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Wednesday, April 6, 2016

मेरी कहानी की कहानी - लोकेंद्र शर्मा

दोस्‍तो,
जल्‍दी ही जाने माने ब्रॉडकास्‍टर और विविध भारती के हमारे पूर्व साथी लोकेंद्र शर्मा अपने जीवन की कहानी 'ताने-बाने लेकर रेडियोनामा पर हाजिर होने वाले हैं। क्‍या होगा इसमें और क्‍यों होगा...ये सब तो आप पढ़ ही लेंगे उस श्रृंखला में। लेकिन 'ताने-बाने' की शुरूआत होगी लोकेंद्र जी की लिखी एक कहानी से। ये कहानी उन्‍होंने क्‍यों और कैसे लिखी- 
उनकी ही ज़बानी पढिए। 


कुछ
ही दिनों में मैं आप सब के सामने अपने जीवन के पन्ने खोलने वाला हूँ. 

अब तक ऐसा करने से, मेरा आलस और यह विचार कि मेरी जीवनी में किसी को क्या और क्यों रूचि होगी, मुझे रोकता रहा. मुझे मालूम है, मैं कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ, जिसके बारे में जानने की किसी को कोई
जिज्ञासा हो या जिसे जान कर किसी का भला हो. अगर मेरा जीवन संघर्ष भरा रहा, तो इसमें क्या अजूबा है. खोजने जाओ तो हर जीवन में एक कहानी मिलेगी. मेरा जीवन भी एक कहानी ही है, बस दूसरी कहानियों से थोड़ी अलग है. यह अलग होना ही मुझे प्रेरित कर रहा है कि मैं इसे आपको सुनाऊं.  

इस कहानी के ताने बाने केवल मेरे चारों ओर ही नहीं लिपटे हैं. मैं जो हूँ, वो सच पूछो तो मेरा है ही नहीं. मेरा पूरा वजूद, कई महान व्यक्तित्वों का दिया हुआ दान है, जिसे मैंने अपनी झोली में समेटा हुआ है. असल में मैं अपने माध्यम से, उन की बातें आप को बताना चाहता हूँ, जिन्होंने मेरे जन्म को सार्थक बनाया. मुझे इस काबिल बनाया कि मैं आपके प्यार का अधिकारी बना. 

ज्यों ज्यों कहानी की परतें खुलेंगी आप देवत्व से भरे इन पात्रों को जानते जायेंगे. जिज्ञासा बनी रहे इसलिए किसी का नाम अभी नहीं बता रहा हूँ.

रेडियो में (एनाउंसर के रूप में) तो मैंने 1964 में प्रवेश किया, लेकिन रेडिओ ने मेरे जीवन में बहुत पहले, शायद 9-10 बरस की आयु में ही प्रवेश कर लिया था. आज वो बात याद करने पर लगता है, जैसे मेरा जन्म ही रेडिओ की खातिर हुआ था. लेकिन वो एक अलग कहानी है. समय आने पर सुनाऊंगा. 

यहाँ मैं एक दूसरी कहानी की बात करना चाहता हूँ.

रेडिओ (विविध भारती, दिल्ली) में चाकरी शुरू करने से पहले से मैं कहानियां लिख रहा था. 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' का तो नियमित लेखक था, हर हफ्ते एक कॉलम लिखता था. रेडिओ में प्रवेश किया तो, वहां के माहौल ने मेरे नौजवान व्यक्तित्व को कुछ झटके से दिए. शायद उम्र का तकाजा था कि इतनी सारी औरतों और उनके तथाकथित खुले व्यवहार को देख कर, मेरे भीतर बहुत कुछ हिल सा गया. एक-दो ऐसे ही अनुभवों को लेकर मैंने एक कहानी लिख मारी. लिख कर थोड़ा डर भी गया कि कुछ लोगों की पोल सी खोलती हुई यह कहानी, अगर छप गई तो कौन जाने रेडिओ से निकाल ही दिया जाऊं. राय जानने  लिए मैंने वो कहानी विविध भारती के एसिस्टेंट प्रोड्यूसर पंडित सत्येन्द्र शरत को पढने के लिए दी. पढ़ कर उन्होंने बताया की यह एक खतरनाक कहानी है, अगर छपी तो मुझे नुकसान पंहुचा सकती है.

मैं और डर गया. लेकिन सोचा एक बार अगर विविध भारती के चीफ प्रोड्यूसर पंडित नरेन्द्र शर्मा से अनुमति ले लूं, तो निश्चिन्त हो कर छपवा सकता हूँ.

मैं पंडितजी से मिलने बगल वाली इमारतआकाशवाणी भवनमें पंहुचा. पंडितजी अपने पानदान को खोले, पान पर कत्था या चूना लगा रहे थे. सामने एक और सज्जन, पान का इंतज़ार करते हुए से बैठे थे. मैंने बताया कि मैंने एक कहानी लिखी है. पंडित नरेन्द्र शर्मा ने कुछ जांच-तोल के से अन्दाज़ में मुझे देखा, जैसे सोच रहे हो कि यह लड़का और कहानी ? पूछा, “क्या कहानी है ?”

मैंने बताया, “जी रेडियो के माहौल पर है. फ्रस्ट्रेशन की.”

पंडित जी कुछ दुखी से होकर, सामने बैठे सज्जन से बोले, “देखिये भगवती बाबू. आजकल के नौजवानों को जहाँ से रोज़ी रोटी मिलती है, वहां फ्रस्ट्रेशन दिखाई देता है

इस संवाद से मैंने दो बातें जानी. एक तो सामने बैठे सज्जन महान साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा हैं और दूसरे मुझे अपनी कहानी को छपवाने की बात भूल जानी चाहिए.

पंडित नरेन्द्र शर्मा ने मेरी तरफ देखा, “काहे का फ्रस्ट्रेशन है?”

पूछा था, सो जवाब तो देना ही था. कहा, “जी सेक्सुअल फ्रस्ट्रेशन की कहानी है.”

पंडितजी की आवाज़ में दुःख के साथ शायद थोडा क्रोध भी शामिल हुआ, “देख रहे हैं भगवती बाबू. आज के नौजवानों को ?”

भगवती बाबू ने सर घुमा कर मेरी तरफ देखा. उनके मुंह में पान था, सो उनके चहरे का भाव मैं ठीक से पढ़ नहीं पाया.

बहरहाल कमरे से बाहर आते आते, मैं तय कर चुका था कि कहानी को छपने के लिए कहीं नहीं भेजूंगा.

कुछ दिन बाद ये कहानी मैंने आकाशवाणी दिल्ली के हिंदी विभाग के प्रोड्यूसर मोहन सिंह सेंगर को पढ़ने के लिए दी. उन्होंने उसे बेहद पसंद किया और मेरा उत्साह बढाया कि मैं निसंकोच इसे छपवा सकता हूँ. लेकिन एक बार चीफ प्रोड्यूसर पंडित नरेन्द्र शर्मा की अस्वीकृति के बाद मेरा साहस नहीं हुआ.

कहानी बरसों तक अप्रकाशित ही रही.

लगभग तीस बरस बाद जब मैं विविधभारती मुंबई में था, मेरे मित्र संजय मासूम ने इस कहानीकेंचुआकोसबरंगमें प्रकाशित किया. अच्छा हुआ जो कहानी ने एक बार छापेखाने का मुंह देख लिया, क्योकि बाद मेंसबरंगका प्रकाशन ही बंद हो गया.

रेडियो के पहले अनुभव की पहली कहानी का यह अनुभव मैंने आपके साथ इसलिए बांटा, क्योकि मेरे बाकायदा शुरू होने वाले रेडिओ जीवन की यह शुरुआती यादें हैं.

इस कहानी के पात्र सच्चे है, सचमुच के हैं. आज कहाँ हैं, हैं भी या नहीं, मुझे कुछ नहीं पता. नाम बेशक नकली हैं, शायद इतनी लाज तो उनकी रखनी ही चाहिए.


 

4 comments:

Sajjan Jangra said...

बहुत खूब सर ।

Sajjan Jangra said...

बहुत खूब सर ।

डॉ. अजीत कुमार said...

लोकेंद्र जी, रेडियोनामा के इस मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है. आपके जीवन से जुड़े लम्हे हमसे share करने के लिए आपका साधुवाद.

सागर नाहर said...

स्वागतम्‍
उम्मीद है उस कहानी को फ़िर से ब्लॉग या FB पर फ़िर से पढने को मिलेगी।

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