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Friday, November 28, 2008

राष्ट्रीय शोक,आकाशवाणी और एफ़एम चैनल्स.

पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथप्रताप सिंह के निधन के कारण भारत सरकार ने राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है. आज सुबह आकाशवाणी का स्थानीय क्षेत्रीय चैनल ट्यून किया तो गीता-पाठ सुनाई दिया. विविध भारती पर भी पूरी संजीदगी थी. हाँ प्रसारण की शुरूआत में बजने वाली शहनाई की मंगल ध्वनि भी नहीं थी उसकी जगह बिना तबले की सारंगी से दिन शुरू हुआ. उदघोषक के स्वर में भी एक सहज गंभीरता थी. इधर विविध भारती को ट्यून करने में रोज़ ही ख़ासी मशक्क़त करनी पड़ती है क्योंकि हैवी ट्रांसमीटर्स से एफ़एम चैनल्स (मेरे शहर इन्दौर में रेडियो मिर्ची,माय एफ़एम,बिग एफ़एम. और एस.एफ़एम हैं) ऐसा अतिक्रमण कर बैठे हैं कि विविध भारती को वाक़ई ढूंढना ही पड़ता है. बहरहाल बरास्ता एफ़एम.चैनल्स जब विविध भारती तक पहुँचा तो लाज़मी है इन नये ज़माने के चैनल्स के प्रसारणों पर भी कान चला गया. जब से इन एफ़एम चैनल्स को पता पड़ा है कि विविध भारती के पास सुबह भक्ति संगीत के स्लॉट वंदनवार या रीजनल प्रसारण के वंदना को अधिकतम श्रोता मिलते हैं तो ये चैनल्स भी कोई सुबह पाँच बजे या साढ़े पाँच बजे भकितमय हो जाते हैं .शोक के पल में भक्ति संगीत भी किस क्वालिटी का हो ये देखने वाला इन नये-नकोरे चैनल्स पर कोई नहीं होता.कोई माता रानी के गीत बजा रहा है तो कोई विष्णु सहस्त्रनाम,कोई गायत्री मंत्र बजा रहा था तो कोई श्री गणेश अथर्वशीर्ष.यानी राष्ट्रीय शोक के समय में भक्ति संगीत भी किस मूड हो ये देखने की किसे फ़ुरसत है. सात बजे के बाद तो वही शोर मचाते रेडियो जॉकीज़ नमूदार हो गए,वही उनका खिलंदड़ अंदाज़ , वही वायब्रेंसी और एनर्जी लेवल बढ़ाती धमाल.रीजनल स्टेशन पर शुभलक्ष्मी,शंकर-शंभू,
और दीगर कई स्थानीय कलाकारों की आवाज़ों में निबध्द ऐसी रचनाएँ थीं जो संकेत दे रहीं थीं की ये राष्टीय शोक की बेला में बजने वाला भक्ति संगीत है.

एफ़एम चैनल्स के साथ प्रसार भारती क्या अपने अनुबंध में इन राष्ट्रीय महत्व के प्रसारणों के लिये कोई विशेष नियमों का खुलासा नहीं करती.जब चार-चार चैनल्स पर नये गीतों के तड़क भड़क वाले गीत बज रहे हों तब आकाशवाणी और विविध भारती का सोग भरा प्रसारण गुम हो जाता सा प्रतीत होता है.

याद है मुझे जब डाँ.ज़ाकिर हुसैन,फ़क़रूद्दीन अली अहमद,डॉ.शंकरदयाल शर्मा,इंदिरा गाँधी,राजीव गाँधी,जयप्रकाश नारायण,वी.वी.गिरि,ज्ञानी ज़ैलसिंह जैसी राष्ट्रीय हस्तियों के दिवंगत होने पर आकाशवाणी और दूरदशन के ह्र्दयस्पर्शी प्रसारणों से घर-परिवार में भी ऐसा वातावरण बन जाता था जैसे परिवार में ही कोई ग़मी हो गई हो. जसदेवसिंह,मैलविन डिमेलो,सुरजीत सेन और कमलेश्वरजी की खनकती आवाज़ों की वे सारी धीर-गंभीर कमेंट्री दिवंगत शख़्सियतों को हमारी आँखों के सामने ला खड़ा करती थी.
आज एन एफ़एम चैनल्स के पास टैक्नीक है,पैसा है,स्पॉंसरशिप्स है,एंडोर्समेंट्स हैं और है बेताहाशा शोर जो मनुष्य की समवेदना को की थाह नहीं ले पा रहा है.

3 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आप शोक की बात कर रहे हैं...? शुक्र मानिए कि एफ एम चैनलों ने शोक संगीत को भी स्पॉंसेर करवा लेने क़ी योजना नहीं बना डाली

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

" शोक व्यक्त करने के रस्म अदायगी करने को जी नहीं चाहता. गुस्सा व्यक्त करने का अधिकार खोया सा लगता है जबआप अपने सपोर्ट सिस्टम को अक्षम पाते हैं. शायद इसीलिये घुटन !!!! नामक चीज बनाई गई होगी जिसमें कितनेही बुजुर्ग अपना जीवन सामान्यतः गुजारते हैं........बच्चों के सपोर्ट सिस्टम को अक्षम पा कर. फिर हम उस दौर सेअब गुजरें तो क्या फरक पड़ता है..शायद भविष्य के लिए रियाज ही कहलायेगा।"

समीर जी की इस टिपण्णी में मेरा सुर भी शामिल!!!!!!!
प्राइमरी का मास्टर

yunus said...

भाई साहब तिजारत और तहज़ीब में फर्क होता है । एक तिजारती सिलसिला है एक तहज़ीबी ।
अब ये अलग बात है कि व्‍यवस्‍था व्‍यापारियों पर भी संस्‍कारों की नकेल लगाकर उन्‍हें सुधार दे ।
वरना 'शोक' कोष्‍ठक में होगा । और बाहर नाच गाना होगा ।

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