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Friday, October 1, 2010

विविध भारती के नाटक - साप्ताहिकी 30-9-10

शुरूवाती दौर से ही नाटक विविध भारती का अभिन्न अंग रहे हैं। रेडियो नाटक के लगभग सभी रूपों का श्रोता आनंद लेते रहे हैं। विविध भारती के नाटको का फलक भी विशाल हैं, इसमे सामाजिक, ऐतिहासिक, साहित्यिक नाटक शामिल हैं। साहित्य में केवल हिन्दी ही नही, सभी भारतीय भाषाएँ और देश काल की सीमा से परे विदेशी साहित्य से भी रचे गए नाटक सुनवाए जाते हैं।

एक ओर तो इन नाटकों से सन्देश मिलता हैं, दूसरी ओर हमारी सांस्कृतिक विरासत का पता चलता हैं, इसके अलावा ऐतिहासिक घटनाओं से भी हम भली-भांति परिचित होते हैं। इन सबके साथ हास्य का विशाल सागर भी लहराता हैं जो शुद्ध मनोरंजन तो करता ही हैं साथ ही समाज पर अपनी पैनी दृष्टि से व्यंग्य भी करता हैं।

नाटकों के दो कार्यक्रम प्रसारित होते हैं हवामहल और नाट्य तरंग हवामहल रात के प्रसारण का दैनिक कार्यक्रम हैं और नाट्य तरंग सप्ताहांत यानि शनिवार और रविवार को दोपहर बाद प्रसारित होता हैं।

हवामहल बहुत ही पुराना कार्यक्रम हैं। इतना पुराना और लोकप्रिय कि लगता हैं हर रेडियो श्रोता इस कार्यक्रम से परिचित हैं। कार्यक्रम का यह नाम शायद विविध भारती के पितामह पंडित नरेंद्र शर्मा जी ने रखा हैं। इस कार्यक्रम का स्वरूप अपने दोनों ही रूपों में फिट बैठता हैं - जयपुर की शान हवामहल की तरह यह विषय को खोल कर रख देता हैं फिर चाहे पति-पत्नी की नोंक झोंक हो या प्रेम का इजहार आप सपरिवार इसका आनंद ले सकते हैं। मुहावरे की तरह यह हवाई किले भी बनाता हैं जिसमे आसमाँ की सैर भी होती हैं तो चाँद के लोग जमीन पर मिलने भी आते हैं। सबसे बढ़िया हैं इसकी गुदगुदाती संकेत धुन जो बरसों से सुन रहे हैं। हालांकि प्रसारण समय बदल गया हैं, पहले सालो तक रात 9:15 से 9:30 तक प्रसारित होता था अब पिछले कुछ वर्षो से रात 8:00 से 8:15 तक प्रसारित हो रहा हैं। अवधि 15 मिनट की ही हैं।

नाट्य तरंग अपने मूल श्रव्य नाटक रूप में प्रसारित होता हैं। इसकी प्रसारण अवधि भी आधा घंटा हैं जबकि हवामहल में नाटक के विभिन्न रूप सुनने को मिलते हैं - नाटिका, प्रहसन, झलकी। इन दोनों ही कार्यक्रमों में एक ख़ास बात हैं कि विभिन्न केन्द्रों की प्रस्तुतियां होने से देश के विभिन्न भागो की प्रतिभाओं को जानने का अवसर मिलता हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

रात 8 बजे का समय है हवामहल का, जिसकी शुरूवात हुई गुदगुदाती धुन से जो बरसों से सुनते आ रहे है। यही धुन अंत में भी सुनवाई गई।

शुक्रवार को इसकी विशिष्ट शैली से मनोरंजन हुआ। प्रहसन सुना - आसमान से टपके खजूर में अटके। पृथ्वी लोक की सैर के लिए सोच-विचार के बाद विष्णु और लक्ष्मी रात में महानगर बंबई में उतरने का निर्णय लेते हैं। उन्हें समुद्र के किनारे टहलता देख अपराधी समझा जाता हैं। गहनों से लदी लक्ष्मी जी को देख कर यह अनुमान लगाया जाता हैं कि इस स्त्री को भगा कर लाया गया हैं। पुलिस थाने में उनके संयत व्यवहार को देख कर उन्हें मनोचिकित्सक के पास भेजा जाता हैं जहां पागलखाना देख कर वे हैरान हो जाते हैं और लौट जाते हैं। संवाद में मुम्बई को बंबई कहा गया जिससे पता चलता हैं यह पुरानी रचना हैं। भोपाल केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं मक़बूल हसन और लेखक हैं आर ऐ चतुर्वेदी।

शनिवार को दिनेश भारती की लिखी नाटिका सुनी - नीलामी। फिल्मो और फिल्मी कलाकारों के प्रति दीवानगी बताई गई जिसमे बुजुर्ग भी शामिल हैं। विभिन्न फिल्मो में लोकप्रिय कलाकारों द्वारा उपयोग की गई विभिन्न चीजो की नीलामी हो रही हैं जैसे कपडे, तकिया, तावीज जिसे बढ़-चढ़ कर दाम देकर खरीद रहे हैं। नामो से भी हास्य पैदा किया गया जैसे फिल्म का नाम देसी कबूतर विलायती चोंच, नायिका का नाम चमचा चतुर्वेदी। बहुत देर से तमाशा देख रही एक बुजुर्गवार की पत्नी बाद में सबको फटकार कर दुकान बंद करवाती हैं। इलाहाबाद केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं मधुर श्रीवास्तव।

रविवार को श्रीमती मीना आनंद की लिखी झलकी सुनी - चक्कर छकाने का। कुछ ख़ास नही रही। पत्नी बच्चो के साथ रामलीला में अभिनय की बात करती हैं। पत्नी के लिए पति सरप्राइज तोहफा लाता हैं। दरवाजा भीतर से बंद हैं बहुत देर तक आवाज लगाने से भी नही खुलता। तभी पत्नी बाहर से आती हैं। पीछे के दरवाजे से भीतर कूदने पर छोटी लड़की दरवाजा खोलती हैं यानि कुम्भकरण के अभ्यास में सबको छकाती हैं। प्रस्तुति में तस्वीर आबिदी ने सहयोग दिया और निर्देशक हैं जयदेव शर्मा कमल। इस दिन एक बात अच्छी हुई कि कलाकरों के नाम भी बताए गए। हर दिन नही बताए जाते।

सोमवार को सुधा जौन की लिखी नाटिका सुनी - सिफारिश। एक कार्यालय में इंटरव्यू हैं। अफसर के घर पर उसकी माँ अपनी दूर की रिश्तेदारी से एक उम्मीदवार के लिए सिफारिश करती हैं। ऐसे ही पिता भी एक की सिफारिश करते हैं। नौकर भी एक की सिफारिश करता हैं, उसकी मित्र जिस घर में काम करती हैं, वहीं का उम्मीदवार हैं। वो लोग बतौर रिश्वत नौकर को एक नई कमीज भी देते हैं। लेकिन अधिकारी इनमे से किसी का भी चयन नही करता क्योंकि कोई भी योग्य नही हैं। वह एक योग्य उम्मीदवार का चयन करता हैं। नाटिका क्या थी, हकीक़त ही थी। वैसे अच्छा सन्देश मिला। इसे निर्देशित किया मुमताज शकील ने। बढ़िया प्रस्तुति जयपुर केंद्र से।

मंगलवार को मोहिनी जोशी की लिखी झलकी सुनी - राम मिलाई जोडी जिसके निर्देशक हैं रमेश जोशी। मैनेजर का ट्रांसफर हो गया, सभी कर्मचारी विदाई समारोह में ऐसे दुखी हैं जैसे उनका जाना बहुत दुखद हैं। विवाह की बात पक्की होने में भी वही हाल हैं, दोनों लगता हैं एक दूसरे के लिए बने। इस तरह की हैं राम मिलाई जोडी। प्रस्तुति लखनऊ केंद्र की रही।

बुधवार को सुनवाई गई झलकी - एक दिन का प्यार। यह प्यार सास-बहू का हैं। दोनों के बीच रिश्ते ठीक नही हैं। इस रिश्ते को ठीक करने के लिए ससुरजी पहल करते हैं। दोनों को अलग-अलग यह बताते हैं कि बाजार में एक नया मिट्टी का तेल (कैरोसिन) आया हैं जिसे छिड़कने के चौबीस घंटे बाद अपने आप जल जाएगा। दोनों को सलाह देते हैं छिड़कने की और चौबीस घंटे के दौरान प्यार जताने की फिर अंत में कही चले जाने की ताकि पुलिस को शक न हो। दोनों एक दूसरे के साथ ऐसा ही करते हैं। लेकिन बाद में डर जाते हैं। तब ससुरजी बताते हैं वह कैरोसिन नही गुलाब जल था। इस तरह भयंकर परिस्थिति से दो-चार होते ही अपराध बोध हो जाता हैं और आपसी प्यार हो जाता हैं। अच्छा सन्देश मिला इस झलकी से कि आपसी रिश्तों में सुधार के लिए घर-परिवार से ही किसी को पहल करनी चाहिए। दिल्ली केंद्र की इस प्रस्तुति के लेखक वी एम आनंद हैं और निर्देशक सुदर्शन कुमार हैं।

गुरूवार को झलकी सुनी - शान्ति जिसे गंगा प्रसाद माथुर ने लिखा। कवि महोदय अपनी पत्रिका शान्ति की चर्चा करते हैं और पत्नी मान लेती हैं कि उसके पति का शान्ति नाम की महिला से सम्बन्ध हैं। वह घर छोड़ने भी तैयार हो जाती हैं। विषय बहुत पुराना हैं, अब ऐसे विषयों से न मनोरंजन होता हैं न सीख मिलती हैं। हाँ, जिस समय यह झलकी लिखी गई थी तब मनोरंजन भी खूब हुआ होगा और सीख भी मिली होगी। एकाध संवाद से पता चला कि रचना बहुत पुरानी हैं या कुछ पुराने समय के बहुत कम विकसित क्षेत्र की हैं जैसे कहा गया - हमारे घर बिजली लग गई तो पड़ोसी को जलन हो गई। निर्देशिका लता गुप्ता हैं। प्रस्तुति जयपुर केंद्र की रही।

3:30 बजे नाट्य तरंग कार्यक्रम में शनिवार को कमलेश्वर की लिखी कहानी राजा निरबंसिया का अभय कुमार सिंह द्वारा किया गया रेडियो रूपांतर सुनवाया गया। नाटक में सूत्रधार कहानी को आगे बढाता रहा। दो कहानियों के माध्यम से प्राचीन और आधुनिक समय की स्थिति बताई गई। दोनों कहानियां समान हैं। बचपन में सुनी गई राजा निरबंसिया की कहानी और आज के निम्न मध्यमवर्ग के पति-पत्नी की समस्या वही हैं। पति-पत्नी के बीच आपसी विश्वास-अविश्वास, बीच में तीसरे का अहसास। अपनी कमजोरियों से ही पति उस दूसरे के साथ जीवन में आगे बढ़ता हैं। पर बाद में पत्नी पर विश्वास नही कर पाता। पुरानी कहानी में पत्नी ने अपनी पवित्रता सिद्ध कर दी थी पर आज की नारी सिद्ध नही कर पाती। वैसे पति को बाद में पश्चाताप होता हैं। आत्महत्या करते समय चिट्ठी लिखता हैं कि पत्नी के आने पर ही दाह संस्कार होगा और बेटा ही अंतिम संस्कार करेगा। यह कहानी पढ़ने में अच्छी लगती हैं पर विविध भारती पर सुनकर अच्छा नही लगा। ऐसे विषय टेलीविजन धारावाहिकों में सभी देखते हैं, अगर विविध भारती भी उसी राह पर चले तो ठीक नही लगता। यहाँ इतने परिपक्व विषय सुनने में उलझन होती हैं। यह दिल्ली केंद्र की प्रस्तुति रही।

रविवार को योगेश त्रिपाठी का लिखा नाटक प्रसारित किया गया - कैंसर जिसके निर्दशक हैं राकेश ढ़ोंढीयाल. एकदम सच्चाई, सुन कर लगा जैसे हमारे आस-पास घटने वाली कोई घटना हैं। निम्न मध्यमवर्गीय परिवार हैं। कर्ज भी ले रखा हैं। पता चलता हैं पिता को कैंसर हैं। तुरंत इलाज कराना हैं। दफ्तर से पैसा मिलने में समय लगेगा। इसीलिए विभिन्न दफ्तरों में जाकर चन्दा जमा कर इलाज करा लेते हैं। जब दफ्तर से पैसा मिलता हैं तो गाड़ी-गहने खरीद लेते हैं। कर्जदार रात को कुछ आदमियों को लेकर पैसा वसूलने आता हैं तो बेटी से छेड़छाड़ और गुंडागर्दी का आरोप लगाते हैं। इतना ही नही पुलिस में रिपोर्ट की धमकी से पैसा भी वसूलना चाहते हैं। क्योंकि अब तक वे गलत रास्ते से पैसा लेना सीख गए। भोपाल केंद्र की अच्छी प्रस्तुति रही।

2 comments:

शरद कोकास said...

हवामहल के बारे मे पढकर अपने बचपन की याद आ गई । सवा नौ से साढ़े नौ का समय , और वह संकेत धुन । मुझे ओ हेनरी की कहानी के नाट्यरूपांतरन की अब तक याद है ।
इन यादों को ताज़ा करने के लिये धन्यवाद ।

शरद कोकास said...

हवामहल के बारे मे पढकर अपने बचपन की याद आ गई । सवा नौ से साढ़े नौ का समय , और वह संकेत धुन । मुझे ओ हेनरी की कहानी के नाट्यरूपांतरन की अब तक याद है ।
इन यादों को ताज़ा करने के लिये धन्यवाद ।

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