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Thursday, June 9, 2011

यादें हवामहल के 'मुंशी इतवारीलाल' की। (लेखक नरेश मिश्र से फोन पर बातचीत)

रेडियो की दुनिया काफी विराट है। और एफ.एम.रेडियो के इस दौर में चारों तरफ़ युवा पीढ़ी का शोर है।
पर रेडियो की इस दुनिया की मज़बूत नींव रखने में और उस पर ये सुनहरा संसार खड़ा करने में अग्रज पीढ़ी का जबर्दस्‍त योगदान रहा है। रेडियोनामा पर हमने एक प्रयास शुरू किया है, रेडियो की इस अग्रज पीढ़ी से जुड़ने का। इस सीरीज़ में आप अग्रज प्रसारणकर्ताओं के टेलीफ़ोन पर किए गए इंटरव्‍यू सुनेंगे। इन्‍हें मैं अपने मोबाइल फोन पर रिकॉर्ड कर रहा हूं। और रेडियोनामा की टीम के हम लोग मिलकर इन्‍हें अंकित भी करेंगे। संभवत: पाक्षिक रूप से हर बुधवार को हम हाजिर होंगे। 

पहले चरण में इलाहाबाद के कुछ प्रसारण दिग्‍गजों को चुना गया है। आपको ये बता दूं कि इस श्रृंखला की प्रेरणा इलाहाबाद के हमारे मित्र 'डाकसाब' ने दी है। (प्रेरणा और संपर्क-सूत्र वग़ैरह सब) हालांकि इसका आग़ाज़ पिछले महीने ही होना था। पर अनेक कारणों से ये हो ना सका। संयोग से आज 'डाकसाब' का जन्‍म-दिन है। तो डाक-साब से ये कहते हुए कि 'तेरा तुझको अर्पण, क्‍या लागे मोरा'। जन्मदिन की शुभकामनाओं सहित।
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विविध-भारती का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम रहा है 'हवामहल'। और हवामहल ने रेडियो नाटक की दुनिया को समृद्ध करने में अपना महती योगदान दिया है। दरअसल वो दौर रेडियो नाटकों का सुनहरा दौर था। जब देश के विभिन्‍न केंद्रों पर नाटक रिकॉर्ड होते और उन्‍हें विविध-भारती भेज दिया जाता। जहां से वो सारे देश को सुनाई देते। हास्‍य-नाटिकाओं की बहार होती थी उन दिनों। 'लोहा सिंह', 'मुंशी इतवारीलाल', 'म्‍यूजिक मास्‍टर भोलाशंकर' और 'बहरे बाबा' जैसी श्रृंखलाओं ने तब धूम मचा रखी थी। मुंशी इतवारीलाल वाली सीरीज़ को लिखते रहे श्री नरेश मिश्र। नरेश जी पहले पत्रकार थे और फिर इलाहाबाद आकाशवाणी में स्क्रिप्‍ट-राइटर बने। तकरीबन बीस साल उन्‍होंने 'मुंशी इतवारीलाल' सीरीज़ लिखी। आकाशवाणी परिवार की सबसे लंबी श्रृंखला है ये। और इन दो दशकों में इसकी लोकप्रियता हमेशा एक जैसी ऊंची बनी रही। आपको बता दें कि मुंशीजी की भूमिका इस सीरीज़ के निर्देशक विनोद रस्‍तोगी स्‍वयं करते थे। विनोद रस्‍तोगी आकाशवाणी नाटकों का बड़ा नाम रहे हैं। बहरहाल...इतना लंबा अनुभव रखने वाले नरेश मिश्र से मैंने केवल 'मुंशी इतवारीलाल' के बारे में ये बातचीत अपने मोबाइल फोन पर रिकॉर्ड की है।

बातचीत की अवधि है क़रीब छब्‍बीस मिनिट।
इतना सुनने का धीरज (या फुरसत) जिन लोगों के पास नहीं है, उनके लिए इस बातचीत की इबारत भी

यूनुस- नरेश जी नमस्‍कार कैसे हैं आप

नरेश- हां मैं ठीक हूं।

यूनुस- नरेश जी मुंशी इतवारीलाल अपने समय की बहुत ही मशहूर हास्‍य-नाटिकाओं में से एक रही है और आप इसके लेखक हैं। हमें इसके इतिहास के बारे में बताईये

नरेश मिश्र- इसका इतिहास 1964 से शुरू होता है। मेरा करियर फ्रीलान्‍सर के रूप में शुरू हुआ। और आकाशवाणी में आने से पहले मैंने कई संस्‍थाओं में काम किया। न्‍यूज़पेपर्स लिमिटेड, हिंदुस्‍तान टाइम्‍स, गांधी मेमोरियल ट्रस्‍ट का प्रकाशन विभाग, अकबर मेमोरियल ट्रस्‍ट का प्रकाशन विभाग। इन संस्‍थाओं में नौकरी करने के बाद मैं आकाशवाणी में सन 1967 में आया। लेकिन 'मुंशी इतवारीलाल' की शुरूआत 1964 से ही हो गयी। ऐसा था कि ....जो आकाशवाणी इलाहाबाद के ड्रामा प्रोड्यूसर थे विनोद रस्‍तोगी, जिनका बड़ा नाम हे ड्रामा के क्षेत्र में, तो उनके दिमाग़ में आया कि एक हास्‍य-नाटिका शुरू की जाए। क्‍योंकि उस समय आकाशवाणी के विभिन्‍न केंद्रों से बहुत अच्‍छी हास्‍य नाटिकाएं प्रसारित हो रही थीं। आकाशवाणी पटना से लोहा सिंह, आकाशवाणी लखनऊ से बहरे बाबा, आकाशवाणी जयपुर से 'म्‍यूजिक मास्‍टर भोलाशंकर'। तो उसी तरह की एक हास्‍य नाटिका जो है इलाहाबाद से प्रसारित करने की योजना थी। और रस्‍तोगी जी दारागंज में ही रहते थे। रहने वाले तो वो फ़र्रूख़ाबाद के थे, लेकिन जब रेडियो में आए तो दारागंज में ही उन्‍होंने आके मकान लिया। और इसी मुहल्‍ले में मेरा जन्‍म हुआ है, तो मुझसे उनका परिचय हो गया। तो उन्‍होंने ये प्रस्‍ताव मेरे सामने रखा और कहा कि एक कन्‍सेप्‍ट बनाओ और फिर मुझसे डिस्‍कस करो। क्‍योंकि हम एक हास्‍य-नाटिका शुरू करना चाहते हैं। तो मैंने कन्‍सेप्‍ट बनाया। और मेरे ज़ेहन में एक कायस्‍थ परिवार आया, जिसके ख़ानदान के पुरखे अवध के नवाब के ज़माने में मीर-बख़्शी के ओहदे पर तैनात थे, ऐसा मेरे ज़ेहन में आया। और एक इड्डा मियां थे, मैं जब बीमार पड़ा तो इड्डा मियां मेरे बड़े शुभचिंतक थे। वो कहते थे—‘भैया भगवान के फ़ज़ल से आप ठीक हो जायेंगे। आपकी सेहत बहाल हो जायेगी’। तो भगवान के फ़ज़ल से जो वाक्‍यांश है वो मैंने उनका पकड़ लिया। (आगे चलकर कादर ख़ान ने एक फिल्‍म में इस जुमले को अपनाया और बेहद लोकप्रिय किया)

एक और बात मैं आपको बताऊं। मेरी एजुकेशन संस्‍कृत पाठशाला में हुई है। उर्दू से मेरी वाकफियत बहुत कम है। लिपि के बारे में तो मैं बिल्‍कुल नहीं जानता लेकिन भाषा को लेकर के कोई दिक्‍कत इसलिए नहीं होती क्‍योंकि आमतौर पर हम जो बोलचाल की भाषा का इस्‍तेमाल करते हैं उसमें उर्दू होती ही है। और हिंदी और उर्दू को मैं अलग नहीं मानता। अच्‍छा, मेरे तीन बहुत अज़ीज़ दोस्‍त थे। एक नसीमउद्दीन। एक इख़लाक उद्दीन और एक मंज़ूर आलम। नसीमुद्दीन तो बंटवारे के वक्‍त पाकिस्‍तान चले गए और सेक्रेटियेट में वहां एक बड़े ऊंचे ओहदे पर तैनात हो गए। और बहुत ही ग़रीब परिवार से थे। पिता उनके सुनारी का काम करते थे। मां के देहांत के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। मेरी मां बचपन में ही मर गयी थी तो हम दोनों एक ही दुख से दुखी रहते थे। एक दूसरे से बहुत पटती थी। दूसरे जो इख़लाक थे वो यहां इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में थे। अभी दो साल पहले उनका इंतकाल हुआ। और मंज़ूर आलम यहां से एयर-फोर्स में भर्ती हो गयी। इन तीनों के साथ हमारा जो उठना बैठना था, उससे उर्दू के संस्‍कार मिल गये थे और कायस्‍थ परिवार में तो मेरा एक तरह से पालन-पोषण ही हुआ है। कायस्‍थों का जो रहन-सहन है उससे मेरी वाकफियत बहुत ज़्यादा थी। यानी कहने को आप मुझे ब्राह्मण कह सकते हैं पर ज्‍यादातर मेरी जिंदगी कायस्‍थ परिवारों में गुज़री। तो एक तरह से ये संयोग था जिससे ‘मुंशी इतवारीलाल’ के लेखन में मुझे मदद मिली।

इस तरह से ‘मुंशी इतवारीलाल’ का कंसेप्‍ट बना। स्क्रिप्‍ट लिखी गयी। डिस्‍कस हुआ। और उसके बाद फिर विनोद रस्‍तोगी ने अपनी डायलॉग अदाकारी के कई नमूने पेश किये। उसमें से जो टीम को सबसे अच्‍छा लगा, उसे ही उन्‍होंने डेवलप किया। तो कहने का मतलब ये है कि ‘मुंशी इतवारीलाल’ के प्रोडक्‍शन में बड़ी मेहनत होती थी। ये आकाशवाणी इलाहाबाद का बहुत शाहकार प्रोडक्‍शन माना जाता था इसलिए इस पर सबकी नज़र रहती थी। और आगे चलकर जब वो ‘विविध-भारती’ से ब्रॉडकास्‍ट होने लगा तब उसकी क़ीमत बढ़ने लगी। और बहुत बड़ा प्रोत्‍साहन था। इसके तमाम उदाहरण हैं। जिनका अनुभव मैंने किया। और कुछ ऐसे अनुभव थे जो कि विनोद रस्‍तोगी को हुए। इनमें से एक अनुभव मैं शेयर करना चाहूंगा अगर आप चाहें तो।

मेरी ससुराल इटावा में है। उन दिनों एक ट्रेन चलती थी ‘असम मेल’। आजकल इसे नॉर्थ-ईस्‍ट फ्रंटियर कहते हैं। जब मैं प्‍लेटफॉर्म पर पहुंचा तो ट्रेन चलने लगी थी। तो सामने जो डिब्‍बा दिखाई दिया वो उसी में चढ़ गया। बाद में जब मैंने देखा तो पाया कि सारे मिलेटरी वाले बैठे हैं। एक भी सिविल व्‍यक्ति नहीं है। तो मुझे लगा कि ग़लती हो गयी। मैं मिलेट्री के कोच में बैठ गया। ये राजपूताना रायफल्‍स के लोग थे जो राजस्‍थान जा रहे थे। मैं बाथरूम के पास खड़ा था। क्‍योंकि बैठने का सवाल ही नहीं उठता। कैप्‍टन वहां से गुज़रा तो उसने मेरी तरफ़ देखा। बोला—‘आप कैसे इस डिब्‍बे में आ गए। ये तो मिलेट्री के लिए रिज़र्व है।’ मैंने उससे कहा—‘वक्‍त नहीं था, ऐन वक्‍त पर ट्रेन छूट रही थी। मैं चढ़ गया। फ़तेहपुर में उतर जाऊंगा’। वो भला शख्‍़स था कि बोला नहीं। बाथरूम से लौटा, अपनी सीट पर बैठ गया, थोड़ी देर मुझे देखता रहा। फिर बोला, आप बैठ जाईये, फतेहपुर में उतर जाईयेगा। मैंने उससे शुक्रिया कहा और बैठ गया। उस समय ‘मुंशी इतवारीलाल’ पुस्‍तक रूप में प्रकाशित होने वाला था, और उसका प्रूफ मेरे पास पड़ा था। मैंने सोचा कि डेढ़ घंटे का वक्‍त कैसे गुज़ारूंगा। तो मैं बैठकर प्रूफ पढ़ने लगा।

कैप्‍टन ने पूछा कि ये आप क्‍या पढ़ रहे हैं तो मैंने कहा, मुंशी इतवारीलाल हास्‍य नाटिका अगर आपने कभी सुनी हो। तो वो कहने लगा, अरे हम लोग तो इसे एक साथ बैठकर सुनते हैं। उन दिनों टेलीविजन था ही नहीं। तो सैनिकों के मनोरंजन का भी एकमात्र साधन रेडियो ही था। उससे आपका क्‍या ताल्‍लुक है। मैंने कहा कि वो नाटिका मैं ही लिखता हूं। कहने लगा कि आप तो मुंशी इतवारीलाल नहीं हैं। मैंने कहा, हां मैं मुंशी इतवारीलाल नहीं हूं। उसके हीरो विनोद रस्‍तोगी हैं। मैं सिर्फ लिखता हूं। उसने अपने तमाम साथियों को बुलवा लिया। आओ आओ मुंशी इतवारीलाल से मिलवाते हैं। और फिर उसने इतने सवालात पूछे। कैसे लिखते हैं, कैसे प्रोडक्‍शन होता है, कैसे रिहर्सल होती है। मुंशियानइ कौन हैं, फिदा हुसैन कौन हैं। उस ज़माने में उसके जो अच्‍छे चरित्र थे, उन सबके बारे में पूछना शुरू कर दिया। डेढ़ घंटे का वक्‍त बड़े आराम से गुज़र गया। मुझे पता भी नहीं चला। फतेहपुर स्‍टेशन आ गया। तो मैंने सोचा कि मैंने कहा था कि फतेहपुर में उतर जाऊंगा तो बैग लेकर उतरने लगा। अब वो कैप्‍टन जो था, वो चाय-नाश्‍ता लेने के लिए प्‍लेटफार्म पर उतर गया था। जैसे ही मैं उतरने लगा, उसने सामने आकर कहा, क्‍या आप अभी तक मुझसे नाराज़ हैं, मैंने कहा, भई नाराज़गी की तो कोई बात नहीं है। आपने मुझे बैठने की जगह दी, मैंने कहा था कि मैं फतेहपुर में उतर जाऊंगा, तो मैं जनरल डिब्‍बे में चला जाता हूं। उसने कहा, नहीं मैं आपको जाने नहीं दूंगा। चाय पिलाई, नाश्‍ता कराया। और बाकी सफ़र कानपुर तक का, जो लगभग पैंतालीस मिनिट का होता है, वो भी मुंशी इतवारीलाल का बयान करने में ही गुज़र गया। जब कानपुर में मैं उतरने लगा, मैंने इजाज़त ली, कहा बड़ा अच्‍छा वक्‍त कटा आपके साथ। तो उसने मेरा बैग उठा लिया। और प्‍लेटफार्म तक आया और कहा कि मैंने अनजाने में आपसे जो ऐतराज किया था, इस डिब्‍बे में चढ़ने का उसके लिए आप मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने कहा, ऐसी कोई बात नहीं है। डिब्‍बा आपके लिए रिज़र्व था। किसी सिटिज़न को उसमें घुसना नहीं चाहिए। आपकी मेहरबानी है कि आपने अपने साथ सफ़र करने दिया। तो मुझे पहली बार लगा कि ‘मुंशी इतवारीलाल’ की लोकप्रियता बहुत है।


इसी तरह का किस्‍सा विनोद रस्तोगी के साथ भी हुआ। उन्‍हें श्रीनगर रेडियो स्‍टेशन पर मुंशी इतवारीलाल को मंच पर प्रस्‍तुत करने जाना था। और टिकिट हो चुके थे। ऐन वक्‍त पर उनकी पत्‍नी कहने लगीं कि मुझे भी कश्‍मीर घूमना है। तो उनको भी साथ ले लिया। जम्मू तक तो कोई प्रॉब्‍लम थी नहीं। जम्‍मू से श्रीनगर फ्लाइट से जाना था। और उसमें तो ऐन वक्‍त पर रिज़र्वेशन मिलता नहीं। तो ‘बड़े भैया’ के नाम से मशहूर विजय बोस काउंटर पर गये और उन्‍होंने मुंशी इतवारीलाल का परिचय करवाया। और कहा कि हम लोग एक टिकिट और चाहते हैं क्‍योंकि मुंशी इतवारीलाल की मुंशियाइन तो साथ हैं लेकिन उनकी धर्मपत्‍नी भी यात्रा करनी चाहती हैं। जो काउंटर पर तैनात व्‍यक्ति था वो बहुत हंसा। और बोला- अभी दो टिकिट खाली हैं। मैं आपको दे देता हूं। उसने भी मुंशी इतवारीलाल के बारे में बहुत कुछ पूछा।


श्री विद्याभूषण अग्रवाल, जो (मशहूर लेखिका) ममता कालिया के पिताजी थे, अब तो उनका देहांत हो गया है। इलाहाबाद रेडियो स्‍टेशन के डायरेक्‍टर थे। तो लौटकर विनोद रस्‍तोगी ने सारा किस्‍सा बताया। बहुत प्‍यार करते थे अग्रवाल जी। कहने लगे, पंडित तू बड़ा अभागा है। देख, ये जो बनिया है, ये मुंशी इतवारीलाल के नाम पर पूरा हिंदुस्‍तान घूम रहा है। और मैं तुझे जाने की परमीशन देने को तैयार हूं। लेकिन पता नहीं क्‍यों तुझे ये सब अच्‍छा नहीं लगता। लेकिन मुझे कुछ बीमारियां थीं, जिनके रहते मैं यात्रा से बचता था। मैंने उन्‍हें बताया कि ऐसी बात नहीं है। मेरी कुछ मजबूरियां हैं। इसलिए मैं नहीं जाता।

एक बार नागपुर में एक नाटक-सम्‍मेलन हुआ। जितनी हास्‍य-नाटिकाएं उस ज़माने में आकाशवाणी में हो रही थीं सबको बुलाया गया। वहां म्‍यूजिक मास्‍टर भोलाशंकर, लोहासिंह, बहरे बाबा सब इकट्ठा हुए। वहां रेडियो के डायरेक्‍टर जनरल भी मौजूद थे। तो उन्‍होंने ‘मुंशी इतवारीलाल’ को सर्वश्रेष्‍ठ हास्‍य–नाटिका बताया। मुझे बड़ा अच्‍छा लगा। और बहरे बाबा से भी अप्रत्‍यक्ष परिचय हुआ। उन्‍होंने पूछा कि कौन हैं इसके लेखक। तो विनोद रस्‍तोगी ने बताया कि इलाहाबाद में रहते हैं। आपके ही समाज के हैं। बाद में एक मज़ेदार बात ये हुई कि रमई काका, जो चंद्रभूषण त्रिवेदी हैं, इनकी भतीजी को मैंने अपनी बड़ी बहू बनाया। कान्‍यकुब्‍जों में बहुत दहेज लिया जाता है। आपको शायद पता होगा। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी को भी यही एक शोक था। कम दहेज की वजह से उनकी बिटिया सरोज ने बड़ा कष्‍ट उठाया। उसका देहांत हो गया। उसी की याद में उन्‍होंने ‘सरोज-स्‍मृति’ लिखी। तो जब दहेज की बात आई तो मैंने कहा, हां दहेज तो लेना है। वो बहुत चौंके, क्‍या दहेज लेना है। मैंने कहा कि रमई काका अगर समधी की तरह गांव के दरवाजे तक मुझसे मिलने आएं, तो मैं ये शादी करूंगा। (ठहाका) मुझे अच्‍छी तरह से याद है कि रमई काका दमा के मरीज़ थे। और वो लखनऊ से उन्‍नाव उनका घर है, तो एक आदमी स्‍कूटर से उन्‍हें लेकर आया। समधी के रूप में जब मिले तो गले से लगा लिया। और मज़ाक़ भी किए। बताईये साहब मुझे और क्‍या चाहिए। कोई क्‍या देगा। जो अपनी लड़की दे रहा है, उससे बड़ी कौन सी चीज़ हो सकती है, जिसे लेकर मैं धन्‍य हो जाऊंगा। वो तस्‍वीर मेरे पास आज भी है। जिसमें हम दोनों गले मिल रहे हैं। रमई काका का काफी बीमारी के बाद निधन हो गया। तो मुंशी इतवारीलाल से कई तरह की यादें जुड़ी हुई हैं।

यूनुस—कितना पेमेन्‍ट मिलता था आपको मुंशी इतवारीलाल लिखने का।

नरेश मिश्र—जैसा कि मैंने आपको बताया कि मैं फ्री लान्‍सर था, सन चौंसठ से तीन बरस तो मैंने बाहर से लिखा। फिर 1967 में दो सितंबर को आकाशवाणी में मुझे स्क्रिप्‍टराइटर के तौर पर तैनाती मिल गयी। तो पेमेन्‍ट मिलना बंद हो गया। पर उससे पहले चालीस रूपये मूल फीस मिलती थी। और दोबारा प्रसारण की फीस मिलती थी सवा छह रूपए। बहुत सारे रेडियो स्‍टेशन इसे रिपीट करते थे। और उसका हिसाब कैश विभाग में आता था। अच्छी खासी रकम हो जाती थी। तब महंगाई ज्‍यादा तो थी नहीं। चार सौ रूपए का मूल वेतन पाने वाला बहुत रईस माना जाता था तब। उस समय अगर आपको दो सौ तीन सौ रूपए हर महीने रॉयल्‍टी मिल रही है, तो उस ज़माने के हिसाब से बड़ी बात होती थी।

यूनुस—कुल मिलाकर कितनी झलकियां लिखीं होंगी आपने मुंशी इतवारीलाल के नाम से।

नरेश‍ मिश्र--मैंने बीस बरस इसे लिखा। कई सौ झलकियां लिखीं। इनमें से चालीस या पचास पुस्‍तक के रूप में संग्रहीत हैं। मुंशी इतवारीलाल को हम कई वातावरण में ले गये। मुंशी इतवारीलाल का ट्रान्‍सफर करा दिया मुंबई। मुंबई में वो नन्‍हीं के पेइंग गेस्‍ट हो गए। उसका एक बेटा था कुमार। बिगड़ैल। और पहले जब मुंशी इतवारीलाल थे तो उनके साथ बाबू बाबूलाल थे। फिदा हुसैन हमेशा साथ रहे। वो मुंबई भी चले गए साथ में। फिर मुंशी इतवारीलाल लौटकर गांव आ गये। तो गांव की समस्‍याओं पर भी लंबे समय तक लिखा जाता रहा। जिसमें एक परसादीलाल नाम के कैरेक्‍टर को इंट्रोड्यूस किया गया। एक बजरंगी पहलवान को लाया गया। परसादी लाल युक्तिभद्र दीक्षित बनते थे। वो आज भी जीवित हैं। एक बात मैं आपको बता दूं कि आकाशवाणी इलाहाबाद में स्‍टाफ और बाहर से आने वाला ऐसा कोई भी जाना माना नाटक का आर्टिस्‍ट नहीं था जिसने मुंशी इतवारीलाल में काम नहीं किया (यूनुस--क्‍या बात है, बहुत बढिया) जिसने मुंशी इतवारीलाल में काम नहीं किया, उसे आकाशवाणी इलाहाबाद का बहुत अच्‍छा ड्रामा आर्टिस्ट नहीं माना जाता था। चंद्रकान्‍ता ने बुआ का रोल किया था। आज भी जीवित हैं। 95 बरस की उम्र है उनकी। अदभुत रोल करती थीं। अवधी टच था। मैं पंचायत घर में स्क्रिप्‍ट लिखता था। वहां अवधी में लिखना पड़ता था। पर मुंशी इतवारीलाल अलग लिखा जाता था। उसकी खुशबू अलग होती थी। उसका माहौल अलग होता था। और मैं आपको यकीन दिलाना चाहता हूं कि उन्‍नीस बरस के दौरान कोई ऐसा मौक़ा नहीं आया जब मैंने उसे दफ्तर में बैठकर लिखा हो। हमेशा घर पर लिखा। और हमेशा तीन चार दिन ज़ाया किये पंद्रह मिनिट की स्क्रिप्‍ट के लिए। कई कई बार उसे री-राइट करना पड़ता था। कभी कभी रस्‍तोगी जी के सवालात आते थे। तो फिर से लिखना पड़ता था। और ये बड़ी मेहनत का काम था। और हर प्रोडक्‍शन के बाद एक मीटिंग होती थी, कि अब आगे क्‍या कंसेप्‍ट लेना है, क्‍या करना है।

एक और मज़ेदार बात बताना चाहता हूं। एक बार सहारिया साहब स्‍टेशन डायरेक्‍टर थे। तो एक मीटिंग हुई, जैसी कि रेडियो की तिमाही मीटिंग होती है। तो उसमें एक बहस चली कि कौन से प्रोग्राम बंद कर देने चाहिए और कौन से नए शुरू करने चाहिए। तो मेरे एक मित्र हैं , जो डी डी जी (उप महानिदेशक) होकर रिटायर हुए, बड़े अच्‍छे मित्र हैं मेरे। आजकल अमरीका में हैं। वो वहां प्रोग्राम एक्‍जीक्‍यूटिव थे। उन्‍होंने कहा कि मुंशी इतवारीलाल को बंद कर देना चाहिए। पंद्रह बरस से ज़्यादा हो गए हैं अब वो बासी हो गया है। सहारिया साहब स्‍टेशन डायरेक्‍टर थे और मिलेट्री कोटे से इस पद पर आए थे। उन्‍होंने कहा--'मुंशी इतवारीलाल पीक/शिखर नहीं है। वो एक प्‍लेटो/पठार है। और अगर आप एवरेस्‍ट के पीक पर चढ जायें तो ज्यादा देर रह नहीं सकते। आपको उतरना पड़ता है। लेकिन पठार पर आप आराम से रह सकते हैं। उसमें तो बाग हैं, बग़ीचे हैं, जानवर हैं, लोग हैं, बोली है, भाषा है, लोकगीत हैं। ये सब है।' तो उन्‍होंने इसकी पठार से तुलना की। इसलिए उसको बंद नहीं किया जा सकता। उन्‍होंने इस सुझाव को नहीं माना।

तो इस तरह से तमाम यादें जो हैं मुंशी इतवारीलाल से जुड़ी हुई हैं।

यूनुस--नरेश जी मुंशी इतवारीलाल जिस तरह से अपना परिचय देते हैं उसे आपने पुस्‍तक में लिखा है।

नरेश मिश्र--मुंशी इतवारीलाल और उनके जो सहयोगी पात्र हैं, उन्‍होंने अपना तार्रूफ़ खुद करवाया है। मैं कुछ पात्रों का परिचय आपको सुनाता हूं।

मुंशी जी कहते हैं--
दुश्‍मनों का दुश्‍मन यारों का यार हूं मैं
मीर-बख्‍शी हूं, मुहब्‍‍बत का तलबगार हूं मैं
गुलशने-कौम का हर दिन अजीज है ऐ दोस्‍त
नीयत-ए-बद के लिये ज़हर भरा ख़ार हूं मै।

मुंशियाइन कहती हैं--


ब्‍याहता हूं मीर-बख्‍शी की, शायरी से उन्‍हें मुहब्‍बत है
रोऊं अपने करम पे या कि हंसूं, जिंदगी भर की मुसीबत है।

बेटी ग़ज़ल कहती है--
अपने पापा की मैं हूं प्‍यारी ग़ज़ल, अपनी मम्‍मी की आंख का सपना
प्‍यार मुझको मिला विरासत में, बांटना उसको काम है अपना।

प्‍यारेलाल कहते हैं--
अपने फन में जनाब आला हूं, मीर बख्‍शी का साला हूं।

बुआ जी कहती हैं--(वो हमेशा मंदिर बनवाने के लिए चंदा जमा करती रहती हैं)
ये बड़ा है कष्‍ट हरे कृष्‍णा
हो गयी दुनिया भ्रष्‍ट हरे कृष्‍णा
चंदा कर बनवा दूं मैं मंदिर तेरा
बस इतना ही इष्‍ट हरे कृष्‍णा।

बाबूलाल कहते हैं--
एक रूपैया तीन अठन्‍नी मेरा यही कमाल
श्रीमान कहते हैं मुझको बाबू बाबूलाल।

यूनुस--नरेश जी ये अदभुत बातचीत रही। और मुंशी इतवारीलाल से जुड़ी जो बातें आपने हमें बताई हैं, बहुत अदभुत हैं। इनके बारे में हमें पता नहीं था। अगली बार कुछ और किस्‍से आपसे सुनेंगे। बहुत धन्‍यवाद।

नरेश मिश्र- शुक्रिया।

8 comments:

Shubhra said...

Hawa mahal ki signature tune is baat ka sanket hoti thi ki ab radio-transistor par badon ka ekadhipatya samaapt ho gaya hai aur bacche aadhe ghante se band zuban ko thoda-bahut hila sakte hain. Lekin 15 minute tak zuban svecchha se band rahti thi. Kya Shandar prahsan aur jhalkiyan hoti theen....
Aur phir ladai ke dinon prasarit hone wali Dhol ki Pol....
Yadon ka ye anmol pitara kholne ke liye sachmuch dhanyavaad ke paatr hain Yunus aur Radionama.

sanjay patel said...

मज़ा आ गया यूनुस भाई इस दस्तावेज़ी पोस्ट को पढ़/सुन कर. झलकी मुंशी इतवारीलाल यदि आज की टीवी वाली परिभाषा में कहूँ तो टीआरपी की दृष्टि से सर्वोच्च होती थी.म्युज़िक मास्टर भोलाशंकर और उस्ताद ततैया ख़ाँ वाली दीनानाथजी और सोमनाथ(शायद) नागर वाली झलकी के साथ यह भी अदभुत समाँ बांधती थी.
जैसे ही हवा-महल में कहा जाता कि आज सुनिये मुंशी इतवारीलाल,तो जैसे एक मस्ती सी दिमाग़ में छा जाती.

यहाँ ग़ौरतलब होगा कि जब हवा-महल,बिनाका गीतमाला और कुछ एक रीजनल प्रसारण (जैसे हमारे यहाँ इन्दौर में देर रात प्रसारित होने वाला पुराने नग़मों का फ़रमाइशी कार्यक्रम मनभावन) शीर्ष पर थे तब का कालखण्ड रोज़ी-रोटी की जद्दोजहद का था और देश में मध्यमवर्ग की तादात बहुत बड़ी थी और उसकी अपनी मुश्किलें और विवशताएं थीं .
घर में सायकल,रेडियो,दीवार घड़ी होना बहुत बड़ी बात होती थी. हर शख़्स कुछ कर गुज़रना चाह रहा था और क़ामयाबी-नाक़ामयाबी के बीच झूल रहा था.ऐसे में मुंशी इतवारीलाल जैसे कार्यक्रम उस समय के अवाम को थकान,तकलीफ़,संघर्ष और उदासी को दूर करने में ख़ासा योगदान देते थे. एक तरह से मैं कहना चाहूँगा कि हमारी तत्कालीन सोश्यो-इकॉनॉमिक स्थितियों को इत्मीनान देने का मनोवैज्ञानिक काम मुंशी इतवारीलाल जैसी प्रस्तुतियों ने किया.तब कम्युनिटि लिसनिंग यानी किसी के घर या पान की दुकान पर जाकर रेडियो को एक साथ सुनने में बड़ा मज़ा आता था और लोग अपने यहाँ चाय/शरबत या पान-सुपारी खिलाते हुए हवामहल,छायागीत,बिनाका गीतमाला सुनवाने में आनंद और फ़ख्र महसूस करते थे.

मुंशी इतवारीलाल के प्रसारण के बाद कई दिनों तक भाग लेने वाले कलाकारों के नाम नहीं दिये जाते थे,शायद वजह थी हवामहल का सीमित समय. अस्सी के दशक में आकाशवाणी के एक कार्यक्रम में भाग लेने जयपुर से रेडियो नाटकों का जानामाने कलाकार रहे नंदलाल शर्मा इन्दौर आए. वे विख्यात प्रसारणकर्ता पं.विनोद शर्मा एक अनुज है. उनका लहजा,आवाज़ का टिम्बर और उसमें मौजूद नैज़ल कुछ ऐसा था कि मुझे लगा कि मुंशी इतवारीलाल यही हैं. मैंने पिताजी से कहा कि इनसे पूछिये(उस ज़माने में घर आये अतिथि से एकदम ऐसी बातों की तसदीक करनें में ख़ासा डर सा लगता था)कि क्या हवामहल वाले मुंशी इतवारीलाल यहीं हैं तो उन्होंने बताया कि नहीं;वह रोल विनोद रस्तोगी करते हैं. हम यह सुन कर बहुत रोमांचित हुए.रस्तोगीजी वैसे भी नाटकों और रेडियो का जाना-माना नाम थे. सो इस तरह से मुंशी इतवारीलालजी का किरदार निभाने वाले कलाकार का असली नाम मैंने पहली बार जाना.

आज नरेश जी से हुए वार्तालाप से नंदलाल शर्मा,रस्तोगी जी और हवामहल की सिगनेचर ट्यून की न जाने कितनी दीगर यादें घुमड़-घुमड़ कर दिमाग़ में ताज़ा हो आईं हैं.....जारी रहे ये सिलसिला...इस परिश्रम के लिये यूनुस भाई और सागर भाई को दिल से आभार.

सागर नाहर said...

मैने यह श्रंखला बरसों पहले सुनी थी, जब मैं बहुत छोटा था। ज्यादा बातें आज याद नहीं है, लेकिन नरेश मिश्र जी का साक्षात्कार सुन कर आनन्द आ गया।
उम्मीद है अगली कड़ियों में और भी मजेदार बातें सुनने-पढ़ने को मिलेंगी।

धन्यवाद।

" डाक साब " said...

ऐसी अनमोल "बर्थ-डे गिफ़्ट" और "सरप्राइज़" हमें आप और सिर्फ़ आप ही दे सकते थे,यूनुस जी !
हम अभिभूत हैं ।

हमारीवाणी said...

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annapurna said...

इस धारावाहिक और म्यूजिक मास्टर भोलाशंकर के बारे में मैं जानती हूँ पर अन्य धारावाहिकों के बारे इसी पोस्ट से जाना.
अच्छी शुरूवात... बधाई और शुभकामनाएं !

Archana said...

suna tha beete din wapas nahi aate....par beete dino me jaya ja sakta hai ..Radionama se......shukriya

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Hwa Mahal was the most awaited Radio programe
& this interview is priceless ...
My Best wishes to the Creator of Munshee Itwareelal
- Thanx to Yunus bhai
- with sincere appreciation
Lavanya D. Shah
from USA

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