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Friday, July 1, 2011

विविध भारती के नाटक - साप्ताहिकी 26.6.11

हर दिन विविध भारती से रेडियो नाटक के विविध रूपों - नाटक, नाटिका, प्रहसन और झलकियों का प्रसारण हुआ। कलेवर के साथ विषय में भी विविधता रही। कुछ पुरानी ऎसी समस्याएँ भी रही जो आज भी समाज में हैं जैसे घरेलु नौकर की समस्या तो कुछ आज के मुद्दों का भी उल्लेख हुआ जैसे कन्या भ्रूण को नष्ट करना और सुविधाओं के दुरूपयोग पर भी सन्देश दिए गए। साथ ही मनोरंजन तो हुआ ही एकाध बार कमजोरियां भी नजर आई।

रात 8 बजे पुराना लोकप्रिय दैनिक कार्यक्रम हवामहल अपनी चिरपरिचित गुदगुदाती धुन के साथ 15 मिनट के लिए प्रसारित हुआ। इसमें झलकी ऐसा भी होता हैं सुन कर समझ में नही आया कि इसका उद्येश्य धर्म के प्रति आस्था जगाना हैं या अंध विश्वास बढ़ाना हैं। लखनऊ केंद्र की इस प्रस्तुति में पत्नी देवी माँ की पूजा करती हैं और बच्चो को भोजन के लिए बुलाती हैं, पति को इन बातो पर विश्वास नही। तभी उनका मुन्ना छत से नीचे गिरता हैं पर केले के ठेले पर गिरने के कारण बच जाता हैं। मुन्ने के बचने को ईश्वर का आशीर्वाद बताया जाता हैं। लेखक हैं के एल यादव और निर्देशिका चंद्रप्रभा भटनागर। एक झलकी मनोरंजन के लिए प्रस्तुत की गई - झगड़े की जड़। नोक-झोंक हैं, पति को समाचार सुनना हैं और पत्नी को गाने। पत्नी अपनी सहायता के लिए मौसेरे भाई को बुला लेती हैं जो पक्का गाना गाता हैं, पति इससे तंग आकर एक शायर साहब को बुला लेते हैं जो जोर-जोर से शेर सुनाते हैं। जाहिर हैं सब तंग आ जाते हैं अंत में पत्नी समाचार सुनती हैं जिसमे बताया जाता हैं कि महिला सशक्तिकरण के लिए जो पुरूष महिला को तंग करेगा उसे सजा होगी, पति गाने सुनने का फैसला कर लेता हैं। ज्यादा मजा नही आया पर थोड़ा नयापन रहा। भोपाल केंद्र की इस प्रस्तुति को निर्देशित किया अजुमुद्दीन ने और लेखक हैं संतोष श्रीवास्तव। दिल्ली केंद्र द्वारा प्रस्तुत झलकी मिल गया नौकर में समस्या भी रही मनोरंजन भी। मैनेजर साहब नए आए हैं, पास-पड़ोस में जान-पहचान के लिए पार्टी रखी हैं। पार्टी में नौकर को एक युगल लालच देकर अपने घर ले जाने के लिए खींच रहे। महानगरो में घरेलु नौकर न मिल पाने की समस्या की यह हद हैं। इसीसे नौकरो के भी ठाठ हैं। समय पर नौकर नही पहुंचा तो वह खुद ही सर्व करने लगे। मेहमानों ने उन्हें नौकर समझ लिया। बाद में बना-ठना नौकर आया तो सबने उसे मैनेजर समझा। वी एम आनंद लेखक हैं और निर्देशक हैं कमल दत्त। अगले ही दिन दिल्ली केंद्र की दूसरी प्रस्तुति रही - सस्ता बाजार। इसमे आधुनिक मशीनी युग की हास्य झलक दिखाने की कोशिश की गई। पति की लाई हर चीज पत्नी को महंगी लगती हैं। एक बार पति ऐसे बाजार में जाता हैं जहां सब सस्ता हैं इसीसे बहुत सी चीजे खरीद लेता हैं। बाद में सपना देखता हैं कि उसे गिरफ्तार किया गया हैं और आधुनिक मशीनी युग में यह देखा जा रहा हैं कि उसने कितना वजन उठाया हैं, उसका वजन कितना हैं और ऊंचाई क्या हैं वगैरह... ममता गुप्ता की लिखी इस झलकी में बात कुछ स्पष्ट नही हुई। निर्देशक हैं विजय दीपक छिब्बर।

मूल हिन्दी रचनाओं के अलावा मराठी भाषा से भी एक रचना प्रस्तुत हुई। यह झलकी - चोरों को आना चाहिए, आमंत्रित श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत की गई थी। मूल मराठी लेखक हैं वसंत सबनीस जिसका हिन्दी रेडियो नाट्य रूपांतर किया वसंत देव ने। गहनों का बीमा करवाया जाता हैं और पति यह सोचता हैं कि गहने चोरी होने पर आज की सोने की कीमत से बीमे की रक़म का भुगतान होगा, इस तरह अच्छा लाभ मिलेगा। चोरो की प्रतीक्षा करता हैं और एक दिन चोर आते भी हैं पर नक़द रक़म पूछते हैं, जब वह गहने ले जाने की बात कहता हैं तब चोरो को लगता हैं कि गहने नकली हैं और वे बिना कुछ लिए चले जाते हैं। इसके कलाकार हैं - एस वी माखीजा, अरूण माथुर, एम एल गौड़, मंजू भाटिया। निर्देशक हैं गंगा प्रसाद माथुर और सहायिका कुमारी परवीज।

सरकारी सुविधाओं का दुरूपयोग करने वालो को सन्देश देती एक नाटिका भी अच्छी रही - इलाज। पत्नी चाहती हैं कि उसकी बीमार सहेली का इलाज पति सेना के अस्पताल में अपनी पत्नी बता कर करवा ले। मना करने पर भी वह नही मानती और कहती हैं दूर पोस्टिंग हैं, कोई पहचानेगा नही। पति उस सहेली को इलाज के लिए ले जाता हैं। बाद में सहेली के निधन की सूचना मिलती हैं। पत्नी वहां पहुंचती हैं पर इस मामले के कारण अब वह उसकी पत्नी की तरह नही जानी जाती। वहां पति के साथी उसका दूसरा विवाह कराने की तैयारी करते हैं। सगाई के दिन पता चलता हैं कि उसे सबक सिखाने के लिए यह नाटक किया गया। उचित तरीके से उस शहर में सहेली का इलाज करवाया गया जिससे वह ठीक हो गई और उसी की सगाई हैं। विविध भारती की बेहतरीन प्रस्तुति। लेखिका वीणा शर्मा और निर्देशक लोकेन्द्र शर्मा।

पटना केंद्र द्वारा प्रस्तुत प्रहसन सुना - चाँद का टुकड़ा। मजेदार रहा। बिना लड़की देखे, बिना तस्वीर देखे, केवल अपने दोस्त से तारीफ़ सुन शादी कर ली। उसे जीवन में सरप्राइज का बहुत शौक हैं। पहली बार पत्नी को देख कर तारीफ़ में कहा चाँद का टुकड़ा और वह रोने लगी और बताया कि उसने गाँव में लाइब्रेरी में पढ़ा हैं कि चाँद पर बहुत गड्ढे हैं यानि वह बदसूरत हैं। इस तरह उसे बदसूरत कहा गया। बाद में कविता के चाँद से स्थिति ठीक हुई। लेखिका हैं पुष्पा चोपड़ा और निर्देशक सत्य सहगल।

शनिवार और रविवार को दोपहर 3:30 बजे आधे घंटे के लिए प्रसारित हुआ कार्यक्रम नाट्य तरंग। शनिवार को अजीमुद्दीन का लिखा नाटक सुना - अंधा मोड़। तनाव में आत्म ह्त्या करने पहुंचे दोनों एक दूसरे से अपनी व्यथा कहते हैं। लड़की सौतेली माँ से तंग हैं। प्रेम विवाह करती हैं पर वहां भी अपनापन नही मिलता यहाँ तक कि पति का व्यवहार भी बदल जाता हैं। यहीं, लड़कियों की इस स्थिति के साथ ही कन्या भ्रूण को नष्ट करने का भी उल्लेख हुआ। पुरूष अपनी कहानी बताता हैं कि शराब की लत से सब कुछ बर्बाद कर चुका। अंत में बहन ने नई जिन्दगी शुरू करने के लिए रूपए दिए जिसे भी वह घुड़दौड़ में हार गया। अब दोनों मिलकर एक नई जिन्दगी शुरू करने का निर्णय लेते हैं। राकेश ढौनढीयाल के निर्देशन में भोपाल केंद्र की अच्छी रही प्रस्तुति।

रविवार को प्रसिद्ध हिन्दी लेखक कमलेश्वर की कहानी राजा निरबंसिया का अभय कुमार सिंह द्वारा किया गया रेडिओ नाट्य रूपांतर सुनवाया गया जिसके निर्देशक हैं विजय दीपक छिब्बर। पहले भी बहुत बार सुनवाया जा चुका हैं और हम साप्ताहिकी में लिख भी चुके हैं। नारी आज के दौर में अपना सतित्व सिद्ध नही कर पाती लेकिन पति को अहसास हो सकता हैं। अच्छा तो हैं पर बहुत बार सुन चुके हैं, साहित्य से कुछ और प्रेरणादायी रचनाएं सुनना चाहते हैं। प्रस्तुति दिल्ली केंद्र की रही।

चलते-चलते हम आपको बता दे कि यह सभी कार्यक्रम हमने हैदराबाद में एफ़ एम चैनल पर 102.8 MHz पर सुने।

2 comments:

डॉ. अजीत कुमार said...

अन्नपूर्णा जी, आपने विविध भारती से प्रसारित नाटकों , झलकियों की विवेचना की.. पढ़ कर अच्छा लगा. सारे नाटकों पर एक समान पैनी नजर.
अगर कोई माँ देवी की पूजा करती है और उसका बच्चा चाट से गिरकर भी बच जाता है तो इसमें मेरे हिसाब से इसमें श्रद्धा की झलक मिलती है ना की अंधविश्वास की.

नीरज गोस्वामी said...

कोई ज़माना था जब रात नौ बजे 'हवा महल' सुनने के लिए इंतज़ार किया करते थे. हंसी मज़ाक से भरपूर नाटिकाएं /झलकियाँ सुनने को मिलती थी. मुझे दीनानाथ जी बहुत याद आते हैं जिनका 'कसम उड़ान झल्ले की' जुमला हम लोगों के मुंह चढ़ा हुआ था. विनोद शर्मा आदि की आवाज़ अब भी कानों में गूंजती है...अब न वैसा हवा महल रहा न वैसी प्रस्तुतियां...जाने कहाँ गए वो दिन...

नीरज

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