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Friday, September 24, 2010

शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 23-9-10

विविध भारती की शुरूवात से ही जिस श्रेणी के कार्यक्रम शुरू हुए हैं वो आज भी अनवरत चले आ रहे हैं। यह हैं हिन्दुस्तानी शास्त्रीत संगीत के कार्यक्रम। विविध भारती ने अपने फिल्मी स्वरूप से इसे जोड़ कर रखा हैं। अलग रूपों में शास्त्रीय संगीत श्रोताओं तक पहुंचाया जाता रहा हैं। आजकल इसके दो कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं संगीत सरिता और राग-अनुराग

प्रमुख कार्यक्रम हैं संगीत सरिता जिसका प्रसारण हर दिन सुबह की सभा में होता हैं। यह वास्तव में शिक्षाप्रद कार्यक्रम हैं। 15 मिनट के इस कार्यक्रम को नियमित सुनने से हमें घर बैठे ही हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का ज्ञान मिलता हैं। इसके अलावा प्रमुख कलाकारों से बातचीत भी सुनने का अवसर मिलता हैं। अपने फिल्मी स्वरूप को बनाए रखते हुए हर दिन की जाने वाली शास्त्रीय संगीत की चर्चा से सम्बंधित फिल्मी गीत भी सुनवाए जाते हैं। साथ ही शास्त्रीय पद्धति में गायन और वादन भी सुनवाया जाता हैं। इसकी संकेत धुन भी बढ़िया हैं, एकदम कार्यक्रम के अनुरूप। धुन को सुन कर ही समझ में आ जाता ही कि शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम हैं। कार्यक्रम के शुरू और अंत में बजती हैं यह धुन।

राग अनुराग 15 मिनट का साप्ताहिक कार्यक्रम हैं जिसमे विभिन्न रागों पर आधारित फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं।
लेकिन खेद हैं कि शुद्ध हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का आनंद देने वाला कार्यक्रम अनुरंजनि बंद कर दिया गया हैं। इस कार्यक्रम में केवल शास्त्रीय गायन और वादन सुनवाया जाता था जिसमे बहुत बड़े कलाकारों को भी सुनने का आनंद मिलता था। अनुरोध हैं कि इस कार्यक्रम का प्रसारण फिर से शुरू कीजिए। वैसे भी शास्त्रीय संगीत का प्रसारण आकाशवाणी के स्थानीय केन्द्रों से होता हैं पर अन्य चैनलों से लगभग नहीं होता हैं ऐसे में अनुरंजनि का बंद होना शास्त्रीय संगीत प्रेमियों के लिए दुखद हैं, क्योंकि आजकल युवा वर्ग में भी शास्त्रीय संगीत के प्रति रूझान देखा जा रहा हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

7:30 बजे संगीत सरिता में श्रृंखला प्रसारित की गई - रसवर्षा। इस समय वर्षा ऋतु अपने चरम पर हैं। ऐसे में यह श्रृंखला सुनना अच्छा लगा। आरंभिक उदघोषणा भी अच्छी थी, यहाँ संगीत संयोजन से माहौल भी वर्षा ऋतु का रखा गया। इसमे वर्षा ऋतु की रचनाएं प्रस्तुत की गई। राग मल्हार के अलावा अन्य रागों में भी गायन का आनंद मिला। अतिथि कलाकार थे ख्यात गायक संजीव अभ्यंकर।

शुक्रवार को राग मधुकौंस सुनवाया गया। पहले अभ्यंकर जी ने इस राग का चलन बताया। फिर इस राग में सूरदास का पद प्रस्तुत किया। पहले पूरा पद सुनाया, कृष्ण राधा से सम्बंधित इस पद के भाव बताए। उसके बाद इस पद को मध्यम लय में तीन ताल में सुनाया -

ये ऋत रुसने की नाही
बरसत मेह
बोलत कुंवर कन्हाई

उसके बाद इस राग पर आधारित फिल्मी गीत सुनवाया गया - इन्तेहा हो गई इन्तेजार की

शनिवार को राग रामदासी मल्हार सुनवाया गया। पहले अभ्यंकर जी ने इस राग का चलन बताया। फिर इस राग में गायन प्रस्तुत किया -

सावन के बदरा आए
कारी फिर घटा छाए
अंधियारी बीच बिजुरी चमके

उसके बाद इस राग पर आधारित फिल्मी गीत सुनवाया गया जो मीरा की रचना हैं - म्हारा री गिरधर गोपाल दूसरा न कोया

रविवार को अंतिम कड़ी प्रसारित की गई जिसमे राग था गुर्जरी तोडी। इस दिन भी पहले राग का चलन बताया गया। फिर द्रुत एक ताल में बंदिश सुनाई। पहले पूरा पद सुनाया फिर गायन प्रस्तुत किया -

बरसन गुजर गए मेहा
लाल मनावत तू नही मानत

अंत में इस राग पर आधारित अमर प्रेम का गीत सुनवाया - रैना बीती जाए श्याम न आए

इस श्रृंखला को वीणा (राय सिंघानी) जी के तकनीकी सहयोग से रूपाली रूपक जी ने प्रस्तुत किया।

सोमवार से श्रृंखला शुरू हुई - ताल। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं सुप्रसिद्ध सितार और तबला वादक नयन घोष। शुरूवात में बताया कि तबले में तीन ताल लोकप्रिय हैं। इन कड़ियों में स्वतन्त्र तबला वादन में तीन ताल को ही आधार बना कर चर्चा की गई। इसमे सोलह मात्राएँ हैं जिसे बजाकर बताया। जानकारी दी कि इसी ठेके को आधार बना कर संगीत संयोजन किया जाता हैं। इसकी उठान बताई और समझाया कि पेशगार विभिन्न घरानों के अलग-अलग होते हैं। दिल्ली घराने का पेशगार बजा कर बताया। इसके लिए हारमोनियम पर साथ दिया गुरूदत्त जी ने और सारंगी पर साथ दिया दिलशाद खाँ ने। इए कड़ी का समापन भी बढ़िया रहा - तीन ताल में निबद्ध बैजू बावरा फिल्म से रफी साहब की गाई यह भक्ति रचना सुनवाई -

हरी ॐ मन तडपत हरी दर्शन को आज

मंगलवार को तबला वादन में कायदा की जानकारी दी। बताया कि कायदा एक तरह की बंदिश हैं जिसमे बोल बंधे होते हैं जो बुजुर्गो ने बनाए हैं। इस कायदे को आगे बढाया जाता हैं और यह आगे बढाने या बढ़त करने का सिलसिला महत्वपूर्ण हैं। दिल्ली घराने का दो ऊंगलियों का बाज सुनाया जो किनार की आवाज हैं। इसके बाद लखनऊ घराने का कायदा भी बजा कर सुनाया। दोनों बार सुनाने से पहले तबले के बोल बताए फिर दोनों घराने के बारीक अंतर को भी स्पष्ट किया। तबले का आनंद लेने के बाद रफी साहब की आवाज में कोहिनूर फिल्म का गीत सुना - मधुबन में राधिका नाचे रे

बुधवार को तबले का रेला और रौ पर चर्चा हुई। बहुत अच्छी तरह से समझाया कि ये बोलो की बंदिशों की प्रस्तुति हैं। कायदे में बोल दिखते हैं पर रेले में बोल महीन हैं। इन बोलो को धीरे-धीरे आगे बढाया जाता हैं जिस तरह से पानी का रेला आगे बढ़ता हैं। जब इन बोलो का सिर्फ ढांचा बजाया जाए तो इसे रौ कहते हैं। दिल्ली और लखनऊ घराने की शैली में रौ और रेला बजा कर सुनाया। उस्ताद अमीर हुसैन खाँ की शैली में भी प्रस्तुत किया। इस दिन फिल्मी गीत नही सुनवाया गया, समय नही था।

गुरूवार को तबले की लड़ी और रौ पर चर्चा हुई। बताया कि जब बोल एक के बाद एक गुंथे जाते हैं तब उसे लड़ी कहते हैं। बनारस घराने के अनोखे लाल जी की शैली में लड़ी प्रस्तुत की और बताया कि इससे लड़ी को लोकप्रियता मिली। गुरूदेव ज्ञानदेव प्रकाश जी की शैली भी प्रस्तुत की। रौ भी प्रस्तुत किया जिसके बारे में जानकारी दी कि इसकी शुरूवात लखनऊ घराने से हुई जिसका आधार मुहर्रम में बजने वाला वाद्य हैं।

अंत में कल्पना फिल्म का गीत सुनवाया - तू हैं मेरा प्रेम देवता

इस श्रृंखला को भी रूपाली रूपक जी ने प्रस्तुत किया वीणा (राय सिंघानी) जी के सहयोग से, तकनीकी सहयोग दिनेश (तापोलकर) जी का रहा। शुक्रवार को छोड़ कर हर दिन फिल्मी गीतों का चुनाव अच्छा रहा।

गुरूवार को शाम बाद के प्रसारण में 7:45 पर प्रसारित हुआ कार्यक्रम राग-अनुराग। इस कार्यक्रम में विभिन्न रागों पर आधारित गीत सुनवाए गए। ऐसे गीत चुने गए जो शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम के लिए उचित रहे।

शुरूवात की राग खमाज से - बहारों की महफ़िल सुहानी रहेगी (पुरानी फिल्म बेनजीर - आवाज लता जी की) यह गीत बहुत ही कम सुनवाया जाता हैं।
राग मधुमाग सारंग - यारा सिली सिली (नई फिल्म लेकिन - आवाज लता जी की)
राग दरबारी - राधिके तूने बंसुरी चुराई (पुरानी फिल्म बेटी-बेटे - आवाज रफी साहब की)
राग रागेश्वरी - अब के न सावन बरसे (बीच के समय की फिल्म किनारा - आवाज लता जी की)

इस तरह गाने नए पुराने चुने गए पर चारों एकल (सोलो) गीत रहे और तीन गीत लता जी के रहे। चुनाव में विविधता होती तो कार्यक्रम अधिक अच्छा लगता।

2 comments:

MUFLIS said...

ऐसी रोचक और विलक्षण जानकारी के लिए
बहुत बहुत आभार ....
जाने क्यूं ,, मुझे गलत फ़हमी थी कि
"रैना बीती जाए....."
राग 'ललित' पर आधारित है
अब आप ने बताया तो मालूम पडा गुर्जरी तोड़ी
शुक्रिया .

annapurna said...

संगीत-सरिता कार्यक्रम की आज की कड़ी में आपकी बात स्पष्ट हो गई। एक पुरानी श्रृंखला का फिर से प्रसारण हो रहा हैं - मेरी संगीत यात्रा जिसमे आर डी बर्मन, गुलज़ार और आशा भोंसले बातचीत कर रहे हैं। आज इस गीत की चर्चा हुई। आप भी यह बात मानते ही हैं कि फिल्मी गीत फिल्म की कहानी के अनुसार तैयार किए जाते हैं इसीलिए गीत राग पर आधारित होते हैं।

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