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Monday, May 30, 2016

पीपल पात सरिस मन डोला (पत्‍ता पत्‍ता बूटा बूटा आठवीं कड़ी)


और सब पेड़ों को उगते-बढ़ते देखकर हम हर्षित होते हैं लेकिन न जाने क्या बात है कि पीपल को
पनपते देख हम सिहर जाते हैं। पीपल के फल खाकर चिड़ियाँ बड़ी अजीब-अजीब जगहों पर बीट कर देती हैं और पीपल भी ऐसा ढीठ कि उस बीट से ही उग आता है। और तो और, उसे उगने के लिए समतल भूमि, उपजाऊ मिट्टी और खाद-पानी की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। दीवारों के बीच की दरारों में, नाली के मोखे पर, छत की मुँडेर के नीचे, कहीं भी जड़ जमा लेता है। उसे उखाड़ने को कहिये तो ज़्यादातर लोग कानों को हाथ लगा लेते हैं कि भैया, हमें माफ़ करो। हमसे यह काम नहीं होगा।

ग्रेटर नोएडा में मैं जहाँ रहती हूँ उसकी सबसे ऊँची मंज़िल पर सिर्फ़ एक आग-बुझावन टंकी है और लिफ्ट का अंतिम छोर। पानी की टंकी देखने सोसाइटी का प्लंबर श्रीकांत या लिफ़्ट की मशीन चेक करने इलेक्ट्रीशियन दीपक वहाँ जाते हैं। मैंने उन्हें दिखाया कि उस मंज़िल पर कई जगह पीपल उग रहे हैं और अगर उन्हें निकाला न गया तो वे दीवार और टंकी को नुकसान पहुँचा सकते हैं। दोनों ने मेरी बात पर सहमति व्यक्त की लेकिन पीपल उखाड़ने की हिम्मत दोनों में से किसी ने नहीं की। कई बार याद दिलाने के बाद बोले - "ऐसा करते हैं
, माली को आपके पास भेज देते हैं, आप उससे कह दीजियेगा।"

माली साहब बोले - "अरे मैडम
, ये हाथ से थोड़ो निकलेगा। किसी दिन फावड़ा लेकर आता हूँ तो निकाल दूँगा।"
इस बात को छह महीने बीत चुके हैं। उन्हें अब तक फावड़ा नहीं मिला है और पीपल के पत्ते अब भी वहाँ से मुझे मुँह चिढ़ा रहे हैं।

ऐसा क्यों है? खर-पतवार की तरह उग आये किसी और पौधे को उखाड़ने में तो हमें कोई झिझक नहीं होती, फिर पीपल का ऐसा ख़ौफ़ क्यों है?


नौकरी से रिटायर होने का एक फ़ायदा ये है कि इस तरह की बातों के बारे में सोचने-समझने और पढ़ने का समय मिल जाता है। तो मैंने भी थोड़ा विचार-मंथन किया। दो बातें ध्यान में आयीं। एक तो यह कि बचपन के तमाम किस्सों-कहानियों में पीपल के पेड़ पर भूत-प्रेत-पिशाचों का डेरा बताया जाता था। रात को पीपल के नीचे से गुज़रते हुए हनुमान चालीसा दोहराने की हिदायत हमने अपने बड़ों से पायी थी और अपने बच्चों को दी है। अगर आप वैज्ञानिक सोच के तहत इसे ख़ारिज करते हैं तो कर दीजिये। लेकिन तब मैं आप ही से अनुरोध करूंगी कि कृपया मेरी छत से उन अनचाहे पीपल के पौधों को उखड़वाने की व्यवस्था भी कर दीजिये।


दूसरी बात यह ध्यान में आयी कि गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है -  पर्वतों में मैं हिमालय हूँ, नदियों में गंगा हूँ और वृक्षों में अश्वत्थ यानी पीपल हूँ। तो इससे साबित हुआ कि जन मानस में यह भावना बहुत गहरे तक पैठ गयी है कि हिमालय, गंगा और पीपल में स्वयं भगवान का वास है और उनका कतई कोई अहित नहीं करना चाहिये।
गीता के पन्द्रहवें अध्याय का पहला श्लोक "ऊर्ध्वमूल अधःशाख अश्वत्थ" की चर्चा करता है, यानी एक ऐसा पीपल का पेड़ जिसकी जड़ तो ऊपर की ओर है और टहनियाँ नीचे की ओर। टीकाकारों का मानना है कि यह पीपल यह दृश्य जगत है जिसकी जड़ परमात्मा हैं। नीचे फैली टहनियाँ प्राणियों की विभिन्न योनियाँ हैं। जब तक व्यक्ति इस रहस्य को नहीं समझता तब तक इन्हीं शाखाओं में भटकता रहता है लेकिन जब वह ऊर्ध्व-मूल को पहचान लेता है तब उसे भव-बंधन से मुक्ति मिल जाती है।

यहाँ मुझे एक और व्यक्ति का ध्यान आया, जिसने ऐसे ही एक पीपल के नीचे बैठकर सांसारिक दुःखों से मुक्ति का मार्ग पा लिया था - सम्यक सम्बोधि प्राप्त की थी और पूरे संसार में भगवान बुद्ध के नाम से प्रसिद्धि पायी थी।
बोध गया में उस बोधि वृक्ष के दर्शन मैंने किये हैं। कहा जाता है कि ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक के पुत्र महिन्द और पुत्री संघमित्रा मूल बोधि वृक्ष के तले उगने वाले पौधे को लेकर श्रीलंका गये थे। बौद्ध धर्म के शत्रुओं ने जब बोधिवृक्ष को नष्ट कर दिया था तब श्रीलंका से उसी के अंश को लाकर यहाँ लगाया गया था। तब से आज तक वह वृक्ष, बुद्ध और उनके उपदेशों का प्रतीक बन वहीँ खड़ा है।

बुद्ध के समय से भी बहुत पहले, ईसा से दो हज़ार वर्ष पूर्व, सिंधु घाटी की सभ्यता में पीपल के मौजूद होने के सबूत मिलते हैं। हड़प्पा कालीन मिटटी के बर्तनों और मुहरों पर पीपल के पत्ते उकेरे हुए हैं।


बच्चे के जन्म के समय गाये जाने वाले सोहर गीतों में "पिपरी पिसाने" का ज़िक्र यह साबित करता है कि पीपल पिछले चार हज़ार सालों से भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है।
पीपल के पेड़ की एक और ख़ास बात है। उसके पत्ते टहनी से इस तरह जुड़े होते हैं कि हर पत्ता पूरा 360 डिग्री घूम सकता है। हवा चलने पर यों तो सभी पेड़-पौधों के पत्ते हिलते हैं लेकिन कोई भी पीपल के पत्ते सरीखा नहीं घूमता। बल्कि हवा न भी हो तो भी पीपल के पत्ते हिलते-डुलते से लगते हैं। शायद इसीलिये तुलसीदास जी ने चलायमान चित्त की उपमा पीपल के पत्ते से दी है - पीपल पात सरिस मन डोला।


और पैसे कमाने के लिये परदेस गया पति जब नयी ब्याहता पत्नी के पास घर लौट रहा होता है तो उसके मन का हाल भी तो पीपल के पत्ते सरीखा ही होता है न?










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Saturday, May 28, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग-२८ (महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला)

कॉलेज में आर्ट्स की पढाई चल रही थी खरामा खरामा, लेकिन कार चौथे गीयर में चल रही हो और बिना स्पीड टूटे उसे दूसरे गीयर में डाल दिया जाए तो जैसा झटका लगता है, कुछ उसी तरह का झटका मैं महसूस कर रहा था. सारे दोस्त बदल गए थे, पूरी कंपनी बदल गयी थी. सिवाय सतीश खत्री, प्रमोद खन्ना जैसे गिने चुने लोगों को छोड़कर, बाकी सब लोग नए नए दोस्त बने थे. कुछ दिन तो कॉलेज पहुँचते ही कदम खुद बखुद, कॉलेज के पीछे की और बढ़ जाते थे जहां साइंस सैक्शन हुआ करता था. फिर सामने से भंडारी जी या लवानिया साहब जैसे कोइ सर मिल जाते थे, तो ऐसा कोई जुमला फेंककर चुटकी लेने से बाज़ नहीं आते थे “क्या हुआ महेंदर...... वापस साइंस में आ गए क्या?”

क्या जवाब देता मैं कि कदम खुद ब खुद उधर आ गए? बस खिसिया कर मुस्कुराना पड़ता. हाँ कभी कभी दलीप सिंह जी या सोनी जी जैसे कुछ ऐसे गुरु लोग भी मिल जाते थे, जो बिना तंज़ के सीधे सीधे हाल चाल पूछ लिया करते थे. साथ ही ये भी पूछ लेते थे, कैसा चल रहा है? ये चेंज कैसा लग रहा है? ये वो गुरु लोग थे, जो ये नहीं मानते थे कि जो आर्ट्स में चले जाते हैं, वो डफर ही होते हैं. अब चाहे आप इसे अन्धों में काणा राजा कह लीजिए, आर्ट्स की उस क्लास में हमारे हरि ओम ग्रुप के सारे साथी सबसे आगे थे. स्टेटिस्टिक्स में तो हम पालीवाल साहब की सारी दादागिरी खत्म कर ही चुके थे, हर साल उनके घर में ट्यूशन पढ़ने वालों की जो हरियाली रहती थी, वो वीराने में बदल चुकी थी. हम लोग जानते थे कि अगर एक साल इनके ट्यूशन को झटका लगा गया, तो वापस दुकानदारी जमते जमते एक दो साल तो लग ही जायेंगे. इम्तहान तो बाद में हुए लेकिन उस साल के दौरान ही पालीवाल साहब की जमी जमाई दुकानदारी उखाड़ने की वजह से हमारा ग्रुप कॉलेज में मशहूर हो गया. उस ज़माने में आम तौर पर आर्ट्स में जो भी गुरु लोग होते थे, वो अक्सर अपनी तनख्वाह से ही मुतमईन रहने वाले लोग होते थे, क्योंकि आर्ट्स में ट्यूशन कौन पढता था? यही फर्क होता था, साइंस और आर्ट्स के टीचर्स में. साइंस में ज्यादातर टीचर्स अपनी तनख्वाह से ज़्यादा ट्यूशन से कमाते थे. उस माहौल में पालीवाल साहब जैसे कोई सौ में एक धुरंधर ही हुआ करते थे, जिनके पास पूरी क्लास ही ट्यूशन पढ़ने जाया करती थी. आर्ट्स के कई टीचर्स उन्हें बड़ी हसरत से तका से करते थे. उन सबको इस सारे वाकये से मज़ा आ गया.

लेकिन आर्ट्स में शिवजी जोशी, डा. घनश्याम देवडा, अमीनुद्दीन जी और डा. एल एन गुप्ता जैसे लोग भी थे, जो हर स्टूडेंट की बिना किसी फीस, बिना किसी तरह के लालच के हर वक्त मदद करने को तैयार रहते थे, वहीं गेवर चंद जी आचार्य जैसे गुरु भी थे, जो ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर का भाव लिए, अपनी मस्ती में मस्त रहते थे और सरीन साहब जैसे गुरु भी थे जिन्होंने अपने कॉलेज के वक्त में शायद अपने किसी पढाई में तेज साथी की कुछ कॉपियां हथिया ली थीं. बस उनका काम होता था, रोज क्लास में आते ही एक कॉपी खोलकर लिखवाना शुरू कर देना. पूरे पीरियड में वो बस लिखवाते ही रहते थे. बीच में अगर कोई स्टूडेंट कुछ पूछने की कोशिश करता, तो कहते पहले जो लिखवा रहा हूँ, लिख लो, बाद में जो पूछना हो पूछ लेना. लेकिन जब पूरा पीरियड लिखने में ही चला जाता था, तो भला बाद में कब कोई उनसे पूछता? लोग बताते थे कि उनकी नौकरी शुरू से ही इसी तारह चल रही थी. हम लोगों ने भी थोड़े दिन बाद उनकी क्लास में उस वक्त से लिखना बंद कर दिया, जब जो उन्होंने पहले रोज लिखवाया था वो ज्यों का त्यों एक किताब में मिल गया. उन्होंने हम लोगों से पूछा, आप लोग लिखते क्यों नहीं हो? तो हिम्मत ने अपने खास अंदाज़ में, उन्होंने जिस जिस दिन जिस जिस किताब से टीप कर लिखवाया था, उसका पूरा कच्चा चिट्ठा उनके सामने रख दिया. उन्होंने हरि ओम ग्रुप के सारे लोगों को क्लास से बाहर कर दिया. हम लोगों को भी वैसे इस बात से कोई फ़िक्र नहीं हुई क्योंकि आर्ट्स में साइंस की तारह प्रेक्टिकल्स तो होते नहीं, जिसमे इंटरनल के हाथ में कुछ मार्क्स होते हो. मगर हमें थोड़ी ज़लालत महसूस हुई. हम फ़ौरन हैड ऑफ द डिपार्टमैंट पुरोहित सर के पास जा पहुंचे. उन्होंने जब हमसे कहा कि हमारी शिकायत सरीन साहब कई दिन से उनसे कर रहे थे. सरीन साहब को ये बुरा लग रहा था कि हम उनकी डिक्टेशन नहीं लेते हैं, तो हिम्मत ने एक एक लाइन उनके सामने रख दी कि ये इस किताब के इस पेज के इस पैरा से ली गयी है और ये पोर्शन इस किताब के इस पेज के इस पैरा से इस पैरा तक से लिया गया है. हिम्मत ने पिछले साल के एक स्टूडेंट की कॉपी लेकर उसे भी पुरोहित जी के सामने रख दिया था जिसमे उन मारे हुए नोट्स में से हू ब हू वही सब लिखवाया हुआ था, जो उन्होंने हमें लिखवाया था. अब पुरोहित साहब थोड़ा संजीदा हो गए. उन्होंने वो सारे सबूत हमसे ले लिए जो ये साबित करते थे कि हमारे सर सिर्फ एकाध किताब या न जाने किसके मारे हुए नोट्स से टीप कर, बस लिखवाते रहते हैं. न तो वो घर से कुछ पढकर आते हैं, न तैयारी करके आते हैं कि क्या पढ़ाना है?

पूरे कॉलेज में ये बात फैल गयी कि हरि ओम ग्रुप के लड़कों को सरीन साहब ने क्लास से बाहर कर दिया और अब साबित हो गया है कि सरीन साहब ने कुछ साल पहले के किसी स्टूडेंट के नोट्स मार लिए थे और बस हर साल उन्हीं नोट्स के बल पर अपनी ज़िंदगी चला रहे हैं.
हमें ये लड़ाई लड़ने में मज़ा आ रहा था क्योंकि हम सच्चाई के साथ थे कि सुना एक नए सर ने ज्वाइन किया है और सरीन साहब की जगह अब वो हमारी क्लास लेंगे. ये हमारी जीत थी क्योंकि हमारी शिकायत पर उनसे हमारी क्लास छीन ली गयी थी. जो नए सर हमारी क्लास लेने वाले थे, सुना कि उनका नाम था, एस पी खडगावत. जैसे ही हमने ये सुना हम क्लास में पहुँच गए क्योंकि सरीन साहब ने अपनी क्लास से हमें निकाला था, पूरे इक्नोमिक्स डिपार्टमैंट से नहीं. हम क्लास में पहुंचे. देखा बोर्ड की तरफ मुंह किये हुए, एक दुबले पतले से साहब चाक से कुछ लिख रहे हैं. हम सब ने एक साथ कहा...... मे वी कम इन सर ? उन्होंने सहजता से सर घुमाया. जो चेहरा पहले सहज नज़र आया, अब वो धीरे धीरे नहीं, बल्कि बहुत तेज़ी से सख्त होता चला गया. उन्होंने कहा “कम इन...... अगर मैं गलत नहीं हूँ, तो आप लोग ही हैं वो बदनाम हरि ओम ग्रुप के लोग........!!!!!!!!”

हम सब लोग अंदर आते आते रुक गए. मैंने कहा “सर आपकी ये बात तो सच है कि हम लोग हरि ओम ग्रुप के लोग हैं, लेकिन आपकी ये बात ज़रा भी सच नहीं है कि हमारा ग्रुप बदनाम ग्रुप है.”
उन्होंने अपने आप पर कंट्रोल  करते हुए कहा “ इस तरह रास्ते में खड़े होकर बात मत कीजिये आप लोग. ठीक से क्लास में बैठिये और उसके बाद बात कीजिये, जो भी बात करनी है.”
हम लोग आकार सबसे पीछे की सीट्स पर बैठ गए. मैंने कहा “सर क्या ये कहना कि फलां सर हमें ठीक से पढ़ाते नहीं हैं, गलत है? क्या एक टीचर शुरुआत में एक पेपर को बहुत आसान साबित करे और जब पेपर बदलने का वक्त निकल जाए, तो उस पेपर की खूंखार शक्ल स्टूडेंट्स के सामने रखकर, उनमे से अपनी ट्यूशन के शिकार ढूंढें, तो उनके खिलाफ बोलना बगावत है?आप ज़रा पूछिए इन स्टूडेंट्स से कि कितना वक्त देकर हम इन सबको स्टेटिस्टिक्स करवाते हैं और इससे उनका कितना पैसा बचता है?”

पूरी क्लास ने तालियाँ बजाईं. आकाशवाणी के ऑडीशन के बाद, पहली बार मुझे महसूस हुआ कि कुछ तो अलग है मेरी आवाज़..... कुछ तो है मेरी आवाज़ में जो इसे दूसरी आवाजों से अलग बनाता है.
खडगावत सर कुछ देर तक खामोश खड़े रहे. इसके बाद उन्होंने कहा “आप लोगों के साथ क्या हुआ है और आपने लोगों के साथ कैसा बर्ताव किया है, मुझे उससे कोइ मतलब नहीं. मुझे बस अपनी क्लास में संजीदगी चाहिए...... मुझे मेरी क्लास में शोहदे नहीं चाहिए, मुझे मेरी क्लास में शान्ति चाहिए.”

हिम्मत ने कहा “सर हम लोग सब शांत रहने वाले लोग ही हैं. कॉलेज में पढाई करने आये हैं. आपने ये तो ज़रूर सुना होगा कि हमने सरीन सर की शिकायत इसलिए की कि वो ठीक से पढ़ाते नहीं हैं, लेकिन आपने ये नहीं सुना होगा कि हमने कॉलेज की किसी लड़की को छेड़ा है. आप उन लोगों को शोहदा कहिये जो लड़कियों को छेड़ते हैं. हम उन में से नहीं हैं.”
इस पर खडगावत सर ने आवाज़ थोड़ी ऊंची करते हुए कहा “ ठीक है, आप लोग पढ़ने वाले लोग हैं, तो जो मैं पढाऊँ, आप भी पढकर आइये और मुझसे बहस कीजिये. मैं बिलकुल बुरा नहीं मानूंगा. अगर आप ज़्यादा पढकर आये हैं और जो मैं बताता हूँ, उसके अलावा कुछ बताते हैं तो मैं सीखूंगा भी और आपको थैंक्स भी कहूँगा, लेकिन बेकार की बहस नहीं चाहिये मुझे.”
और उस दिन के बाद एक होड सी लग गयी. खडगावत सर जो भी पढ़ाते थे, उसकी खूब तैयारी करके आते थे और उनसे भी ज्यादा हम सब तैयारी करके आते थे. बाकी पूरी क्लास हमारी शक्ल देखती थी. एक दो लोगों को छोड़कर कोई और हमारी बहस में हिस्सा नहीं लेता था. बस एक तरफ हरि ओम ग्रुप और दूसरी तरफ खडगावत सर. एक दिन हमने उन्हें थोड़ा तंग करने के लिए एक एक दो  दो उलटे सीधे सवाल उनके सामने रख दिए. न जाने उस दिन उनका मूड कुछ और था या वो ठीक से पढकर नहीं आये थे, हमारे सवाल अपनी जगह ज्यों के त्यों रह गए. उन्होंने उन सवालों का कोई जवाब नहीं दिया. बस मुस्कुराकर कुर्सी पर बैठ गए. मैंने कहा “सर क्या हुआ ?”

वो थोड़ा सर ऊपर उठाते हुए मुस्कुरा कर बोले “तुम लोग अपने आप को बहुत होशियार समझते हो न? कोई बात नहीं.... लेकिन आज मैं एक न्यूज़ आप लोगों के साथ शेयर करना चाह्ता हूँ.”
हम सब लोग हैरान परेशान कि आखिर आज हुआ क्या है? तभी उन्होंने बोलना शुरू किया “आज मेरा रिज़ल्ट आया है और मैं आर पी एस में सलेक्ट हो गया हूँ. यानी आज से कुछ दिन बाद मैं ये नौकरी छोड़कर डीवाई एस पी बन जाऊंगा. एक बात और कहना चाहूँगा. ये दुनिया बहुत बड़ी नहीं है. हो सकता है किसी दिन आप लोग किसी अच्छी पोस्ट पर पहुँच जाएँ, लेकिन याद रखिये कि उस वक्त मेरी आपसे मुलाक़ात होगी तो मैं किसी जिले के एस पी की कुर्सी पर बैठा मिलूँगा. आप लोग खुश हुए कि परेशान?”

हम सब लोग बहुत खुश थे क्योंकि बहुत थोड़े से दिनों में ही खडगावत सर हमारे फेवरेट सर बन चुके थे. पूरी क्लास में बधाई बधाई का शोर मच गया. सतीश ने कहा “सर आप ने हमें बहुत थोड़े वक्त पढ़ाया है. काश आप हमें कुछ दिन और पढ़ाते. आप बहुत अच्छे इंसान हैं, आपको आर पी एस में सलैक्ट होने के लिए बहुत बहुत मुबारकबाद. हम चाहते हैं कि आप आगे से आगे बढ़ें लेकिन सर आपने ये क्या किया ? आपने पुलिस की नौकरी क्यों चुनी ? आपका जो मिज़ाज है वो पुलिस वालों जैसा हरगिज़ नहीं है...... आप जैसा सेंसिटिव इंसान को पुलिस में बहुत परेशानियां होती हैं. खैर आपने जो राह चुनी है ऊपरवाला आपको उसमे कामयाबी दे, यही दुआ है.”
माहौल बहुत भारी हो गया था. हम सब उदास हो गए थे तभी खडगावत सर ने हमें बताया कि दरअसल दस दिन बाद ही वो लेक्चरर की उस नौकरी से इस्तीफा देने वाले हैं. हमने तय किया.... बीकानेर के सबसे महंगे रेस्तरां क्षीर सागर में उन्हें फेयरवेल दिया जाएगा.

एक हफ्ते बाद ही खडगावत सर को क्षीर सागर में एक शानदार फेयरवेल हरि ओम ग्रुप के हम आठों दोस्तों ने दी, जिसे न हम लोग कभी भूल पाए और न ही खडगावत सर. आप कहेंगे कि हम लोग नहीं भूल पाए, यहाँ तक तो ठीक है लेकिन खडगावत सर नहीं भूल पाए, ये मैं कैसे कह सकता हूँ? तो मैं आपको बता दूं कि खडगावत सर से जो हमारे ताल्लुकात कुछ दिन की उस नौकरी में बने, वो उस क्षीर सागर के फेयरवेल में खत्म नहीं हो गए. मैं जब सूरतगढ़ में पोस्टेड था तो वो श्रीगंगानगर में पोस्टेड थे. मैं जब कोटा में था, तब वो भी कुछ दिन कोटा में रहे और अभी कुछ रोज पहले एफ बी पर उनसे राब्ता बना तो पता चला कि वो आई जी पुलिस के ओहदे से कुछ साल पहले रिटायर हुए और अब कोटा में रह रहे हैं. यानी जो ताल्लुक एक बार बने वो बस चलते रहे, निभते रहे और मेरी तो  हमेशा एक ही दुआ रही है कि जिस से भी एक बार ताल्लुक बन जाए, बस उससे आख़िरी वक्त तक ये ताल्लुक यूं ही बने रहे.

हमारे सर पर फिर किसी सर को बिठा दिया गया था और हम लोग मिस कर रहे थे खडगावत सर को, इस उम्मीद के साथ कि वो भी कहीं न कहीं हमें मिस कर रहे होंगे. हमने उनसे कहा था कि हम शोहदे नहीं हैं, हम लड़कियों को तंग नहीं करते. दरअसल उस ज़माने में को एज्यूकेशन एक बहुत ही रेयर चीज़ हुआ करती थी. बहुत पैसे वालों की बात छोड़ दीजिए, जो शुरू से ही अपने बच्चों को को एज्यूकेशन में पढ़ाते थे, बाकी लोगों के बच्चे, लड़कियों की शक्ल या तो लड़कियों की स्कूल के सामने अड्डेबाजी करके देखने की कोशिश करते थे, या फिर जब एम् ए में आते थे तो २५ लड़कों की क्लास में तीन चार लडकियां, उन्हें आटे में नमक की तरह नसीब होती थीं. जैसा कि मैंने पिछले एक एपिसोड में बताया कि कुछ बन्ना लोग हमेशा, हर साल यही तलाशते थे कि किस सब्जेक्ट में सुन्दर लडकियां हैं, उसी में वो दाखिला ले लेते थे और इस तरह लड़कियों की कुर्बत हासिल करने की कोशिश किया करते थे, मगर हम लोग बन्ना तो थे नहीं, हमें तो हर साल पास होना था और ऐसा कर अगली क्लास में जाना था, सो हम इस तरह की हरकत में ना तो यकीन करते थे और ना ही हम लोगों के हालात हमें ऐसा करने की इजाज़त देते थे.

उसी वक्त एक रोज जब हम हरि ओम ग्रुप के लोग हमारे टीचर पुरोहित सर को ढूँढने लेक्चरर्स के कॉमन रूम की तरफ गए, तो देखा कि कॉमन रूम में पुरोहित साहब नहीं है. लेक्चरर्स के कॉमन रूम के बिलकुल पास ही, लड़कियों का कॉमन रूम था. न जाने कैसे लड़कियों के कॉमन रूम में बैठी लड़कियों को ये वहम हो गया कि हम उनके रूम में झाँक रहे हैं. हम वहाँ से हटते, इससे पहले ही दो तीन लडकियां गुस्से से तमतमाती हुई बाहर निकलीं और चिल्लाईं “शर्म नहीं आती आप लोगों को लड़कियों के कॉमन रूम में तांक झाँक करते हुए?क्या कर रहे हैं आप लोग? जानते हैं मेरा नाम प्रतिभा राठी है, मैं प्रोफ़ेसर राठी की बेटी हूँ, अभी प्रिंसिपल साहब को शिकायत करती हूँ आपकी.”
महावीर हमारे ग्रुप में सबसे बिंदास लड़का था. इससे पहले कि हम में से कोई कुछ और बोले महावीर बोला “ अरे आप इतना नाराज़ क्यों हो रही हैं? अव्वल तो हमने आपके कॉमन रूम में झांका नहीं, हम तो पुरोहित साहब को देखने आये थे और अगर आपको देख भी लिया तो क्या हो गया, भगवान ने कोई सुन्दर चीज़ बनाई है तो उसे देखने में क्या हर्ज है?”

इतना सुनते ही प्रतिभा राठी प्रिंसिपल के कमरे में घुस गयी और चिल्लाने लगी “देखिये सर ये लड़के हमारे कॉमन रूम में तांक झाँक कर रहे हैं.”
उस वक्त हमारे प्रिंसिपल थे श्री कन्हैया लाल गोस्वामी जी. बहुत ही मस्त इंसान थे. हँसने लगे और बोले “अरे बेटा गलतफहमी हो गयी होगी कुछ आप लोगों को. मैंने तो इन लड़कों को पहले कभी इधर आते नहीं देखा.”
लेकिन तभी मुछ बन्ना लोग उधर आ गए और उन लड़कियों की हिमायत करने लगे. उस ज़माने में बन्ना लोगों का दबदबा हर तरफ था और उनके साथ उनके ढेरों गोले और चमचे भी रहते थे सो हारकर प्रिंसिपल साहब ने हम लोगों को वॉर्न किया “आइन्दा इस तरफ दिखाई मत देना वरना कॉलेज से निकाल दिए जाओगे.’

हमने कुछ भी नहीं किया था. लेकिन हमें अपमान का घूँट पीकर रह जाना पड़ा. एक प्रतिभा राठी की वजह से हमें ज़िंदगी में पहली बार इस तरह की वार्निंग सुनने को मिली, वो भी इतने बन्ना लोगों और उनके गोलों के सामने. हम सभी दुखी होकर उस रोज कॉलेज से घर लौटे.
जब हम लोग घर लौट रहे थे तो मैं, मन ही मन प्रतिभा राठी एंड कंपनी से अपने अपमान का बदला लेने की योजना बना रहा था, क्योंकि हमें बिना कोई गलती किये डांट पडी थी. मैंने किसी से कुछ नहीं कहा. चुपचाप घर लौट आया.

वो वक्त रेडियो का था. टी वी तो था ही नहीं, मनोरंजन का फिल्म और रेडियो  के अलावा और कोई साधन नहीं था. हर संडे को साढे बारह बजे से डेढ़ बजे तक, आकाशवाणी, बीकानेर से फरमाइशी गाने आया करते थे और उस वक्त पूरे शहर के रेडियो चालू रहते थे. शहर का हर इंसान उस प्रोग्राम को सुनता था. मैं चूंकि रेडियो से जुड़ा हुआ था, जानता था कि इस प्रोग्राम की तैयारी, अनाउंसर शनिवार को करते हैं. आकाशवाणी बीकानेर पर उस वक्त चार अनाउंसर हुआ करते थे. चंचल जी, गिरधर जी, यशपाल जी और अरविन्द जी. इनमे से अरविन्द जी से मेरी कभी नहीं पटी, बाकी तीनों अनाउंसर मेरे अच्छे दोस्त बन गए थे. उस ज़माने में एक पोस्टकार्ड १० पैसे का आया करता था. मैं घर लौटते हुए, उस रोज १० रुपये के १०० पोस्टकार्ड खरीद लाया. मेरे छोटे मामा बाबू मामाजी के पास एक पोर्टेबल टाइप राइटर था. वो पास ही के ई एम् रोड पर रहते थे. मैं उनके घर गया और कुछ पोस्टकार्ड्स पर टाइप किया, फिल्म का नाम, गाने के बोल और फरमाइश करने वालों के नाम- डूंगर कॉलेज से प्रतिभा राठी, लता गुप्ता, फलां फलां और फलां फलां. उस वक्त मुझे कतई पता नहीं था कि ये लता गुप्ता आगे जाकर मेरे दोस्त प्रवीण गुप्ता की पत्नी बनेगी. मैंने तो अपना काम किया. कुछ पोस्ट कार्ड्स ऐसे तैयार किये और पोस्ट कर दिए. शनिवार को दिन में, जब कि अनाउंसर इस प्रोग्राम की तैयारी करते थे, मैं आकाशवाणी पहुँच गया और अनाउंसर साहब की मदद करने लगा. जो पोस्टकार्ड मैंने भेजे थे वो भी पहुँच चुके थे. उन्हें भी प्रोग्राम में शामिल कर लिया.

संडे को जब प्रोग्राम प्रसारित हुआ तो प्रतिभा राठी एंड कंपनी के नाम बाकायदा प्रसारित हुए. जैसा कि मैंने बताया कि उस ज़माने में संडे के दिन उस वक्त पूरे बीकानेर के रेडियो चालू रहते थे, लिहाज़ा कॉलेज के बहुत लोगों ने ये गाने भी सुने और नाम भी. सोमवार को कुछ नहीं हुआ, लेकिन मैंने अपनी ये एक्सरसाइज़ चुपचाप आगे भी चालू रखी. मैं पोस्टकार्ड खरीदता था और मामाजी के टाइपराइटर पर पूरी ईमानदारी और राजदारी के साथ कुछ फरमाइशी लैटर्स टाइप कर लिया करता था. मैंने हरि ओम ग्रुप के लोगों को भी इस बारे में कुछ नहीं बताया. दो तीन प्रोग्राम होते ही कॉलेज में आवाजें उठने लगीं. प्रतिभा राठी, लता गुप्ता और उनकी वो सखियाँ जिन्होंने हमें डांट पड़वाई थी, कॉलेज में जिधर से भी निकलतीं, हर ओर लोग आवाजें कसते...... “आज कल तो.... फरमाइश” ......”रेडियो पर फरमाइश” या फिर लोग वो गाने उनके सामने गाने लगते, जिनकी फरमाइश में  उनके नाम आते थे. प्रतिभा जी, लता जी और उनकी सखियाँ हैरान कि आखिर ये हो क्या रहा है? कुछ दिन ऐसा करके फिर मैंने एक छोटा सा वक्फा दिया, तो उन लोगों ने सोचा, चलो अब बंद हो गया सब कुछ. तब तक मैं और पोस्टकार्ड खरीद लाया और मैंने फिर से ये काम शुरू कर दिया. ये सिलसिला चलता रहा और प्रतिभा जी, लता जी और उनकी सखियों पर कॉलेज में फब्तियां कसी जाती रहीं. वही बन्ना लोग जो उनकी हिमायत में आये थे, उन्हें गाने गा गा कर छेड़ रहे थे और हम सब हरि ओम ग्रुप के लोग तमाशा देख रहे थे. मेरे ग्रुप के लोग भी बातें करते कि यार ये सब क्या हो रहा है? कौन कर रहा है ये सब, लेकिन मैं खामोश रहता. मैंने अपने ग्रुप के लोगों के सामने भी ये राज़ नहीं खोला कि इस सबके पीछे मैं हूँ, क्योंकि मुझे डर था कि अगर ये राज़ उनके सामने ज़ाहिर हो गया तो हो सकता है कि कोई बड़ाई बड़ाई में किसी के सामने ज़िक्र कर दे. ऐसे में लेने के देने पड सकते थे. आखिरकार प्रतिभा राठी ने अपने पिताजी से शिकायत की और प्रोफ़ेसर राठी जा पहुंचे, आकाशवाणी, बीकानेर के ऑफिस जो रथखाने के एक किराए के मकान में हुआ करता था. उस ज़माने में आकाशवाणी, बीकानेर के इंचार्ज हुआ करते थे, भूपेंद्र स्वरुप जिन्हें सब बाबा कहते थे. बहुत ही मस्त मलंग इंसान. उन्होंने प्रोफ़ेसर राठी को पूछा, “आप कैसे कह सकते हैं कि आपकी बेटी फरमाइश नहीं भेजती?” प्रोफ़ेसर राठी ने कहा “ जनाब मुझे मेरी बेटी ने बताया है.”
“अच्छा आपको या आपकी बेटी को किसी पर शक है?”

“नहीं सर शक तो नहीं है, आप मुझे वो पोस्टकार्ड दिखा

इए, हम लोग पता लगा लेंगे.”
सारे पोस्टकार्ड खंगाले गए. ये वो वक्त था, जब मैंने इंटरवैल दिया हुआ था. कोई पोस्टकार्ड नहीं मिला. बेचारे राठी साहब अपना सा मुंह लेकर लौट आये. कुछ दिन गुज़रे और फिर एक दो गानों में वही नाम आये “डूंगर कॉलेज से प्रतिभा राठी, लता गुप्ता, फलां फलां और फलां फलां.” राठी साहब फिर भागे हुए आकाशवाणी पहुंचे. पोस्टकार्ड निकाले गए. सारे के सारे पोस्टकार्ड टाइप किये हुए. किसी की हैण्ड राइटिंग नहीं. बेचारे राठी जी क्या पहचानते? बाबा ने कहा “ जाइए अपनी बच्चियों को संभालिए, हमें परेशान मत कीजिये. हमारे पास अगर फरमाइश आयेगी तो हम तो उनके नाम शामिल करेंगे, वरना वही लोग शिकायत करेंगी कि वो फरमाइश भेजती हैं और हम बिना किसी माकूल वजह के उनके नाम शामिल नहीं करते. हमारे पास और भी बहुत काम हैं, ये जासूसी हम नहीं कर सकते कि कौन फरमाइश भेज रहा है और कौन नहीं.”
राठी साहब लौट आये. मुझे ये सारी ख़बरें मिलती रहीं क्योंकि मैं आकशवाणी जाता रहता था और सच्ची बात ये है कि अक्सर मैं ही वो पोस्टकार्ड प्रोग्राम में शामिल करवाता था.
पूरे साल ये सिलसिला चलता रहा और कॉलेज के लोग प्रतिभा राठी एंड कंपनी को इस क़दर छेड़ते रहे कि उनका जीना हराम हो गया.


मैंने आज तक किसी को, जैसा कि मैं कह चुका हूँ, यहाँ तक कि अपने हरि ओम ग्रुप को भी नहीं बताया कि इस सारी शरारत के पीछे मैं था. आज पता नहीं वो प्रतिभा जी कहाँ हैं, वो लता जी, जो मेरे दोस्त प्रवीण गुप्ता की शरीके हयात बनीं, कहाँ हैं और बाकी तीन चार जिनके नाम भी मुझे याद नहीं, कहाँ हैं....... अगर कभी, मेरी ये तहरीर पढ़ें तो मेरी उनसे गुजारिश है के बराएमेहरबानी, मेरी इस शरारत को शरारत ही समझें. मेरा कोई भी बुरा मकसद इसके पीछे नहीं था. वो जो बेइज्ज़ती नाहक उन्होंने हम लोगों की करवाई थी, उसी का चुपचाप मैंने बदला लिया था........ मेरी इस हरकत से उनका कोई ज़ाती नुक्सान तो हुआ नहीं सो बचपन की बात को बचपना मानकर मुझे माफ कर दें.


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Monday, May 23, 2016

गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता - पत्‍ता पत्‍ता बूटा बूटा सातवीं कड़ी

गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता 

मार्च और अप्रैल अगर टेसू और आम के महीने कहे जा सकते हैं तो मई अमलतास और गुलमोहर का महीना है। मई
आते न आते हरी निखरी पत्तियों वाला अमलतास पीले फूलों के गुच्छों से ऐसा सज उठता है जैसे कोई दरबारी रक्कासा कोर्निश बजाने को तैयार खड़ी हो। दूसरी तरफ, नीचे खड़े होने वालों पर नन्हीं-नन्हीं पत्तियाँ बरसाने वाला गुलमोहरमाथे पर सुर्ख़ फूलों की पगड़ी बँधते ही किसी अकड़ू ज़मींदार जैसा ऐंठ जाता है। मज़े की बात यह है कि गर्मी के मौसम में हम और आप ऐसे शोख़ और चटख़ रंग पहनने की सोच भी नहीं कते सफ़ेदफ़िरोज़ीपिस्तईप्याज़ी रंगों पर गुज़र करते हैं लेकिन अमलतास और गुलमोहर पर यही पीला और लाल रंग कितना फबता है!




ब्रिटिश हुकूमत ने जब दिल्ली को हिंदुस्तान की राजधानी बनाने का ऐलान किया तब क़िला राय पिथौरा से लेकर शाहजहानाबाद तक की तमाम दिल्लियों को दरकिनार कर, एक बिलकुल नयी दिल्ली की नींव रखी गयी। रायसीना पहाड़ी पर साम्राज्यवादी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये आलीशान वाइस रीगल लॉज बनाना तय किया गया। उसके दाहिने-बाँये नॉर्थ और साउथ ब्लॉक और थोड़ा सा हटकर पार्लियामेंट। अफ़सरों के शानदार बँगले, गोल डाक ख़ानागोल मार्किटजिमख़ाना और चेम्सफोर्ड क्लब। एक-दूसरे को समकोण पर काटती चौड़ी सड़कें और हर चौराहे पर छोटे पार्क। नयी दिल्ली की योजना इतनी तफ़सील से बनायी जा रही थी कि किस सड़क के किनारे कौन से पेड़ लगाये जायेंगे, यह भी पहले से तय कर लिया गया था।   

दरअसल दिल्ली के गोशे-गोशे में इतिहास बिखरा पड़ा है। हर तरफ़ कोई पुराना महल, सरायख़ानक़ाह या मक़बरा सर झुकाए ख़ामोश खड़ा है। उनको समुचित सम्मान देने और उनकी खूबसूरती को हाई लाइट करने वाले पेड़ लगाने की योजना बनायी गयी थी। ऐसे पेड़ चुने गए जो इमारत की लम्बाई-चौड़ाई के हिसाब से सही लगें इसीलिए किसी सड़क पर इमली, किसी पर नीम, कहीं जामुन तो कहीं सप्तपर्णी के पेड़ लगाये गये। अमलतास और गुलमोहर उस योजना का हिस्सा नहीं थे इसलिए किसी भी सड़क पर उनकी नियमित क़तार नहीं मिलती। लेकिन शुक्र है बाद की सरकारें और उनके बाग़बानी विभाग के अफ़सर इतना सोच-समझ कर काम नहीं करते थे इसलिये पीले और लाल फूलों से लदे ये पेड़ किसी भी मोड़ पर मिल जाते हैं और आपको याद दिला जाते हैं कि मई का महीना आ गया है। 
मैं मई के महीने में जब आकाशवाणी से घर लौटती तब ओबेरॉय होटल के आगे सब्ज़ गुम्बद का चक्कर काटते हुए, पल भर के लिये ट्रैफ़िक से नज़र हटाकर हुमायूँ के मक़बरे की तरफ ज़रूर देख लेती थी। मक़बरे की इमारत तो वहाँ से दूर है, लेकिन इमारत तक जाने वाले रास्ते के दोनों तरफ़ अमलतास के पेड़ हैं, जिन पर पहले दो चार गुच्छे लटकते दिखायी देते, फिर इतने गुच्छे हो जाते कि पत्तों की हरियाली गुम हो जाती और फिर कुछ ही दिनों में यह तय करना मुश्किल हो जाता कि पेड़ों पर लगे फूल ज़्यादा हैं या ज़मीन पर बिखरे हुए। 

मैं जब बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से एम ए कर रही थी तब मेन गेट से अंदर जाते ही सड़क के दोनों तरफ़ अमलतास और गुलमोहर की दोहरी क़तार मिलती थी। मई-जून में दोनों फूलों से लदे रहते। कड़ी धूप में सड़क का कोलतार पिघल कर चिकने काले फ़र्श जैसा लगता और तीनों रंग मिलकर किसी पुरानी पेंटिंग का आभास दिलाते लेकिन जिस दिन आसमान में बादल छाये होते उस दिन ऐसा लगता जैसे फ्रेम में से पुरानी तस्वीर हटाकर कोई नयी तस्वीर लगा दी गयी है। फूलों, पत्तियों और कोलतार के रंग को जैसे दोबारा पेंट कर दिया गया है। 

कॉलेज ऑफ़ फ़ार्माकोलॉजी की तरफ मुड़ते ही मोर बोलने की आवाज़ सुनायी देती। हम लड़कियों में यह बात भी होती कि यह मोर क्या सारे दिन बोलता रहता है? कभी थकता नहीं? हममें से कुछ का मानना था कि कोई मोर-वोर नहीं है, चाय की थड़ी पर बैठे ठलुए लड़कियों को आता-जाता देखकर मोर की आवाज़ निकालते हैं ताकि लड़कियाँ मोर के बहाने उनकी तरफ़ देख लें। 
बचपन में हम गुलमोहर की कली से हाथी बनाते थे। खिलने को तैयार कली में चार पैर और एक सूँड पहले से मौजूद होती थी। सारा हुनर उन्हें हलके हाथों से अलग करने का था। आज बरसों बाद मैंने फिर हाथी बनाने की कोशिश की। नतीजा देखिये -

 




आपको याद है, मैंने कुछ दिन पहले बच्चन जी की कैंब्रिज प्रवास के दिनों में लिखी एक कविता सुनायी थी जिसमे उन्होंने कहा था -
बौरे आमों पर बौराये भँवर न आये, कैसे समझूँ मधु ऋतु आई ?
आज उसी कविता का एक और अंश सुना रही हूँ जो अमलतास की बात कर रहा है -
डार पात सब पीत पुष्पमय जो कर लेता, अमलतास को कौन छिपाये 
सेमल और पलाशों ने सिन्दूर पताके नहीं गगन में क्यों फहराये 
छोड़ नगर की सँकरी गलियाँ, घर-दर-बाहर आया पर फूली सरसों से 
मीलों लम्बे खेत नहीं दिखते पियराये, कैसे समझूँ मधु ऋतु आई ?

और फिर गुलज़ार साहब का गाना तो हम सबकी ज़बान पर चढ़ा ही रहता है -
गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता 
मौसमे-गुल को हँसाना भी हमारा काम होता।


आख़िर में दुष्यंत कुमार की बेहद मक़बूल ग़ज़ल के चंद शेर -
कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए 
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए। 
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है 
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए। 
जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले 
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।  


Saturday, May 21, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग-२७ (महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला)

मुझे आकाशवाणी, बीकानेर ने ड्रामा कलाकार के तौर पर चुन तो लिया था, मगर अब तक किसी प्रोग्राम के लिए नहीं बुलाया था. अब चूंकि मैं बीकानेर के प्रोफेशनल स्टेज पर काम करने लगा था, मुझे अपने आप में कई गलतियाँ महसूस होने लगी थीं. मुझे लग रहा था कि आकाशवाणी मुझे किसी प्रोग्राम के लिए बुलाये, उससे पहले जहां तक हो सके, भाषा के वो दोष जो मुझमें हैं, दूर कर लेने चाहिए. स्टेज पर जिन कलाकारों के साथ मैं काम कर रहा था, उनमें से ज़्यादातर  पर तो मुझसे ज़्यादा राजस्थानी भाषा का असर था. बीकानेर में
मुझे कोई डायरेक्टर भी ऐसा नज़र नहीं आ रहा था, जो कि मेरी खामियों को दूर कर सके. स्कूल की बड़ी क्लास में आने के बाद से इंसान अक्सर यार दोस्तों के साथ ज़्यादा रहता है. स्कूल में तो जो लोग मेरे साथ थे, सब राजस्थानी में ही हिन्दी अंग्रेज़ी सब बोलते थे, कॉलेज में मेरे हरी ओम ग्रुप के दोस्तों में से अशोक, महावीर, हरि कृष्ण मुंजाल पर पंजाबी भाषा सवार थी और बाकी पर मारवाड़ी. मुझे लगा कि अगर मुझे कहीं से एक टेप रिकॉर्डर मिल जाए, तो मैं खुद को थोड़ा ठीक कर सकता हूँ. लेकिन सवाल ये था कि टेप रिकॉर्डर आये कहाँ से? आजकल के नौजवानों को ये बात बड़ी अजीब सी लगेगी, क्योंकि आजकल तो हर बच्चे के पास मोबाइल होता है और हर मोबाइल में एक रिकॉर्डर होना ज़रूरी है. रिकॉर्डर अमूमन रेडियो स्टेशन पर ही होते थे और वो भी बड़े बड़े. मुझे याद है, कुछ वक्त  पहले सरहदी गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान ने बीकानेर का दौरा किया था. मैं भी उनका भाषण सुनने स्टेडियम गया था और इत्तेफाक से डायस के बिलकुल पास ही बैठा था. मैंने देखा आकाशवाणी के लोग जो रिकॉर्डर लेकर आये थे, उन्हें दो दो लोगों ने उठा रखा था. तो बड़ा मुश्किल था, टेप रिकॉर्डर का इंतजाम करना.

मेरे भाई साहब के मेडिकल कॉलेज के कुछ बहुत जिगरी दोस्त थे, डॉक्टर रविन्द्र गहलोत, डॉक्टर पूनम शर्मा, डॉक्टर पूनम जोशी, डॉक्टर कैलाश नारायण पाण्डेय, डॉक्टर प्रदीप गुप्ता, डॉक्टर राजेन्द्र शर्मा, डॉक्टर राम चंद्र शर्मा, डॉक्टर राधा किशन सोनी, डॉक्टर राधा किशन सुमन, डॉक्टर नवल किशोर पारीक वगैरह वगैरह. जब तक ये मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे थे, अक्सर सभी हमारे घर आते रहते थे. एम् बी बी एस पास करने के बाद इनमें से कुछ एम् एस या एम् डी करने में जुट गए, कुछ लोगों की पोस्टिंग भाई साहब की ही तरह छोटे छोटे गाँवों में हो गयी. वैसे तो ये सभी डॉक्टर भाई साहब के जिगरी थे, मगर रवि भाई साहब(डा. रविन्द्र गहलोत), कैलाश भाई साहब, पूनम जोशी भाई साहब और पूनम शर्मा भाई साहब ऐसे लोग थे, जो कॉलेज के दिनों में अक्सर हमारे घर रहकर भाई साहब के साथ ही पढाई किया करते थे. जिस तरह इन चारों का हमारे घर में आना जाना था, ठीक उसी तरह भाई साहब का भी इनके घरों में आना जाना था. यहाँ तक कि मैं भी इन सबके घर, बिलकुल अपने दोस्तों के घर की तरह आया जाया करता था. खास तौर पर रवि भाई साहब के तो घर का हिस्सा ही बन गया था मैं . उनकी माँ को हम लोग बाई कहते थे और पिताजी को बाऊजी. उन दिनों उनकी दादी जी भी ज़िंदा थीं. सभी लोग मेरा बहुत लाड रखते थे. उनके भाई बहन सरला जीजी, शशि, गजेन्द्र, मानो मेरे सगे भाई बहन ही थे. मैं अक्सर उनके घर आया जाया करता था. रवि भाई साहब घर हैं या नहीं, इसका मेरे जाने आने पर कभी कोई फर्क नहीं पड़ा. रवि भाई साब शुरू से ही बहुत तेज दिमाग़ के इंसान रहे थे. कभी कभी बीकानेर के रेलवे फाटक के पास खड़े होते और कोई मालगाड़ी गुजर रही होती तो उनपर लिखी हुई दस-बारह अंकों की संख्याओं को जुबानी जोड़ने लगते और बहुत तेज़ी से वो ये काम कर लिया करते थे. एक चीज़ उनकी बहुत बड़ी दुश्मन हुआ करती थी, नींद. कई बार वो हमारे घर आकर रात में वहीं रहते थे पढाई के लिए. दस बजते बजते उनको नींद आने लगती थी. अब मेरी शामत आती थी. वो मुझसे कहते “महेंदर तू तो अभी देर तक पढेगा, मुझे मालूम है. तू ऐसा करना, मुझे एक बजे उठा देना...... और हाँ भायला एक कप चाय भी बना देना, ताकि मेरी नींद उड़ जाए.”
मैं कहता “भाई साहब प्लीज़ आप कोई और काम सौंप दो मुझे, आपको उठाना बहुत भारी काम है, आप उठते ही नहीं हो”

हमेशा उनका यही जवाब होता था “आज उठ जाऊंगा, पक्का उठ जाऊंगा, आज तुझे बिलकुल तंग नहीं करूँगा.”

मैं क्या कहता और कहता भी तो वहाँ सुनता कौन, क्योंकि आखिरी जुमले का आखिरी लफ्ज़ पूरा करने से पहले तो उन्हें खर्राटे आने लगते थे. रात में एक बजे उन्हें उठाने से पहले चाय बनाता. अब शुरू होती मशक्कत उन्हें उठाने की. मैं आवाजें देता, उन्हें पकड़कर जोर जोर से हिला देता, लेकिन उनकी नींद नहीं टूटती थी. वो नींद में ही बडबडाते रहते “पन्द्रह मिनट और सो लेने दे प्लीज़”. मैं कहता “आधा घंटा हो गया है आपको उठाते उठाते.” कभी कभी तो बहुत जोर से डांट दिया करते थे, लेकिन उससे क्या होता? उन्हें उठाने की ड्यूटी तो पूरी करनी ही होती थी. किसी तरह झिन्झोड़कर, उन्हें चाय का कप हाथ में पकड़ा देता. वो कहते “अब तू जा सो जा, मैं उठ गया हूँ.” मैं पूछता “आप अच्छी तरह से होश में आ गए हैं ना?” उनका जवाब होता “हाँ यार जाग गया हूँ, अब क्या स्टाम्प पेपर पर लिख कर दूं तुझे?” मैं अपने कमरे में जाकर सो जाता. सुबह नींद खुलती थी, डॉक्टर रविन्द्र गहलोत के चिल्लाने से. वो मुझपर चिल्ला रहे होते थे कि मैंने उन्हें रात को उठाया ही नहीं. और सच बताऊँ, वो जीनियस डॉक्टर तब भी बहुत जीनियस था और आज भी बहुत जीनियस है, लेकिन साथ ही ये भी एक हकीकत है कि वो उस वक्त भी बहुत खब्ती थे और आज भी उतने ही खब्ती हैं. एम् बी बी एस करने के बाद उनकी पोस्टिंग, झालावाड के पास एक छोटे से गाँव में हो गयी थी. वो जा चुके थे, लेकिन मेरा उनके घर आना जाना बदस्तूर जारी था. इधर कैलाश भाई साहब की पोस्टिंग भी एक छोटे से गाँव में हो गयी थी, जहां अपने स्टाफ की एक नर्स के साथ प्रेम सम्बन्ध हो गया. किसी एक से सम्बन्ध जुड़ने का अर्थ बाकी पूरी दुनिया से ताल्लुक तोड़ लेना तो नहीं होता, लेकिन न जाने क्यों उन्होंने बस वो एक सम्बन्ध क्या जोड़ा, पूरी दुनिया से नाता तोड़ लिया. अभी कुछ महीने पहले मेरे भाई साहब के निधन से एक महीने पहले जब भाई साहब मुम्बई आये हुए थे तो ४२ साल बाद पता नहीं डॉक्टर कैलाश नारायण जी को क्या उपजी कि उन्होंने भाई साहब के मोबाइल पर फोन किया और भाई साहब के साथ साथ मुझसे भी डेढ़ दो घंटे तक बात की.

पूनम शर्मा भाई साहब के बड़े भाई भागीरथ जी, जो पहले टेलीफोन ऑपरेटर थे, राजस्थान एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज़ में आ गए थे और किसी ट्रेनिंग के लिए कुछ दिन इंग्लैण्ड गए थे. जब वो इंग्लैण्ड से लौटे तो अपने डी ए में से कुछ पैसे बचाकर एक चीज़ खरीद् करके लाये. वो चीज़ थी एक छोटा सा कैसेट रिकॉर्डर. पूनम भाई साहब वो कैसेट रिकॉर्डर लेकर हमारे घर आये. मैंने उसे हाथ में लिया तो मुझे लगा, मुझे भी ऐसा ही रिकॉर्डर चाहिए. उन्होंने उसे एक पूरे दिन के लिए मेरे सुपुर्द कर दिया. मैं बार बार अपनी आवाज़ उसपर रिकॉर्ड करके सुनता रहा. लेकिन पराई चीज़ तो आखिर पराई चीज़ ही ठहरी. शाम को वो रिकॉर्डर मुझसे बिछड गया. भाई साहब ने जो पीलवा से बीकानेर आये हुए थे, मेरी आँखों में उस रिकॉर्डर के प्रति उठ रहे मोह को देख लिया था. उन्होंने मुझसे वादा किया कि चाहे कहीं से भी मंगाना पड़े, वो मुझे एक कैसेट रिकॉर्डर ज़रूर दिलवाएंगे. मुझे लगा, उनके कहने से ही रिकॉर्डर नहीं आ जाता है. उनकी भी नौकरी लगे कुछ ही तो महीने हुए थे. पिताजी भी रिटायर हो चुके थे. रिकॉर्डर खरीदने के लिए पैसा कहाँ से आएगा ? मैं बस ठंडी सांस भरकर रह गया.
पूनम भाई साहब जोधपुर चले गए थे और भाई साहब पीलवा. थोड़े ही दिन बाद  भाई साहब ने समाचार करवाए कि उन्हें कुछ दिन के लिए फलौदी लगाया गया है और फलौदी में किसी के पास एक टेप रिकॉर्डर कम रेडियो है जिसे उन दिनों टू इन वन कहा जाता था. वो उसे बेचना चाहता है. मैं एक बार फलौदी जाकर उसे देख लूं. अगर वो मेरे काम का होगा तो भाई साहब मेरे लिए वो खरीद देंगे. मैं भी कॉलेज में आते ही ट्यूशंस करने लगा था, क्योंकि मेरा हमेशा ये मानना रहा कि हर स्टूडेंट को कॉलेज की अपनी पढाई के साथ साथ ट्यूशन पढ़ानी चाहिए. होता ये है कि जब हम स्कूल में होते हैं तो मार्क्स स्कोर करने के हिसाब से पढाई करते हैं, जिसमें कोर्स के कुछ नापसंद हिस्से हम छोड़ देते हैं. आगे जाकर नौकरी के लिए हम जो भी इम्तहान देते हैं, उनकी बुनियाद स्कूल की पढाई ही होती है. ऐसे में वो छोड़े हुए हिस्से हमें बहुत परेशान करते हैं. अब अगर हम १०वीं ११वीं के बच्चों को ट्यूशन पढायेंगे तो पढ़ाते वक्त तो सारा ही कोर्स पढ़ाना पडेगा. इस तरह हमारी पीछे की रही कमियां दूर हो जायेंगी. इसके साथ साथ कुछ पैसा जेब में आने लगता है तो इंसान कम से कम अपने कुछ खर्च खुद उठा सकता है.   मुझे लगा, यहाँ तो एक रिकॉर्डर खरीदने पर भी सवाल खडा हो रहा था कि इतने पैसे कहाँ से आयेंगे? इसमें तो रेडियो भी साथ में है, तो ये तो और भी महंगा होगा. इतने पैसों का इंतजाम मैं और भाई साहब कहाँ से करेंगे? एक बार सोचा कि उन्हें मना करवा दूं, लेकिन फिर सोचा एक बार फलौदी हो आता हूँ. इस बहाने एक दो दिन भाई साहब के साथ रहना हो जाएगा. रही रिकॉर्डर की बात तो उसके लिए वहाँ जाकर भी मना किया जा सकता है. मुझे क्या पता था कि कुदरत इस सफर के बहाने मेरी झोली में एक ज़बरदस्त तजुर्बा डालना चाहती है.

बीकानेर से बस पकड़कर मैं फलौदी पहुँच गया. उन दिनों न तो सड़कें आज जैसी अच्छी हुआ करती थीं और न ही बसें बहुत तेज चलने वाली. बीकानेर से कोलायत, भाप होते हुए फलौदी पहुँचने में करीब सात घंटे लगा करते थे. मैं सुबह आठ बजे रवाना हुआ था और दिन में तीन बजे फलौदी पहुँच गया था. भाई साहब वहाँ डाक बंगले में रह रहे थे. मुझे लेने बस स्टैंड पर आ गए थे. मैं उनके साथ डाक बंगले चला गया. शाम को एक साहब एक बड़ा सा टू इन वन लेकर आए. मैंने देखा सोनी का बहुत अच्छा सैट था. हालांकि सैकंड हैंड था, लेकिन देखने में बिलकुल नया लग रहा था. मुझे लग रहा था, ये काफ़ी महंगा होगा. भाई साहब ने पूछा “क्यों.......पसंद है?” मैं तो मन ही मन में उसकी कीमत का अंदाजा लगा रहा था. हडबडा कर बोला “दिखाई तो बहुत अच्छा दे रहा है लेकिन..........” मैं बात पूरी करूं उससे पहले ही जो साहब वो टू इन वन लेकर आए थे, बोले “आप दो दिन बजा कर देख लो, रिकॉर्ड करके देख लो. कोई दिक्कत नहीं है, घर की ही बात है.” भाई साहब बोले “ठीक है, आप आज इसे यहीं छोड़ दीजिए, आपको कल तक बता देंगे कि हम इसे खरीद रहे हैं या नहीं.” वो साहब उसे हमारे पास छोड़कर चले गए. मैंने रेडियो चलाकर देखा, कैसेट रिकॉर्डर बजा कर देखा, उस पर रिकॉर्डिंग करके देखा. हर कसौटी पर वो खरा उतर रहा था. उस रात मैं शायद एक डेढ़ घंटे से ज्यादा नहीं सो पाया. बाकी टाइम टू इन वन को ही जांचता रहा. सुबह भाई साहब हस्पताल चले गए और मैं फिर जुट गया उसी रिकॉर्डर में. दोपहर में भाई साहब वापस आए तो पूछने लगे “क्यों ठीक है ये? कोई खराबी तो नहीं है इसमें?” मैंने कहा “ खराबी तो कुछ भी नज़र नहीं आ रही, लेकिन ये बहुत महंगा होगा. आपको कितनी कीमत बता रहे हैं वो ?” भाई साहब हंसकर बोले “तू उसकी चिंता मतकर. मेरी बात हो गयी है उनसे. मैं तीन चार महीने में थोड़े थोड़े करके उनको रुपये दे दूंगा. अगर तुझे पसंद है, तो तू इसे ले जा.” मैंने कहा “ नहीं नहीं, इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी डा. साहब, मेरे ट्यूशन से कमाए कुछ रुपये रखे थे मेरे पास, वो लाया हूँ मैं, हाँ जो कम पड़ें वो आप दे देना.” इस तरह मेरे बचाए हुए रुपये और भाई साहब की इतने महीनों की बचत हम दोनों ने उन साहब को सौंप दी, जिनका वो टू इन वन था. उसी रात भाई साहब को किसी मीटिंग के लिए जोधपुर जाना था, इसलिए तय किया गया कि वो अपनी सरकारी जीप से जोधपुर निकल जायेंगे और मैं रात की बस पकड़कर, उस टू इन वन को लेकर बीकानेर चला जाऊंगा. बस रात दस बजे रवाना होने वाली थी ९ बजे भाई साहब ने अपनी जीप से मुझे बस स्टैंड पर छोड़ दिया और खुद जोधपुर के लिए रवाना हो गए. मुझे वहाँ बैठे कोई पांच मिनट हुए होंगे कि एक बूढा सा दाढ़ी वाला इंसान मेरे करीब आया. उसके हाथ में कुछ पत्रिकाएं थीं. मेरे पास आकर वो बोला “बेटा एक पत्रिका खरीदोगे क्या?”

मैंने कहा “बाबा बस इतनी हिलती है, ऊपर से रात का सफर है, क्या करूँगा पत्रिका लेकर? कल भी रात को सो नहीं पाया था, आज थोड़ी नींद निकालूँगा.”
बाबा मुस्कुराया और बोला “हाँ बेटा नींद बहुत ज़रूरी है इंसान के लिए, लेकिन पेट खाली हो तो कम्बख्त नींद भी नहीं आती.”
मैंने कहा “बाबा मैं आपका मतलब नहीं समझा.”

बाबा बोला “ देखो बेटा कोई ज़बरदस्ती नहीं है.......लेकिन तुम मुझसे मतलब पूछ रहे हो तो बता रहा हूँ कि मैं एक प्राइवेट स्कूल में टीचर था. जो कुछ कमाता था, बच्चों पर खर्च कर देता था. रिटायर हुआ तो मुझे जो पैसा मिला उससे बच्चों को काम शुरू करवा दिए, यही सोचकर कि बच्चे कुछ कमाएंगे तो मुझे भी बुढापे में दो वक्त की रोटी नसीब हो जायेगी. अब मैं बिलकुल खाली हो गया था. थोड़े ही  दिन बाद मेरी बीवी को ऊपर से बुलावा आ गया. वो मुझे इन बच्चों और बहुओं के हाथों में छोड़कर चल दी.”
मैंने देखा बाबा की आँखें छलछला आई हैं. मुझे समझ नहीं आया कि बाबा को क्या कहूँ. कुछ लम्हों तक अपने आपको संभालने की कोशिश करने के बाद वो बाबा बोला “मेरी बीवी के जाते ही मैं बहुओं की नज़रों में चुभने लगा. एक दिन मुझे अपने ही उस घर से निकालकर बाहर फेंक दिया गया.”
“फिर अब कहाँ रहते हो बाबा? और क्या खाते हो?”

“ये बस अड्डा ही अब मेरा घर है बेटा. यहाँ के एक बुकसेलर से ये पत्रिकाएं ले आता हूँ और इन्हें बेचकर जो कुछ कमीशन मिलता है, उसी से दो रोटी सुबह और दो शाम को खा लेता हूँ. और मुझे चाहिए भी क्या? लेकिन बेटा आज एक भी पत्रिका नहीं बिकी, इसलिए सुबह से अन्न का एक दाना भी पेट में नहीं गया है. खाली नल का पानी पीकर भी कब तक पीऊँ? पानी भी तभी अच्छा लगता है जब पेट में अनाज हो.” ये कहकर बाबा ने अपनी धोती के पल्लू से अपनी आँखें पोंछ ली. मैंने कहा “लाओ बाबा आप कोई एक पत्रिका दो मुझे. अभी रास्ते में ना सही बीकानेर पहुंचकर पढ़ लूंगा” बाबा ने नीहारिका का नया अंक निकालकर मुझे दे दिया. मैंने जेब से दो रुपये निकालकर बाबा के हाथ पर रख दिए. नीहारिका मेरी पसंदीदा, कहानियों की मैग्जीन थी. बाबा ने रुपये लिए और ढेर सारे आशीर्वाद देते हुए वो चला गया. मुझे लगा कि बाबा को बहुत जोर से भूख लगी थी, वो निश्चित रूप से खाना खाने बस अड्डे के ढाबे की तरफ गया होगा. बस में अभी भी आधा घंटा बाकी था. मैं म्युनिस्पैलिटी के बल्ब की अंधी अंधी रोशनी में, नीहारिका के पन्ने पलटने लगा. उस रोशनी में दो पेज पढ़ने में करीब बीस मिनट निकल गए. तभी देखा बस लग रही थी. मैं जाकर ड्राइवर के बिलकुल पीछे वाली सीट पर बैठ गया, क्योंकि वहाँ पाँव रखने के लिए काफी जगह होती है और उस जगह में मैं अपना टू इन वन रख सकता था. ड्राइवर मेरी तरफ देख कर मुस्कुराया और पूछा “नया लिया है क्या?” मैंने बताया कि नहीं सैकंड हैंड है. तो बड़ी तारीफ़ वाली नज़रों से देखकर बोला “ बाबूजी लगता तो बिलकुल नया है.”
थोड़ी ही देर में बस भर गयी और चल पडी बीकानेर की ओर. पिछली रात की नींद बाकी थी, इसलिए बस के हिलने से मुझे झपकियाँ आने लगीं. थोड़ी देर तक मैं झपकियाँ लेता रहा लेकिन वहाँ कोई पलंग तो बिछा हुआ नहीं था कि मैं आराम से सो जाऊं. बस की सीटें बहुत खराब हालत में थी, इस वजह से मेरी पीठ में दर्द होने लगा था. बस भाप पहुँचने वाली थी कि मैंने तय कर लिया, अब सोऊँगा नहीं. मुझे याद आई नीहारिका की. मैंने बैग में से नीहारिका निकाली और पढ़ने की कोशिश करने लगा. लेकिन मेरी सीट के ऊपर लाल रंग की लाइट लगी हुई थी, जिसकी रोशनी में पढ़ना मुमकिन नहीं था. मैंने इधर उधर निगाह डाली. चौथी लाइन में ड्राइवर के उल्टी तरफ यानि कंडक्टर साइड में जो दो की सीट थी, उसके बिलकुल ऊपर पीलापन लिए हुए सफ़ेद लाइट लगी हुई थी. मुझे लगा कि अगर वो सीट मिल जाए तो मैं बीकानेर पहुँचने तक नीहारिका पढ़ सकता हूँ. मगर उस सीट पर तो एक पगड़ी वाला बैठा हुआ था. मैं ये सब सोच ही रहा था ड्राइवर साहब ने मुझसे हँसते हुए पूछा “क्या हुआ बाबूजी नींद पूरी हो गयी?”

मने कहा “नहीं यार कल रात बिलकुल सोया नहीं हूँ, बहुत जोर से नींद आ रही है लेकिन बस की सीटें बहुत खराब है, पीठ दुखने लगी है.”
ड्राइवर जोर से हंसा और बोला “ बाबूजी, कभी आपने हमारे बारे में सोचा है? पूरी रात बिना सोये बस चलाते हैं हम लोग.”
मैंने कहा “भाई अपना अपना काम है ये तो. आपने ये नौकरी करना तय किया है तो रात की नींद तो कुर्बान करनी ही होगी.”
“हाँ साहब आप ये कह सकते हैं, मैं भी जब आपकी उम्र का था, खूब पढता था. चाहता था कि फ़ौज में जाऊं, लेकिन घर के हालात कुछ इस क़दर बिगड़े कि प्राइवेट बस का ड्राइवर बन कर रह गया. वैसे आप क्या करते हैं बाबूजी?”
मैंने कहा, “भाई , कॉलेज में पढता हूँ. और हाँ रेडियो का आर्टिस्ट हूँ” पता नहीं यहाँ ये कहने की क्या ज़रूरत थी,लेकिन अब तो कह गया था.
ड्राइवर फ़ौरन बोला “अरे हाँ, आप बोलते हैं तो लगता है रेडियो सुन रहा हूँ. मेरे भी एक बेटा और एक बेटी है. दोनों पढ़ने में बहुत होशियार हैं. मैं चाहता हूँ कि वो मेरी तरह ड्राइवरी न करे. मेरी बेटी की बोली भी बहुत मीठी है, क्या वो भी रेडियो में काम कर सकती है?”

मैंने कहा “क्यों नहीं? अगर उसकी आवाज़ अच्छी है और जुबान साफ़ है तो वो भी रेडियो पर काम कर सकती है.”
ड्राइवर मुझसे इसी तरह की बातें कर रहा था कि बस भाप पहुँच गयी. जैसे ही बस भाप में रुकी, जिस सीट पर मेरी निगाह थी उस पर बैठी हुई सवारी उठी और अपना सामान समेटकर नीचे उतर गयी. मैं फ़ौरन खडा हुआ और अपना बैग लेजाकर उस सीट पर रख दिया. इधर मैंने चौथी लाइन की कंडक्टर साइड की सीट पर बैग रखा और उधर एक आदमी आकर मेरी, ड्राइवर के बिलकुल पीछे वाली सीट पर बैठने लगा. ड्राइवर ने उसे रोका और मेरी तरफ इशारा किया कि वो मेरी सीट है, तभी मैं आगे की तरफ आया और सोचने लगा कि अपने टू इन वन का क्या करूं ? वो तो पीछे वाली सीट में फिट होगा नहीं. ड्राइवर मुझसे बोला “ बाबूजी यहीं बैठो ना? पीछे झटके लगेंगे.”
मैंने कहा “भैया यहाँ लाइट सही होती, तो यहीं बैठता, दरअसल अब सोना नहीं चाहता और मेरे पास एक पत्रिका है, उसे पढ़ना चाहता हूँ. इसलिए भाई बैठूंगा तो वहीं, लेकिन इस टू इन वन को कहाँ रखूँ?”
उसने फिर एक बार इसरार किया “अरे बाबू जी इसकी फिकर आप मत करो मैं ध्यान रख लूंगा लेकिन बहुत झटके लगेंगे वहाँ, आप दुखी हो जायेंगे. और हाँ, आपसे बातें करके बहुत अच्छा लग रहा था. नींद उड़ गयी थी, आप यहाँ से उठकर जायेंगे तो कहीं ऐसा न हो कि मुझे नींद आने लग जाए.”
फिर ज़रा सा मुस्कुराते हुए बोला “ज़रा सोचिये कि मुझे नींद आ जायेगी तो क्या हो जाएगा?”

मुझे लगा कि रोजाना ड्राइवरी करने वाला इंसान, भला उसे क्या नींद आयेगी ? वो मुझसे मजाक कर रहा है शायद. मैं अपनी जिद पर अडा रहा कि मुझे तो नीहारिका पढनी है और वो मैं पीछे की सीट पर जाकर ही कर सकता हूँ. मैं बस पीछे आकर बैठ गया और नीहारिका पढ़ने लगा.

मुझे बाद में समझ आया कि उसने अपने सफर में, मुझे अपना साथी बनाने की भरपूर कोशिश की थी, लेकिन होता तो वही है ना, जो मंजूरे खुदा होता है.
बस भाप से निकल कर कोलायत की तरफ चल पडी. कोलायत की रोशनियाँ नज़र आने लगी थीं कि अचानक ज़ोरदार धमाका हुआ और पूरी बस एक दम उछल गयी. बस में सब लोग सो रहे थे, लेकिन मैं तो नीहारिका पढ़ रहा था, इसलिए जाग रहा था. ज़ोरदार झटका लगा, तो मैं एक दम से खडा हो गया. बस में घुप्प अन्धेरा हो गया था. मैंने टटोलकर देखा कि मेरे आगे की सीट टूटकर मेरे पैरों पर आ गयी थी. जिस सीट पर मैं बैठा था, वो भी टूटकर मेरे बराबर बैठी सवारी के भार से पीछे की तरफ गिर गयी थी. बस का इंजन बहुत जोर से आवाज़ कर रहा था मानो न्यूट्रल में खड़ी बस का ऐक्सीलरेटर किसी ने पूरा दबा दिया हो. पूरी बस में लोगों के चिल्लाने की आवाजें गूँज रही थीं. कुछ देर मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया. फिर मैंने अपने हाथ, पैर, सर, सब चैक किये...... मुझे कोई चोट नहीं लगी थी. अब मैंने सबसे पहले बस में से बाहर निकलने की सोची. अँधेरे में टटोलते टटोलते मैंने दरवाज़ा ढूंढा और बाहर कूद पड़ा. मेरे उतरने के दो ही मिनट बाद देखा कि एक शख्स और दरवाज़े से बाहर निकल रहा है. वो बस का खलासी था.मेरी आँखें भी अब तक अँधेरे में देखने की थोड़ी आदी हो गयी थी. मैंने देखा, पुराने स्टाइल के एक नाक वाले ट्रक और हमारी बस में कुछ इस तरह से टक्कर हुई थी कि ट्रक का पूरा नाक, बस के दायें आधे हिस्से में घुस गया था. खलासी ने कहा “भाई साहब लगता है, हम दो ही सही सलामत बचे हैं. सबसे पहले तो इस बस का इंजन बंद करना पडेगा, वरना आग लग जायेगी. उसने बस के ऊपर चढ़कर पता नहीं कहाँ से, एक पाइप का टुकड़ा और एक टॉर्च निकाली. हमने बस के डीज़ल टैंक का ढक्कन खोला और पाइप डालकर सारा डीज़ल बाहर निकाला. इस काम में आधा घंटा लग गया. 

इंजन के बंद होते ही बस के अंदर की चीख पुकार और जोर से सुनाई पड़ने लगी. अब हम दोनों टॉर्च लेकर अंदर घुसे. ट्रक इतनी बुरी तरह से बस के अंदर घुसा था कि ड्राइवर, उसके पीछे की दो लंबी सीटों पर बैठे ६ लोगों की जगह बस मांस के लोथड़े नज़र आ रहे थे. पूरी बस की सीटों के नीचे कसे हुए स्क्रू टूट गए थे और लोग सीटों के नीचे पड़े हुए चिल्ला रहे थे. मैंने और खलासी ने मिलकर खून से लथपथ लोगों को बाहर निकाला और सड़क के किनारे के रेत के धोरों पर लिटाया. तभी एक बस आती हुई दिखाई दी. मैंने हाथ देकर उसे रोका और बताया कि इस तरह एक्सीडेन्ट हो गया है. फ़ौरन उस बस की सवारियों को कोलायत में उतार दिया गया और बस हमारे पास आ गयी. जितने भी लोग ज़िंदा बचे थे, सबको उस बस में डाला गया. मैं एक्सीडेन्ट वाली बस के आगे के हिस्से की तरफ गया तो मुझे जोर से चक्कर आ गया. अपने आपको थोड़ा सम्भाला, तो देखा जिस जगह पर मैं फलौदी से भाप तक बैठा था और लाइट ठीक न होने की वजह जिस जगह को छोड़कर पीछे आया था, वहाँ बैठे हुए इंसान के परखच्चे उड़ गए थे, ड्राइवर के भी परखच्चे उड़ गए थे और मेरे सोनी के टू इन वन के भी परखच्चे उड़ गए थे. वो ड्राइवर जो मुझसे वहीं बैठने का इतना इसरार कर रहा था, क्योंकि उस सीट पर बैठकर सफर आराम से किया जा सकता था, न जाने किस सफर पर रवाना हो गया था.

हम लोग नई आई बस में सवार हुए.... न जाने कितने घायलों को हमने उस बस में लादा और कितनी लाशों को....... मुझे कुछ होश नहीं था. लोगों की चीख चिल्लाहट मुझे फिर एक बार सरदारशहर के कसाइयों के उस मोहल्ले में ले गयी थी जहां रोज सुबह सुबह बकरों के बाड़े में से एक बकरे को निकाला जाता था तो सारे बकरे चिल्ला पड़ते थे. उस बकरे को ज़िबह करने की जगह ले जाया जाता तो बाड़े में क़ैद बाकी बकरे एक बार शायद ये सोचकर खामोश हो जाते थे कि चलो आज उनकी जान बच गयी. फिर जब उस बकरे को ज़िबह किया जाता तो उसके हलक़ से एक दर्दनाक चीख उभरती थी और पूरे माहौल में गूँज जाती थी. एक बार फिर से बाड़े में बंद सारे बकरे उस चीख के साथ आवाज़ मिलाते हुए चीख पड़ते थे, शायद ये सोचकर कि आज बच गए तो क्या हुआ, हश्र तो हमारा भी यही होना है, आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों. मुझे लगा, अगर मैंने उस बाबा से नीहारिका न ली होती तो पहली लाइन की उस सीट को छोड़कर क्यों पीछे और उल्टी तरफ जाता? और अगर ड्राइवर के बार बार कहने पर या अपने टू इन वन के मोह में उस सीट पर बैठा रहता, तो कहानी कुछ और ही होती. मौत से एक बार फिर मैं इतनी नज़दीक से रूबरू हो चुका था, मौत जैसे बस मुझे छूते हुए निकल गयी थी. लेकिन मौत से बड़ी हकीकत शायद इस दुनिया में और कोई नहीं है. कब तक इंसान इससे बच सकता है?
मैंने सर झटककर इन ख्यालों को झटकने की कोशिश की. थोड़ा थोड़ा उजाला होने लगा था. जैसे जैसे उजाला बढ़ रहा था बस के अंदर का मंज़र और खौफनाक होता जा रहा था. मैंने अपने कपड़ों पर निगाह डाली. ज़ख़्मी लोगों को उठा उठा कर इधर उधर करने में मेरे सारे कपडे खून से लाल हो चुके थे. हालांकि मुझे कहीं खरौंच भी नहीं आई थी, लेकिन अपने कपड़ों को खून से तरबतर देखना मुझे बहुत डरावना लग रहा था. मैंने फिर अपने दिमाग को काबू में करने की कोशिश की. देखा, जस्सूसर गेट आ रहा था. यानि हम लोग बीकानेर में घुस रहे थे. अचानक मेरे ज़ेहन में आया, अब तक इंसानियत के नाते जो करना चाहिए था, वो सब कर दिया. क्या ज़रूरी है कि पुलिस के सवाल जवाब के चक्कर में पड़ा जाए? मैंने फ़ौरन फैसला ले लिया. जस्सूसर गेट पर एक सैकंड के लिए बस रुकी और मैं बैग लेकर उतर पड़ा. बस मुझे छोड़कर हस्पताल गयी या पुलिस स्टेशन, मुझे कुछ पता नहीं. मैंने अपनी तरफ से पुलिस से पीछा छुडा लिया था. मुझे कहाँ पता था कि मेरी ज़िंदगी में आगे जाकर एक ऐसा हादसा होने वाला है, जिसकी बदौलत मेरी ज़िंदगी के आठ बरस पुलिस और अदालत की नज़र हो जायेंगे.

जस्सूसर गेट पर रवि भाई साहब का घर था. मैं सीधा उनके घर पहुंचा. घंटी का बटन दबाया. बाई (रवि भाई साहब की माँ) ने दरवाज़ा खोला. मेरे खून से तरबतर कपडे देखते ही उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं. वो जोर से चिल्लाईं “ अरे महेंदरा, कईं होग्यो रे ?(अरे महेंद्र क्या हो गया रे)...........” और धड़ाम से बेहोश होकर गिर पड़ीं. बाऊजी आ गए, शशि भी आ गयी, दादी जी भी आ गईं. मैंने सबको बताया कि एक्सीडेन्ट हुआ है, लेकिन मुझे ज़रा भी चोट नहीं लगी है. बाई के चेहरे पर पानी छिड़क कर उन्हें होश में लाया गया और उन्हें बताया गया कि मैं बिलकुल ठीक हूँ. मुझे ठीक देखकर उन्हें तसल्ली हुई. मैं दिन में नहा धोकर कपडे बदलकर अपने घर पहुंचा. दूसरे दिन अखबार से पता लगा कि कुल आठ आदमी मारे गए थे इस हादसे में, जिनमें दोनों गाड़ियों के ड्राइवर भी शामिल थे. एक बार फिर से कुचले हुए जिस्मों की तस्वीरें मेरी आँखों के सामने थीं. बहुत दिन तक मैं ज़ेहनी तौर पर बहुत परेशान रहा.अक्सर रात में मुझे ख्वाब में भी वही एक्सीडेन्ट दिखाई देता और मैं चौंक कर जाग जाता.    
इंसानी दिमाग में कभी एक़ तो कभी उससे बिलकुल उलटा ख़याल आने लगता है, ये उसकी फितरत है. एक ओर जहाँ मैं ये सोच रहा था कि अगर वो नीहारिका नहीं खरीदता तो ड्राइवर के बिलकुल पीछे वाली सीट से नहीं हटता और मेरा भी वही हश्र होता जो मेरी जगह आकर बैठने वाले शख्स का हुआ था, वहीं जेहन में ये भी आता है कि हो सकता है ये एक्सीडेन्ट ड्राइवर को नींद की झपकी लगने से हुआ हो. मुझे ड्राइवर ने कहा भी था कि मैं वहीं बैठा रहूँ ताकि वो मुझसे बात करता रहे और उसे नींद न आए. अगर मैं उसकी बात मानकर वहीं बैठा रहता तो शायद उसे झपकी नहीं लगती ये पूरा हादसा ही टल जाता. तो क्या मैं ही उस हादसे के लिए ज़िम्मेदार था? ये सवाल आज भी कई बार मेरी आत्मा को परेशान करता है.   


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