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Sunday, July 17, 2011

अलविदा साप्ताहिकी

मुझे साप्ताहिकी लिखते हुए तीन वर्ष होने को आए। तीन वर्ष पहले 15 अगस्त के दिन मैंने पहली साप्ताहिकी लिखी थी। पहले वर्ष मैं पूरे कार्यक्रमों पर लिखने का प्रयास करती थी। कार्यक्रमों सबंधी पूरी जानकारी देना कठिन हो जाता था। पोस्ट लम्बी होती जाती थी फिर भी बहुत सी बाते अनकही रह जाती थी। इसीलिए मैंने दूसरे वर्ष में एक-एक समय के प्रसारण पर लिखना शुरू किया जैसे सुबह के प्रसारण, दोपहर के प्रसारण वगैरह। फिर मुझे लगा कि अब भी कुछ बाते हैं जो मैं कह नही पा रही जैसे गैर फिल्मी गीतों का सिमटता प्रसारण वगैरह। इसी बात को ध्यान में रख कर तीसरे वर्ष में मैंने विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत कार्यक्रमों की चर्चा शुरू की जिसमें सभी तरह की चर्चा विस्तार से करने का मौक़ा मिला। एक-एक श्रेणी के अंतर्गत सभी कार्यक्रमों में क्या, कैसे प्रसारित हुआ, मेरी नजर में क्या सही रहा और कहाँ क्या हो सकता, इसकी भी चर्चा मैंने बेबाकी से की। इस तरह विविध भारती के कार्यक्रमों के प्रति मैंने अपना दृष्टिकोण रखा जिसे आप पिछले सप्ताह तक पढ़ते रहे। अब साप्ताहिकी से मैं विदा ले रही हूँ लेकिन रेडियोनामा से जुड़ी रहूंगी।

Monday, July 11, 2011

महिला और युवा वर्ग के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 10.7.11

पिछले लगभग दो दशको से ही विविध भारती पर महिलाओं के लिए अलग से कुछ कार्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं जिनमे से पहला नियमित कार्यक्रम सखि-सहेली सात वर्ष पहले ही शुरू हुआ। दोपहर बाद 3 बजे से 4 बजे तक सोमवार से शुक्रवार तक इसका प्रसारण होता हैं। सोमवार से गुरूवार तक हर दिन दो प्रस्तोता सखियाँ आपस में बतियाते हुए इस कार्यक्रम को आगे बढाती हैं। इस सप्ताह प्रस्तोता सखियाँ रही - रेणु (बंसल) जी, शेफाली (कपूर)जी, शहनाज (अख्तरी) जी, निम्मी (मिश्रा) जी और इस बार तीसरे प्रस्तोता की तरह प्रस्तुतकर्ता डा रेखा (वासुदेव) जी भी पधारी।

सामान्य बाते की गई और कुछ छोटी-मोटी सलाहे भी दी जैसे बारिश के मौसम में साफ़ सफाई रखे,खाने-पीने की देखभाल करे, पानी उबाल कर पिए, एक सलाह अच्छी रही कि पीने के पानी में फिटकरी चलाए जिससे थोड़ी देर बाद गंदगी नीचे जम जाएगी। एक खबर यह थी कि अन्टार्कटिका से आए एक पक्षी का ऑपरेशन कर उसमे से रेत निकाली गई, इसी पर पर चर्चा करते हुए बताया कि चरने वाले पशुओं के पेट में प्लास्टिक भी चला जाता हैं आगे इसी चर्चा से प्लास्टिक के उपयोग को कम करने की सलाह भी दी। पर्यावरण की सुरक्षा, शिक्षा का महत्त्व बताया और परीक्षा के परिणाम घोषित होने के इस समय को ध्यान में रखते हुए असफलता से घबराना नही बल्कि सफलता के लिए प्रयत्न करने चाहिए जैसी महत्त्व की बाते भी बताई गई, घर की सजावट पर भी चर्चा हुई। सखियों ने भी पत्रों के माध्यम से कुछ बाते लिख भेजी जैसे माँ का महत्त्व। सखियों की पसंद पर नए पुराने गीत सुनवाए गए जिनमे से कुछ फरमाइशी गीत मौसम के अनुसार थे।

सोमवार को श्रोता सखियों से प्राप्त पत्रों से कचौरी और दाल की मुठिया बनाना बताया गया। एक सखि ने पनीर से सम्बंधित विस्तृत जानकारी लिख भेजी। पुराने गीत सुनवाए - मिलन, आँखे, आप की परछाइयां, अनपढ़, फागुन, आया सावन झूम के फिल्म का शीर्षक गीत और सावन फिल्म का गीत - भीगा भीगा प्यार का समां बता दे तुझे जाना हैं कहाँ। मंगलवार को युवा सखियों के लिए अर्थ शास्त्र में बी ए विषय लेकर कैरिअर बनाने की जानकारी दी। युवा सखियों के लिए नई फिल्मे सिंग इज किंग, फरेब, रब ने बना दी जोडी के गीत सुनवाए, दिल तो पागल हैं और यह दिल आशिकाना हैं फिल्मो के शीर्षक गीत भी सुनवाए और गुरू फिल्म का गीत बरसों रे मेघा नन्ना रे भी शामिल था। इस तरह इस दिन का प्रसारण सिर्फ लड़कियां ही नही समूचे युवा वर्ग के लिए उपयोगी रहा। बुधवार को स्वास्थ्य और सौन्दर्य के लिए काजल, लिपिस्टिक के प्रयोग में सावधानी बरतने की सलाह दी। चेहरे के धब्बे आदि से सम्बंधित कुछ पुराने नुस्के थे। कुछ पुरानी फिल्मो जूनून, लैला मजनूं, आशा, दो रास्ते के गीत सुनवाए और यलगार फिल्म का यह गीत भी सुनवाया - आखिर तुम्हे आना हैं ज़रा देर लगेगी। गुरूवार को विशेष रहा, गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास आँख की किरकिरी का अगला अंश ममता (सिंह) जी ने पढ़ कर सुनाया। पिछले अंशो को भी संक्षिप्त में बताया ताकि निरन्तरता बनी रहे। सफल महिला की गाथा में प्रेमा पूरब के बारे में जानकारी दी जो बचपन में स्वास्थ्य के कारण सामान्य नही थी। फिर स्वाधीनता के संघर्ष में लगे सेनानियों को भोजन पहुंचाने का काम करने लगी और साथ सन्देश भी पहुंचाती थी। इसके बाद चालीस और पचास के दशक में महिला मजदूरों को गर्भवती होने पर काम से हटा दिया जाता था। तब इन मजदूर महिलाओं के साथ मिलकर खाना बना कर मजदूरो तक पहुंचाने का काम शुरू किया जिससे उन महिलाओं को अच्छी आय होने लगी। यह काम आज भी कई महिलाएं करती हैं। प्रेरणादायी रहा यह प्रसंग। यह जानकारी भरा आलेख और मंगलवार का करिअर सम्बन्धी आलेख उन्नति (वोरा) जी ने तैयार किया था। इस दिन नई फिल्म रावण का यह गीत भी सुनवाया जो कम ही सुनवाया जाता हैं - बहने दे मुझे बहने दे घनघोर घटा, इसके साथ कृष्णा कॉटेज, डर फिल्मो के गीत सुनवाए और यह लोकप्रिय गीत भी सुनवाया - हमको सिर्फ तुमसे प्यार हैं।

रेखा जी ने कहा कि कार्यक्रम सम्बंधित सुझाव भेजे जा सकते हैं, हमारा सुझाव हैं पत्र कुछ कम पढ़िए। इस सप्ताह भी पत्र अधिक ही रहे। श्रोता सखियाँ तो पत्र लिखती ही रहती हैं, बाते भी कुछ ख़ास नही रहती, वही सुनी-सुनाई बाते जिससे कार्यक्रम संतुलित नही लगता। हमारा अनुरोध हैं कि सिर्फ गुरूवार के बजाए चारो दिन उपन्यास वाचन रखिए जिससे संतुलन बना रहेगा।

शुक्रवार को यह फोन-इन-कार्यक्रम के रूप में हैलो सहेली शीर्षक से प्रसारित होता हैं। इसका उप शीर्षक अच्छा हैं -सखियों के दिल की जुबां - हैलो सहेली। वाकई लगता हैं सखियाँ दिल से बात करती हैं। इस बार कुल 9 फोन कॉल थे। सखियों से फोन पर बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने। दो फोन कॉल बहुत प्रेरणादायी रहे। एक सखि ने बताया कि वह अध्यापिका हैं, बच्चो को सभी विषय पढ़ाती हैं और साथ ही घर भी संभालती हैं, दूसरा कॉल ज्यादा अच्छा रहा, श्रोता सखि ने बताया कि उसने घर को सहयोग देने के लिए पढाई छोड़ दी थी पर अब कॉलेज की पढाई जारी रखे हैं, एक-दो गृहणियों ने बात की, एक-दो कामकाजी महिलाओं ने बात कि जो ब्यूटी पार्लर और सिलाई का काम करती हैं, एक-दो स्कूल की लड़कियों ने भी बात की जिसमे से एक ने सत्तर के दशक की फिल्म आराधना का यह गीत सुनने की फरमाइश की - कोरा कागज़ था जीवन मेरा, एक-दो ने बहुत ही कम बात की, एक ने अमर अकबर एंटोनी फिल्म की क़व्वाली सुननी चाही तो अच्छा लगा क्योंकि आजकल क़व्वालियों की फरमाइश कम ही आती हैं। एक सखि ने कहा कि उसका भाई उससे दूर हैं जिसे वह यह गीत समर्पित करना चाहती हैं - चन्दा रे मेरे भैया से कहना बहना याद करे पर शायद निम्मी जी ठीक से सुन नही पाई और तुरंत काजल फिल्म के गीत के बारे में कहा और सुनवाया भी वही गीत - मेरे भैया मेरे चन्दा मेरे अनमोल रतन। इस कार्यक्रम को माधुरी (केलकर) जी के सहयोग से प्रस्तुत किया गया, तकनीकी सहयोग स्वाति (भंडारकर) जी का रहा। अंत में बताया कि इस कार्यक्रम के लिए बुधवार को दिन में 11 बजे से फोनकॉल रिकार्ड किए जाते हैं जिसके लिए नंबर बताया 28692709 और मुम्बई का एस टी डी कोड 022

शनिवार को रात 7:45 पर 15 मिनट के लिए प्रसारित हुआ सामान्य ज्ञान का साप्ताहिक कार्यक्रम जिज्ञासा जिसका उपशीर्षक बढ़िया हैं - ज्ञान की रेडियो एक्टिव तरंग। यह कार्यक्रम सभी वर्ग के श्रोताओं के लिए रूचिकर और युवा वर्ग के लिए उपयोगी हैं। इस बार पहला स्तम्भ रहा स्पोर्ट्स पेवेलियन जिसमे भारतीय महिला हॉकी टीम के विश्व में शीर्ष 10 में आने की खबर दी साथ ही हाल ही में हुए विम्बलडन की भी जानकारी दी। दूसरा स्तम्भ रहा - फिटनेस मंत्रा जिसमे एक शोध अध्ययन की जानकारी देते हुए बताया कि नींद सेहत के लिए बहुत जरूरी हैं। तीसरा और अंतिम स्तम्भ रहा - टाइम मशीन - समय यात्री जिसमे जाने-माने निर्देशक मणिकौल पर जानाकारी दी। पिछले दिनों उनका निधन हुआ। बताया कि उन्होंने लीक से हट कर फिल्मे बनाई - आषाढ़ का एक दिन जो जाने माने हिन्दी लेखक मोहन राकेश के नाटक पर आधारित हैं, उसकी रोटी, दुविधा जिसके दुबारा पहेली नाम से अमोल पालेकर द्वारा बनाने की भी जानकारी दी। हम यहाँ एक और बात बता देते हैं कि उसकी रोटी भी मोहन राकेश की कहानी पर आधारित हैं। इस तरह इस बार भी यह कार्यक्रम दूर-दराज के श्रोताओं के लिए अधिक उपयोगी और शहरी श्रोताओं से कुछ दूर ही लगा। मुझे लगता हैं अगर प्रश्न पूछे जाए और श्रोताओं से उत्तर देने के लिए कहा जाए तो शायद शहरी युवा इससे जुड़े। शोध, आलेख और स्वर युनूस (खान) जी का रहा। सम्पादन किया पी के ए नायर जी ने और इसे प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने।

चलते-चलते हम आपको बता दे कि यह सभी कार्यक्रम हमने हैदराबाद में एफ़ एम चैनल पर 102.8 MHz पर सुने।

Monday, June 20, 2011

शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 19.6.11

शास्त्रीय संगीत के दैनिक कार्यक्रम संगीत सरिता में दो पद्धतियों का आनंद देती श्रृंखला प्रसारित हुई - कर्नाटक पद्धति के कुछ राग और उनकी मान्यताएं आमंत्रित कलाकार हैं शकुन्तला नरसिम्हन इसके पहले भाग में विभिन्न रागों की चर्चा हुई। पट्टनम सुब्र्हामण्यम ने लगभग 150 साल पहले राग कट्टन पुट्टूवलम बनाया। यह अंग्रेजो का शासन काल था इसीसे इस राग की गायन शैली में अंग्रेजियत हैं लेकिन इसके स्वर राग शंकराभरणम से लिए गए, इन्ही स्वरों का हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का राग हैं - बिलावल। इस राग में शेष गोपालम का गायन सुनवाया गया और जल तरंग वादन भी सुनवाया। राग सौराष्ट्रम और मध्यमावती के बारे में बताया कि इनमे मंगलम गाया जाता हैं। यह अच्छी जानकारी दी कि कार्यक्रम का समापन मंगलम से किया जाता हैं ताकि कार्यक्रम के दौरान अगर राग और गायन शैली आदि को लेकर कोई अशुभ बात हुई हो तो इससे वातावरण ठीक हो जाए। इनके स्वर ही ऐसे हैं कि वातावरण शांत लगता हैं। इन दोनों रागों के हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के समान राग बताए - राग भैरवी और बिलावल राग सौराष्ट्रम के लिए और मध्यमावती के लिए राग मदमादी सारंग। ख्यात गायिका एम एस सुब्बा लक्ष्मी का मंगलम गायन और डा एम रमणी का बाँसुरी वादन सुनवाया। दूसरे भाग में 19 वी शताब्दी के तिरूअनन्तपुरम के राजा स्वाति तिरुनाल की हिन्दी रचनाएं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय पद्धति में प्रस्तुत की गई जो ख्यात कवि और संगीतज्ञ थे। संस्कृत, मलयालम और हिन्दी में उन्होंने रचनाएं की। राग वृन्दावनी सारंग में गायन - चलिए कुंजन हो तुम हम श्याम हरि और इस राग पर आधारित फिल्म चश्मेबद्दूर का गीत सुनवाया - कहाँ से आए बदरा। राग धनाश्रयी की चर्चा हुई जिसके स्वर हिन्दुस्तानी पद्धति के राग भीमपलासी के समान हैं। राग धनाश्रयी में शिवस्तुति सुनवाई - सीस गंग भस्म अंग और राग भीमपलासी में रामराज्य फिल्म का सरस्वती राणी का गाया गीत सुनवाया - वीणा मधुर-मधुर बोल। ये दोनों शास्त्रीय गायन ध्रुपद शैली में थे। हिन्दुस्तानी पद्धति के राग दरबारी कानडा में भगवद गीता के प्रसंग पर आधारित रचना सुनवाई - देवो के पति इंद्र तारों के पति चन्द्र जिसमे कर्नाटक पद्धति के राग पल्लवी के स्वर हैं। इन रागों पर चर्चा भी हुई और राग दरबारी पर आधारित मेरे हुजूर फिल्म का मन्नाडे का गाया गीत सुनवाया - झनक झनक तोरी बाजे पायलिया। अंतिम दो कड़ियों में राग भैरवी पर चर्चा हुई कि दक्षिण की भैरवी अलग हैं जिसमे काफी थाट के स्वर लगते हैं। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय पद्धति की भैरवी में कहरवा ताल में रचना सुनवाई -रामचंद्र प्रभु तुम बिन प्यारे कौन खबर ले। प्रचलित दादरा ताल में सुनाया - विश्वेश्वर दर्शन कर। इस राग पर आधारित डा हरिवंश राय बच्चन की सरस्वती वन्दना सुनवाई - माता सरस्वती शारदा जिसे लताजी और दिलराज कौर ने फिल्म आलाप के लिए गाया हैं। समापन कड़ी में दोनों पद्धतियों में भैरवी के स्वर गाकर सुनाए जिससे फर्क समझ में आया। श्रृंखला का समापन किया फिल्म दूज का चाँद के मन्नाडे के गाए इस गीत से - फूल गेंदवा न मारो लगत करेजवा पे चोट। समापन पर श्रोताओं को पता भी बताया गया जिससे कार्यक्रम के सम्बन्ध में श्रोता पत्र लिख सके, पता हैं - संगीत सरिता, विविध भारती सेवा, पोस्ट बॉक्स नंबर 19705 मुम्बई - 400091

सुबह 7:30 बजे 15 मिनट के लिए प्रसारित इस श्रृंखला को चित्रलेखा (जैन) जी के सहयोग से रूपाली रूपक जी ने प्रस्तुत किया, तकनीकी सहयोग दिनेश (तापोलकर) जी का रहा। इस तरह कर्नाटक और हिन्दुस्तानी दोनों ही संगीत शैलियों के संगम का आनंद मिला। अब प्रतीक्षा हैं रविन्द्र संगीत के प्रसारण की.....

गुरूवार को रात 7:45 पर 15 मिनट के लिए प्रसारित हुआ साप्ताहिक कार्यक्रम राग-अनुराग जिसमे विभिन्न रागों पर आधारित फिल्मी गीत सुनवाए गए। शुरूवात अच्छी हुई, बहु चर्चित राग खमाज पर आधारित गाइड फिल्म का गीत सुनवाया लता मंगेशकर और साथियो की आवाज में - इन आँखों से नैना लागे रे। इसके बाद ऐसा राग सुनवाया जो कम ही सुनवाया जाता हैं, राग भटियार जिस पर आधारित सुरैया का गाया फिल्म रूस्तम सोहराब का उदास मूड का गीत सुनवाया - ऐ दिलरूबा। यहाँ तक ठीक रहा पर तीसरा गीत राग भीमपलासी पर वही सुनवाया जो सुबह संगीत सरिता में सुनवाया गया था, रामराज्य फिल्म से। इस लोकप्रिय राग में किसी गायक की आवाज में अच्छे मूड के गीत का चुनाव बेहतर होता क्योंकि अभी तक गायिकाओ के ही गीत सुनवाए गए थे और समापन भी युगल गीत से था। यह युगल गीत राग आसावरी पर आधारित था, इस राग की चर्चा बहुत अधिक नही होती। इस तरह रागों का संयोजन अच्छा रहा पर गीतों का नही।

चलते-चलते हम आपको बता दे कि यह सभी कार्यक्रम हमने हैदराबाद में एफ़ एम चैनल पर 102.8 MHz पर सुने।

Monday, June 13, 2011

साप्ताहिकी 12-6-11

दिन का पहला-पहला कार्यक्रम हमने सुना 6:30 बजे - तेरे सुर और मेरे गीत जो युगल गीतों का कार्यक्रम हैं। इसके बाद 7 बजे प्रसारित होता हैं पुराना लोकप्रिय कार्यक्रम भूले-बिसरे गीत। पहले कार्यक्रम में अधिकतर गीतों का चुनाव अच्छा रहा जैसे आराधना, पाकीजा, गुमराह फिल्म का यह गीत - इन हवाओं में इन फिजाओं में तुझको मेरा प्यार पुकारे। दोनों में साठ के दशक की फिल्मो के गीत सुनवाए, एक्का-दुक्का गीत पचास और सत्तर के दशक के भी थे। कभी-कभार आधे-आधे घंटे के ये दोनों ही कार्यक्रम मुझे लगभग एक जैसे लगे। फर्क सिर्फ इतना कि एक में सिर्फ युगल गीत सुनवाए गए। इसमे हलाकू जैसी फिल्मो के गीत सुनवाए गए और मिर्जा ग़ालिब फिल्म का तलत महमूद और सुरैया का गाया यह गीत - दिले नादाँ तुझे हुआ क्या हैं जो अक्सर भूले बिसरे गीत कार्यक्रम में सुनवाया जाता हैं। हद तो तब हो गई जब सोमवार को नागिन का हेमंत कुमार और लता जी का गाया युगल गीत पहले कार्यक्रम में सुना फिर अगले ही दिन इसी फिल्म का दूसरा गीत भूले बिसरे गीत कार्यक्रम में सुना। युगल गीतों के कार्यक्रम में गीतों का चुनाव तर्क संगत होने से दोनों कार्यक्रम अलग-अलग हो जाएगे जो अच्छा रहेगा।

भूले बिसरे गीत कार्यक्रम में सुमन कल्याणपुर,शमशाद बेगम जैसी आवाजे सुनना, राकेट टार्जन, सात समुन्दर पार जैसी भूली बिसरी फिल्मे और कुछ ऐसे गीत सुनना भी अच्छा लगा जिससे जुड़े सभी नाम भूले-बिसरे हैं - फिल्म का नाम मतलबी दुनिया, गायिका सुलोचना चौहान, गीतकार रमेश मेहता, संगीतकार भरत चौहान, गीत के बोल - हमको इण्डिया बहोत पसंद। ऐसे लोकप्रिय गीत भी शामिल थे जो अक्सर सुनवाए जाते हैं जैसे - मैं प्रेम की गलियों का राजा तू रूप की नगरी की रानी। कार्यक्रम तो अच्छा रहा लेकिन बहुत पुराने सुनहरे दौर के गीत सुनने को नही मिले जैसे लाल मोहम्मद के स्वर बद्ध किए, सुरेन्द्र, श्याम, उमा देवी के गाए गीत। अगर हो सके तो सप्ताह में एक दिन पचास के दशक और उससे पहले के गीत सुनवाइए।

7:30 बजे संगीत सरिता में बढ़िया श्रृंखला प्रसारित हुई - उपशास्त्रीय संगीत के विभिन्न रूप। इन विभिन्न रूपों को बताया ख्यात ठुमरी गायिका शोभा गुर्टू ने जिनसे चर्चा की ख्यात गायिका सरला भिड़े ने। इस श्रृंखला को छाया (गांगुली) जी ने 1992 में तैयार किया था। इसमे होरी, कजरी, झूला, लोक गीत, बारहमासी, समापन कड़ी में भैरवी लोकगीत पर चर्चा हुई, राग पीलू, शिवरंजनी, माज खमाज, पहाडी, जौनपुरी में शोभा जी ने गाकर सुनाया साथ ही शास्त्रीय गायन और वादन भी सुनवाया गया - रसूलन बाई का ठुमरी गायन, पंडित रविशंकर का सितार वादन, उस्ताद नजाकत अली खां और सलामत अली खां की गाई पहाडी ठुमरी, उस्ताद रज्जब अली खां का गायन, उस्ताद बरकत अली खां की गाई भैरवी ठुमरी। इस तरह शुद्ध शास्त्रीय संगीत का आनंद देने वाले, अब बंद हो चुके कार्यक्रम अनुरंजनि की कमी नही खली। हर दिन राग पर आधारित फिल्मी गीत भी सुनवाए गए। संग्रहालय से बेहतरीन प्रस्तुति। इसके बाद प्रसारित हुआ विचारोत्तेजक कार्यक्रम त्रिवेणी जिसमे चर्चा हुई कि जीवन जीना भी एक कला हैं जिसने जाना वो सफल हुआ, संस्कृति की बात चली कि हम पाश्चात्य संस्कृति को अपना रहे हैं, जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं, वक़्त को दोष दिए बिना उसका सामना करना चाहिए, यही भाव अगले दिन भी थे पर इसे जल धारा के समान जीवन के रूप में प्रस्तुत किया गया, यह भी चर्चा चली कि जीवन में हर दिन एक चुनौती हैं, सकारात्मक सोच बनाए रखे, समाज की स्थिति पर इस मुहावरे को बताते हुए चर्चा की - जहां चने हैं वहां दांत नही और जहां दांत हैं वहां चने नही, जीवन में आगे बढ़ने के दो रास्ते हैं, एक लंबा मेहनत का रास्ता और दूसरा छोटा रास्ता जिसमे कई गलत बाते हैं। चर्चा के दौरान विषय पर आधारित तीन फिल्मी गीत सुनवाए गए, नए-पुराने गीतों का चुनाव बढ़िया रहा जैसे - अपने हुए पराए किस्मत ने क्या दिन दिखलाए हाय रे धीरज कौन बंधाए, ये तो जिन्दगी हैं कभी खुशी हैं कभी गम और नई फिल्म जन्नत का गीत - दुनिया का क्या .... पत्थर को छू कर मैं सोना बना दूं जन्नत यहाँ। दोनों ही कार्यक्रमों की संकेत धुन बढ़िया हैं।

दोपहर के प्रसारण में फरमाइशी फिल्मी गीतों के एक-एक घंटे के दो कार्यक्रम प्रसारित हुए - 12 बजे प्रसारित हुआ आधुनिक तकनीक से सजा कार्यक्रम SMS के बहाने VBS के तराने। यह एक घंटे का दैनिक सजीव (लाइव)प्रसारण हैं। इसमे गाने सुनने के लिए किसी इन्तेजार की जरूरत नही, तुरंत फरमाइश भेजिए और तुरंत सुनिए अपनी पसंद का गीत। फरमाइशी खतों की परम्परा से दूर इस इंस्टेंट फरमाइशी कार्यक्रम से युवावर्ग सहज ही विविध भारती से आकर्षित हो गया। फरमाइशी गीत सुनना भी आसान हैं, बस, मोबाइल के मैसेज बॉक्स में जाकर टाइप करना हैं - vbs - फिल्म का नाम - गाने के बोल - अपना नाम और जगह (शहर,गाँव) का नाम और भेज दे इस नंबर पर -5676744

और इन संदेशों को 12 बजे से 12:50 तक भेजने के लिए कहा गया और यह भी कहा गया कि हर सन्देश में दो श्रोताओं के नाम ही भेजे ताकि अधिक SMS शामिल किए जा सकें। कार्यक्रम के शुरू में फ़िल्मों के नाम बताए गए और कार्यक्रम के अंत में अगले दिन की फ़िल्मों के नाम बताए गए ताकि फरमाइश भेजने में आसानी हो। पूरे सप्ताह अधिकाँश फिल्मे सत्तर के दशक की रही। फिल्मो के चुनाव में विशेष अवसरों का भी ध्यान रखा गया। बुधवार को ऎसी फिल्मे चुनी गई जिनमे डिम्पल कपाडिया ने अभिनय किया और शुरूवात की उनकी महत्वपूर्ण फिल्म बौबी के गीत से। इस दिन उनका जन्मदिन था। श्रोताओं की फरमाइश पर विभिन्न मूड के गीत सुनवाए जैसे फिल्म प्रेमनगर का गीत - ठंडी हवाओं ने साजन को नटखट बना दिया, मौसम के अनुसार छतरी न खोल उड़ जाएगी गीत, प्रतिज्ञा फिल्म से यमला पगला दीवाना गीत भी शामिल था। इस कार्यक्रम की संकेत धुन सुन कर लगता हैं मोबाइल बज रहा हैं या SMS आ रहा हैं। इस कार्यक्रम को साइमन परेरा जी, राजीव (प्रधान) जी, गणेश (शिंदे) जी के तकनीकी सहयोग से हम तक पहुंचाया गया और पूरे सप्ताह इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक (छिब्बर) जी ने।

दोपहर 1:30 बजे का समय रहा मन चाहे गीत कार्यक्रम का। एक घंटे के इस कार्यक्रम की प्रस्तुति पारंपरिक और आधुनिक दोनों ढंग से हैं यानि दो दिन बुधवार और गुरूवार को ई-मेल से भेजी गई फरमाइश से गीत सुनवाए जाते हैं और शेष दिन पुराने तरीके से पत्रों से प्राप्त फरमाइश के अनुसार गीत सुनवाए जाते हैं। नए-पुराने गीतों के लिए श्रोताओं ने फरमाइश भेजी। सोमवार को बीते दिन मनाए गए पर्यावरण दिवस को ध्यान में रख कर बूँद जो बन गई मोती फिल्म से यह गीत भी शामिल किया - हरी भरी वसुंधरा पे नीला-नीला ये गगन। ईमेल से पुरानी और बहुत पुरानी जैसे सरस्वती चन्द्र और दादीमाँ फिल्मो के गीत सुनने के लिए भी फरमाइश भेजी और वीरजारा जैसी नई फिल्मे भी शामिल थी।

इन दोनों कार्यक्रमों के बीच में 1:00 बजे आधे घंटे के लिए प्रसारित होता हैं कार्यक्रम हिट-सुपरहिट जिसे रात 9 बजे दुबारा प्रसारित किया जाता हैं। रविवार को छोड़कर हर दिन किसी एक कलाकार पर केन्द्रित हिट-सुपरहिट गीत सुनवाए जाते हैं। सोमवार को संगीतकार आदेश श्रीवास्तव के जन्मदिन के अवसर पर उन्ही पर केन्द्रित रहा यह कार्यक्रम। शिल्पा शेट्टी अभिनीत फिल्मो के गीत सुनवाए गए जबकि पिछली रात एक ही फनकार कार्यक्रम उन्ही पर केन्द्रित था जिसका स्वरूप हिट-सुपरहिट जैसा ही था। अभिनेता विनोद खन्ना, संगीतकार सलीम-सुलेमान, निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट, गायक शान के गीत सुनवाए गए। गीतों के साथ कलाकार से सम्बंधित कुछ जानकारी भी दी गई। रविवार को आयोजन रहा - फेवरेट फाइव। इसमे कोई एक कलाकार आमंत्रित होते हैं, अपने पसंदीदा पांच गीत बताते हैं इस बार आमंत्रित रही बीते समय की मशहूर अभिनेत्री कामिनी कौशल। यह दूसरी कड़ी थी। अपनी पसंद के बेहतरीन गाने सुनवाए जिसमे वो फिल्मे शामिल थी जिसमे उन्होंने काम किया। बहुत पुरानी फिल्म जेलर जिसमे सोहराब मोदी के साथ काम किया, पुरानी फिल्म दो रास्ते का गीत भी शामिल था और देश भक्ति गीत भी - मेरा रंग दे बसंती चोला।

दोपहर बाद के प्रसारण में सोमवार से शुक्रवार तक 3 बजे से एक घंटे के लिए प्रसारित हुआ महिलाओं के लिए कार्यक्रम, गुरूवार तक हैलो सहेली कार्यक्रम में हर दिन दो प्रस्तोता सखियाँ आपस में बतियाते हुए कार्यक्रम को आगे बढाती हैं साथ ही फरमाइश के गीत भी सुनवाए जाते हैं। प्रस्तोता सखियाँ रही - ममता (सिंह) जी, निम्मी (मिश्रा) जी, शहनाज (अख्तरी) जी। प्रस्तुति में हल्का सा परिवर्तन अच्छा लग रहा हैं, खासकर गुरूवार के प्रसारण में। गुरूवार को गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के चर्चित उपन्यास आँख की किरकिरी का वाचन हुआ। पता चला कि यह पिछले सप्ताह ही शुरू हुआ। ममता जी बहुत अच्छा पढ़ कर सुना रही हैं। हमारा अनुरोध हैं कि चारो दिन यह उपन्यास पढ़ कर सुनाइए। हर दिन इसका कुछ अंश सुनना सुखद रहेगा। अब पूरे प्रसारण में सखियों के पत्र पढ़ने के बजाय केवल अंतिम आधे समय में पत्र पढ़े जा रहे हैं और शुरू का आधा घंटा किसी विषय पर दोनों प्रस्तोता सखियाँ बतियाती हैं। सोमवार को पर्यावरण दिवस के सन्दर्भ में बतियाते हुए अच्छी सलाह दी कि घर में जब भी कोई शुभ दिन हो तब एक पेड़ लगा दे। व्यंजनों में मूंग की दाल का पराठा और सखियों के पत्रों से टमाटर का हलवा बनाना बताया गया। स्वास्थ्य और सौन्दर्य के नुस्के बताए। सफल महिलाओ की गाथा में नसीमा हुर्जूर के बारे में बताया जो रीढ़ की हड्डी की समस्या से विकलांग हुई फिर प्रशिक्षित होकर आत्मनिर्भर बनी। इसके लिए आलेख उन्नति (वोहरा) जी ने तैयार किया।

बुधवार को कुछ तकनीकी खराबी से आवाज ठीक से सुनाई नही दी पर तुरंत ही ठीक कर दिया गया। सखियों की फरमाइश पर हर दिन अलग-अलग दौर के फिल्मी गीत सुनवाए गए। बहुत पुराने गीत जैसे भीगी रात फिल्म का गीत -दिल जो न कह सका, पुराने गीत जैसे मेघा रे मेघा रे मत परदेस जा रे। हर दिन सखियों के पत्र पढ़े गए जिनमे से घरेलु नुस्के बताए गए, दोस्ती, पूजा का महत्त्व बताया। शुक्रवार को प्रसारित हुआ हैलो सहेली कार्यक्रम। श्रोता सखियों से फोन पर बातचीत की ममता (सिंह) जी ने। विभिन्न स्तर की श्रोता सखियों से बात हुई - छात्र, कम शिक्षित, अशिक्षित गृहणीयों ने फोन किए। एक सखि ने बातो ही बातो में खम्मन ढोकला बनाने की विधि बता दी। एक ने बताया कि उसके पास कुछ छात्र आते हैं जिन्हें वो फैशन डिजाइनिंग सिखाती हैं। सखियों की पसंद पर नए-पुराने गीत सुनवाए गए जैसे नागिन फिल्म से - तेरे संग जीना तेरे संग मरना, कुछ ऐसे गीत भी सुने जो बहुत ही कम सुनवाए जाते हैं। कार्यक्रम के समापन पर बताया गया कि इस कार्यक्रम के लिए हर बुधवार दिन में 11 बजे से फोन कॉल रिकार्ड किए जाते हैं जिसके लिए फोन नंबर भी बताए - 28692709 मुम्बई का एस टी डी कोड 022 दोनों कार्यक्रमों के लिए अलग-अलग संकेत धुन सुनवाई गई। प्रस्तुति मनीषा(जैन)जी की रही सहयोग रीता (गोम्स)जी का।

सप्ताहांत में इस एक घंटे का प्रसारण अलग रहा। 3:30 बजे तक शनिवार को प्रसारित हुआ सदाबहार नगमे कार्यक्रम जिसमे मेरे सनम, ससुराल जैसी साठ के दशक की फिल्मो के सदाबहार गीत सुनवाए गए। रविवार को प्रसारित हुआ कार्यक्रम सदाबहार नगमे सन्डे स्पेशल। मेरे लाल फिल्म का गीत सुनवाया - पायल की झंकार हंसते हंसते ढूंढें तेरा प्यार रस्ते रस्ते जिसे बहुत दिन बाद सुनना अच्छा लगा। तीसरी मंजिल, अनुपमा फिल्मे भी शामिल थी। 3:30 बजे नाट्य तरंग कार्यक्रम में शनिवार और रविवार को नाटक सुनवाया - दुल्हन का दाम। इस नाटक के मूल लेखक हैं लोमेर दाई और हिन्दी रूपान्तरकार हैं आरती दास बैरागी और निर्देशक हैं तरूण आजाद डेका। परम्पराओं के नाम पर महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को दर्शाया गया। पंचायत ने महिला के हक में फैसला सुनवाया। अच्छी प्रेरणादायी रचना, प्रस्तुति दिल्ली केंद्र की रही।

शाम 4 से 5 बजे तक हर दिन प्रसारित हुआ कार्यक्रम पिटारा जिसमे हर दिन अलग-अलग कार्यक्रम प्रसारित हुए। इसकी अपनी संकेत धुन हैं और हर कार्यक्रम की अलग संकेत धुन हैं। इसमे सोमवार का कार्यक्रम महत्वपूर्ण रहा - सेहतनामा। इस कार्यक्रम में डा गीता बिरला से युनूस (खान) जी की बातचीत प्रसारित हुई। बातचीत का विषय था - यकृत प्रत्यारोपण (लीवर ट्रान्सप्लानटेशन)। बताया कि शराब पीने से लीवर खराब हो जाता हैं, हेपीटाईटीस के शिशुओं को लगाए जाने वाले टीको की जानकारी दी। पीलिया रोग और अन्य संक्रमण की जानकारी भी दी। महत्वपूर्ण बात यह बताई कि लीवर के प्रत्यारोपण में 80-90% मामलों में सफलता मिली हैं। लीवर देने वाले से 60% भाग निकाला जाता हैं और दूसरे को लगाया जाता हैं और बहुत जल्द दोनों में लीवर अपने पूरे आकार में आ जाता हैं क्योंकि शरीर का यही एक ऐसा अंग हैं जो तेजी से बढ़ता हैं। इसीलिए लीवर दान देने के लिए सन्देश भी दिया। अन्य महत्वपूर्ण बात यह बताई कि ब्रेन डेथ यानि मस्तिष्क पहले काम करना बंद करने पर लीवर निकालना आसान होता हैं और अगर ह्रदय काम करना पहले बंद कर दे तो थोड़ा कठिन हो जाता हैं। प्रत्यारोपण के बाद डाक्टर की देखरेख में नियमित दवाई लेने से कोई समस्या नही होगी। इस काम में 10-20 लाख का खर्च हैं। इस कार्यक्रम को सुनील भुजबल जी के तकनीकी सहयोग से तनूजा कोंडाजी कानरे जी ने प्रस्तुत किया।

बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में मेहमान रही कवियित्री और गीतकार माया गोविन्द जिनसे बातचीत की अमरकांत (दुबे) जी ने। शुरू में इस कार्यक्रम की संकेत धुन के स्थान पर इस श्लोक का गायन सुना - अथ स्वागतम शुभ स्वागतम, आनंद मंगल मंगलम, इत प्रियम भारत भारतम। बातचीत की शुरूवात अच्छी हुई और आगे भी अच्छा बढी, जानकारी मिली कि बचपन से ही रेडियो की कलाकार हैं, फिर संगीत, नृत्य की शिक्षा ली, नाटको में काम किया, विवाह हुआ और टूटा। मंच पर काव्य प्रस्तुति द्वारा अभिनेता भारत भूषण से मुलाक़ात और फिल्म जगत में प्रवेश। उनके गीतों पर चर्चा हुई, गीत सुनवाए। क़ैद फिल्म के गीत करा ले साफ़ करा ले, कानो का ये मैल को लेकर चर्चा अच्छी रही कि फिल्म की सिचुएशन के अनुसार गीत लिखे फिर कार्यक्रम समाप्त हो गया। एक महत्वपूर्ण बात रह गई, उनके कुछ गीतों की आलोचना हुई कि गीत द्विअर्थी हैं। इस मुद्दे पर चर्चा हो सकती थी पर इस मुद्दे को छुआ भी नही गया। इस कार्यक्रम को रमेश (गोखले) जी के सहयोग से शकुन्तला (पंडित) जी ने प्रस्तुत किया। शुक्रवार को प्रसारित हुआ सरगम के सितारे जिसमे बातचीत हुई पार्श्व गायक मनहर उदहास से। यह सातवी कड़ी थी। बातचीत की युनूस (खान) जी ने। नब्बे के दशक की फिल्म जान के शीर्षक गीत के बनने की चर्चा की। संगीतकार ओ पी नय्यर से मुलाक़ात की चर्चा की और खेद जताया कि यह भेंट तब हुई जब नय्यर साहब फिल्म जगत छोड़ चुके थे। अमिताभ बच्चन के साथ किए गए स्टेज शोज की भी चर्चा की। इस कार्यक्रम को विनायक (रेणके) जी के तकनीकी सहयोग से तनूजा कोंडाजी कानरे जी ने प्रस्तुत किया। रविवार को प्रस्तुत हुआ कार्यक्रम उजाले उनकी यादो के जिसमे पार्श्व गायक मन्नाडे से कमल (शर्मा) जी की बातचीत प्रसारित हुई। शुरूवाती बात हुई कि चाचा के सी डे के माध्यम से फिल्मो में आए। शंकर राव व्यास को याद किया। शुरू में उच्चारण में होने वाली दिक्कतों की भी चर्चा की। सहगल साहब और पंकज मलिक को याद किया। यह गीत भी सुनवाया - केतकी गुलाब जूही चम्पक बन फूले। विभिन्न गीतों के लिए उन्हें मिले एवार्ड्स की भी चर्चा हुई। इस कार्यक्रम को कैलाश नाथ वर्लीकर जी के तकनीकी सहयोग और कमला (कुंदर)जी के सहयोग से कमल (शर्मा) जी ने प्रस्तुत किया।

मंगलवार, गुरूवार और शनिवार को प्रसारित हुआ कार्यक्रम हैलो फरमाइश जिसमे फोन पर कई श्रोताओं ने विविध भारती के विविध कार्यक्रमों को पसंद करने की बात बताई। विभिन्न स्तर के श्रोताओं ने फोन किया - छात्र, अलग-अलग तरह का काम करने वाले जैसे टेलर, ब्रेल लिपि सिखाने वाले टीचर। अपने-अपने काम के बारे में बताया। साथ ही कुछ और बाते भी पता चली जैसे राजस्थान में गर्मी बहुत हैं। नए-पुराने गीतों की फरमाइश की - बसंत बहार, महबूब की मेहदी जैसी फिल्मो से। 5 बजे दिल्ली से प्रसारित समाचार के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद प्रसारित हुआ कार्यक्रम गाने-सुहाने। इसमे नए और कुछ पुराने गीत सुनवाए गए जैसे नई फिल्मे खट्टा मीठा, ढाई आखर प्रेम का, कुछ पुरानी फिल्मे - डर, दिल का रिश्ता फिल्म का शीर्षक गीत भी शामिल था।

शाम बाद 7 बजे प्रसारित हुआ फ़ौजी भाइयों के लिए कार्यक्रम जयमाला जिसमे SMS से प्राप्त फरमाइश के अनुसार गीत सुनवाए जाते हैं। हर दिन लगभग सभी दौर की फिल्मो के गीत सुनवाए गए, पुरानी फिल्म आँखे का गीत - मिलती हैं जिन्दगी में मोहब्बत कभी-कभी, कुछ पुराना देश भक्ति गीत - दिल दिया हैं जाँ भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए, आज के दौर का गीत यमला पगला दीवाना फिल्म से - इश्क का मंजन घिसे हैं पिया। फ़ौजी भाइयो को SMS करने का तरीका भी बताया गया - मोबाइल के मैसेज बॉक्स में जाकर टाइप करना हैं - vjm - फिल्म का नाम - गाने के बोल - अपना नाम और रैंक जरूर लिखे और भेज दे इस नंबर पर - 5676744

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया चरित्र अभिनेता ए के हंगल ने। अपनी पहली फिल्म शागिर्द की चर्चा के साथ पर्यारण की चर्चा की। एक फ़ौजी जवान का किस्सा भी सुनाया। लोकप्रिय गीत सुनवाए। जयमाला के बाद 7:45 पर 15 मिनट के लिए अलग-अलग कार्यक्रम प्रसारित हुए। सोमवार को पत्रावली में श्रोताओं के पत्र पढ़े रेणु (बंसल) जी ने और उत्तर दिए कमल (शर्मा) जी ने। विभिन्न राज्यों से जिलों, शहरो और दूरदराज के गाँव से पत्र आए। कुछ नियमित श्रोताओं ने पत्र भेजे और कुछ नए श्रोताओं के भी पत्र पढ़े गए। लगभग सभी कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। कुछ पत्रों में फरमाइशे भी थी। अंत में डाक पता बताया गया जिससे कुछ श्रोता अगर अब पत्र भेजना चाहे तो उन्हें दिक्कत न हो - विविध भारती सेवा, पोस्ट बॉक्स नंबर 19705 मुम्बई 400091

मंगलवार, शुक्रवार और रविवार को सुना कार्यक्रम गुलदस्ता जिसमे मंगलवार को नए शायर और गुलोकारों को सुना - कतिल शिफाई, इब्राहिम अश्क, भूपेन्द्र, राजकुमार रिजवी। शुक्रवार को गैर फिल्मी गीत सुनवाए गए - मधुकर राजस्थानी, योगेश की रचनाएं, मन्नाडे, सुमन कल्याणपुर को सुना। रविवार को दो गजले सुनवाई, आगाज में अंदाज नया रहा, एक एलबम से निदा फाजली का कलाम सुनवाया और आखिर में बेगम अख्तर साहिबा को सुना - दिल में तमन्ना भी नही - कलाम फ़िराक गोरखपुरी का हैं। इस तरह अच्छी विविधता रही। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में संगीतकार जोडी के संगीतकार दिलीप सेन से निम्मी (मिश्रा) की बातचीत का दूसरा और अंतिम भाग प्रसारित हुआ। सुनकर लगा कि यह बातचीत पिटारा कार्यक्रम के अंतर्गत प्रसारित होती तो ठीक होता, इस कार्यक्रम में नए कलाकारों से संक्षिप्त बातचीत अच्छी लगती हैं। गुरूवार को राग-अनुराग कार्यक्रम में राग शिवरंजनी, भैरवी और कम चर्चित राग विभास पर आधारित फिल्मी गीत सुनवाए गए। फिल्मी गीतों का चुनाव अच्छा रहा, अच्छी विविधता रही। शनिवार को सामान्य ज्ञान के कार्यक्रम जिज्ञासा में सोन चिरय्या के साथ विभिन्न पक्षियों के लुप्त होने के कगार पर होने की चर्चा की। मेढक की त्वचा के प्रोटीन के विभिन्न रोगों में किए जाने वाले उपयोग की चर्चा की। फ्रेंच ओपन टेनिस की चर्चा हुई। एम ऍफ़ हुसैन को श्रद्धांजलि दी।

रात 8 बजे का समय रहा हवामहल का जिसकी गुदगुदाती वर्षों पुरानी संकेत धुन आज भी शुरू और अंत में सुनवाई जाती हैं। रविन्द्रनाथ मैत्र के लिखे मूल बंगला नाटक - मानमयी गर्ल्स स्कूल का सत्येन्द्र शरत द्वारा किया गया हिन्दी रेडियो नाट्य रूपांतर - कितना सच कितना झूठ का धारावाहिक प्रसारण सुना। इसमे पति-पत्नी का नाटक कर गाँव के स्कूल में नौकरी पाई जाती हैं। पत्नी का नाटक करने में उसे उलझन होती हैं और वह वापस जाना चाहती हैं पर जा नही पाती क्योंकि परस्पर पनपे प्रेम का अहसास हो जाता हैं। निर्देशक हैं लोकेन्द्र शर्मा और सहायक हैं पी के ए नायर। इस बार कलाकारों के नाम भी बताए गए - कमल शर्मा, सुधीर पाण्डेय, सुलक्षणा खत्री, अमरकान्त दुबे, शैलेन्द्र कौल, आशा शर्मा, प्रतिभा शर्मा, अशोक सोनावणे, अरूण माथुर।

रात 9:30 बजे आज के फनकार कार्यक्रम प्रसारित किया गया। विख्यात अभिनेत्री नर्गिस पर यह कार्यक्रम अच्छा लगा, यह महत्वपूर्ण जानकारी मिली कि वह पहली अभिनेत्री हैं जिसे पद्मश्री मिला। शिल्पा शेट्टी और डिंपल कपाडिया पर प्रस्तुत कार्यक्रम हिट-सुपरहिट जैसा लगा। गीतकार असद भोपाली पर कार्यक्रम भी ऐसा ही था सिर्फ यहाँ उनकी रिकार्डिंग के कुछ अंश सुनवाए गए लेकिन उनसे सम्बन्धी अच्छी जानकारी नही मिल पाई सिवाय एक महत्वपूर्ण बात के कि पुराना गीत हंसता हुआ नूरानी चेहरा और अस्सी के दशक की फिल्म मैंने प्यार किया का गीत कबूतर जा जा जा उन्ही के लिखे हैं। डिंपल कपाडिया पर केन्द्रित कार्यक्रम में गाने वही सुनवाए जो दोपहर 12 बजे सुनवाए थे। हद तो तब हो गई जब सागर फिल्म के दो और बौबी फिल्म के तीन गाने सुनवाए जबकि कई महत्वपूर्ण बाते नही बताई जैसे बाद में उन्होंने सार्थक सिनेमा में अपनी अभिनय क्षमता दिखाई, दृष्टि फिल्म का सिर्फ नाम बताया कि उसके लिए एवार्ड मिला, कोई चर्चा नही की। यह कार्यक्रम बिलकुल भी अच्छा नही था। बेहतर होता दो कार्यक्रमों के स्थान पर केवल हिट-सुपरहिट कार्यक्रम ही तैयार किया जाता। फिल्मकार संजय लीला भंसाली पर कार्यक्रम ठीक रहा। पूरे सप्ताह इस कार्यक्रम को विजय दीपक छिब्बर जी ने प्रस्तुत किया। सहयोग पी के ए नायर जी का रहा। इस कार्यक्रम का प्रसारण हर दिन के बजाय सीमित करने से ठीक रहेगा, अन्य समय कोई और कार्यक्रम प्रसारित करने से विविधता और रोचकता बढ़ेगी। हिट-सुपरहिट और इस कार्यक्रम की अपनी-अपनी संकेत धुन हैं।

रात 10 बजे छाया गीत में अमरकांत जी ने दिल की बाते की और प्यार की चर्चा की, शागिर्द, ज्वैल थीफ और दिल हैं कि मानता नही जैसी फिल्मो के गीत सुनवाए। ममता (सिंह) जी ने प्यार के अहसास की चर्चा की, गाने अधिकतर पुराने ही सुनवाए - ये किसने गीत छेड़ा। राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने शायराना अंदाज में रोमांटिक गीत सुनवाए - नजरो से कह दो प्यार में मिलने का मौसम आ गया। रेणु (बंसल) जी ने मोहब्बत की चर्चा की और यह शरारती गीत भी सुनवाया - ये परदा हटा दो ज़रा मुखड़ा दिखा दो हम प्यार करने वाले हैं कोई गैर नही। कमल (शर्मा) जी ने प्यार में प्रतीक्षा की चर्चा की, एक ऐसा गीत भी सुनवाया जो कम ही सुनवाया जाता हैं - ऐसा होता तो नही ऐसा हो जाए अगर। इस तरह सभी ने प्यार की चर्चा की पर युनूस (खान) जी की प्रस्तुति हट कर रही, ऐसे गीतों की चर्चा की जो कम ही सुनवाए जाते हैं, ज्यादातर ऐसे गीत सुनवाए जिसे मैंने शायद ही पहले कभी सुना हो जिनमे से एक गीत हैं - तुझे दूं मैं क्या तू ही बता जो देना हैं मालिक ने पहले ही दिया। कुछ गीत जाने-पहचाने भी रहे। 10:30 बजे आधे घंटे के लिए आपकी फरमाइश कार्यक्रम प्रसारित हुआ जिसमे फरमाइश पर पुराने गाने जैसे एक बार मुस्कुरा दो फिल्म और बहुत पुरानी जैसे बरसात फिल्म से यह गीत सुनवाया - हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का। नई फिल्मो दबंग और सुर के गीत भी शामिल थे। मन चाहे गीत की तरह यहाँ भी बुधवार और गुरूवार को ई-मेल और शेष दिन पत्रों से प्राप्त फरमाइशे पूरी की गई। शनिवार को रात 9:30 से 11 बजने से कुछ पहले तक प्रसारण सुनाई नही दिया केवल खरखराहट थी।

भूले बिसरे गीत, त्रिवेणी, मन चाहे गीत, पिटारा, जयमाला, आपकी फरमाइश कार्यक्रम प्रायोजित रहे। प्रायोजक के विज्ञापन भी प्रसारित हुए। श्रोताओं की सुविधा के लिए दिन भर के कार्यक्रमों का विवरण बताया गया झरोका के अंतर्गत सुबह 6:55 पर, आगे के कार्यक्रमों का विवरण दोपहर 12:55 शाम 6:55 पर, और रात 11 बजे अगले दिन के सभी कार्यक्रमों की जानकारी दी गई जिसमे प्रायोजित कार्यक्रमों के लिए प्रायोजक के नाम भी बताए गए। रात 11:05 पर समाचारों के दिल्ली से प्रसारित 5 मिनट के बुलेटिन के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

मन चाहे गीत और आपकी फरमाइश कार्यक्रम में फरमाइश भेजने के लिए पता बताया गया, पता वही हैं जो हमने पत्रावली के लिए बताया, केवल ऊपर कार्यक्रम का नाम लिखना हैं।

ई-मेल आई डी - manchahegeet@gmail.com apkifarmaish@gmail.com

चलते-चलते हम आपको बता दे कि यह सभी कार्यक्रम हमने हैदराबाद में एफ़ एम चैनल पर 102.8 MHz पर सुने।

Thursday, May 5, 2011

महिला और युवा वर्ग के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 5-5-11

महिला और युवा वर्ग का एक-एक कार्यक्रम हैं - सखि-सहेली और जिज्ञासा महिला वर्ग के कार्यक्रम में एक कड़ी युवा सखियों के लिए होती हैं जो युवको के लिए भी उपयोगी हैं। आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -


सप्ताह में पांच दिन एक घंटे के लिए दोपहर 3 बजे से प्रसारित होने वाले महिलाओं के कार्यक्रम सखि-सहेली में शुक्रवार को प्रसारित हुआ कार्यक्रम हैलो सहेली। फोन पर सखियों से बातचीत की ममता (सिंह) जी ने। 8 फोन कॉल थे। अधिकतर कॉल छात्राओं के थे। एक छात्रा की बातचीत से पता चला कि उसके गाँव में अधिक सुविधाएं नही हैं इसीलिए वह बी ए की पढाई के बाद बीएड के लिए पास के शहर जाना चाहती हैं। दो-तीन सखियों ने कोई बात ही नही की सिर्फ अपने शहर का नाम बताया और गीत की फरमाइश की। कुछ से विस्तार से बातचीत हुई, एक सखि ने बताया कि लड़के और लड़की में भेद नही करना चाहिए, दोनों को समान सुविधाएं मिलनी चाहिए। लड़कियों को चाहिए कि वे आवश्यक हो तो पढाई के लिए अपने गाँव-शहर से बाहर भी जाए। एक सखि ने इलाहाबाद से बात की और बताया कि वहां लोकनाथ और घंटाघर में खाने-पीने की बढ़िया चीजे मिलती हैं। एक बात पहली बार हुई, बातचीत के दौरान एक सखि ने क्षेत्रीय व्यंजन बनाने की विधि बता दी। सखियों की पसंद पर अस्सी नब्बे के दशक के गीत सुनवाए गए - साजन जैसी फिल्मो से और एक फरमाइश सत्तर के दशक की फिल्म कच्चे धागे के एक गीत के लिए हुई। इस गीत की फरमाइश बहुत दिन बाद हुई, सुनना अच्छा लगा - हाय हाय एक लड़का मुझको ख़त लिखता हैं। विभिन्न क्षेत्रो से शहर, गाँव, जिलो से फोन आए। एक सखि ने विविध भारती के कार्यक्रमों को पसंद करने की बात कही। कार्यक्रम के समापन पर बताया गया कि इस कार्यक्रम के लिए हर बुधवार दिन में 11 बजे से फोन कॉल रिकार्ड किए जाते हैं जिसके लिए फोन नंबर भी बताए - 28692709 मुम्बई का एस टी डी कोड 022 और यह अनुरोध भी किया गया कि यह कार्यक्रम सखियों का हैं, इसीलिए कृपया पुरूष श्रोता फोन न करे। शुरू और अंत में संकेत धुन सुनवाई गई जिसमे शीर्षक के साथ उपशीर्षक भी कहा जाता हैं - सखियों के दिल की जुबां - हैलो सहेली ! इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया कमलेश (पाठक) जी ने स्वाती (भंडारकर) जी के सहयोग से।


अन्य चार दिनों में सखि-सहेली कार्यक्रम में हर दिन दो प्रस्तोता सखियाँ आपस में बतियाते हुए कार्यक्रम को आगे बढाती हैं। हर दिन के लिए एक विषय निर्धारित हैं -सोमवार - रसोई, मंगलवार - करिअर, बुधवार - स्वास्थ्य और सौन्दर्य, गुरूवार - सफल महिलाओं की गाथा। सोमवार, मंगलवार और गुरूवार को प्रस्तोता रही ममता (सिंह) जी और शहनाज (अख्तरी) जी। सोमवार को बताया कि पिछले सप्ताह विचार मंच का विषय था - इंतज़ार। इस विषय पर बहुत से पत्र आए इसीलिए इस दिन भी सिलसिला जारी रखा गया। लगभग 18 पत्र पढ़े गए। एकाध पत्र अच्छा रहा, एक सखि ने लिखा कि उसके पिता उसकी पढाई के विरूद्ध थे। जब पिता नौकरी के लिए दूसरे शहर गए तब उनकी अनुमति के बिना पढाई की। उनके आने के बाद पढाई छूट गई फिर भाई की सहायता से चार साल के इन्तेजार के बाद पढाई शुरू हुई। तत्कालिक स्थिति से सम्बंधित पत्र नही थे जैसे स्कूल की अंतिम परीक्षा दी और नतीजे का इन्तेजार हैं क्योंकि कॉलेज जाना हैं, इसी तरह पढाई ख़त्म हुई और नौकरी का इन्तेजार हैं वगैरह। अधिकाँश पत्र ऐसे थे जिनमे इन्तेजार के बारे में लिखा गया जैसे माँ को आने वाले बच्चे का इन्तेजार हैं, रोगी को अच्छा होने का इन्तेजार हैं आदि। कुछ पत्रों में ऐसा एकाध वाक्य ही लिखा था फिर भी ये पत्र पढ़े गए। यह उचित हैं कि इस कार्यक्रम के माध्यम से महिलाओं को अपनी बात कहने का अवसर दिया जा रहा हैं। लेकिन यहाँ एक बात स्पष्ट हैं कि यह कार्यक्रम दूरदराज के क्षेत्रो की महिलाएं अधिक सुनती हैं जिनमे से अधिकाँश महिलाएं कम पढी लिखी और संकोची भी होती हैं। ऎसी कई महिलाएं हैलो सहेली में फोन करती हैं, कुछ भी बात नही कर पाती केवल फरमाइशी गीत बता देती हैं। स्थिति यहाँ तक ठीक हैं कि फोन पर बात करने में संकोच होता हैं पर फोन तो किया पर यही स्थिति पत्रों में हो तो ठीक नही लगता। ऐसा लगता हैं प्रसारण समय का उचित उपयोग नही किया गया। बीस-पच्चीस पत्रों को पढ़े इससे अच्छा हैं चार पत्र पढ़े। सखियों ने पत्रों के साथ इसी विषय से सम्बंधित गीतों की फरमाइश की जो नए और कुछ पुराने थे - काइट्स, शराबी, फ़िदा फिल्मो के गीत। मैं हूँ न फिल्म का शीर्षक गीत और कृष्णा कॉटेज फिल्म का यह गीत - सूना सूना लम्हा लम्हा, मेरी राहे तन्हा तन्हा


मंगलवार का दिन करिअर का होता है। इस दिन वकील - क्रिमिनल लॉयर बनने के लिए जानकारी दी गई। करिअर संबंधी जानकारी का आलेख उन्नति (वोहरा) जी ने तैयार किया था। इस तरह यह अंक केवल लड़कियां ही नही लड़को के लिए भी उपयोगी रहा। यह दिन युवा सखियों के लिए हैं इसीलिए इस दिन सखियों की पसंद पर नए गाने ही सुनवाए गए। तनु वेड्स मनु, बैंड बाजा बारात, सिंग इज किंग, लव आजकल, जब वी मेट फिल्मो के गीत सुनवाए गए और पटियाला हाउज फिल्म से तुम्बा तुम्बा गीत भी शामिल था। बुधवार को प्रस्तोता रही ममता (सिंह) जी और रेणु (बंसल) जी। इस दिन स्वास्थ्य और सौन्दर्य संबंधी सलाह दी जाती है्। सखियों के भेजे गए पत्रों से कुछ जाने-पहचाने घरेलु नुस्के बताए गए। कोई नई जानकारी नही थी। इस दिन दो बाते अच्छी हुई, पहली बात, पहले किसी कार्यक्रम में गोदना (टैटू) के बारे में बताया गया था, इसके सम्बन्ध में एक सखि ने पत्र भेजा कि यह शरीर के लिए हानिकारक भी हो सकता हैं। इससे संक्रमण हो सकता हैं। इसीलिए इसका प्रचार भी नही किया जाना चाहिए। दूसरी बात - एक सहेली ने एक अशोभनीय चुटकुला लिख कर भेजा जिसे पढ़ कर सुनाया गया और साथ ही प्रस्तोता सखियों ने ये कहा कि यह पत्र शामिल नही भी किया जा सकता था पर शामिल किया और चुटकुला भेजने वाली सखि को खूब लताड़ा। सखियों की फरमाइश पर नए-पुराने गीत सुनवाए गए - जीत, फर्ज, उपहार, मस्त फिल्मो से और फूल और कांटे फिल्म से यह गीत भी शामिल था - मैंने प्यार तुम्ही से किया हैं। गुरूवार को सफल महिलाओं के बारे में बताया जाता है। इस दिन मालती बेटेकर के बारे में बताया। लड़कियों की शिक्षा के विरूद्ध माहौल में शिक्षा ली। बाद में आदिवासियों को बढाया और अच्छी लेखिका बन कर उभरी। इस जानकारी का आलेख उन्नति (वोहरा) जी ने तैयार किया था। सखियों के अनुरोध पर कुछ ही पहले के समय की फिल्मो के लोकप्रिय गीत सुनवाए - दोस्ती, थोड़ी सी बेबफाई, आनंद, चितचोर, दुल्हन वही जो पिया मन भाए, साजन बिना सुहागन फिल्मो से और सौदागर फिल्म से यह गीत भी सुनवाया - सजना हैं मुझे सजना के लिए, हरजाई फिल्म का गीत अंत में सुनवाया, बहुत थोड़ा सा, समय कम था, इस गीत को रोका जा सकता था।


हर दिन श्रोता सखियों के पत्र पढे गए। सखियों ने सलाह दी कि उम्र रहते शादी कर ले, उम्र रहते बच्चो को जन्म दे। शोर से बचे। अपने आपको कमतर न समझे। आशावादी बने। एक पत्र ऐसा भी था जिसमे सखि ने कुछ लिख भेजा जिसे पढ़ा भी गया पर समझ में नही आया कि क्या लिखा हैं। इस पत्र को पढ़ा गया और सखियों से यह कहा गया कि वे जो भी कहना चाहते हैं, स्पष्ट लिखे। प्रस्तोता सखियों ने भी आपस में बतियाते हुए बहुत सी बाते बताई जैसे करिअर के मामले में अभिभावक अपने विचार बच्चो पर न थोपे, पार्टी का आयोजन कैसे किया जाए। चारो दिन प्रसारण सुन कर ऐसा लगा कि इसके स्वरूप में परिवर्तन करना उचित रहेगा। हमारा अनुरोध हैं चार दिनों में से किसी एक दिन पत्रों के माध्यम से विभिन्न विषयो की चर्चा ठीक रहेगी, शेष दिन प्रस्तुति का अंदाज बदल दीजिए। हर दिन का विषय जैसे रसोई, करिअर आदि जारी रखते हुए (या इन्हें हटाया भी जा सकता हैं), फरमाइशी गीत सुनवाते हुए, एक या दो दिन साहित्य की चुनी हुई रचनाओं का पठन किया जा सकता हैं और साथ ही कुछ और स्तम्भ भी जोड़े जा सकते हैं या प्रसारण की अवधि को समेटते हुए एक-दो ही दिन रख दीजिए। कार्यक्रम के शुरू और अंत में सखि-सहेली की संकेत धुन सुनवाई गई। चारो दिन इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया कमलेश (पाठक) जी ने।


कार्यक्रम के दौरान एक सूचना भी दी कि हर महीने के अंतिम सोमवार के लिए एक विषय निर्धारित किया जाता हैं और उस पर सखियों के विचार आमंत्रित किए जाते हैं। सखियों के पत्रों को पढ़ कर सुनाया जाता हैं और साथ ही उनकी फरमाइश के गीत भी सुनवाए जाते हैं। इस बार का विषय हैं - गर्मियों की छुट्टियों का सदुपयोग कैसे करे।


शनिवार को रात 7:45 पर सुना सामान्य ज्ञान का साप्ताहिक कार्यक्रम जिज्ञासा। 15 मिनट के इस कार्यक्रम के विभिन्न खंड हैं। हर खंड के बाद जानकारी से सम्बंधित फिल्मी गीत की झलक सुनवाई जाती हैं। पहला खंड हैं - समय यात्री - टाइम मशीन जिसके अंतर्गत जानकारी दी गई कि टाइपराइटर बनाना बंद कर दिया गया हैं। यहाँ इससे सम्बंधित सामान्य जानकारी भी दी और यह भी बताया कि एक लोकप्रिय लेखक के पास सोने का टाइपराइटर था। दूसरी जानकारी भारतीय मूल के चिकित्सक सिद्धार्थ मुखर्जी की लिखी पुस्तक कैंसर से सम्बंधित थी जिस पर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। तीसरी जानकारी रोचक रही कि एक ऐसे आभासी (vartual ) विश्व विद्यालय को तैयार करने की योजना बनाई जा रही हैं जिससे छात्र इंटरनेट से ही पढाई कर सकेंगे। खोज शीर्षक के अंतर्गत बताया कि बाज गायब हो रहे हैं, बाज का भोजन रही घरेलु चिड़िया भी लुप्त होने की कगार पर हैं जिसका कारण पर्यावरण में एक तरह के रसायन का बढ़ना हैं जो इनके लिए जहर के समान हैं। इसके अलावा तम्बाकू का सेवन न करने के लिए जानकारी देने वाली वेबसाईट की भी जानकारी दी। बीच-बीच में सम्बंधित गीतों की झलकियाँ सुनवाई गई। कुछ गीत ऐसे थे जिन्हें मैंने पहली बार सुना - टाइपराइटर टिक टिक करता हैं जिन्दगी की हर कहानी लिखता हैं और लोकप्रिय गीतों की भी झलकियाँ सुनवाई गई - जिन्दगी का सफ़र हैं ये कैसा सफ़र। पूरे कार्यक्रम को सुन कर लगा कि कुछ और स्तम्भ जोड़ कर इसे अधिक उपयोगी बनाया जा सकता हैं। शोध, आलेख और स्वर युनूस (खान) जी का रहा। कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने।


ये दोनों ही कार्यक्रम आधुनिक विविध भारती की देन हैं यानि पहले इस तरह से महिलाओं और युवाओं के लिए अलग से कार्यक्रम तैयार नही किए जाते थे। वास्तव में नब्बे के दशक में कुछ कार्यक्रमों से महिला कार्यक्रमों की शुरूवात हुई फिर ये दो नियमित कार्यक्रम प्रसारित होने लगे। इन दोनों कार्यक्रमों को सुनकर ऐसा लगता हैं जब विविध भारती महिला और युवा वर्ग के लिए अलग कार्यक्रम तैयार कर ही रही हैं तब बच्चो के लिए भी कोई कार्यक्रम तैयार किया जा सकता हैं। बाल श्रोताओं के लिए भी विविध भारती में जगह होनी चाहिए।



Friday, April 29, 2011

विविध भारती के नाटक - साप्ताहिकी 28-4-11

नाटकों के दो कार्यक्रम हैं हवामहल और नाट्य तरंग हवामहल रात के प्रसारण का पुराना दैनिक कार्यक्रम हैं और नाट्य तरंग सप्ताहांत यानि शनिवार और रविवार को दोपहर बाद प्रसारित होता हैं। आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

हवामहल रात में 8 बजे से 8:15 बजे तक प्रसारित होता हैं। इस सप्ताह धारावाहिक नाटक प्रसारित किया गया -उजड़ी हुई बस्ती में जिसकी लेखिका हैं विभा देवसरे। शुक्रवार को इसकी दूसरी कड़ी प्रसारित हुई। लेकिन सिलसिला मिलाने के लिए पहली कड़ी की जानकारी दी गई जिससे पूरे कथानक का शुरू से पता चल गया। नायक चेतन एक ऎसी बस्ती में पहुँच जाता हैं जो उजड़ चुकी हैं। यहाँ उसकी मुलाक़ात एक बुजुर्गवार से होती हैं। यह बुजुर्ग बाबा उसे बताते हैं कि जागरूकता न होने से, आबादी बहुत बढ़ने से, जीवन निर्वाह कठिन होने से यह बस्ती उजड़ गई। एक-एक खँडहर मकान के बारे बताते रहे कि यह परिवार कैसे उजड़ा। एक मकान में सुधा नाम की एक ग्राम सेविका रहती थी जो घर-घर जाकर समाज सुधार की बाते बताती पर उसके अपने ही माता-पिता को लड़का न होने का दुःख हैं। उसका विवाह एक ऐसे विधुर माधो से तय कर दिया जाता हैं जिसके बच्चे सुधा की उम्र के हैं। वह विवाह नही करना चाहती थी और यही बात समझाने बाबा उसके घर जाते हैं पर उसके पिता नही मानते फिर रातो रात सुधा और माधो के परिवार घर छोड़ कही चले जाते हैं। नायक अब भी यह कल्पना करता हैं कि सुधा यह संघर्ष जीत गई होगी। एक परिवार था मंगरू और संतो का। मंगरू आलसी हैं, उनका बेटा लंगडा और बेटी नेत्रहीन हैं। संतो बेटे का ऑपरेशन कराने बच्चो के साथ सरकारी अस्पताल जाती हैं, बस खाई में गिर जाती हैं, मंगरू वहां आता और अंधी बेटी उसकी आवाज पहचान जाती हैं पर वह उसे अपने साथ नही लाता। यहाँ बाबा के अलावा सुखिया भी हैं जो गाकर इस बस्ती के बारे में बताता हैं। बाबा इस सुखिया के बारे में बताते हैं कि यह पहले वाकई सुखी था। इसका एक दोस्त था शोभाराम। तारा शोभाराम की पत्नी और उनके चार बच्चे थे और वह पांचवी बार माँ बनने वाली थी। सुखिया के बहुत समझाने पर वह समझते हैं पर तब तक देर हो चुकी होती हैं, ग्राम सेविका कोई मदद नही कर पाती और पांचवे बच्चे को जन्म देते समय वह चल बसती हैं। उसकी मौसी चारो बच्चो को लेकर गाँव चली जाती हैं। एक दिन गाँव से मौसी के गुजरने की खबर आती हैं। वह बच्चो को लेने गाँव गया पर कभी नही लौटा। सुखिया के बेटे की तबियत बिगड़ जाती हैं पर डाक्टर पार्टी छोड़ कर आने के लिए तैयार नही। बस्ती में और डाक्टर, अस्पताल नहीं हैं। समय पर इलाज न होने से उसका निधन हो जाता हैं। एक महिला के ऑपरेशन के मामले में डाक्टर से ग्राम सेविका का विवाद होता हैं। बाद में डाक्टर का ह्रदय परिवर्तन होता हैं। मंगलवार को अंतिम कड़ी प्रसारित हुई। इसमे रज्जो के परिवार के उजड़ने की कहानी याद की गई। उसकी पत्नी सास के पोते की चाह में पांचवी बार गर्भवती हैं जिससे उसका शरीर भी कमजोर हो गया हैं। रज्जो बाहर दोस्तों के साथ ताश खेल रहा हैं, उसे लगता हैं फिर से लड़की हुई तो अम्मा बिगड़ेगी। पत्नी उससे मिलना चाहती हैं। सुखिया के कहने पर भी वह नही जाता। प्रसव घर पर दाई की सहायता से किया जाना हैं। ग्राम सेविका अस्पताल की गाड़ी लाती हैं फिर भी अस्पताल नही जाना चाहते। प्रसव के दौरान उसकी पत्नी दम तोड़ देती हैं। समाज का यथार्थ बताता बढ़िया धारावाहिक। जितना अच्छा लेखन उतनी अच्छी प्रस्तुति। बस, एक बात अखर गई, कलाकारों के नाम नही बताए गए। दिल्ली केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं कमल दत्त।

बुधवार को विपिन बिहारी मिश्रा की लिखी झलकी सुनी - मास्टरजी। लखनऊ केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं जयदेव शर्मा कमल। सच्चाई भी बताई और सन्देश भी अच्छा रहा। गाँव के स्कूल में 9 कुल बच्चे हैं। मास्टरजी देर से आते हैं और बच्चो से नीम की छाँव में खेलने के लिए कहते हैं, वह सोना चाहते हैं और बच्चो से कहते हैं कुछ पूछना हो तो बाद में पूछ लो, वैसे बाद में उन्हें मीटिंग में जाना हैं। बच्चे फिल्मी गानों की अन्ताक्षरी खेलते हैं। निरीक्षक आ जाते हैं। मास्टरजी को लताड़ते हैं। कहते हैं इसीलिए सरकारी स्कूल में कम बच्चे हैं, अन्य बच्चे दूसरे स्कूलों में जाते हैं। तभी वहां विधायक आते हैं जिनके साथ मास्टरजी को चुनाव से सम्बंधित मीटिंग में जाना हैं। अंत में निरीक्षक की बातो से सबको अपनी गलती का एहसास होता हैं। इस तरह मनोरंजन भी हुआ और सन्देश भी मिला। गुरूवार को भी सुरिंदर कौर की लिखी ऎसी ही झलकी सुनी - अनमोल दौलत। रक्षा बंधन का त्यौहार हैं। पत्नी सोचती हैं कि पति की बहन अमीर घराने में ब्याही हैं उसे क्या भेंट दी जाए। जब बहन आती हैं तब लगता हैं उसके लिए स्नेह का बंधन ही अनमोल भेंट हैं। अच्छा तो लगा पर इस झलकी का प्रसारण किसी भी दृष्टि से उचित नही लगा। राखी पूनम के अवसर पर सुनवाते तो अच्छा लगता दूसरी बात दो दिन पहले ही दिल्ली केंद्र का धारावाहिक प्रसारित हुआ था, फिर से उसी केंद्र की झलकी और निर्देशक भी वही। वैसे भी गंभीर धारावाहिक के बाद एक सिर्फ मनोरंजन करने वाली झलकी की कमी महसूस हुई।

3:30 बजे से 4 बजे तक प्रसारित होने वाले नाट्य तरंग कार्यक्रम में शनिवार और रविवार को गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के लिखे मूल बंगला उपन्यास चोखेर बाली का रेडियो नाट्य रूपांतर सुनवाया गया - आँख की किरकिरी। यह उपन्यास इतना लोकप्रिय हैं कि इसका कथानक बहुत से लोग जानते हैं। नारी के दो रूप - एक सरल ह्रदय और दूसरी व्यावहारिक। पुरूष की प्रेम भावना कभी एक ओर तो कभी दूसरी ओर आकर्षित करती हैं। सरल पत्नी आशा को छोड़ महेंद्र विनोदिनी के साथ कही चला भी जाता हैं पर विधवा विनोदिनी उसे अपनाने से इन्कार कर देती हैं। रूपान्तरकार और निर्देशक हैं नंदलाल शर्मा। प्रस्तुति जयपुर केंद्र की हैं। कलाकारों के नाम नही बताए गए। गुरूदेव की 125 वी जयंति के अवसर पर यह प्रस्तुति अच्छी लगी।

यह एक अनमोल रचना और दूसरा समाज में जागरूकता का सन्देश देता धारावाहिक - दोनों उच्च स्तरीय प्रस्तुतियों के लिए हम विविध भारती के आभारी हैं।

Friday, April 22, 2011

शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 21-4-11

विविध भारती से शास्त्रीय संगीत के दो कार्यक्रमों का प्रसारण होता हैं संगीत सरिता और राग-अनुराग एक कार्यक्रम के माध्यम से रोज हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की कई जानकारियाँ मिलती हैं और दूसरे में विभिन्न फिल्मी गीतों के शास्त्रीय आधार का पता चलता हैं। आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

सुबह 7:30 बजे 15 मिनट के लिए प्रसारित होने वाले संगीत सरिता कार्यक्रम में इस सप्ताह दो श्रृंखलाएं प्रसारित हुई। पांच कड़ियों की श्रृंखला प्रसारित की गई - ख्याल गायकी में बंदिश की परम्परा। इसे प्रस्तुत किया ख्यात शास्त्रीय गायक पंडित सी आर व्यास जी ने। शुक्रवार को इसकी पहली कड़ी प्रसारित हुई। बंदिश गायकी में पुराने समय की शास्त्रीय संगीत की शिक्षा की चर्चा की। बताया कि उस समय बंदिशे याद रखी जाती थी। शुरूवात राग यमन से किया, ख्याल गा कर सुनाया - ऐ री लाल मिले, राग यमन कल्याण की भी चर्चा हुई और इसमे भी ख्याल गा कर सुनाया। शनिवार को राग छायानट की चर्चा की। बताया कि इसमे मध्यम प्रभावी होता हैं। दो बंदिशे सुनाई जिसमे से एक के बोल हैं - तन बदन सब तुम पर वारो, खुद की बनाई बंदिश भी सुनाई - माने न जिया मोरा उन बिना, रविवार को राग भैरव की चर्चा करते हुए बंदिश भी सुनाई, द्रुत बंदिश में तराना भी सुनाया। राग गौड़ मल्हार में भी द्रुत बंदिश सुनाई। यह भी बताया कि हर पारंपरिक बंदिश में कोई न कोई महत्वपूर्ण बात होती हैं। सोमवार को राग गौड़ सारंग के बारे बताया गया। गौड़ के प्रकार भी बताए, संगति सुनाई और बताया कि यह संगति जहां हो वहां राग गौड़ होता हैं और यह संगति बार-बार दोहराना चाहिए जिससे राग अच्छा लगता हैं। इस तरह इस राग में यह संगति ही महत्वपूर्ण हैं। यह जानकारी भी मिली कि इस राग में धईवत भी लाया गया जो पहले नही था और असंभव सा लगता था। पारंपरिक बंदिशे भी सुनाई - कजरारे तोरे नैन, और रब ध्यान लावे, मंगलवार को समापन किया राग पूर्वी से। बताया कि यह पुराना राग हैं, इससे बहुत से राग निकले हैं जैसे राग बसंत, ललित आदि। राग पूर्या धनाश्री की भी चर्चा हुई। जानकारी दी कि इसमे पंचम पमुख हैं और राग पूर्वी में गंधार प्रमुख हैं। इसे समझाते हुए इन दोनों में बंदिशे भी सुनाई - नीलिमा लालिमा, और कारी कारी कामरिया, सामान्य जानकारी में बताया कि किसी राग में बहुत सी बंदिशे तैयार कर प्रस्तुत करने से राग अच्छा लगता हैं जिससे सामान्य जनता भी शास्त्रीय संगीत की ओर आकर्षित होती हैं। हर बंदिश को व्यास जी ने गा कर सुनाया जिसके लिए हारमोनियम पर संगत की पुरूषोत्तम मालावलकर जी ने और तबले पर मुकुंद राजदेव जी ने।

एक ख़ास बात हुई, इस श्रृंखला में एक भी दिन फिल्मी गीत नही सुनवाया गया। बिना फिल्मी रचनाओं के संगीत सरिता अधूरी लगी। वास्तव में इस कार्यक्रम में शास्त्रीय संगीत के किसी अंग की चर्चा करते हुए शास्त्रीय गायन या वादन सुनवा कर फिल्मी गीतों में इसका प्रयोग भी बताते हुए फिल्मी गीत सुनवाने से कार्यक्रम पूर्ण लगता हैं।

बुधवार से दूसरी श्रृंखला शुरू हुई - घुँघरू की तरह। लगा कि शायद संगीत में घुँघरू की आवाज पर, वाद्य पर चर्चा होगी। पर शीर्षक, संगीत के कार्यक्रम के अनुरूप नही लगा। बताया गया कि गीतकार, संगीतकार और गायक रविन्द्र जैन से बातचीत की जाएगी। फिर आगे बताया कि बातचीत करेंगे लेखक और गीतकार राजेश जौहरी। जब बातचीत शुरू हुई तो लगा कि संगीत सरिता नही सरगम के सितारे कार्यक्रम सुन रहे हैं। शुरूवात की कि बचपन में घर का माहौल साहित्यिक होने से इस दिशा में रुचि हुई। अलीगढ़ के रहने वाले हैं इसीसे हिन्दी, उर्दू और ब्रज भाषा के जानकार हैं। गायक बनना चाहते थे पर आकाशवाणी सुन कर लगा गायक बनना आसान नही। फिर संगीत संयोजन की ओर ध्यान दिया। अपने पहले गीत की चर्चा की जिसे रफी साहब ने गाया सिलसिला हैं प्यार का फिल्म के लिए पर यह फिल्म शायद बनी नही और यह गीत किसी भी फिल्म में नही आ पाया। गीत के बोल बताए जो संगीत सरिता के मिजाज के नही लगे - माना के तेरे होंठ मेरा प्यार नही हैं, यह भी बताया कि गीत तैयार करने के लिए फिल्म से सम्बंधित विस्तृत जानकारी लेते हैं। आगे उनके लोकप्रिय गीत पर चर्चा हुई - घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं, बताया कि यह गीत गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की रचना से प्रभावित हैं और वह रचना भी सुनाई। यह गीत तो सुनवाया ही गया।

गुरूवार को भी शुरू में बातचीत का अंदाज ऐसा ही रहा फिर जब चर्चा शुरू हुई उनके फिल्मी संगीत में लोकधुनो के प्रयोग पर तब से लगा कि हम संगीत सरिता सुन रहे हैं। एक लोक गीत भी सुनाया - मैं ब्रज को वासी, मन कान्हा का दास, आत्मा राधा की दासी। फिल्म सौदागर के संगीत की चर्चा की। बताया कि लोकधुने पारंपरिक हैं और उनका वैसा ही प्रयोग किया। अच्छा लगा कि दो लोकप्रिय गीतों के मुखड़े गाकर सुनाए और साथ ही जोड़ कर फिल्मी गीत सुनाए - नीर भरन का कर के बहाना, मेरे लिए ज़रा बोझ उठाना, राधा रे राधा जमुना किनारे आना रे और दूसरा गीत - दूर हैं किनारा। अब लग रहा हैं कि श्रंखला अच्छी चल रही हैं। यदि शीर्षक उचित होता और बातचीत का स्वरूप शुरू में कुछ बदल देते तो श्रंखला शुरू से ही अच्छी लगती थी।

दोनों श्रृंखलाएं रूपाली (कुलकर्णी) जी द्वारा तैयार की गई हैं। हर दिन कार्यक्रम के शुरू और अंत में संकेत धुन बजती रही जो बढ़िया और समुचित हैं। यहाँ हम एक बात कहना चाहते हैं। यह कार्यक्रम हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का हैं। इसमे चर्चा के दौरान कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की भी कुछ जानकारी मिल जाती हैं जैसे कुछ राग एक पद्धति से दूसरी पद्धति में आए हैं, दोनों पद्धतियों के कुछ रागों की समानता, विषमता और खासकर दोनों पद्धतियों में वाद्यों का प्रयोग। लेकिन एक तीसरी पद्धति हैं - रविन्द्र संगीत जिसको शायद इस कार्यक्रम में कभी छुआ तक नही गया। कुछ बहुत पुराने हिन्दी फिल्मी गीतों में और एस डी बर्मन और मन्ना दा (डे) के गाए हिन्दी फिल्मी गीतों में बंगाल के संगीत का जादू हैं, हो सकता हैं इसमे रविन्द्र संगीत भी समाया हो। चूंकि विविध भारती के अलावा अन्य किसी केंद्र से शास्त्रीय संगीत पर इतनी विस्तृत जानकारी नही दी जाती, इसीलिए हमारा अनुरोध हैं कि इस वर्ष जब सिर्फ हमारे देश में ही नही बल्कि समूचे उप महाद्वीप में गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर की 125 वीं जयंति मनाई जा रही हैं, इस अवसर पर रविन्द्र संगीत पर आधारित कुछ कार्यक्रम प्रस्तुत कीजिए।

गुरूवार को शाम बाद के प्रसारण में 7:45 पर प्रसारित हुआ साप्ताहिक कार्यक्रम राग-अनुराग। 15 मिनट के इस कार्यक्रम में विभिन्न रागों पर आधारित फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं। इस बार दो गीत अलग-अलग रागों पर आधारित थे पर तीसरी रचना शास्त्रीय पद्धति में ढली थी। पहला गीत राग झिंझोटी पर आधारित था। तीन देवियाँ फिल्म के इस गीत को पूरा सुनवाया गया जिससे शुरू की धीमी गति अच्छी लगी - ख़्वाब हो तुम या कोई हकीक़त कौन हो तुम बतलाओ। दूसरा गीत राग भैरवी पर आधारित था सोहनी महिवाल फिल्म से - चाँद छुपा और तारे डूबे रात गजब की आई और समापन किया उस्ताद अमीर खां की आवाज में शास्त्रीय पद्धति में ढले झनक झनक पायल बाजे फिल्म के शीर्षक गीत से। तीनो रचनाएं अलग अलग मूड की थी। प्रस्तुति बढ़िया रही। और भी अच्छी लगती प्रस्तुति अगर थोड़ा और ध्यान देते और तीनों में से एक रचना गायिका के स्वर में या युगल गीत होता क्योंकि तीनो गीत गायकों की आवाज में ही थे - किशोर कुमार, महेंद्र कपूर और उस्ताद अमीर खां।

इस तरह, इस सप्ताह भी शास्त्रीय संगीत की जानकारी मिली जिसके अनुसार गायन सुना, शास्त्रीय आधार बताते हुए कुछ फिल्मी गीत भी सुनवाए गए परन्तु केवल शास्त्रीय गायन और वादन का आनंद नही मिला और इस तरह के कार्यक्रम अनुरंजनि की कमी महसूस हुई।

Thursday, April 14, 2011

सदविचारों के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 14-4-11

विविध भारती के दो कार्यक्रम ऐसे हैं जिनके माध्यम से सदविचार बता कर श्रोताओं को प्रेरित किया जाता हैं, ये दो कार्यक्रम हैं चिंतन और त्रिवेणी दोनों ही दैनिक कार्यक्रम हैं और सुबह की सभा में प्रसारित होते हैं। हालांकि इनका प्रसारण समय कम हैं पर गागर में सागर हैं ये कार्यक्रम। दोनों कार्यक्रम मिलाकर लगभग 15 मिनट का प्रसारण समय हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं - 6:05 पर चिंतन में शुक्रवार को नेहरू जी का कथन बताया गया - जितना हम किताबो से सीखते हैं उससे सौ गुना अधिक हम अपने अनुभवों से सीखते हैं। शनिवार को विदेशी लेखक मैक्सिम गोर्की का कथन बताया गया - नवयुग की ज्योति को जो एक बार देख लेते हैं, वो उसी को पवित्र बनाती हुई जलाने लगती हैं।

रविवार को शेक्सपियर का कथन बताया गया - कोई वस्तु अच्छी हैं या बुरी, यह विचार ही उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं। सोमवार को विदेशी चिन्तक जेम्स एलन का कथन बताया - संकट पहले अज्ञान और दुर्बलता से उत्पन्न होते हैं फिर ज्ञान की शक्ति का बोध कराते हैं। मंगलवार को पुराणों का कथन बताया - सज्जन अपने स्वार्थ की अपेक्षा मित्रो के हितार्थ कार्य करते हैं। बुधवार को प्रेमचंद का कथन बताया गया - समाज और साहित्य एक दूसरे का आईना हैं, यदि इस आईने में हमारा आचरण शुद्ध रूप से दिखता हैं तो जान लीजिए कि हमने इसी आईने को साफ़ किया हैं। आज चिन्तन हम सुन ही नही पाए। समाचार समाप्त होते ही खरखराहट शुरू हो गई। जब प्रसारण ठीक से सुनाई देने लगा तभी चिंतन समाप्त हुआ था।

शनिवार से सोमवार तक लगातार तीन दिन विदेशियों के सदविचार सुने। यह सच हैं कि अच्छाई कही से भी मिले ग्रहण करनी चाहिए लेकिन अपने सदविचारो को अनदेखा कर गैरों से प्रेरणा लेना कुछ ठीक नही लगा। हमारे चिन्तक, मनीषियों, बुद्धिजीवियों, विचारकों ने बहुत कुछ कहा हैं। हमारी संस्कृति से ही उदाहरण दिए जा सकते हैं। साहित्य में नीति विषयक दोहे हैं, कई साहित्यकारों के कथन हैं। इनके साथ सप्ताह में एक बार किसी विदेशी विद्वान का कथन सुनना अच्छा रहेगा, पर लगातार विदेशियों को इस श्रेणी में सुनना अच्छा नही लगता।

7:45 को त्रिवेणी में शुक्रवार को जीवन में सफलता की कुंजी बताई। कहा कि आत्म विश्वास, संकल्प और समर्पण से सफलता मिलती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में हौसला रखने से असंभव भी संभव होगा। यहाँ एक लघु बोध कथा सुनाई कि एक राजा जब पराजय से थक कर बैठा था तब उसने देखा कि एक मकडी बार-बार प्रयास कर अंत में दीवार पर चढ़ने में सफल हुई। चर्चा के दौरान ये गीत सुनवाए - हम जब चले तो ---------- आरजू हमारी आसमाँ को छूले राही तू रूक मत जाना कभी तो मिलेगी बहारो की मंजिल शनिवार को उन लोगो को प्रेरणा दी जो हींन भावना के शिकार हो जाते हैं। कहा कि जीवन में परेशानियाँ हमेशा रहती हैं, कुछ हार जाते हैं और कुछ संघर्ष करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। कोई भी लड़ाई हथियारों से नही बुलंद हौसले से लड़ी जाती हैं। जीवन में हौसला बुलंद रखे। चर्चा के दौरान ये गीत सुनवाए - दुनिया में कितना गम हैं मेरा गम कितना कम हैं निर्बल से लड़ाई बलवान की ये कहानी हैं दिए की और तूफ़ान की राही ओ राही, तेरे सर पे दुआओं के साए रहे मंजिले पथ में पलकें बिछाए रहे तू निराशा में आशा के दीपक जला हो हिमालय से ऊंचा तेरा हौसला अंत में सुनवाए गए गीतों की फिल्मो के नाम भी बताए गए -अमृत, तूफ़ान और दिया, हिमालय से ऊंचा।

रविवार को युवावस्था पर चर्चा हुई। बताया कि इस अवस्था में दो रास्ते नजर आते हैं। एक रास्ता सच्चाई का हैं और दूसरा रास्ता छोटा हैं, किसी भी तरह से सफलता पाने का। रास्ता चुनना कठिन होता हैं। इस उम्र में कुछ विचार रोमानी होते हैं और कुछ तर्क-वितर्क के। किसी को सुविधा संपन्न देख कर युवा उस जैसा बनना चाहते हैं। युवाओं को समय के महत्त्व को समझना होगा। यही समय हैं जब कोशिश कर जीवन को सफल बनाया जा सकता हैं। एक बार सफलता न मिले तो बार-बार कोशिश करनी चाहिए। गाने नए ही सुनवाए गए - मैं ऐसा क्यूं हूँ अभी अभी कुछ यकीं हैं पाया हैं मुझमे कमी वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता हैं बढ़िया प्रस्तुति।

सोमवार को मन के अँधेरे की चर्चा हुई। बताया कि इस अँधेरे में पूरा व्यक्तित्व ही डूब जाता हैं। निराशा को हावी न होने दे। जिस तरह रात की कालिख सुबह की किरण से धुल जाती हैं उसी तरह जीवन में भी सुबह आती हैं। चर्चा के दौरान तीन गीत सुनवाए गए - गम की अंधेरी रात में दिल को न बेकरार कर सुबह जरूर आएगी सुबह का इंतज़ार कर रात भर का हैं मेहमां अन्धेरा किसके रोके रूका हैं सवेरा वो सुबह कभी तो आएगी

मंगलवार को बताया कि भारतीय दर्शन में किनारे को मुक्ति माना गया हैं। संसार रूपी भव सागर में हम किनारे की तलाश करते हैं। यह किनारा ही जीवन का लक्ष्य हैं। बुजुर्गो ने कहा हैं कि जीवन एक यात्रा हैं और लगातार किनारे की ओर यानि लक्ष्य कि ओर हमें बढ़ना हैं। चर्चा के दौरान ये गीत सुनवाए - दूर हैं किनारा गहरी नदी की धारा टूटी तेरी नय्या माझी खेते जाओ रे ओ माझी रे अपना किनारा नदिया की धारा जीवन से लम्बे हैं बंधू ये जीवन के रस्ते अंत में सुनवाए गए गीतों की फिल्मो के नाम भी बताए गए - किनारा, आशीर्वाद और खुशबू

बुधवार को बताया कि जीवन में हमेशा सफलता नही मिलती। सफल न होने पर अकर्मण्य होकर न बैठे। प्रयास करे, आगे बढे, आत्मबल ही मंजिल तक पहुंचाता हैं। चर्चा के दौरान ये गीत सुनवाए - रूक जाना नही तू कही हार के ओ नदिया चले चले रे धारा चन्दा चले चले रे तारा तुझको चलना होगा जो राह चुनी तूने उसी राह पे रही चलते जाना रे

आज की त्रिवेणी में शुरू में बताया कि जीवन एक तस्वीर हैं जिसमे आशा और निराशा के रंग हैं। यह कल्पना अच्छी लगी। आगे बताया कि इन विरोधाभासी रंगों से जीवन प्रभावित होता हैं। आगे जो भी कहा गया उसमे शुक्रवार और बुधवार के कार्यक्रमों की झलक नजर आई, कहा कि हौसला होना चाहिए, हार से न डरे, गिर कर उठने का हौसला रखे और वही बात बताई कि कैसे जीव दीवार पर गिर-गिर कर चढ़ने में सफल होता हैं। यहाँ तक कि एक गीत भी वही सुनवाया जो कल की त्रिवेणी में ऐसे ही विचारों पर सुनवाया गया था - रूक जाना नही तू कही हार के समापन पर अच्छी बात बताई कि जब ईश्वर ने हम पर विश्वास कर मानव जीवन देकर हमें संघर्षो में डाला हैं तो क्यों न हम उस विश्वास को बनाए रखते हुए जीवन का यह महासंग्राम जीते। कितना अच्छा होता अगर इस अंतिम बात को ही विस्तार देकर पूरा आलेख तैयार करते... सुनवाए गए शेष दो गीत ये रहे - जीवन से न हार जीने वाले और यह पुराना गीत - तेरी हिम्मत में बल भगवान का

 शुक्रवार और सोमवार को पुराने कार्यक्रमों को फिर से प्रसारित किया गया जबकि शनिवार, रविवार और मंगलवार को प्रस्तुति नई रही। त्रिवेणी कार्यक्रम क्षेत्रीय केंद्र से प्रायोजित रहा, प्रायोजक के विज्ञापन क्षेत्रीय केंद्र से प्रसारित हुए। दोनों ही कार्यक्रमों के लिए आरम्भ और अंत में संकेत धुन सुनवाई गई।

Friday, April 8, 2011

जब विविध भारती कहे अपने मन की... कर्म की... साप्ताहिकी 7-4-11

लावण्या जी, बहुत दिन बाद रेडियोनामा पर आपकी उपस्थिति सुखद रही। इस समय साप्ताहिकी निकालना आवश्यक हैं क्योंकि अगली साप्ताहिकी के कार्यक्रम शुरू हो चुके हैं... आज चर्चा उन दो कार्यक्रमों की जिसमे श्रोताओं से रूबरू हैं विविध भारती - छाया गीत और पत्रावली एक कार्यक्रम के अंतर्गत रोज उदघोषक एक या कभी उससे जुड़े अधिक भाव लेकर चलते हैं और उससे सम्बंधित अपनी पसंद के गीत सुनवाते हैं, इस तरह आलेख प्रस्तुति के साथ फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं। दूसरे कार्यक्रम के माध्यम से सप्ताह में एक बार विविध भारती श्रोताओं के पत्रों के माध्यम से अपने कार्यक्रमों का विश्लेषण करती हैं। आइए इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं - रात 10 बजे का समय छाया गीत का होता है। आधे घंटे के इस कार्यक्रम को शुक्रवार को प्रस्तुत किया कमल (शर्मा) जी ने। प्रस्तुति रही अपनी चिरपरिचित शैली साहित्यिक हिन्दी में। चर्चा प्यार की हुई, प्यार से जुड़ी यादों की हुई लेकिन लेकिन अंदाज वही पुराना रहा। गीतों के चयन में भी कोई नयापन नही। इन्ही भावो पर आधारित गीत सुनवाए जिनमे ये गीत भी शामिल थे - मेरे दो नैना मतवाले किसके लिए कितनी अकेली कितनी तन्हा सी लगी और अंत में सुनवा दिया - रामय्या वस्तावय्या मैंने दिल तुझको दिया शनिवार को प्रस्तुत किया अशोक जी ने। लगा, श्रोताओं को वर्ल्ड कप मैच देखने के लिए छुट्टी दी गई। वही चिरपरिचित भाव, मोहब्बत की, फूलो की, रूठने-मनाने की बाते। एक गीत अच्छा रहा - हुई शाम उनका ख्याल आ गया एकाध गीत ठीक रहा - रूठे सैय्या हमारे सैय्या क्यों रूठे बहुत सुस्त रही प्रस्तुति। ऐसे गीत भी सुनवाए जो बहुत कम सुनवाए जाते हैं। एक गीत के तो बोल भी ठीक से समझ में नही आए, शायद कुछ इस तरह हैं - प्यार में छुपने छुपाने से रविवार को प्रस्तुत किया युनूस (खान) जी ने। कोई नयापन नही था। बाते प्यार मोहब्बत की, विरह की हुई। कुछ लोकप्रिय गीत सुनवाए जैसे - तुम और हम भूल के गम गाए प्यार भरी सरगम कुछ ऐसे गीत भी सुनवाए गए जो कम ही सुनवाए जाते हैं जैसे - बुझ गया दिल का दिया तो चांदनी को क्या कहे तीनो दिन ये कार्यक्रम उदघोषको की पसंद के ही रहे, मुझ जैसे श्रोताओ के लिए ये कार्यक्रम सुस्त और ऊबाऊ रहे। सोमवार को प्रस्तुत किया अमरकान्त जी ने। दिल की बाते हुई। संक्षिप्त आलेख और चुने हुए लोकप्रिय गीतों के साथ अच्छी प्रस्तुति थी, हालांकि नयापन नही था। ज्वैल थीफ, शागिर्द, कटी पतंग के गीत सुनवाए। दिल ही तो हैं और दिल हैं कि मानता नही फिल्मो के शीर्षक गीत सुनवाए। समापन किया भीगी रात फिल्म के इस बढ़िया गीत से - दिल जो न कह सका वही राजे दिल कहने की रात आई मंगलवार को प्रस्तुत किया ममता (सिंह) जी ने। इस दिन भी प्रस्तुति अच्छी रही। चर्चा प्यार की हुई। लोकप्रिय गजले सुनवाई शंकर हुसैन, साथ-साथ, बाजार, प्रेमगीत फिल्मो से शायराना अंदाज में। केवल यह एक गजल ऎसी थी जो कम ही सुनवाई जाती हैं - झुकी झुकी सी नजर बेकरार हैं के नही बुधवार को प्रस्तुत किया राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने। इस दिन भी शायराना अंदाज में प्यार की चर्चा हुई पर नए रोमांटिक गीतों के साथ। नए गीत चूंकि लम्बे होते हैं इसीलिए चार ही सुनवाए गए। दो गीत ऐसे थे जो अक्सर सुनवाए जाते हैं - तौबा तुम्हारे ये इशारे हम तुम्हारे हैं तुम्हारे सनम दो गीत ऐसे थे जो ज़रा कम ही सुनवाए जाते हैं - मेरी तरह तुम भी कभी प्यार करके देखो न गुरूवार को रेणु (बंसल) जी ने प्रस्तुत किया। इस दिन भी प्रस्तुति काव्यात्मक रही। शुरूवात की इस गीत से - मैंने रखा हैं मोहब्बत अपने अफसाने का नाम एकाध ऐसा गीत भी शामिल था जो कम ही सुनवाया जाता हैं - मीठी मीठी सी भीनी भीनी सी क्यों हैं हवा और समापन किया इस गीत से - अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ न सोमवार से गुरूवार तक प्रस्तुति में नयापन लाने की हल्की सी कोशिश नजर आई। पूरे सप्ताह प्रमुख भाव प्यार ही रहा। यह सच हैं कि प्यार एक अच्छी भावना हैं पर ऐसा भी क्या कि सातो दिन यह कार्यक्रम प्यार की भेंट चढ़ गया। किसी शायर ने क्या खूब कहा हैं - और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा... सोमवार को रात 7:45 पर पत्रावली में श्रोताओं के पत्र पढ़े रेणु (बंसल) जी ने और उत्तर दिए कमल (शर्मा) जी ने। 15 मिनट के इस कार्यक्रम में 15 पत्र शामिल हुए। इसके अलावा 6 पत्र ऐसे थे जिनमे सिर्फ छायागीत कार्यक्रम की तारीफ़ थी। मैं तो समझ ही नही पाई कि दिन पर दिन उबाऊ होते जा रहे इस कार्यक्रम में श्रोताओं को क्या पसंद आ रहा हैं, खैर... पसंद अपनी अपनी विभिन्न राज्यों से जिलों, शहरो और दूरदराज के गाँव से पत्र आए। कुछ नियमित श्रोताओं ने पत्र भेजे और कुछ नए श्रोताओं के भी पत्र पढ़े गए। लगभग सभी कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। कुछ सुझाव भी थे। एक श्रोता ने सुझाव दिया कि फ़ौजी भाइयो के कार्यक्रम जयमाला में वीर भावना और देश भक्ति के गीत सुनवाए जाए। इसके जवाब में कहा गया कि देश की सुरक्षा का भार संभाले फ़ौजी भाइयो के मनोरंजन के लिए हैं जयमाला कार्यक्रम। एक सुझाव था कि लघु तरंग (शार्ट वेव SW) पर प्रसारण समय बढाया जाए जिसके उत्तर में कहा कि सम्बंधित अधिकारियों तक यह सुझाव पहुंचा दिया जाएगा। कुछ पत्रों में फरमाइशे भी थी। एक पत्र में रफी साहब, साहिर लुधियानवी और गुरूदत्त से की गई बातचीत की रिकार्डिंग सुनवाने की फरमाइश थी जिसका उत्तर सुन कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, कहा कि इनसे बातचीत की रिकार्डिंग उपलब्ध नही हैं। तीनो सिने जगत के दिग्गज हैं, तीनो का सिने जगत में महत्वपूर्ण योगदान हैं और इनसे की गई बातचीत की रिकार्डिंग संग्रहालय में उपलब्ध नही हैं.... एक बात खली कि अंत में डाक पता और ई-मेल आई डी नहीं बताया गया जिससे कुछ श्रोता अगर अब पत्र भेजना चाहे तो उन्हें दिक्कत हो सकती हैं। शुरू और अंत में उद्घोषणा की युनूस (खान) जी ने।

Friday, April 1, 2011

फिल्मी कलाकारों के रूपक कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 31-3-11

विविध भारती से फिल्मी कलाकारों के रूपक कार्यक्रम दो हैं - हिट सुपरहिट और आज के फनकार जो दैनिक हैं। दोनों ही कार्यक्रमों की अवधि आधा घंटा हैं। हिट सुपरहिट कार्यक्रम हर दिन दो बार प्रसारित होता हैं।


आइए इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -


दोपहर 1:00 बजे और रात 9 बजे प्रसारित हुआ हिट-सुपरहिट कार्यक्रम। शुक्रवार को यह कार्यक्रम अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे पर केन्द्रित रहा। पहला गीत सुनवाया सत्यम शिवम् सुन्दरम फिल्म का शीर्षक गीत जो जीनत अमान पर फिल्माया गया हैं। पद्मिनी कोल्हापुरे पर यह गीत फिल्माया गया -


यशोमति मय्या से बोले नंदलाला राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला


इस गीत के दो संस्करण हैं। एक में शशि कपूर के संवाद हैं और दूसरा युगल गीत के रूप में हैं। यह युगल गीत पद्मिनी कोल्हापुरे पर फिल्माया गया जहां वह बाल कलाकार के रूप में हैं। यह गीत उनके अभिनय कैरिअर का शायद पहला गीत हैं। रात में ज्यादा गड़बड़ हुई। शुरू में कलाकार का नाम ही नही बताया और इस पहले गीत को सुनवाने के बाद कहा गया कि इस गीत को सुनते ही समझ गए होगे कि नाम हैं पद्मिनी कोल्हापुरे जबकि सत्तर अस्सी के दशक की फिल्मो में रुचि रखने वाले श्रोताओं के दिमाग में इस गीत को सुनते ही नाम आता हैं - जीनत अमान


जमाने को दिखाना हैं, प्रेम रोग, प्यार झुकता नही फिल्मो के गीत सुनवाए। आहिस्ता आहिस्ता फिल्म से यह गजल भी सुनवाई -


माना तेरी नजर में तेरा प्यार हम नही कैसे कहे के तेरे तलबगार हम नही


रात में प्रेम रोग फिल्म के गीत के स्थान पर वो सात दिन फिल्म का गीत सुनवाया। यह भी बताया कि वो गायिका भी हैं लेकिन उनके पहले गीत की चर्चा नही की। उनका पहला गीत शायद यादो की बारात फिल्म का शीर्षक गीत हैं। इस गीत के दो संस्करण हैं। एक पद्मिनी कोल्हापुरे और उनकी बहन शिवांगी कोल्हापुरे ने गाया हैं। शायद इसी लोकप्रिय गीत से उनका फिल्म संसार में प्रवेश हुआ और इस लोकप्रिय गीत के बाद ही शायद उनकी अभिनय यात्रा शुरू हुई। इस गीत को सुनवाया जा सकता था या इस गीत की चर्चा की जा सकती थी।


शनिवार को प्रस्तुत हुआ - सैटरडे स्पेशल जिसके अंतर्गत किसी एक विषय पर गीत सुनवाए जाते हैं। इस दिन ऐसा विषय चुना गया जो रोमांटिक गीतों का अक्सर विषय रहा हैं पर आमतौर पर इस विषय पर खासकर गीतों के मामले में कम ही चर्चा होती हैं। यह विषय हैं - गुस्सा।


दिल ही तो हैं फिल्म का यह गीत सुनवाया -


गुस्से में जो निखरा हैं उस हुस्न का क्या कहना गुस्से में अभी हमसे तुम यूं ही खफा रहना


डिटेक्टिव फिल्म का यह गीत सुनवाया जो बहुत कम सुनवाया जाता हैं - छोडिए गुस्सा हुजूर ऎसी नाराजी भी क्या


अप्रैल फूल फिल्म का शीर्षक गीत और प्रोफ़ेसर, मर्यादा, काला पानी, लव स्टोरी फिल्मो के पुराने और बहुत पुराने लोकप्रिय गीत सुनवाए। गीतों का चुनाव अच्छा रहा। प्रस्तुति में छाया गीत की झलक मिली। अच्छी रही प्रस्तुति।


रविवार को आयोजन रहा - फेवरेट फाइव। इसमे कोई एक कलाकार आमंत्रित होते हैं, अपने पसंदीदा पांच गीत बताते हैं और यह भी बताते हैं कि यह गीत उन्हें क्यों पसंद हैं। साथ में कुछ और बातचीत भी हो जाती हैं। इस बार आमंत्रित रहे ख्यात अभिनेता, निर्माता निर्देशक राजा बुन्देला। बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने। बताया कि उन्हें राजकपूर पसंद हैं। उनका हर गीत सार्थक हुआ करता हैं। सुनवाया आवारा फिल्म का शीर्षक गीत। बताया कि बचपन से उन्हें फिल्मे देखने की अनुमति नही मिली फिर भी गुरूदत्त, हृषिकेश मुखर्जी की फिल्मे देखी। देव आनंद की शैली पसंद हैं। दूसरा गीत सुनवाया गाइड फिल्म से -


वहां कौन हैं तेरा मुसाफिर जाएगा कहाँ


गीतों की पसंद के सम्बन्ध में कहा कि प्रेरणादायी गीत पसंद हैं, सुनवाया समझौता फिल्म से लता जी का गाया शीर्षक गीत।


प्रेरणाप्रद गीतों की चर्चा की और सुनवाया यह गीत - जिन्दगी की यही रीत हैं हार के बाद ही जीत हैं


मनोज कुमार के सिने जगत में योगदान की चर्चा की। सुनवाया उनकी फिल्म उपकार का गीत - कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बाते हैं बातो का क्या


अंत में खैय्याम और उनके दौर के संगीतकारों की चर्चा की और सुनवाया उमराव जान फिल्म से दिल चीज क्या हैं गीत। इस तरह 6 गीत सुनवाए जबकि कार्यक्रम हैं फेवरेट फाइव यानि 5 गीत सुनवाने का। वैसे छठे गीत के लिए पर्याप्त समय भी नही था, गाना चलता रहा और साथ-साथ समापन उदघोषणा होती रही जिसमे प्रस्तुतकर्ता का नाम बताया - तनूजा कोंडाजी कानरे। शुरू और अंत में परिचय दिया और समापन किया युनूस (खान) जी ने।


सोमवार को गीतकार आनंद बक्षी को श्रद्धांजलि दी गई। ऐसे लोकप्रिय गीत सुनवाए जिनके लिए उन्हें फिल्मफेयर एवार्ड मिले।


पहला एवार्ड 1977 में अपनापन फिल्म के इस गीत के लिए - आदमी मुसाफिर हैं आता हैं जाता हैं 1981 में एक दूजे के लिए फिल्म के इस गीत के लिए दूसरा एवार्ड - तेरे मेरे बीच में कैसा हैं ये बंधन अनजाना 1995 में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएगे फिल्म के इस गीत के लिए - तुझे देखा तो ये जाना सनम प्यार होता हैं दीवाना सनम 1999 में आखिरी एवार्ड मिला ताल फिल्म के इस गीत के लिए - इश्क बिना क्या जीना यारा


लगभग 40 बार नामांकन किया गया पर एवार्ड 4 ही मिले, ऐसे कुछ गीतों की जानकारी भी दी जो एवार्ड के लिए नामांकित किये गए पर एवार्ड के लिए चुने नही जा सके। समापन किया 1972 में रिलीज फिल्म मोम की गुडिया के लिए उन्ही के गाए इस गीत से जिसे मैंने पहली ही बार सुना -


मैं ढूंढ रहा था सपनों में तुम हो अनजाने अपनो में


रात के कार्यक्रम में उनका गाया यह गीत न सुनवा कर चरस फिल्म का गीत सुनवाया जिसमे उन्होंने भी गाया हैं। उनके बारे में हल्की सी जानकारी भी दी।


मंगलवार को अभिनेत्री पूनम ढिल्लों पर फिल्माए गए गीत सुनवाए गए। नूरी फिल्म का यह गीत बहुत दिन बाद सुन कर अच्छा लगा - चोरी चोरी कोई आए


त्रिशूल, दर्द, सोहनी महिवाल, फिल्मो के गीत सुनवाए। तेरी क़सम फिल्म का यह गीत सुनवाया जो कुमार गौरव पर फिल्माया गया हैं - ये जमीं गा रही हैं आसमाँ गा रहा हैं


उनके सम्बन्ध में एक ही बात बताई जो मैंने पहली बार सुनी कि उनका सम्बन्ध थियेटर से भी हैं।


बुधवार को कार्यक्रम निर्माता निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा पर केन्द्रित था। परिंदा, 1942 अ लव स्टोरी, मुन्ना भाई एम बी बी एस, लगे रहो मुन्ना भाई फिल्मो के गीत सुनवाए। करीब फिल्म से यह गीत भी सुनवाया - चोरी चोरी जब नज़रे मिली अच्छा लगा कि रात में मोहाली में चल रहे क्रिकेट मैच की ताजा स्थिति भी बताई गई।


गुरूवार को यह कार्यक्रम अभिनेत्री मीनाकुमारी कि पुण्य स्मृति में समर्पित किया गया। मीनाकुमारी पर फिल्माए उन फिल्मो के गीतों को सुनवाया गया जिसे फिल्मफेयर एवार्ड मिले या एवार्ड के लिए नामांकित किया गया। बैजू बावरा, साहब बीबी और गुलाम, काजल, आजाद फिल्मो के गीत सुनवाए। पाकीजा का चलते चलते गीत भी सुनवाया। आरती फिल्म का यह गीत मीनाकुमारी और प्रदीप कुमार के संवादों के साथ सुनवाया -


कभी तो मिलेगी बहारो की मंजिल


फिल्मो की रिलीज के वर्ष और उनके अभिनय से सम्बंधित एक-दो बाते भी बताई।


पद्मिनी कोल्हापुरे और पूनम ढिल्लों पर कार्यक्रम प्रसारित करते समय यह कहा गया कि उनकी फिल्मो के गीत सुनवाए जा रहे हैं। शायद इसीलिए सत्यम शिवम् सुन्दरम और तेरी क़सम फिल्मो के गीत सुनवाए जो उन फिल्माए नही गए। मुझे लगता हैं किसी निर्माता निर्देशक की फिल्म को उनकी फिल्म कहा जा सकता हैं पर अभिनेता अभिनेत्री जिस फिल्म में काम करते हैं उस फिल्म को उनकी फिल्म नही कहा जा सकता। इसीलिए बेहतर होगा कि अभिनेता अभिनेत्री पर केन्द्रित कार्यक्रमों में वही गीत सुनवाइए जो उन पर फिल्माए गए हो। अजीब सी स्थिति हो गई जब कार्यक्रम सुन रहे थे पद्मिनी कोल्हापुरे पर और गीत सुना रहे थे वो जो जीनत अमान से जुडा हैं इसी तरह पूनम ढिल्लों पर कार्यक्रम सुनते समय कुमार गौरव पर फिल्माए गीत को सुनना बड़ा अजीब इसीलिए भी अधिक लगा कि यह गीत नायिका को संबोधित भी नही था।


रात 9:30 बजे आज के फनकार कार्यक्रम प्रसारित किया गया। शुक्रवार को यह कार्यक्रम अभिनेता फारूख शेख पर केन्द्रित था। इस दिन उनका जन्मदिन था। शुरूवात अच्छी की, कथा फिल्म के कौन आया गीत से। बताया कि उनकी पहली फिल्म गरम हवा थी। पहली व्यावसायिक फिल्म नूरी थी। उनकी विभिन्न फिल्मो में अभिनय की, उनकी हास्य और गंभीर भूमिकाओं की भी चर्चा की। बाजार फिल्म का सीन सुनवाया जिसमे उनके सुप्रिया पाठक के साथ हैदराबादी भाषा में संवाद हैं जहां वो चूडिया बेच रहे हैं। चश्मेबद्दूर, उमराव जान जैसी सभी प्रमुख फिल्मो की चर्चा की और गीत भी सुनवाए। उनके रंगमंच के काम की भी चर्चा हुई। बताया कि उन्होंने शबाना आजमी के साथ आपकी अमृता नाटक में काम किया, आज भी वो नाटको में व्यस्त हैं। शोध, आलेख और स्वर युनूस (खान) जी का रहा।


शनिवार को यह कार्यक्रम केन्द्रित रहा आज के दौर की संगीतकार जोडी सलीम-सुलेमान पर। बताया कि पहली फिल्म हैं प्यार में कभी-कभी जिसमे पार्श्व संगीत दिया। अन्य फिल्मो में भी पार्श्व संगीत दिया - क़यामत, डरना मना हैं। भूत फिल्म के लिए एवार्ड भी मिला। इक़बाल और रब ने बना दी जोडी फिल्मो के गीतों में उनका संगीत लोकप्रिय हुआ। चेक दे इंडिया, फैशन उनकी उल्लेखनीय फिल्मे हैं और नई फिल्म बैंड बाजा बारात की भी चर्चा हुई। इन सभी फिल्मो के गीत सुनवाए।


रविवार को विश्व रंगमंच दिवस था। इस अवसर पर उन कलाकारों की चर्चा हुई जिनका सम्बन्ध सिनेमा के साथ रंगमंच से भी रहा। ऐसा पहला नाम हैं पृथ्वी राज कपूर जिनका सम्बन्ध पृथ्वी थियेटर से रहा। एक सीन भी सुनवाया जो शायद मुगले आजम फिल्म का था। अगला नाम बताया सोहराब मोदी। यहाँ भी एक सीन सुनवाया जो शायद पुकार फिल्म का था। उनकी रिकार्डिंग भी सुनवाई जिसमे उन्होंने ऐतिहासिक विषयो को पसंद करने की बात बताई। अगला नाम रहा बलराज साहनी का जिनका सम्बन्ध इप्टा से रहा। जिससे गीतकार कैफी आजमी, शौक़त आजमी और शबाना आजमी भी जुड़े हैं। इसी तरह नसीरूद्दीन शाह, फारूख शेख, अमोल पालेकर, दिनेश ठाकुर, अमरीश पुरी, ओम पुरी, पंकज कपूर, अनुपम खेर, परेश रावल, राकेश बेदी, इला अरूण की चर्चा हुई। आज के दौर के कलाकारों की भी चर्चा हुई - सीमा विश्वास, रघुवीर यादव, मनोज वाजपेयी, आशीष विद्यार्थी, इरफान खान। अभिनय के अलावा लेखन के लिए सौरभ शुक्ला, गीतकार स्वानंद किरकिरे, संगीतकार उत्तम सिंह की चर्चा हुई। सम्बंधित गीत भी सुनवाए। शोध, आलेख और स्वर युनूस (खान) जी का रहा। अच्छी रही प्रस्तुति।


सोमवार को यह कार्यक्रम गीतकार आनंद बक्षी को समर्पित किया गया। इस दिन उनकी पुण्य तिथि थी। बताया कि उनका जन्म रावलपिंडी में हुआ था। कुछ दिन थल सेना में भी नौकरी की। फिर गायक और अभिनेता बनने का शौक़ लेकर बम्बई आए। लिखने का शौक़ भी था जो काम आया और भगवान दादा की फिल्म बड़ा आदमी के लिए पहला गीत लिखा। लेकिन लोकप्रियता मिली जब जब फूल खिले फिल्म के इस गीत से -


परदेसियो से न अँखियाँ मिलाना


पर आगे काम नही मिल पाया क्योंकि हर संगीतकार के अपने-अपने गीतकार रहे। इसके बाद मिली फिल्म मिलन जिसका यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ -


सावन का महीना पवन करे सोर


इस गीत के अनुभव उनसे ही सुने। उनकी आवाज में रिकार्डिंग भी सुनवाई। यह भी बताया कि उन्होंने लगभग 4500 गीत लिखे जिनमे अधिकाँश गीतों में प्यार के विविध रंग हैं। चर्चा में आए गीत सुनवाए। प्रस्तोता रही रेणु (बंसल) जी।


मंगलवार को यह कार्यक्रम हास्य अभिनेता जगदीप पर केन्द्रित रहा। इस दिन उनका जन्मदिन था। उनके बारे में जानकारी उन्ही के मुख से सुनवाई गई यानि रिकार्डिंग सुनवाई गई जिसमे उन्होंने खुद के बारे में बताया। रिकार्डिंग के वो अंश सुनवाए जिसमे उन्होंने बताया कि उनका बचपन संघर्षो में बीता। बचपन में काम करते थे। काम के रूप में ही फिल्मो में अभिनय किया और बाल कलाकार बन गए। बीच-बीच में उन फिल्मो के गीत सुनवाए - हम पंछी एक डाल के, गुरूदत्त की फिल्म आर-पार। यहाँ यह भी बताया की रफी साहब ने उनके लिए गाने के लिए कैसे आवाज का अंदाज बदला। इसके बाद बताया कि कैसे शोले फिल्म में सूरमा भोपाली की भूमिका मिली। इस फिल्म के दो सीन सुनवाए। सूरमा भोपाली फिल्म बनाने की बात भी बताई। कुल मिलाकर ऐसे लगा कि किसी कार्यक्रम के लिए की गई बातचीत के अंश यहाँ सुनवा दिए गए। अंशो का चुनाव भी ठीक नही रहा। उनकी आरंभिक फिल्मो की बात हुई यानि बाल कलाकार के रूप में, फिल्म शोले और फिल्म बनाने की बात हुई, इस तरह हास्य अभिनेता के रूप में उनकी छवि उभर कर नही आई। कई फिल्मो में उन्होंने हास्य भूमिकाएं की जिनके नाम तक नही बताए गए। जहां तक मेरी जानकारी हैं बतौर नायक उनकी एक फिल्म हैं नूरमहल। यह फिल्म नही चली पर इसमे उन पर और नायिका पर फिल्माया गया सुमन कल्याणपुर का गाया यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था -


मेरे महबूब न जा आज की रात न जा


इसकी भी चर्चा नही हुई। प्रस्तोता रहे युनूस (खान) जी।


बुधवार को निर्माता निर्देशक यश चोपड़ा पर कार्यक्रम केन्द्रित रहा। बताया कि पहले आई एस जौहर के सहायक थे फिर अपने भाई बी आर चोपड़ा के सहायक बने। बी आर चोपड़ा ने उन्हें पहली बार निर्देशन का मौक़ा दिया और उनकी पहली फिल्म आई धूल का फूल। इस तरह सामाजिक समस्या पर फिल्म निर्देशित की, अगली फिल्म रही वक़्त। 1973 में अपनी फिल्म कम्पनी खोली - यश राज प्रोडकशनस और पहली फिल्म बनाई दाग। इसके बाद सिलसिला चल पडा, प्यार के विविध रंग बताती एक के बाद एक फिल्मे बनाई जिनमे से कुछ नाम हैं - इत्तेफाक, कभी-कभी, काला पत्थर, सिलसिला, डर, मोहब्बते। दूसरे निर्माताओं के लिए भी फिल्मे निर्देशित की - त्रिशूल, दीवार। उन्हें मिले पुरस्कारों की भी जानकारी दी। फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे उनके दोनों बेटो के बारे में भी बताया - आदित्य चोपड़ा जिन्होंने दिल तो पागल हैं निर्देशित की और उदय चोपड़ा जिन्होंने धूम में अभिनय किया। प्रस्तोता रहे अमरकांत जी। अच्छा संतुलित रहा कार्यक्रम।


गुरूवार को अभिनेत्री मीनाकुमारी पर केन्द्रित रहा यह कार्यक्रम। इस दिन उनकी पुण्य तिथि थी। बताया कि असली नाम महजबीं हैं। पिता संगीत शिक्षक होने से बचपन से कला का माहौल रहा। पहली फिल्म मिली विजय भट्ट की, बाल कलाकार के रूप में। बतौर नायिका पहली फिल्म रही बैजू बावरा। साहब बीबी और गुलाम और परिणीता फिल्म में उनकी अभिनय क्षमता उभर कर आई। भावुक भूमिकाएं अधिक की। उनकी फिल्मे फूल और पत्त्थर, साहब बीबी और गुलाम के सीन सुनवाए। उनकी कॉमेडी भूमिका की भी चर्चा की मिस मेरी फिल्म से पर अधिक कॉमेडी फिल्म थी किशोर कुमार के साथ शरारत जिसका नाम भी नही बताया। इसी तरह से आजाद फिल्म की चर्चा भी नही की जिसमे उनके नृत्य बहुत पसंद किए गए थे जो शायद पहली बार उन्होंने किए थे। उन्हें मिले एवार्ड्स की चर्चा की जिसमे उल्लेखनीय हैं वर्ष 1962, इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए तीन फिल्मो को नामांकित किया गया, तीनो उन्ही की फिल्मे थी - साहब बीबी और गुलाम, मैं चुप रहूंगी और आरती जिनमे से साहब बीबी और गुलाम के लिए उन्हें एवार्ड मिला। जिन फिल्मो के लिए उन्हें एवार्ड मिला उनमे परिणीता, शारदा, बैजू बावरा फिल्मे भी शामिल हैं। उनके शायर रूप की भी चर्चा हुई और गुलज़ार द्वारा उनकी आवाज में उनकी शायरी को संपादित कर निकाले गए एलबम की भी जानकारी दी। बताया कि उनकी रूहानी आवाज लोगो ने बहुत पसंद की। पाकीजा और चित्रलेखा फिल्मो की भी चर्चा की पर दो महत्वपूर्ण फिल्मो की चर्चा नही हुई - मेरे अपने जिसमे उन्होंने नानी माँ की भूमिका की और अंतिम फिल्म गोमती के किनारे। उनके द्वारा फ़ौजी भाइयो के लिए प्रस्तुत जयमाला की रिकार्डिंग के अंश भी सुनवाए। प्रस्तुति अच्छी रही।


पूरे सप्ताह इस कार्यक्रम को विजय दीपक छिब्बर जी ने प्रस्तुत किया। सहयोग पी के ए नायर जी का रहा।


सोमवार और गुरूवार को दोनों ही कार्यक्रम गीतकार आनंद बक्षी और अभिनेत्री मीनाकुमारी को समर्पित रहे। हिट सुपरहिट में प्रस्तुति का नया अंदाज अच्छा लगा। वैसे सारी बाते एक ही कार्यक्रम में समेटी जा सकती थी। केवल आज के फनकार कार्यक्रम का प्रसारण पर्याप्त था।


विभिन्न कलाकारों के जन्मदिन और पुण्य तिथि पर अलग-अलग कार्यक्रम प्रसारित करने के बजाए एक ही रूपक कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा सकता था। वैसे भी हर दिन एक ही फनकार कार्यक्रम सुनना अच्छा नही लगता।


हिट सुपरहिट कार्यक्रम भी दोपहर में 1 बजे से 1:30 बजे तक प्रसारित होता हैं फिर यही कार्यक्रम रात में 9 बजे से 9:30 बजे तक प्रसारित होता हैं। दो समय प्रसारण के बजाय एक समय अन्य कार्यक्रम प्रसारित किए जा सकते हैं। इस तरह रात के एक घंटे के और दोपहर के आधे घंटे के प्रसारण समय में अन्य कार्यक्रम सुनवाए जा सकते हैं। कार्यक्रमों में विविधता आने से रोचकता बढ़ेगी।


दोनों ही कार्यक्रमों की अपनी-अपनी संकेत धुन हैं। हिट-सुपरहिट की धुन में लोकप्रिय गीतों के संगीत के अंश हैं, यहाँ एक बढ़िया उपशीर्षक भी हैं - शानदार गानों का सुरीला सिलसिला। संकेत धुनें कार्यक्रमों के आरम्भ और अंत में सुनवाई गई। हिट सुपरहिट कार्यक्रम के दौरान और रात में दोनों कार्यक्रमों के बीच के अंतराल में अन्य कार्यक्रमों के प्रायोजको के विज्ञापन भी प्रसारित हुए। एकाध बार क्षेत्रीय विज्ञापन भी प्रसारित हुए। विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी देते संदेश (प्रोमो) भी प्रसारित हुए।


मंगलवार की रात और बुधवार दोपहर में प्रसारण में कुछ तकनीकी गड़बड़ रही। कुछ समय प्रसारण गायब रहा, खरखराहट रही, अन्य आवाजे सुनाई दी।

Friday, March 25, 2011

फरमाइशी फिल्मी गीतों के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 24-3-11

विविध भारती के सभी कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा प्रसारण समय फरमाइशी गीतों के कार्यक्रमों का हैं। यूं लगता हैं कि ये कार्यक्रम बहुत आसान हैं यानि जिन गीतों को श्रोता सुनना चाहते हैं वही गीत सुना दो बस... पर ये बात नही हैं। अन्य कार्यक्रमों को तैयार करने में सृजनशीलता, कल्पना शक्ति और विषय से सम्बंधित जानकारी की आवश्यकता होती हैं जबकि फरमाइशी गीतों के कार्यक्रमों में मेहनत बहुत हैं।

किसी भी फिल्मी गीत की औसत अवधि 3-6 मिनट की होती हैं और कम से कम आधे घंटे के प्रसारण में 5-6 गीत सुनवाए जाते हैं। हर गीत के साथ विवरण यानि फिल्म, गायक कलाकार, गीतकार और संगीतकार के नाम बताना जरूरी हैं। इसके साथ उन श्रोताओं के नाम बताए जाते हैं जिनकी फरमाइश पर यह गीत सुनवाया जा रहा हैं। शहरी श्रोता आजकल ई-मेल से फरमाइश भेजते हैं, इसीसे श्रोता का नाम और शहर का नाम बता दिया जाता हैं पर ई-मेल की फरमाइश दो ही दिन होती हैं। शेष पांच दिन पत्रों से आई फरमाइश पर गीत सुनवाए जाते हैं। पत्र अक्सर दूर-दराज के क्षेत्रो से आते हैं जिसमे गाँव, जिला, तहसील फिर राज्य का नाम बताया जाता हैं। इन नामो के साथ श्रोताओं के नाम बताए जाते हैं। हर पत्र के साथ औसतन 5 श्रोताओं के नाम होते हैं। हर गीत के लिए औसतन 5 पत्र होते हैं। अंदाजा लगा लीजिए एक गीत के साथ कितने नाम बताने हैं... फिर लगभग 5 मिनट में एक गीत समाप्त फिर दूसरे गीत के लिए इतने ही नाम फिर तीसरा गीत...... उदघोषक और प्रसारण के तकनीकी पक्ष से जुड़े लोगो को बहुत सावधानी और संयम बरतने की आवश्यकता होती हैं। इसके अलावा फोन पर बातचीत और सबसे अधिक कठिन हैं तुरंत एस एम एस देखना, सभी नाम पढ़ना और तुरंत वह गीत सुनवाना। साथ ही पत्रों और ई-मेलो को एकत्रित कर गीतों का संयोजन करना।

विविध भारती से फरमाइशी गीतों के कार्यक्रम दोपहर से शुरू होते हैं। कार्यक्रम हैं - एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने, मन चाहे गीत, हैलो फरमाइश, जयमाला, आपकी फरमाइश इन कार्यक्रमों का स्वरूप अलग-अलग हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

पहला कार्यक्रम दोपहर 12 बजे प्रसारित होता हैं - एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने। बहुत आकर्षक हैं कार्यक्रम का शीर्षक जो आधुनिक सा लगता हैं और इस लयात्मक शीर्षक को उपशीर्षक की भी आवश्यकता नही हैं। एस एम एस यानि मोबाइल फोन का sms जिसके बहाने वी बी एस (vbs) यानि विविध भारती सेवा के तराने सुनने का अवसर मिलता हैं।

यह दैनिक कार्यक्रम हैं और यह सजीव (लाइव) प्रसारण हैं। यह अति आधुनिक कार्यक्रम हैं। इसमे फरमाइश के लिए आधुनिक तकनीक एस एम एस का प्रयोग किया जा रहा हैं। लेकिन इसी वजह से यहाँ फरमाइश भी बंध सी गई हैं। अन्य कार्यक्रमों की तरह किसी भी फिल्म के गीत की फरमाइश यहाँ नही की जा सकती बल्कि विविध भारती खुद जिन फिल्मो का चुनाव करती हैं, उसी में से किसी गीत के लिए फरमाइश भेजनी होती हैं। पर बड़ी बात ये हैं कि सन्देश भेजते ही तुरंत गीत सुनने को मिल जाता हैं।

एक घंटे के इस कार्यक्रम की शुरूवात में 10 फ़िल्मों के नाम बता दिए गए फिर बताया गया एस एम एस करने का तरीका जो इस तरह हैं -

मोबाइल के मैसेज बॉक्स में जाकर टाइप करना हैं - vbs - फिल्म का नाम - गाने के बोल - अपना नाम और शहर का नाम और भेज दे इस नंबर पर - 5676744

और इन संदेशों को 12 बजे से 12:50 तक भेजने के लिए कहा गया और यह भी कहा गया कि हर सन्देश में दो श्रोताओं के नाम ही भेजे ताकि अधिक एस एम एस शामिल किए जा सकें। पहला गीत उदघोषक की खुद की पसन्द का सुनवाया गया ताकि तब तक संदेश आ सके। फिर शुरू हुआ संदेशों का सिलसिला। सबसे अधिक सन्देश जिन गीतों के लिए मिले वही गीत सुनवाए गए।

शुक्रवार को प्रस्तोता रही मनीषा (भटनागर) जी। इस दिन सत्तर के दशक की लोकप्रिय फिल्मे चुनी गई। श्रोताओं ने भी अधिकतर लोकप्रिय गीतों के लिए सन्देश भेजे। झील के उस पार, दो फूल, हीरा पन्ना, राजा रानी, अनोखी अदा फिल्मो के गीत, मनचली और जैसे को तैसा फिल्मो के शीर्षक गीत सुनवाए गए। अभिमान फिल्म से दो गीत सुनवाए गए। एक गलती हुई, यह गीत सुनवाया और फिल्म का नाम बताया धुंध -

धीरे से जाना खटियन में ओ खटमल

जबकि यह गीत धुंध फिल्म का हैं ही नही। यह गीत देव आनंद पर फिल्माया गया हैं और शायद शरीफ बदमाश फिल्म का हैं यह गीत। वैसे धुंध फिल्म का यह गीत भी सुनवाया गया -

उलझन सुलझे न, रास्ता सूझे न, जाऊं कहाँ मैं

शनिवार को प्रस्तोता रहे अमरकांत जी। शुरूवात की समझौता फिल्म के इस गीत से - बड़ी दूर से आए हैं प्यार का तोहफा लाए हैं

अन्य फिल्मे रही - ब्लैक मेल, ज्वार भाटा, जोशीला, हँसते जख्म और सौदागर जिसका यह गीत सुनवाया - सजना हैं मुझे सजना के लिए

कुछ गीत ऐसे थे जिन्हें बहुत दिन से नही सुनवाया गया था। अधिकाँश गीत रोमांटिक थे। एक बात अखर गई, इस दिन फागुन फिल्म भी शामिल थी जिसमे होली का एक अच्छा गीत हैं लेकिन नही सुनवाया गया। शायद इसके लिए अधिक सन्देश नही मिले।

सोमवार को प्रस्तोता रहे युनूस (खान) जी। इस दिन अभिनेत्री रानी मुखर्जी का जन्म दिन था इसीलिए उन्ही की फिल्मे चुनी गई। चलते-चलते, बंटी और बबली, नो वन किल जसिका, पहेली फिल्मो के गीत सुनवाए। दिल बोले हडिप्पा फिल्म से हडिप्पा गीत भी शामिल था। यह गीत भी सुनवाया -

तू अगर चाहे तो धूप में बारिश हो

इस दिन एक बात अच्छी हुई, फिल्मो के नाम शुरू में धीरे-धीरे बताने से जल्दी एस एम एस आए और पहला ही गीत फरमाइश पर सुनवाया गया गुलाम फिल्म से। लेकिन दो-तीन बाते बहुत खराब रही। गाना चल रहा हैं और नाम पढ़े जा रहे हैं। जाहिर हैं गीत की आवाज धीमी हैं, ऐसे में गाना सुनने का क्या मजा। एक-दो बार लगा फिल्मो के नाम या तो बताए ही नही गए या गीत के साथ बताए गए जिससे संगीत के शोर में सुनाई नही दिया। अंत में तकनीकी सहयोगी का नाम भी कुछ इस तरह बताया कि ठीक से सुनाई ही नही दिया।

मंगलवार को प्रस्तोता रहे कमल (शर्मा) जी। इस दिन के लिए नई फिल्मे चुनी गई। शुरूवात की बाजीगर फिल्म के काली काली आँखे गीत से। 1942 अ लव स्टोरी, राजा हिन्दुस्तानी, धड़कन, मन, सोलजर, जोश फिल्मो के गीत सुनवाए। फिजा फिल्म का यह गीत भी शामिल था - आ जा माहिआ

बुधवार को प्रस्तोता रही मनीषा (भटनागर) जी। इस दिन के लिए सत्तर के दशक की लोकप्रिय फिल्मे चुनी गई। शुरूवात की बेईमान फिल्म के मुकेश के गाए इस गीत से जिसे बहुत-बहुत दिन बाद सुन कर अच्छा लगा, यह गीत लगभग भूल से गए थे -

न इज्जत की चिंता न फिकर कोई अपमान की जय बोलो बेईमान की

सीता और गीता, पाकीजा, बावर्ची, अपना देश, विक्टोरिया नंबर 203, जवानी दीवानी, गोरा और काला, राजा जानी, रामपुर का लक्ष्मण फिल्मो के लोकप्रिय गीत श्रोताओं से प्राप्त एस एम एस के अनुसार सुनवाए गए। इनमे से पाकीजा फिल्म को रोका जा सकता था क्योंकि पिछले दिन हैलो फरमाइश में यह फिल्म शामिल थी।

सबसे अच्छा कार्यक्रम गुरूवार का रहा। प्रस्तोता रही शेफाली (कपूर) जी। सत्तर के दशक की ऎसी फिल्मे चुनी गई जिनके गीत बहुत दिन से नही सुनवाए गए। अनुराग, परिचय, शरारत, मान जाइए, मेरे जीवन साथी, अपराध, आँखों आँखों में, बॉम्बे टू गोवा। श्रोताओं ने भी उन गीतों के लिए सन्देश भेजे जो बहुत लोकप्रिय हैं और कई दिनों से नही सुने। पिया का घर फिल्म का शीर्षक गीत भी शामिल था। वैसे शुरूवात ही बढ़िया रही - समाधि फिल्म के काँटा लगा गीत से।

पूरा कार्यक्रम बहुत बढ़िया हो जाता अगर एक बात न खटकती। पूरे कार्यक्रम के दौरान कई बार कार्यक्रम को शो कहा गया। हर बार मैं अपने सेल फोन को देखती रही लेकिन न उसमे मुझे शेफाली जी नजर आई, न विजय दीपक छिब्बर जी और न ही मनीष जी, गाना भी नजर नही आया, सिर्फ गाना सुनाई दिया और सुनाई दी शेफाली जी की आवाज। दो-चार बार कहा जाता तो अनसुना कर सकते थे। अंग्रेजी के शब्दों से परहेज नही हैं पर शब्दों का गलत प्रयोग नही होना चाहिए। टेलीविजन कार्यक्रमों को शो कहा जाता हैं क्योंकि वहां स्क्रीन पर नजर आता हैं पर ये आवाज की दुनिया हैं। शो के बजाय प्रोग्राम कह सकते हैं।

आधा कार्यक्रम समाप्त होने के बाद फिर से बची हुई फ़िल्मों के नाम बताए गए और फिर से बताया गया एस एम एस करने का तरीका। कार्यक्रम के अंत में अगले दिन की 10 फ़िल्मों के नाम बताए गए। देश के विभिन्न भागो से संदेश आए। हर गीत के लिए औसतन 10 सन्देश आए। आरम्भ, बीच में और अंत में संकेत धुन सुनवाई गई।

इस कार्यक्रम को राजीव (प्रधान) जी, मंगेश (सांगले) जी, मनीष चन्द्र (वैश्य) जी के तकनीकी सहयोग से हम तक पहुंचाया गया और पूरे सप्ताह इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक (छिब्बर) जी ने।

दोपहर 1:30 बजे का समय रहा मन चाहे गीत कार्यक्रम का। एक घंटे के इस कार्यक्रम की प्रस्तुति पारंपरिक और आधुनिक दोनों ढंग से हैं। यानि दो दिन ई-मेल से भेजी गई फरमाइश से गीत सुनवाए जाते हैं और शेष दिन पुराने तरीके से पत्रों से प्राप्त फरमाइश के अनुसार गीत सुनवाए जाते हैं। नए-पुराने गीतों के लिए श्रोताओं ने फरमाइश भेजी।

शुक्रवार को शुरूवात की असली नक़ली फिल्म के इस पुराने गीत से - छेड़ा मेरे दिल ने तराना तेरे प्यार का

मर्यादा फिल्म से चंचल गीत, नौकर फिल्म से लोकगीत की छाप का गीत पल्लो लटके सुनवाया। साजन, ईमानदार, कलाकार, लाल दुपट्टा मलमल का, कन्यादान, आए दिन बहार के फिल्मो के गीत सुनवाए। सांझ और सवेरा फिल्म का शीर्षक गीत सुनवाया। रोमांटिक गीत भी सुनवाए। इस तरह अलग-अलग मूड के गीत सुनवाए गए। प्रस्तोता रहे अमरकांत जी।

शनिवार को प्रस्तोता रहे युनूस (खान) जी। आते ही सुनवाया मर्यादा फिल्म का यह गीत -

चुपके से दिल दे दे नइ ते शोर मच जाएगा

यही गीत पिछले दिन इसी कार्यक्रम में सुनवाया गया। समझ में नही आया... जिन श्रोताओं के नाम शुक्रवार को बताए गए उन्हें शनिवार को सम्मिलित कर एक ही बार गीत सुनवा दिया जा सकता था। धरती, पत्थर के फूल, गहरा दाग, साहब बीबी और गुलाम, जब प्यार किसी से होता हैं, नील कमल जैसी नई पुरानी फिल्मो के गीत सुनवाए गए। आक्रमण फिल्म का यह गीत भी सुनवाया जो बहुत कम ही सुनवाया जाता हैं -

छोटी सी उम्र में लम्बे सफ़र में हमसफ़र

बहुत दिन बाद इश्क पर जोर नही फिल्म का यह शीर्षक सुनना अच्छा लगा - सच कहती हैं दुनिया इश्क पर जोर नही

नूरी फिल्म का शीर्षक गीत भी सुनवाया। साजन फिल्म का गीत भी सुनवाया जिसका दूसरा गीत पिछले दिन सुनवाया गया था।

रविवार का कार्यक्रम होली के रंग में डूबा रहा। शुरूवात की बागबान फिल्म के गीत से - होली खेले रघुवीरा अवध में
पराया धन, सिलसिला, शोले, पुरानी फिल्म गोदान फिल्मो के गीत सुनवाए। कामचोर फिल्म का यह गीत सुनवाया जो कम ही सुनवाया जाता हैं -

मल दे गुलाल मोहे आज होली आई रे

होली का आधुनिक गीत भी सुनवाया वक़्त फिल्म से - लेट्स प्ले होली, रंगो में हैं प्यार की बोली

आरती और मुकद्दर का सिकंदर फिल्मो से अन्य गीत भी सुनवाए।

सोमवार को प्रस्तोता रहे नन्द किशोर (पाण्डेय) जी। शुरूवात की हम आपके हैं कौन फिल्म से माई रे माई गीत से। कल हो न हो, कभी अलविदा न कहना, दिल्ली का ठग, कही दिन कही रात, काजल, पारसमणि, नौ दो ग्यारह, पासपोर्ट जैसी नई पुरानी फिल्मो के गीत सुनवाए। पुरानी फिल्मे अधिक शामिल रही। पुरानी फिल्म आया सावन झूम के से इस गीत के लिए श्रोताओं ने बहुत दिन बाद फरमाइश भेजी -

साथिया नही जाना के जी न लगे

नई फिल्म करीब का यह गीत भी शामिल था - चोरी चोरी जब नज़रे मिली

मंगलवार को हद हो गई। दो घंटे के भीतर दूसरी बार सुनवाया 1942 अ लव स्टोरी फिल्म का यह गीत - एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

यही गीत कुछ समय पहले एस एम एस के तराने कार्यक्रम में सुना था। यहाँ इस गीत को रोका जा सकता था। इस दिन नए पुराने और बहुत पुराने गीत सुनवाए गए। पतिता, आरजू, जीवन मृत्यु, एक राज, दबंग फिल्मो के गीत सुनवाए। रोमांटिक गीत अधिक सुनवाए गए जैसे मोहब्बत, साथिया फिल्मो के शीर्षक गीत। रोमांटिक गीतों के अलावा गंभीर गीत भी शामिल था बहुत पुरानी फिल्म वक़्त से -

आगे भी जाने न तू पीछे भी जाने न तू जो भी हैं बस यही एक पल हैं

राजा हिन्दुस्तानी फिल्म तीसरी बार शामिल रही, एक बार कुछ समय पहले 12 बजे के कार्यक्रम में ही शामिल थी। प्रस्तोता रही ममता (सिंह) जी।

बुधवार को युनूस (खान) जी ने सुनवाए ई-मेल से प्राप्त फ़रमाइशो के अनुसार गीत। इश्किया, रंग दे बसंती, तुम मिले, हम साथ साथ हैं, राम लखन जैसी नई पुरानी फिल्मो के गीत सुनवाए। रूदाली फिल्म से सिली सिली गीत, धड़कन फिल्म का शादी-ब्याह का गीत, उपकार फिल्म से बसंत ऋतु का गीत भी शामिल था। महबूब की मेहंदी फिल्म का यह गीत सुनवाया -

मैंने तुझे पहचाना नही

यह गीत बहुत ही कम सुनवाया जाता हैं। अच्छा लगा कि श्रोताओं ने ऐसे गीत की फरमाइश ई-मेल भेज कर की। इस दिन यह गीत सुनना अच्छा लगा परपिछली रात आपकी फरमाइश कार्यक्रम में भी यह फिल्म शामिल थी जहां लताजी का गाया अक्सर सुनवाया जाने वाला गीत सुनवाया जिसे रोका जा सकता था।

गुरूवार को प्रस्तोता रहे राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी। शुरूवात की अभिलाषा फिल्म के लताजी के गाए इस गीत से जो कम ही सुनवाया जाता हैं, अक्सर रफी साहब का गाया संस्करण सुनवाया जाता हैं -

वादियाँ मेरा दामन रास्ते मेरी बाहें जाओ मेरे सिवाय तुम कहाँ जाओगे

भ्रष्टाचार, आ गले लग जा, कटी पतंग, बिल्लू, अमर प्रेम, आरजू, श्री 420 जैसी नई पुरानी फिल्मो के विभिन्न मूड के गीत सुनवाए गए। क्रान्ति फिल्म का देश भक्ति गीत सुनवाया गया, दो दिन पहले ही जयमाला में इस फिल्म का गीत सुनवाया गया था।

शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को शाम 4 बजे पिटारा कार्यक्रम के अंतर्गत प्रसारित हुआ आधुनिक तकनीक से सजा एक घंटे का फरमाइशी कार्यक्रम - हैलो फरमाइश। इसमे विविध भारती के प्रस्तोता श्रोताओं से सीधे फोन पर बात करते हैं। अपनी पसंद का गीत बताने के साथ-साथ कुछ इधर-उधर की भी बाते होती हैं जिससे कई तरह की जानकारियाँ भी मिल जाती हैं।

पिटारा की संकेत धुन के बाद इस कार्यक्रम की संकेत धुन सुनवाई गई।

शनिवार को श्रोताओं से फोन पर बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। अलग-अलग शहरों से फोन आए। होली का हल्का सा रंग नजर आया। श्रोताओं से हल्की-फुल्की बातचीत हुई। एक महिला श्रोता ने बताया कि वह पंचमढी के पास की रहने वाली हैं और छिन्दवाडा के छोटे से गाँव में विवाह हुआ हैं। पढाई जारी रखे हैं और पहली होली के लिए मायके आई हैं। अलग-अलग तरह का काम करने वाले श्रोताओं से बात हुई और सभी ने अपने काम के बारे में बताया दुकानदार, ईंट भट्टी में काम करने वाले, लगेज बैग बनाने वाले, मैकेनिक ने बताया कि नई मॉडल की गाडियों के लिए कम्पनी से प्रशिक्षण मिलता हैं। कुछ युवा दोस्तों ने बात की और होली पर रासायनिक रंगों की चर्चा की और उनकी पसंद पर सुनवाया सिलसिला फिल्म का होली गीत - रंग बरसे, सभी श्रोताओं ने अस्सी के दशक और उसके बाद के गीत पसंद किए। होली के गीत भी थे और अन्य गीत भी।

मंगलवार को फोन पर श्रोताओं से बातचीत की अमरकांत जी ने। एक श्रोता की बातचीत से अमरकांत जी की ही तरह मुझे भी पहली बार पता चला कि हैदराबाद नाम की एक और जगह हैं। शायद बहुत से श्रोताओं के लिए भी यह नई जानकारी हैं कि उत्तर प्रदेश में एक स्थान हैं हैदराबाद ढीन्गारा, यहाँ से एक छात्र ने फोन किया। एक और बातचीत अच्छी रही। एक नेत्रहीन श्रोता ने फोन किया, बताया कि चार साल पहले एक बीमारी के बाद उनकी आँखों की ज्योति जाती रही। बातचीत से पता चला कि वह नेत्रहीन होने से कुछ भी काम नही करते हैं तब अमरकांत जी ने उन्हें सलाह दी कि कई तरह के काम नेत्रहीन भी कर सकते हैं, उन्हें कोशिश करनी चाहिए। एक बार नेटवर्क की समस्या से बातचीत पूरी नही हो पाई। हालांकि कई बार विविध भारती से यह सलाह दी जा चुकी हैं कि नेटवर्क ठीक न हो तो फोन न करे। एकाध श्रोता ने बात ही नही की सिर्फ गीत सुनना चाहा। एक कॉल रोचक लगा, जयपुर से बात की, बताया कि माताजी के मंदिर में पुजारी हैं और शोले फिल्म का होली गीत सुनने की फरमाइश की। लगता हैं किसी मनचले श्रोता ने शरारत की। श्रोताओं के अनुरोध पर पाकीजा, हिना, खुदा गवाह जैसी कुछ पुरानी फिल्मो के गीत सुनवाए।

गुरूवार को श्रोताओं से फोन पर बातचीत की अशोक जी ने। एक फोन कॉल अच्छा लगा, एक नेत्रहीन छात्र ने बात की, अपनी पढाई और करिअर के बारे में बताया। लेकिन एक कॉल में जितनी बातचीत हो सकती थी नही हुई, इस श्रोता ने बताया कि वह जयपुर में लाख की चूड़ियों बनाने का काम करते हैं। यह बहुत ही मशहूर चूड़ियाँ हैं। इस काम के बारे में कुछ बातचीत होनी चाहिए थी, पर नही हुई। श्रोताओं की पसंद पर पुरानी फिल्म महुआ का शीर्षक गीत सुनवाया और आंटी नंबर 1 फिल्म का कॉमेडी शीर्षक गीत भी सुनवाया। हम साथ साथ हैं और क्रान्ति फिल्मो के गीत भी सुनवाए, ये फिल्मे तीसरी बार शामिल रही। कुली फिल्म का यह गीत भी सुनवाया -

मुबारक हो सबको हज का महीना

एक श्रोता ने अपने दोस्तों के लिए फरमाइश की जजीर फिल्म के मन्नाडे के गाए इस गीत की - यारी हैं ईमान मेरा यार मेरी जिन्दगी तीनो ही कार्यक्रमों में कुछ श्रोताओं ने बहुत ही कम बात की, सिर्फ अपनी पसंद का गीत बताया। बातचीत सुन कर लगा कि श्रोता विविध भारती से जुड़े हैं, गाने सुनने का शौक़ रखते हैं लेकिन अपने बारे में कुछ कहना, कुछ बात करना इनके लिए कठिन हैं।

रिकार्डिंग के लिए फोन नंबर बताया गया - 28692709 मुम्बई का एस टी डी कोड 022 यह भी बताया कि हर सोमवार, मंगलवार और शुक्रवार को 11 बजे से 1 बजे तक फोन कॉल रिकार्ड किए जाते हैं।

कार्यक्रम को रेखा (जम्बुवार) जी के सहयोग से महादेव भीमराव (जगदाले) जी ने प्रस्तुत किया। तकनीकी सहयोग साइमन परेरा जी, सुनील (भुजबल) जी का रहा।

शाम बाद 7 बजे दिल्ली से प्रसारित समाचारों के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद शुरू हुआ फ़ौजी भाईयों की फ़रमाइश पर सुनवाए जाने वाले फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम जयमाला। इसमे फरमाइशी गीत सुनने के लिए फ़ौजी भाई एस एम एस या ई-मेल भेजते हैं। 7:45 तक चलने वाले इस कार्यक्रम के शुरू और समाप्ति पर बजने वाली संकेत धुन अच्छी हैं, कार्यक्रम की परिचायक हैं।
शुक्रवार को नए-पुराने गीत सुनवाए गए। अच्छा लगा कि एक ही कार्यक्रम में महेंद्र कपूर, किशोर कुमार, कुमार सानू के गीत सुनना, कल्याणजी आनंद जी और अन्नू मालिक द्वारा तैयार किए गए गीत एक साथ सुनना। पुरानी डोन, खुदा गवाह, खून भरी मांग, निकाह फिल्मो के गीत सुनवाए। पुरानी फिल्म सुहाग का भक्ति गीत भी सुनवाया और तमन्ना फिल्म का यह गीत भी सुनवाया जिसे कम ही सुनवाया जाता हैं -

तारों को भी नींद आने लगी आपके आने की आस भी जाने लगी

रविवार को नई पुरानी हर समय की फिल्मो के गीत सुनवाए गए। शुरूवात की पुरानी फिल्म चोरी-चोरी के इस गीत से - आ जा सनम मधुर चांदनी में हम

नई फिल्म एक्शन रिप्ले का यह गीत भी सुना -

जोर का झटका हाय जोरो से लगा शादी बन गई उम्र क़ैद की सजा

सिर्फ तुम, राज फिल्मो के गीत सुनवाए। गीत गाता चल फिल्म का शीर्षक गीत भी सुनवाया। हाथी मेरे साथी फिल्म का पशुप्रेम दर्शाता गीत भी सुनवाया। इस तरह हर दृष्टि से इस दिन गीतों के चुनाव में अच्छी विविधता रही।

सोमवार को प्रस्तोता रही संगीता (श्रीवास्तव) जी। नए गीत अधिक सुनवाए गए - विरासत, रब ने बना दी जोडी, जीत फिल्मो के गीत सुनवाए। बार्डर फिल्म का यह गीत भी शामिल था -

ऐ जाते हुए लम्हों ज़रा ठहरो मैं भी तो चलता हूँ

और क्रान्ति फिल्म से देश भक्ति गीत सुनने के लिए भी फ़ौजी भाइयों ने फरमाइश भेजी।

मंगलवार को शुरूवात हुई पुराने गीत से - जन्म जन्म का साथ हैं तुम्हारा हमारा

फिर सुनवाए नए गीत यमला पगला दीवाना, दाग द फायर, वेलकम फिल्मो से और आज के समय का लोकप्रिय गीत दबंग फिल्म से सुनवाया -

तेरे मस्त मस्त दो नैन मेरे दिल का ले गए चैन

दबंग फिल्म का एक गीत दोपहर में मन चाहे गीत में भी सुनवाया गया था।

बुधवार को प्रस्तोता रहे अजेन्द्र (जोशी) जी। कुर्बान, मोहरा, आ अब लौट चले फिल्मो के गीत सुनवाए। यह गीत भी शामिल था - क्योंके इतना प्यार तुमसे करते हैं हम

बंटी और बबली के कजरारे गीत से शुरूवात की। यह फिल्म इस सप्ताह दूसरी बार शामिल हुई।

गुरूवार को प्रस्तोता रही सविता (सिंह) जी। दिल, दिलवाले फिल्मो के गीतों के साथ ग़दर फिल्म का यह मस्त गीत भी सुनवाया - मैं निकला गड्डी लेके

आज के दौर की फिल्म वंस अपॉन अ टाइम इन मुम्बई और पुरानी फिल्म आपकी क़सम का गीत भी सुनवाया।

फ़ौजी भाइयों को एस एम एस करने का तरीका भी बताया गया जो इस तरह हैं -

मोबाइल के मैसेज बॉक्स में जाकर टाइप करना हैं - vjm - फिल्म का नाम - गाने के बोल - अपना नाम और रैंक जरूर लिखे और भेज दे इस नंबर पर - 5676744

रात 10:30 बजे प्रसारित हुआ आपकी फ़रमाइश कार्यक्रम जो प्रसारण का अंतिम कार्यक्रम होता हैं। आधे घंटे के इस कार्यक्रम में मन चाहे गीत कार्यक्रम की तरह ई-मेल और पत्रों से भेजी गई फरमाइश पर गीत सुनवाए गए। इसमें श्रोताओं की फ़रमाइश पर कुछ समय पुरानी फिल्मो के गीत अधिक सुनवाए गए।

शुक्रवार को अभिनेता, निर्माता-निर्देशक शशि कपूर के जन्मदिन को ध्यान में रखकर फरमाइशी गीतों में से जब जब फूल खिले फिल्म के इस गीत से कार्यक्रम की शुरूवात की, उन पर फिल्माए इस गीत को रफी साहब ने गाया हैं -

परदेसियों से न अखियाँ मिलाना परदेसियों को हैं एक दिन जाना

आखिरी दांव और पुरानी फिल्म शर्त का हेमंत कुमार का गाया गीत भी सुनवाया। जूली फिल्म से शीर्षक युगल गीत भी शामिल था। सौतन फिल्म का गीत भी सुना और सबसे अच्छा लगा मुकेश और सुमन कलयाणपुर की आवाजो में पहचान फिल्म का यह मजेदार गीत सुनना -

वो परी कहाँ से लाऊँ तेरी दुल्हन जिसे बनाऊँ के गोंरी कोई पसंद न आए तुझको

शनिवार को प्रस्तोता रही मंजू (द्विवेदी) जी। होली का रंग नजर आया। प्रस्तुति में छाया गीत की छाप झलक आई। अच्छी रही प्रस्तुति। पराया धन फिल्म का होली गीत और फागुन फिल्म का होली गीत भी सुनवाया -

पिया संग खेलूँ होली फागुन आयो रे

पुराना होली गीत भी सुनवाया गोदान फिल्म से - बिरज में होली खेलत नंदलाल

लव इन शिमला का गीत भी सुनवाया जो कम ही सुनवाया जाता हैं - गाल गुलाबी किसके हैं

अन्य गीत भी शामिल रहे कश्मीर की कलि, लोफर फिल्मो से।

रविवार को शिकार, शबनम, ठाकुर जरनैल सिंह, हीरा फिल्मो के गीत सुनवाए और सफ़र फिल्म का यह गीत बहुत दिन बाद सुनना अच्छा लगा -

हम थे जिनके सहारे वो हुए न हमारे डूबी जब दिल की नैय्या सामने थे किनारे

सोमवार को प्रस्तोता रही संगीता (श्रीवास्तव) जी। प्रस्तुति में छाया गीत की छाप झलक आई। इस दिन इस कार्यक्रम में भी बहुत पुराने गीत सुनवाए गए - चाचाचा, अनपढ़, जाल और महल फिल्म का गीत आएगा आने वाला

मंगलवार को महबूब की मेहंदी, दाग, दिल अपना और प्रीत पराई, और बहुत दिन बाद सुना सेहरा फिल्म का गीत और मेरा नाम जोकर फिल्म का यह गीत - जाने कहाँ गए वो दिन

बुधवार को किस्मत, ज्वैल थीफ, आबरू फिल्मो के गीतों के साथ ससुराल फिल्म का यह गीत भी सुनवाया -

तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नजर न लगे चश्मेबद्दूर

एक बात खटक गई, सभी एकल गीत थे और वो भी गायकों की आवाजों में, एक भी गायिका की आवाज नही सुनवाई, यहाँ तक कि युगल गीत भी नही। हालांकि सभी गीत अच्छे थे फिर भी गानों के चयन में विविधता होती तो अच्छा लगता।

गुरूवार को श्रोताओं के ईमेल आधारित फरमाइशी गीतों में खामोशी, जिन्दगी फिल्मो के गीत सुनवाए, संगम फिल्म का मुकेश का गाया यह गीत भी सुनवाया -

दोस्त दोस्त न रहा प्यार प्यार न रहा

आरजू फिल्म का रफी साहब का गाया गीत सुनवाया जबकि इसी फिल्म का एक गीत दोपहर में मन चाहे गीत कार्यक्रम में सुनवाया था। इसके अलावा नई फिल्म दबंग से मस्त मस्त नैन गीत भी शामिल था जो इस सप्ताह दूसरी बार और यह फिल्म तीसरी बार शामिल रही।

बुधवार और गुरूवार को मन चाहे गीत और आपकी फ़रमाइश कार्यक्रम में ईमेल से प्राप्त फ़रमाइशें पूरी की जाती है अन्य दिन पत्र देखे जाते है। देश के अलग-अलग भागों से गानों की फ़रमाइश भेजी गई। इस सप्ताह एक ख़ास बात देखी गई। पत्रों की संख्या में कमी आई। ई-मेलों की संख्या तो हमेशा से हीकम रही थी। अधिकाँश गीत एक ही पत्र और मेल पर सुनवाए गए। लेकिन 12 बजे के कार्यक्रम में एस एम एस की संख्या हमेशा से ही अधिक रही हैं और दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही हैं।
हर पत्र में और हर एस एम एस के साथ श्रोताओं के नाम बहुत होते हैं। इसीलिए विविध भारती ने सीमा लगा दी हैं। श्रोताओं से अनुरोध किया हैं कि हर एस एम एस के साथ दो श्रोताओं के नाम लिखे, हर ई-मेल के साथ चार श्रोताओं के नाम लिखे, लेकिन पत्र चूंकि दूर-दराज के क्षेत्रो से आते हैं इसीलिए यहाँ कोई पाबंदी नही हैं। अब भी हर पत्र के साथ कई श्रोताओं के नाम होते हैं।

एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम को छोड़कर सभी कार्यक्रम प्रायोजित रहे। प्रायोजक के विज्ञापन भी प्रसारित हुए। अन्य कार्यक्रमों के प्रायोजक के विज्ञापन भी प्रसारित हुए। जयमाला में क्षेत्रीय विज्ञापन भी प्रसारित हुए। पूरे सप्ताह देश के विभिन्न भागों, शहरों, गाँवों, जिलो, कस्बों से श्रोताओं की फरमाइश पर नए पुराने सभी समय के गीत विभिन्न कार्यक्रमों में सुनने को मिले।

एक बात बहुत अखर गई। एक ही फिल्म के गीत दो-तीन बार सुनवाए गए। कभी एक ही गीत दुबारा सुनवाया कभी अलग-अलग गीत सुनवाए। एक ही फिल्म को दुबारा शामिल करने के लिए कम से कम एक महीने का अंतर होने से ठीक रहेगा। श्रोताओं की फरमाइश एक महीने बाद भी पूरी की जा सकती हैं।

एक और बात खटकी। दो-तीन बार कार्यक्रम के समापन पर सुनवाए गए गीत का कभी सिर्फ मुखड़ा बजा और संगीत के बाद अंतरा शुरू भी नही हो पाया और कभी थोड़ा सा अंतरा सुनवाया और कार्यक्रम का समय समाप्त हो गया। इस तरह विविध भारती ने तो श्रोताओं की फरमाइश पूरी की पर श्रोताओं को पूरा गीत सुनने को नही मिला। जब पूरा गीत सुनवा सके जितना समय न बचा हो तब कृपया गीत मत सुनवाइए।

मन चाहे गीत और आपकी फरमाइश कार्यक्रम में फरमाइश भेजने के लिए पता बताया गया -

कार्यक्रम का नाम, विविध भारती सेवा, पोस्ट बॉक्स नंबर 19705 मुम्बई 400091

ई-मेल आई डी - manchahegeet@gmail.com apkifarmaish@gmail.com

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