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Monday, September 14, 2009

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-9

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-9 -पंकज अवधिया


पीपल, पलाश और माहुल की पत्तियो से तैयार पत्तल गर्म-गर्म खिचडी परोसी जाये और फिर मुनगे (सहजन) की सब्जी के साथ उसे खाया जाये। खिचडी को कुछ समय तक इस पत्तल मे रखा रहने दिया जाये ताकि पत्तियो से उसकी अभिक्रिया हो सके। ऐसा महिने मे कम से कम दो बार तो अवश्य किया जाना चाहिये। अपनी वाणी को सुमधुर रखने की कामना करने वालो को देश के पारम्परिक चिकित्सक यह सलाह देते है। आप सोच रहे होंगे कि रेडियो वाले ब्लाग मे यह पारम्परिक चिकित्सा का पाठ कैसे शुरु हो गया? आप सही सोच रहे है। चलिये, मै इसका खुलासा कर ही देता हूँ। जब मैने इस ब्लाग की सदस्यता ली थी तो माननीय युनुस खान जी ने यह उम्मीद जतायी थी कि मै आवाज की गुणवत्ता सुधारने के लिये उपयोगी जडी-बूटियो के विषय मे लेख लिखूंगा ताकि रेडियो उद्घोषको को लाभ हो सके। “मेरे आस-पास बोलते रेडियो” की लम्बी लेखमाला मे मै रेडियो के विभिन्न पहलुओ पर लिखता रहा पर इस विषय मे नही लिख पाया। अब इस कमी को दूर करने का प्रयास कर रहा हूँ।

पीपल के पके फल जिसे पिकरी भी कहा जाता है, खाने मे स्वादिष्ट होते है। नाना प्रकार के पक्षी फलन के समय पीपल मे डेरा जमाये रहते है। यह फल मनुष्यो के लिये भी बहुत उपयोगी है। इसका मौसम भर सेवन आवाज को साफ रखता है। यह पेट साफ भी करता है। इसी तरह पीपल के एक रिश्तेदार गूलर जिसे डूमर भी कहा जाता है, के फलो को देशी अंजीर का दर्जा प्राप्त है। चाहे मुम्बई हो या रायपुर यह आसानी से मिल जाता है। बाजार मे नही बल्कि आस-पास बाग-बागीचो मे। इन फलो को बच्चे बडे चाव से खाते है। यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है। गले के लिये इसकी विशेष महत्ता है। गूलर के पके हुये फलो के सेवन का मौका कभी भी नही चूकना चाहिये।

पारम्परिक चिकित्सक बच जिसे वचा भी कहते है, का टुकडा मुँह मे रखकर चूसने की सलाह देते है। बच आसानी से पंसारी की दुकान मे मिल जाती है। आजकल बडी कम्पनियाँ भी इसका विपणन कर रही है। ग्रामीण अंचलो मे बच्चो की तुतलाहट दूर करने के लिये आज भी इसका प्रयोग किया जाता है। यदि आपके पास बागीचा है तो आप इसे स्थायी तौर पर घर मे लगा ले। यह वनस्पति कम देखभाल के आसानी से उगती है। किसानी भाषा मे इसीलिये इसे “आलसियो की फसल” कहा जाता है। एक बार लगाया तो फिर ज्यादा देखभाल की जरुरत नही। आज के प्रदूषण भरे माहौल मे बच के पौधे वातावरण को साफ रखने मे अहम भूमिका निभाते है। बच के टुकडे को जब तक अच्छा लगे मुँह मे रखे फिर फेक थे। ज्यादा देर तक मुँह मे रखने से उबकाई आ सकती है।

गले की नियमित देखभाल के लिये गुनगुने पानी से गरारे करना लाभप्रद है, यह हम सभी जानते है। पर गरारे करने के बाद गले को गरम कपडे से लपेटकर रखना जरुरी है ताकि ठंडी हवा न लगे। ये उपाय कम लोग ही करते है। फिर गरारे के लिये अधिक गर्म पानी का उपयोग न करे। गरारे करने के कम से कम पन्द्रह मिनट बाद तक मौन रखे। इससे इसका असर बढ जायेगा। पानी के साथ फिटकरी ,हल्दी, शहद आदि मिलाकर भी गरारे किये जा सकते है पर सबसे उपयुक्त यही है कि नमक पानी के गरारे किये जाये। किसी भी तरह के संक्रमण चाहे वह स्वाइन फ्लू का ही संक्रमण क्यो न हो, से बचने के लिये सबसे सस्ता और प्रभावी उपाय है नमक पानी से गरारे और जल नेती का प्रयोग। जलनेती बहुत आसान है। पास के योग केन्द्र मे जाकर आप इसके विषय मे विस्तार से जान सकते है। जलनेती आपके गले के लिये विशेष लाभकारी है।

आवाज की दुनिया से जुडे लोग अदरक से विशेष मित्रता रखते है पर बहुत कम लोग जानते है कि अदरक का सेवन सम्भलकर किया जाना चाहिये। प्राचीन भारतीय ग्रंथ नाना प्रकार के त्वचा रोगो मे अदरक का प्रयोग न करने की सलाह देते है। साथ ही अदरक को साल भर भी नही लिया जाना चाहिये। देश के पारम्परिक चिकित्सक कहते है कि लम्बे समय तक चाय मे अदरक का प्रयोग लाभ के स्थान पर नुकसान कर सकता है। दवा को दवा की तरह ही लिया जाना चाहिये।

पारम्परिक चिकित्सक पोखरा (कमलगट्टा) और सिंघाडा को गले के लिये अति उपयोगी मानते है। उनका कहना है कि मौसम विशेष मे उपलब्ध होने वाले इन उपहारो के उपयोग का अवसर नही चूकना चाहिये।

गले के लिये अनगिनत घरेलू नुस्खे है। इस लेख मे मैने उन प्रभावी उपायो की चर्चा की जिसके बारे मे कम ही जानकारी है। आशा ही युनुस जी और उनके साथियो के लिये यह जानकारी उपयोगी सिद्ध होगी।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

1 comment:

Ram said...

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