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Wednesday, May 4, 2016

ताने-बाने, लोकेंद्र शर्मा की जिंदगी के तीसरी कड़ी।

जाने-माने ब्रॉडकास्‍टर और विविध भारती पर हमारे पूर्व साथी लोकेंद्र शर्मा रेडियोनामा पर प्रस्‍तुत कर रहे हैं अपनी जिंदगी की कहानी- 'ताने-बाने'। आज चौथी कड़ी। रेडियोनामा पर लोकेंद्र जी का लिखा सब कुछ पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए

नोट--ताने-बाने श्रृंखला की पहली कड़ी को हमने पूर्व-कथन का नाम दिया है। वो पूर्व कथन ही था। और बाक़ायदा श्रृंखला का आग़ाज उसके बाद वाली कड़ी से ही हुआ है। इसलिए इसे चौथी की बजाय तीसरी कड़ी कहा जा रहा है। गिनती यहां से आगे नियमित रहेगी।

                                    

वैसे तो इतिहास को समय की जूठन कहा जाता है, लेकिन यह जूठन भी उन्हीं की थाली में परोसी जाती है, जो शासन के आसन पर बैठे होते हैं. इसे त्रासदी ही कहिए कि इतिहास की लगाम हमेशा उन्हीं के हाथों में होती है, जिनके हाथों में सरकार की बागडोर होती है. अगर दुनिया की दूसरी जंगी लड़ाई में जर्मनी की जीत हुई होती, तो बेशक आज इतिहास की पोथियां हिटलर की जयजयकार और चर्चिल की दुत्कार से भरी होतीं.
भारत की आजादी के लिए भी अनगिनत लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी. 1857 में मंगल पांडे के बलिदान से सुलगी चिंगारी ने लपटों का रूप धारण करने में तकरीबन एक सदी ले ली और इस दौरान हज़ारों लोगों ने बलिदान दिया. आज़ादी हमें आसानी से नहीं मिली. बंगाल के सुभाष बाबू ने ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ का आह्वान करते हुए आज़ाद हिंद फौज के सिपाहियों को मर-मिटने के लिए प्रेरित किया, तो महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक ने ‘आज़ादी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ की हुंकार लगाकर बरतानवी सरकार की चूलें हिलाईं. 1919 के जलियांवाला बाग़ के शहीदों का नाम कहां लिखा जाएगा ? शहीद भगत सिंह और उनके साथियों के बलिदान को क्या कहेंगे ? सच यही है कि आज़ादी के हवन में अनगिनत लोगों ने अपने प्राणों की आहुतियाँ दीं. लेकिन हुआ यह कि इतिहासकारों की क़लम ने सारा क्रेडिट चंद लोगों और अहिंसा के नारे को समर्पित कर दिया.
बचपन से सुनता आ रहा हूं, ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल’ और सोचता रहा हूं कि क्या गीतकार ने ये पंक्ति लिखते समय बलिदानियों के लहू को बिल्कुल भुला दिया होगा. शायद फिल्मी गाने और सिचुएशन की मजबूरी रही होगी. वर्ना इसी क़लम ने 1943 में ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है’ की ललकार भी लगाई थी. इसी क़लम ने आजादी के बाद, घर में छुपे हुए गद्दारों से संभल कर रहने की चेतावनी भी दी थी. यह दूसरी बात है कि ऐसी चेतावनियों का असर केवल जनमानस के मनोरंजन का साधन भर ही बन सका.
आज़ादी के बाद देश की बागडोर संभालने वाले राजनेता अगर अपनी राजगद्दी पर मोहित होने की जगह देश के लिए भी समय निकाल पाते, पंचशीली मुकुट धारण करके दुनिया भर में अपनी नेतागीरी बघारने की जगह, सूझ-बूझ के साथ भारत के बारे में भी सोच पाते, उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर तैनात सैनिकों में कमी नहीं की जाती, हथियार बनाने वाले हाथों और कारखानों को खिलौने बनाने में नहीं जोता जाता, तो सन् 1962 में देश को चीन के हाथों करारी हार का सामना नहीं करना पड़ता. अब तो इस बात पर कोई चर्चा भी नहीं करता कि भारत का बहत्तर हज़ार वर्गमील इलाका आज भी ड्रेगन के जबड़े में फंसा हुआ है. हमारा तीर्थ कैलाश आज चीन का हिस्सा बन चुका है और वहां की यात्रा के लिए चीन से अनुमति लेनी पड़ती है.
लेकिन यह तो आज़ादी के पंद्रह साल बाद का इतिहास है. शुरूआती दौर के लीडरान की बदौलत सन 48 के कश्मीर युद्ध में भी ‘यहीं रोको, यहीं रोको’ का शोर मचा कर जो ‘लाइन ऑफ़ कंट्रोल’ खीची गयी थी, उसका दंश भारत को अभी जाने कितने बरस और झेलना है. समझ में नहीं आता कि राजमुकुट माथे पर सजाने की ऐसी क्या उतावली थी, जो  ‘ट्रीस्ट ऑफ़ डेस्टिनी’ को थोड़ा टालने की जगह, सिंहासन के दो टुकड़े करने में भी गुरेज़ नहीं किया गया.  कुछ ज्योतिषी ये भी बताते हैं कि आज आज़ादी का त्यौहार बन चुकी, सन 47 की वो तिथियां भारत की कुंडली में कालसर्पदोष का समय था. लेकिन ज्योतिष के इस तर्क में उलझने की जगह, मैं तो बस इतना ही पूछना चाहूँगा कि बंटवारे के नाम पर दस लाख से ज्यादा लोगों के कट-मरने को, क्या आज़ादी की लड़ाई और बलिदान से अलग किया जा सकता है ? आजादी की घोषणा के साथ ही जो हत्याचार मचा, उसे क्या स्वतंत्रता-संग्राम का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिये ? खून में रंगी इस आज़ादी का सारा श्रेय, कोरी अहिंसा के हवाले करना, इतिहास के साथ मज़ाक नहीं है ?
शायद वो सन् 1948 के शुरूआती दिन थे, जब मैंने और मुन्नी ने चौक के दरवाज़े की झिरी से झांककर हॉल में बैठे ढेर सारे बच्चे, औरतें और आदमी देखे. ये वो सिंधी शरणार्थी थे, जो बंटवारे के दंगों से किसी तरह जान बचाकर भीलवाड़ा तक आ पहुंचे थे और बाउजी ने उन्हें अपने घर में शरण दे रखी थी. शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया था, इसलिए लगभग एक-दो दिन तक ये लोग वहीं रहे. साबुन बनाने के लिए, जो बड़ी-बड़ी कढ़ाइयां खरीद कर चौक में संभाल कर रखी गई थी, उनमें आलू की तरकारी और पूरियां तैयार होती और सब लोगों में बांटी जाती. बरून्दंनी (एक गाँव) वाले मांगीलाल जी मामासा और कुछ नौकर इस काम को अंजाम देते. खाते-पीते परिवारों में उन दिनों यह चलन आम था की भंडार में काफी राशन जमा करके रखा जाता था. लेकिन 60-70 लोगों की उस भीड़ में, चार-पांच दुधमुंहे बच्चे भी थे और कर्फ्यू की वजह से उनके लिए दूध की व्यवस्था होना कठिन था. दिन भर उनके रोने की आवाजें आतीं. सुनकर भाभी और बुआजी बहुत विचलित हो जाते. बाद में भाभी ने एक उपाय खोजा. बचा कर रखे गए दूध से दिन में दो-तीन बार, पतीला भर-भर चाय बनाई और उसे चम्मच और कटोरी के साथ दुध-मुहों के लिए, उनकी मांओं में बांट दिया. पीने के पानी की समस्या भी कुछ कठिनाई के साथ दूर हुई. कुएं से पानी भरने के लिए लोगों का बाहर निकलना ज़रूरी था. इसकी अनुमति लेने के लिए बाउजी को थाने तक जाना पड़ा. दो दिन बाद कर्फ्यू में ढिलाई हुई और एक-एक, दो-दो करके शरणार्थी अपने बचे-खुचे परिवारों के साथ ठिकाना ढूंढ़ने के लिए बाहर निकलना शुरू हुए.
इन्ही शरणार्थी परिवारों में फत्तूमल का परिवार भी था. चार औरतें और ढेर सारे बच्चे. फत्तूमल ने हमारी हवेली के बगल में ही एक अधूरा बनाकर छोड़ा हुआ खंडहरनुमा मकान हथिया लिया. बाद में धीरे-धीरे उसकी मरम्मत करवा कर उसे रहने योग्य बनाया गया. इस मरम्मत के दौरान हुई एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी. हमारी और फत्तूमल की छत के बीच में जो छोटी सी मुंडेर थी, उसे उठा कर ऊंची दीवार में बदल दिया गया था. इतनी ऊंची कि उस पार का हमें कुछ भी दिखाई नहीं देता था. उस घर में कौन रहता है, क्या करता है ये सब मेरे लिए रहस्य बन गया.
बाद में एक दिन जब दोपहर में बड़े सब लोग सो रहे थे और हम बच्चों का सीढ़ी-सम्मेलन हो रहा था, तब मुझे प्यास लगी. वहां से उठकर पानी पीने के लिए अपने घर जाने में खतरा था कि बुआजी या भाभी, ‘कठै घूमतो फिर्रयो है गर्मी में, चल सो जा थोड़ी देर’ कहकर धमक देंगी और वापस नहीं आने देंगी. भोजू और मूला ने सलाह करके एक रास्ता निकाला. मुझे अपने घर में ऊपर लेकर गए. मैंने फत्तूमल के घर को यानी अपनी छत की दीवार के उस पार के रहस्य को, पहली बार अंदर से देखा. औरतें और छोटे बच्चे, अन्दर वाले कमरे में सो रहे थे. किसी किसी के हाथ में झला जाता पंखा भी दिखाई दिया. बरामदे में एक तिपाई पर विशालकाय मटका रखा था. मटके का मुंह मिट्टी की प्लेट से ढंका था और प्लेट पर एक पुराना टेढ़ा-मेढ़ा पिचका सा अल्यूमीनियम का गिलास औंधा रखा था. घर के सब लोग इसी इकलौते गिलास में पानी पीते थे. मुझे कुछ संकोच तो हुआ, पर प्यास लगी थी, सो मैंने भी पी लिया. फत्तूमल के घर के अंदर की बस यही एक झलक याद है मुझे.
शरणार्थियों की आमद के बाद भीलवाड़ा में हलचल बढ़ गई. जगह-जगह छोटी-बड़ी दूकानें खुल गईं. सामने इमली के पेड़ के नीचे पनवाड़ी की दूकान के अगल-बगल में भी एक-दो दूकानों ने जगह हथिया ली. पनवाड़ी के सामने इस पटरी पर एक भडभूंजे ने अपनी भट्टी लगा ली. उसकी भट्टी से लगातार भुने हुए चने और मूंगफली की खुशबू आती रहती. हमारे घर के पिछवाड़े की दीवार से सटा कर किसी ने कोयले की एक टाल खोल ली. टाल में काम करने वाले सब लोग कोयले में रंगे काले-भुजंग और भडभूंजे की दूकान में पीले-मैले. इलाक़ा शरणार्थियों के रंगीन पसीने से आबाद हो रहा था.
सड़क पर लोगों की आवाजाही भी बढ़ी. महाराणा टॉकिज के सामने खाने-पीने का सामान लिए कुछ ठेले और टोकरी वाले आ जमे. इनमें एक मोटा मूंगफली वाला भी था. उसकी विशेषता ये थी कि शाम को वो अपनी मूंगफलियों के साथ आ बैठता और खूब ऊंची आवाज़ में चिल्लाता, ‘गर्मा-गर्रम मीठी-मीठी’. मूंगफली वाले के गले में जाने कौन सी फ्रीक्वेंसी फिट थी कि उसकी आवाज़ मीलों दूर तक सुनाई देती. हमें अपने घर के बरामदे में ज्यों ही उसकी आवाज़ सुनाई देनी शुरू होती, हम समझ जाते कि अब महाराणा टॉकिज में शाम का शो शुरू होने वाला है. उन दिनों बस दो ही शो होते थे. एक शाम का, एक रात का, लेकिन छुट्टी वाले दिन दोपहर को भी एक शो होता था.
महाराणा टॉकिज के अलावा भीलवाड़ा में एक और सिनेमाघर था - प्रताप टॉकिज. एक सिनेमा हमारे घर के सामने था और बरामदे से दिखाई देता था, दूसरा दूर पिछवाड़े के मकानों की भीड़ और पेड़ों के पीछे छुपा था. प्रताप टॉकिज की छत टीन की चद्दरों से ढंकी थी. और अंदर चलती हुई फिल्म की आवाज़ बाहर तक सुनाई देती थी. जीवन में पहली बार अकेले फिल्म देखने का आनंद मैंने इसी टॉकिज में उठाया था.
बाउजी किसी काम से अजमेर गए थे. जाने से पहले उन्होंने मुझे और मुन्नी को एक-एक दुअन्नी दी थी. आज की पीढ़ी के लिए शायद ये जानकारी मज़ेदार हो कि उन दिनों नए पैसे का चलन शुरू नहीं हुआ था. एक रुपए में सोलह आने, एक आने में चार पैसे और एक पैसे में तीन पाई होती थी. सिनेमा का टिकट नौ पैसे में आता था. बाउजी मुझे दुअन्नी यानी आठ पैसे दे गए थे. दोपहर को मुझे अकेले फिल्म देखने का खयाल आया. खयाल बड़ा रोमांचकारी था. मैंने काफ़ी मिन्नतें करके मुन्नी से एक पैसा उधार लिया और मुट्ठी में नौ पैसे दबाए, लगभग दौड़ता हुआ प्रताप टॉकिज तक पहुंचा. टिकट खिड़की में मुट्ठी घुसाकर हांफते-हांफते टिकट मांगा और टिकट लेकर हॉल में दाखिल हुआ. अंदर घुप्प अंधेरा था. परदे पर फिल्म चल रही थी. कौन सी थी, कितनी निकल चुकी थी, कुछ मालूम नहीं. बस मैं अकेला फिल्म देखने आया हूं, इस बहादुरी की झुरझुरी सी लगी थी. अंधेरे में किसी का पैर कुचला, किसी से धक्का और किसी से गाली खाई फिर किसी ने खींच कर बेंच पर बैठा दिया. इस दौरान मेरी नज़रें बराबर परदे पर जमी रही. उस फिल्म के बारे में मुझे कुछ याद नहीं है, पर अकेले फिल्म देखने के रोमांच को आज तक नहीं भूला हूं.
परिवार के साथ फिल्म देखने का एक नियम था. जब कोई अच्छी फिल्म आने वाली होती, बाउजी पहले से बता देते कि फलां फिल्म आएगी, सब लोग देखने जाएंगे. आमतौर पर ये धार्मिक फिल्में होती थीं. मुझे याद है हम सब मिलकर महाराणा टॉकिज में फिल्म ‘रामराज्य’ देखने गए थे. मुझे और मुन्नी को लव-कुश ने बहुत प्रभावित किया था. लव-कुश का गाया हुआ गाना, ‘भारत की इक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं, मिथिला की राजदुलारी की हम व्यथा सुनाते हैं’ हम बहुत दिनों तक अपनी बेसुरी आवाज़ में गाते रहे थे. फिल्म में और क्या-कुछ था, वो तो हमें महत्वपूर्ण नहीं लगा, लेकिन एक बात पर मैं और मुन्नी पूरे सहमत थे कि लव-कुश भगवान राम के कंधे तक आते हैं. मुझे एक और फिल्म की याद है, जिसका नाम ‘मुरलीवाला’ या शायद कुछ और था. भाभी की गोदी में उन दिनों छोटू था और फिल्म के बीच में उसके रोने की संभावना रहती थी, इसलिए मैं और मुन्नी, बुआजी के साथ प्रताप टाकीज में यह फिल्म देखने गए. फिल्म में एक दृश्य था कि कृष्ण राधा को बुलाने के लिए बांसुरी बजा रहे हैं और राधा को बाहर जाने की मनाही है. वो बावली सी कभी खिड़की तक जाती, कभी दरवाज़े तक. परदे पर कृष्ण बांसुरी बजाये जा रहे हैं और राधा की छटपटाहट बढती जा रही है. इधर मेरी बगल में पूरे भक्ति भाव से हाथ जोड़ कर बैठी बुआजी की भोली-बेचैनी भी बढ़ रही थी. भरे गले से बोलीं, ‘बस प्रभु, बस’. मैंने उनकी तरफ देखा, तो कोहनी से मुझे घुड़क कर उन्होंने आदेश दिया, ‘हाथ जोड़.’ मैं आज्ञाकारी सा चुपचाप हाथ जोड़ कर बैठ गया.
बुआजी की शादी, जब वे चार बरस की थीं, तभी हो गई थी. बीसवीं सदी के शुरूआती दौर में, बाल-विवाह कोई विचित्र बात नहीं थी. एक बार मैंने अपने घर में किसी पेंटर द्वारा बनाई हुई एक रोबदार चेहरे वाले आदमी की तस्वीर देखी थी. सिर पर बड़ा सा साफा और बदन पर पुलिस की वर्दी. बताया गया कि ये मेरे दादाजी पंडित गौरीशंकर जी की तस्वीर है. वे उदयपुर राज्य के ओहदेदार थे. दादाजी पुलिस अधिकारी थे यानी पढ़े-लिखे थे, इसलिए अनुमान है कि बाल-विवाह के पक्षधर भी नहीं रहे होंगे. लेकिन सुना है, उन्हें अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था और वे अपने सामने ही बेटी का विवाह करवा देना चाहते थे. इसीलिए बुआजी का इतनी छोटी आयु में ही ब्याह करवा दिया गया. अपने बेटे (बाउजी) की भी उन्होंने, गांव बरुंदणी की एक लड़की धापूबाई से सगाई करवा दी. ये दोनों काम करने के कुछ ही दिनों बाद, मेरे दादाजी पंडित गौरीशंकर शर्मा ने सचमुच संसार त्याग दिया.
हमारे पैत्रिक गाँव साड़ास से करीब पच्चीस-तीस कोस की दूरी पर एक गाँव था - बेगूं. यही बुआजी का ससुराल था. यहीँ के पंडित ललिताप्रसाद के छोटे भाई के साथ उनका विवाह हुआ था. बुआजी का नाम था चन्द्रप्रभा और उनके पति यानी हमारे फूफाजी का नाम था पंडित चंद्रशेखर शर्मा.
बाउजी का नाम हरीबल्लभ था. वैसे सही शब्द तो ‘वल्लभ’ है, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा ‘व’ की जगह ‘ब’ का प्रयोग करते ही पाया. गाँव के लोगों के लिए शायद ‘हरिबल्लभ’ भी कठिन शब्द था, इसलिए गाँव में वे ‘हरभजन’ कह कर पुकारे जाते थे.
नाम की चर्चा चली है, तो मुझे 1959-60 की एक घटना याद आ गई. उन दिनों हम दिल्ली के तेलीवाड़ा की पनिहारी गली में रहते थे. गाँव से कुछ लोग बाउजी से मिलने दिल्ली आये. गली का नाम वे भूल गए, लेकिन उनके लिए बाउजी एक बड़ी हस्ती थे, सो सोचा नाम लेकर पूछने से भी घर मिल जाएगा. किसी राह चलते से पूछा, “हरभजन जी कठे रेवें ?” जिस से पूछा वो कोई पंजाबी प्रौढ़ था. सवाल को जितना समझा, उस के हिसाब से जवाब दिया, “इधर सज्जे हाथ की गली में जाओ. उत्थे ही है हरभजन”. गाँव के लोग गली में पहुंचे तो देखा, जाजम बिछी हुई है और उस पर बहुत सारे लोग बैठ कर हारमोनियम-ढोलकी के साथ कीर्तन यानी हरिभजन कर रहे हैं.
नाम की महिमा अपार है. मैं ‘राम-नाम’ की नहीं, नाम की बात कर रहा हूँ. जिस नाम से आदमी पुकारा जाता है, उस नाम का आदमी के व्यकित्व-विकास पर गहरा असर पड़ता है. दिल्ली में जब मैं आठवीं क्लास में था, तब एक मास्टरजी थे, जिन्हें सब के.एल. बंधु के नाम से जानते और पुकारते थे. पूरा नाम हमने कभी सुना नहीं. मास्टरजी का व्यवहार क्लास के साथ ज़रा दोस्ताना सा था. हंसी मज़ाक और चुटकुलों के साथ पढ़ाते थे, इसलिए बच्चे भी उनसे खुल गए थे. एक दिन एक बच्चे ने पूछ लिया, “माष्टर्जी आपका पूरा नांव क्या है ?” सवाल सुन कर मास्टरजी के चहरे पर जो खिसियाना भाव आया था, मुझे आज भी याद है.
न्यूमरोलोजी यानि अंक विज्ञान के जानकारों का दावा है कि अंकों के हिसाब से नाम के अक्षरों में थोड़ा उलट-फेर और तोड़-जोड़ करके, दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदला जा सकता है. इस तर्क को सफलता का मन्त्र मानने वाले, ख़ास तौर पर फिल्मी दुनिया से जुड़े कई लोगों ने, अपने नामों को औंधी-सीधी वर्तनी में लिखना शुरू किया हुआ है. टीवी संसार की जानी-मानी एकता कपूर अपने हर सीरियल का नाम ‘क’ से शुरू करने को, उसके हिट होने की गारंटी मानती हैं. फिल्म निर्माता-निर्देशक जे ओमप्रकाश का विश्वास था कि फिल्म का नाम ‘अ’ से शुरू करेंगे, तो उनकी फिल्में टिकट-खिड़की पर खूब पैसा बटोरेंगी. चूंकि ऐसी धारणाओं का आधार शुद्ध व्यक्तिगत-विश्वास होता है, इसलिए यहाँ किसी तर्क की गुंजाइश नहीं है. आपका अपना नाम है, जैसा भी रखना चाहें, पूरी छूट है.
लेकिन एक ज़माने में, अपना नाम स्वयं रखने का चलन नहीं था, केवल बुज़ुर्ग नामकरण करते थे और व्यक्ति को जीवनभर उसी नाम के साथ गुज़ारा करना पड़ता था, चाहे वो नाम ऐंगा हो या भेंगा. हमारे मास्टरजी के एल बंधु के साथ भी यही हुआ था. उनका नाम रखा गया था - कंछी लाल, जिसे थोड़ी समझ आ जाने के बाद, सार्वजानिक करते हुए उन्हें संकोच होने लगा था. उस दिन भी हुआ, जब एक छात्र के पूछने पर, उन्हें ब्लैक-बोर्ड पर अपना पूरा नाम लिख कर बताना पड़ा था.
मुझे घर में सब मुन्ना कहते थे और मुझसे बड़े, जब तक रहे, मुन्ना ही कहते रहे. आज मुझे मुन्ना कह कर पुकारने वाली सिर्फ बड़ी बहन मुन्नी रह गई है, जिसे घर के सारे लोगों के साथ मोहल्लेवाले भी ‘जीजी’ कहते हैं. सब के साथ ‘जगत जीजी’ को अब मैं भी जीजी कहने लगा हूँ. लेकिन पहली कक्षा के सर्टिफिकेट पर इस मुन्ना का नाम लिखा है – लोकनाथ शर्मा.
             
                 


अपनी दूसरी कक्षा का कोई रिकॉर्ड मुझे बाउजी की पुरानी फ़ाइल में नहीं मिला. सुना है, आज़ादी के बाद, सरकार ने यह फैसला किया गया था कि नई पीढ़ी को जल्दी से जल्दी डिग्री याफ्ता बनाया जाए, ताकि आज़ाद भारत में पढ़े-लिखों की तादाद बढ़ सके. इस फैसले के आधार पर हमें, पहली के बाद सीधे तीसरी कक्षा में बैठा दिया गया था. यानी हमने दूसरी कक्षा पढ़ी ही नहीं. मेरे वार्षिक परीक्षाफल के  सर्टिफिकेट में लिखा हुआ सन भी इस बात की पुष्टि करता है. लेकिन तीसरी कक्षा के सर्टिफिकेट में मेरा नाम लोकेन्द्र कुमार शर्मा हो गया है.
          


यह नाम-परिवर्तन कब, कैसे और क्यों हुआ, मुझे नहीं मालूम. लेकिन हाँ इस नाम का मेरे व्यक्तित्व के संवरने-बिगड़ने पर खासा असर रहा. एक तो यह नाम ‘कॉमन’ नहीं है. जीवन में मुझे ‘लोकेन्द्र’ नाम वाले अन्य लोग गिने-चुने ही मिले. इस बात को लेकर मैं अक्सर इतराता भी रहा. लेकिन मेरा नाम उच्चारण की दृष्टि से थोड़ा कठिन है, इसलिए लोग हमेशा अपने-अपने हिसाब से ज़बान को आराम देने वाले अंदाज़ में मुझे पुकारते रहे. दिल्ली के पंजाबी दोस्तों और उनके घरवालों के लिए मैं कभी ‘लुकिंदर’ और कभी ‘लोकेंदर’ रहा. डॉली ठाकुर मुझे हमेशा ‘लोकी’ कहती रहीं.
एक दोस्त की बहन तो मुझे आता हुआ देखते ही पुकार कर अपने भाई को सूचित करती, “पाइय्या जी, ‘कलंदर’ आया वे”. एक बार दोस्तों की महफ़िल में जब मैंने यही बात बताई, तो मेरी एक परिचित आशिमा सिंह इतने ज़ोर-ज़ोर से ठहाके मार कर हंसी कि उसकी आँखों में आंसू आ गए. बोली, “ कलंदर ? ये बात मैं अपने हसबेंड को ज़रूर बताउंगी.” मेरी समझ में नहीं आया कि इसमें ऐसी कौन सी बात है, जो हसबेंड को बताना ज़रूरी है. लेकिन बाद में मुझे किसी ने बताया कि आशिमा के पतिदेव का नाम भी ‘लोकेन्द्र’ है. इस जानकारी के बाद हुआ ये कि मैं जब भी आशिमा की तरफ देखता, मेरी नज़रें मुस्कराना नहीं भूलतीं. जिन दोस्तों को प्यार जतलाना होता वे मुझे, ‘लोकू’ कहते. बहुत चाह थी कि आशिमा से पूछूं, वो अपने लोकेन्द्र को किस नाम से पुकारती है, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हुई.
कुल मिला कर अपने नाम के साथ, मुझे केवल इस बात पर तसल्ली करनी पड़ी कि रेडियो प्रोग्रामों की एनाउन्समेंट में मेरा नाम हमेशा सही-सही बोला जाता है.
अपने नाम और एक सीमा तक कुछ और नामों के भी, जो नए नए रूप मैंने देखे-सुने, इससे एक बात ज़हन में बैठ गई कि किसी का भी नाम बहुत सोच-समझ कर रखा जाना चाहिए. और फिर मन ही मन मैंने ‘नामकरण’ की एक व्याकरण बनाई.


                 


2 comments:

9214530357 said...

वाह वाह आपके साथ हम सभी पुराने दौर में चले गए ।
यादें ही रह जाती हे ,यादें ही
याद आती हे । धन्यवाद लोकेन्द्र शर्मा जी (मेने सही नाम लिखा हे ना ?)

चंद्रकांत बर्वे said...

बहोत खूब लोकेंद्र जी

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