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Monday, October 3, 2011

जन्मदिन मुबारक हो विविध भारती

आज विविध भारती के जन्मदिवस विविध भारती और उनके सभी अनांऊसर्स और श्रोताओं को हार्दिक बधाई। इस अवसर पर पर हमने पाठकों और श्रोता बिरादरी ग्रुप पर मित्रों से अनुरोध किया था कि वे अपनी रेडियो से जुड़ी यादें हमें भेजें। तो नेहा शर्मा जी, राजश्री शर्माजी और अखिलेन्द्र प्रताप जी यादव ने अपनी यादें हमें लेख कर भेजी है तो हम सहर्ष उन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

Rajshree Sharma
रेडियो की बात करते ही बचपन की याद आ जाती है ,और बचपन के साथ बरसाती पानी सी हहराती यादें बादलों भरे आसमान में बिजली सी कौंध जाती हैं |ढेरों खट्टी मीठी ,चुलबुली यादें इस मन को वापस वहीं बाबुल के आँगन में खींच ले जाती है | पापा उस समय पचमढ़ी में पोस्टेड थे बेहतरीन ब्रिटिशकाल का बंगला मिला था | भाईजी सबसे बड़े थे और बेहद ज़हीन पर शरारती | हम बहनों पर उनका बड़ा रूआब था | गाने सुनने के बेहद शौक़ीन | उन्होंने ही हम बहनों को रेडियो के चस्के के साथ उसकी तमीज़दारी से भी वाकिफ कराया | पापा के घर में ना होने परऊँचे सुर में गाने सुनने का बड़ा शौक |

उस समय पचमढ़ी का मौसम काफी खुशनुमा हुआ करता था |स्कूलों की छुट्टियाँ भी भारी बरसात के कारण गर्मियों की नहीं बरसात की हुआ करती थी| ऐसे ही भारी बरसात के दिन माँ खाना बना रही थी ,पापा के ऑफिस में होने का फायदा जोर -२ सेरेदियो सुन कर उठाया जा रहा था| गाना बज रहा था "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम" हम दो छोटी बहने आगे कमरे में खिड्की की चौखट पर चढ़े हुए रेडियो के साथ खूब झूम झूम कर गुनगुना रहे थे पीछे के आँगन में बड़ी बहने झूले पर रेडियो के साथ सुर मिला रही थीं | माँ के एक बार मना करने पर मस्ती में हमने ध्यान नहीं दिया, और दुबारा माँ ने टोका तो भाईजी ने बढ़ावा दिया "गाओ गाओ कितना अ
च्छा गा रही हो" तारीफ से फूल कर हम दोनों ने बिना सुर लय ताल के चिल्ला -२ कर गाना शुरू कर दिया , फिर थोड़ी देर बाद पीछे जब बहनों को डांट पड़ी तो भाईजी ने उनका हौसला भी ऐसे ही बढ़ाया| २-४ बार कहना नहीं सुनने पर सप्तम सुर में गाने वाली हम बहनों की जो खिचाई और धुलाई हुई उससे दरअसल में हमारे "नैन रिमझिम रिमझिम" बरसने लगे और भाईजी शरारतसे मुस्कुराने लगे | अब जब भी ये गीत कहीं बजता है तो उन मासूम दिनों को याद करके आँखे भीग जाती हैं और ओठों पर मुस्कराहट आ जाती है

Akhilendra Pratap Singh
आज विविध भारती ने अपने 54 साल पुरे कर लिए और साथ ही साथ मेरी रेडियो भी इसकी आधी उम्र यानि 27वें साल के सफ़र में है. यह रेडियो 1984 में पापा को उनकी शादी में मिली थी. होश सभॉंलने से पहले पता नहीं घर कौन
कितना रेडियो सुनता था और न ही ये पता करने की कोशिश की, लेकिन जब होश सभॅांला तो घर में आकाशवाणी और बीबीसी हिंदी की आवाजों को सुनते पाया । पापा और चाचा जी को संगीत सुनने का कोई खास लगाव नहीं है वे लोग मुख्यत समाचारों और परिचर्चाओं को ही सुना करते थे . शाम के समय अक्सर चाचा जी "युववाणी " सुना करते थे। शुरू-शुरू में इस कार्यक्रम के गाने आकर्षित करने लगे ...थोड़ा बड़े हुए तो क्रिकेट का शौक बड़ा तो रेडियो पर क्रिकेट
कमेन्ट्री सुने जाने लगी...धीरे-धीरे रेडियो प्रेम बढने लगा. .तब आकाशवाणी वाराणसी और गोरखपुर खूब सुने जाते थे ।

एक दिन शोर्ट वेब पर बीबीसी हिंदी ट्यून करते समय एक आवाज़ सुनाई दी " मंथन है आपके विचारों का दर्पण " जिसे युनुस खान अपने चिर- परिचित जोशीले अंदाज़ में पेश कर रहे थे ...थोड़ी देर में ही पता चल गया की यही "देश की सुरीली धड़कन विविध भारती है.".. (इससे पहले विविध भारती के बारे में इतना सुना था की कि यह एक ऐसा रेडियो चैनल है जिस पर हरदम गाने बजते हैं लेकिन कभी ट्युन करने का प्रयास नहीं किया था.) फिर उस दिन से विविध भारती की आवाजें घर में गूँजने लगी....।
कुछ ही दिनों में ममता सिंह , रेनू बंसल , निम्मी मिश्रा , कमलेश पटक, लोकेन्द्र शर्मा ,कमल शर्मा, अशोक सोनावने , युनुस खान ,अमरकांत आदि सभी लोंगो की आवाजों ने मुझे विविध भारती का दीवाना बना दिया.. मैं और दीदी स्कूल से लौटकर पहले सखी सहेली और पिटारा सुनते ।. और रात में समाचार सध्‍ंया के बाद कहकशा , गुलदस्‍ता छायागीत सुनते ।
सुबह में त्रिवेणी , चित्रलोक , और आज के फनकार विशेष रूप सुन जाते थे ...। इन सब कार्यक्रमों के मध्य युनुस खान के साथ मंथन , जिज्ञासा , और यूथ एक्सप्रेस जैसे ज्ञानवर्धक कार्यक्रम विविध भारती के लिए एक अलग पहचान
कायम किये. जिसमे मनोरंजन के साथ साथ ज्ञान भी खूब बटोरे गये .। लोकेन्द्र शर्मा जी द्वारा पिटारा में प्रस्तुत किया जाने वाला कार्यक्रम " बाईस्कोप की बातें " की प्रंशसा के लिए कोई शब्द ही नहीं है मेरे पास ..।

हवामहल कभी कभार ही सुन पाने को मिलता क्योंकि ये पढाई के साथ -साथ बीबीसी हिंदी का भी वक्त होता था ! गत वर्ष ही अमृतसर के डीएवी कालेज द्वारा आयोजित एक रेडियो वर्कशॉप में संदीप सर की मदद से मेरी मुलाक़ात युनुस खान जी और ममता दीदी से हुई, और इसी वर्ष फरवरी में जब मुंबई गया तो विविध भारती स्टूडियो भी गया,शनिवार का दिन होने के कारण सिर्फ ममता दीदी से ही मुलाकात हो पाई ..उनके साथ चित्रलोक और समस के बहाने , वीबीएस के तराने दो कार्यक्रमों लाइव देखा. वाकई ये दोनों दिन मेरी जिन्दगी के सबसे खुबसूरत हैं !!

विविध भारती की इस 54वीं जयंती पर विविध भारती के सभी उद्घोषको को ढेर सारी शुभकामनाएं...
रेडियो प्रेमी
अखिलेन्द्र प्रताप यादव

गृह-नगर - आजमगढ़
(वर्तमान में लखनऊ में रहकर के पढाई कर रह रहा हूँ )
मोबाइल
:-8127842382
e-mail- akhilendra44@gmail.com

नेहा शर्मा
मेरे सपनों की दुनिया- विविध भारती
मुझे याद भी नहीं कि कब से मैं विविध भारती सुनती चली आई हूँ..शायद बहुत छोटी थी तभी ये आदत लग गई थी...और जब से विविध भारती और उसके प्रोग्राम के नाम याद रहने लगे...तब से ही कुछ नाम भी जाने पहचाने लगने लगे...ऐसे ही जाने पहचाने दो नाम थे...कमल शर्मा और युनुस खान...

शायद ये विविध भारती का प्यार ही था जो मुझे वोइसिंग की दुनिया से लगाव हुआ और मैं वोइस आर्टिस्ट भी बन गई..और १६ मई को मुझे एक सुनहरा मौका मिला...विविध भारती जाने का...बस सुबह से ही अपने सपनों की दुनिया में जाने की ख़ुशी संभाले नहीं संभल रही थी...मैं अपने बड़े भाई के साथ जाने वाली थी...उनकी पहचान युनुस भाई (हाँ...युनुस जी को अब तो इस नाम से पुकारा ही जा सकता है..) से इन्टरनेट पर हुई थी....घर से विविध भारती कुछ ४५ मिनट की दूरी पर है..जब घर से निकले तो रास्ते में ही हल्की बूंदाबांदी ने मानो मेरे सपने के सच होने की ख़ुशी में मेरे मन के भावों को बयां किया...ऑटो से हाथ बाहर निकालकर बूंदों को हाथ में लेकर मैंने भी ईश्वर का धन्यवाद किया...

हम विविध भारती पहुंचे...युनुस भाई से पहली बार मिलकर भी कोई औपचारिकता की बातें नहीं हुईं वो कुछ इस तरह से मिले जैसे कोई पुराना दोस्त अचानक मिल जाता है और बस अपने दोस्त के ताज़ा हालचाल पूछ लेता है...कोई औपचारिकता नहीं...?...आश्चर्य तो हुआ...पर जब उनमे अपनी आवाज़ से लोगों को अपना बनाने की ताकत है तो फिर सामने बैठे व्यक्तियों की तो बात ही क्या...

जब हम पहुंचे तब विविध भारती में एक प्रोग्राम लाइव चल रहा था...सखी सहेली...ये प्रोग्राम मेरा बहुत ही फेवरेट हुआ करता था...ऐसा लगता था मानो किसी सहेली से ही बातें हो रही हों..साथ ही इस पर चलने वाला पिटारा और हवा महल भी मेरे पसंदीदा कार्यक्रमों से एक हैं...

खैर उनसे बातें चल ही रही थी की एक शख्स उनसे मिलने पहुंचे और युनुस भाई ने उनका परिचय करवाया कि, "ये कमल जी हैं..." कमलजी भी उन बातों में शामिल हो गए...हंसी- मज़ाक का कुछ ऐसा दौर चला कि ऐसा लगा ही नहीं की हम यहाँ पहली बार आये हैं और इन सभी से पहली बार मिले हैं....(वैसे रेडिओ के जरिये हम तो कई बार इनसे मिल चुके थे...)...कमल जी ने मेरा मार्गदर्शन भी किया कि मुझे विविध भारती के लिए किन- किन बातों पर ध्यान रखना चाहिए...उनसे बातें करके अच्छा लगा....

वैसे सच कहूँ तो ज्यादातर बातें युनुस भाई, कमलजी और मेरे भाई आलोक भैया के बीच ही चल रही थी....मैं तो यहाँ भी एक श्रोता की भूमिका में ही थी....लेकिन सुनकर भी कितना कुछ सीखा जा सकता है ये बातें उस दिन मुझे समझ में आई....दरअसल जब बातें ही इतनी खुबसूरत चल रही हों तो उन्हें बीच में रोकना तो सब से बड़ा गुनाह है....और उनको देखकर कुछ ऐसा लग रहा था..जैसे वो कोई बिछड़े दोस्त हों और कई अरसों बाद मिल गए हों...और जितनी बातें एक-दूसरे से कर सकें...कर लेना चाहते हों...मुझे याद है कुछ २-३ घंटे हमने वहां बिताये...फिर भी लग रहा था जैसे अभी तो आये हैं...

वो दिन कुछ अनोखा था....एक तोहफे की तरह...जो मुझे अचानक से मिल गया था....इस तरह से कभी विविध भारती में जाकर युनुस भाई और कमल जी से मिलने का मौका मिलेगा...सोचा न था....
नेहा शर्मा का ब्लॉग

10 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 04/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

वन्दना said...

बधाइयाँ ……………विविध भारती बहुत सुना है ……………वो यादें ही अलग हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

विविधभारती में बचपन बीता है, अभी तक वही भाता है।

चंदन कुमार मिश्र said...

वाह युनूस भाई। बिहार में तो रेडियो मिर्ची ने कमी लाई है विविध भारती सुनने में लेकिन जब यह नहीं था तब मैंने देखा है कि विविध भारती का क्या मतलब है और मैंने भी जमकर सुना है। मन तो नहीं भरता। लाजवाब है यह…

sanjay patel said...

दुआ कीजिये कि तमाम बाज़ारवाद और ज़िन्दगी में बढ़ रही स्पीड के बाद भी विविध भारती हमारी ज़िन्दगी में बनी रहे..सच मानिये...उसके बने रहने से हम इंसान बने रहेंगे....जियो विविध भारती...हमारे कानों को सुरीला बनाने के लिये धन्यवाद....प्यास बाक़ी है...

सागर नाहर said...

मेरी भी कई यादें जुड़ी है लेकिन इस तेलंगाना अंदोलन के चलते दिन में चार घंटे बिजली की कटौती झेलनी पड़ रही है, एकाद दिन में 6-8 घंते हो जायेगी। ऐसे में यादें आईं और चली गई पोस्ट लिखने का समय भी नहीं मिल पाया.. इस पोस्ट को भी आज सुबह ६ बजे तैयार किया।
मैं राजश्री शर्मा जी, नेहा जी और अखिलेन्द्र प्रताप सिंह जी का आभारी हूँ कि उन्होने समय पर अपनी-अपनी पोस्ट्स भेज दी।
अंत में विविध भारती के सभी अनांऊसर्स को हार्दिक बधाई चौपनवीं वर्षगांठ पर!

Anonymous said...

यादो के समुन्दर में डूबती इतराती मेरी इस अंग्रेजी पोस्ट में मैंने विविध भारती और रेडियो से जुड़े अनुभवों को साझा किया है :

Radio And Vividh Bharati: My Two Extremely Lovable and Sincere Friends


URL: http://wp.me/pTpgO-hC

-Arvind K. Pandey

http://indowaves.wordpress.com/

Manish said...

आज सुबह सुबह रेडियोनामा की भविष्यवाणी हुई और हम चले आये.
यहाँ देखा तो खबर थी ५४ वीं वर्षगाँठ की. औरखिलेन्द्र भाई की मौजूदगी भी.
जब विविध भारती की ५० वीं वर्षगाठ मनाई जा रही थी तब हम रेडियो और विविध भारती के कायल थे. कैसे दिन भर कमरे में पैक थे उस दिन।. आज भी याद है. विविधभारती की ५०वी वर्षगाँठ तक हम विविधभारती साथ थे. और फ़िर कुछ ऐसा खो गया जिसे हम खोना नही चाहते थे.
एक बुरे वक्त की शुरूआत हुई और हम अपनी सभी प्यारी चींजे गवाँ बैठे. अब जब भी यदा कदा विविध भारती सुन भी लेता हूँ तो यादें चुभने लगती है और बेहद तकलीफ़ होती है. कहते हैं कुछ चींजे आपके सपनों से जुड़ी होती है और कुछ ऐसी भी होती है जो उसे पूरा करने को प्रेरित भी करती हैं. क्या हो अगर आपसे वह सपना ही छीन लिया जाय. क्या तब वह प्रेरणायें आपको सुकून बख्शेंगी?
लेकिन इस बात की खुशी है कि अन्य लोग जो अपने सपनों से जुड़े हैं उन्हें अभी तक प्रेरणाये मिल रही हैं.

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri said...

बहुत सी स्मृतियाँ हैं रेडियो और विविध भारती के साथ हमारी...५४ वर्षों के इस स्नेहिल सफर को पूर्ण करने
पर शुभ कामनाएं पूरी टीम को ...सुन्दर भव पूर्ण आलेख
के लिये आभार एवं अभिनन्दन !!!!

vagbhi pathak said...

Comment via mail from vagbhi pathak

विविध भारती को पहेले तो हार्दिक बधाई...
मेरा बचपन जूनागढ़ गुजरात में बिता.. और वहा पर विविध भारती सुने नहीं देता था.. इस लिए हम प्राइमरी रेडियो स्टेशन को सुनते थे... लेकिन जब भी राजकोट में मेरे चाचा के यहाँ आती थी तो विविध भारती सुनने को मिलता था.. और थोड़ी बहोत विविध भारती से पहेचन होती थी..

खैर... अब तो विविध भारती पर में काम भी कर रही हु... और मुझे बहुत अच्छा लगता है... विविध भारती सुनना और विविध भारती पर काम करना... जो मेरी बरसो से ख्वाहिश थी..

और दूसरी ख्वाहिश मेरी इस साल पूरी हुई.. थोड़े ही दिनों पहेले जूनागढ़, गुजरात में विविध भारती का प्रसारण सुने दिया... और मुझे बहुत ख़ुशी हुई... आज में वहा पर तो नहीं रहेती..लेकिन मेरी जैसी कई कहानिया अब वहा नहीं बन पायेगी... और सब लोग वो कहेते है ना शुद्ध और सात्विक कर्यरामो और प्रसारण का आनंद उठा पाएंगे...युही शाखाऐ फैलती रहे.. धन्यवाद्...

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