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Monday, June 13, 2016

बेल के पतउआ द्वैै- पत्‍ता पत्‍ता बूटा बूटा दसवीं कड़ीी--शुभ्रा शर्मा


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दोस्तो! इन दिनों भीषण गर्मी पड़ रही है। ऐसी गर्मी कि सेनापति का वह पद बरबस याद आ जाता है -
बृष को तरनि तेज सहसों किरनि कर 
ज्वालनि के जाल बिकराल बरसतु है। 
मेरे जान पवनौ पकरि सीरी छाँह कौनो 
घरी एक बैठि कहीं घामै बितिवतु है। 

यानी वृष राशि का सूर्य अपनी हज़ार-हज़ार किरणों के हाथों से ज्वालाओं के जाल बरसा रहा है। इतनी गर्मी में लोगों की तो बिसात ही क्या, हवा की भी बाहर निकलने की हिम्मत नहीं पड़ रही। मुझे तो ऐसा लगता है कि वह भी कहीं छाँह में बैठकर दोपहर बीतने का इंतज़ार कर रही है। 
चढ़ती गर्मी के दिन होते तो आम के पन्ने से या फालसे के शरबत से तपन कम की जा सकती थी लेकिन अब आम पाक चुके हैं और फालसा ग़ायब हो चुका है। अब तो राहत के दो ही साधन हैं - तरबूज़ या बेल। 
हमारे बचपन में आजकल की तरह छोटे-छोटे तरबूज़ नहीं मिलते थे। तरबूज़ का मतलब ही होता था एक ऐसा भारी-भरकम फल जो हमसे उठाये न उठे। ऊपर से घर वालों ने कटा हुआ तरबूज़ हरगिज़ न खाने की हिदायत कुछ इस तरह ठोंक-ठोंक कर दिमाग़ में भर रखी थी कि हम लाल-हरे तरबूज़ की तरफ़ देखने से भी डरते थे कि कहीं हैजे के कीटाणु हमारी ललचाई नज़र पढ़कर हमारे पीछे न चले आयें। 
कोई बच्चा अगर स्कूल से उल्टी करता घर आता तो उससे पहला सवाल यही पूछा जाता था - कटा तरबूज़ तो नहीं खाया था?
और अगर कहीं इसका जवाब हाँ में होता, तब तो उस बेचारे की खैर नहीं थी। 
ले-दे कर एक इकलौता बेल बचता था, जो उल्टी-दस्त के मरीज़ तक को मिल जाता था। लगभग हर दिन हमें बेल के फ़ायदे बताये जाते और खाने का हुक्म जारी होता। हमारे घर में कोई सज्जन गर्मी के दिनों में बोरा भर बेल भेज देते थे। उन बेलों को कच्चे-पक्के के क्रम से सजाकर रख दिया जाता था। दोपहर का खाना निपटते ही बड़े एहतियात से बेल की ताज़ातरीन टोकरी कूलर वाले कमरे में लायी जाती।  

                                          





मेरी नानी उसमे से दो बेल चुनतीं। एक तत्काल खाने के लिए फोड़ा जाता और दूसरे का गूदा शाम के शरबत के लिए पानी में भिगो दिया जाता। बेल के छिलके को ही प्लेट और चम्मच बनाकर हमें थमा दिया जाता और "मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी" समझकर हमें खाना भी पड़ता। 
शाम को नानी अपने हाथों से शरबत बनातीं और हर बच्चे को उसके गले की स्थिति के अनुसार बर्फ़ डालकर या बिना बर्फ़ का शरबत पकड़ा देतीं। मेरा गला अकसर ख़राब रहता इसलिए मुझे बर्फ़ पाने के लिए बहुत सी दलीलें पेश करनी पड़ती थीं। ज़्यादातर केस मैं हार जाती थी लेकिन कहीं अगर जीत जाऊँ तो उस एक टुकड़ा बर्फ़ वाले बेल के शरबत का स्वाद ....... "बरनि न सकहिं सारदा सेस"। वाणी की देवी शारदा और सौ मुख वाले शेषनाग भी उसका वर्णन नहीं कर सकते, मैं क्या और मेरी सामर्थ्य क्या?  


                     

बाद में जाना कि बेल का फल किसी भी रूप में खाया-पिया जाये, वास्तव में बहुत गुणकारी होता है। पेट के सभी रोगों का तो इलाज है ही, साथ में ख़ून के विकार दूर करने और डायबिटीज़ कम करने में भी मदद करता है। साँस और गुर्दे की तकलीफ़ों से भी छुटकारा दिलाता है। तब समझ में आया कि क्यों हमें रोज़ खपड़े सहित बेल पकड़ा दिया जाता था और क्यों हमें उसके फ़ायदों का दैनिक लेक्चर सुनाया जाता था - ताकि हम इस परंपरा को अपने बच्चों को सौंप कर पूर्वजों के ऋण से मुक्त हो सकें।  परम्परा तो हमें यह भी बताती है कि बेल-पत्र चढ़ाये बिना शिव की पूजा अधूरी रहती है। शिव की मानस पूजा में बिल्व-पत्र का उल्लेख है। मैंने बनारस में शिव रात्रि के अवसर पर लोगों को 108 पत्तों पर चन्दन से "ॐ नमः शिवाय" लिखकर चढ़ाते देखा है।         



                     
बनारस से कुछ दूर गंगा-गोमती संगम पर एक बहुत प्राचीन मार्कण्डेश्वर महादेव का मंदिर है। वहाँ शिवरात्रि पर बड़ा मेला लगता है। इतनी भीड़ हो जाती है कि गर्भगृह तक पहुँचना असम्भव हो जाता है। लोग-बाग कुल्हड़ में लाया गंगाजल और बेल-पत्र दूर से फेंककर मारते हैं। पूरा गर्भगृह बार-बार उन ठीकरों से भरता रहता है और पुजारी लोग बार-बार फावड़े से उसे खाली करते रहते हैं। भीड़ उमड़ती रहती है और शिव जी पर कुल्हड़ बरसाती रहती है। दूसरा कोई देवता हो तो भीड़ की इस बदतमीज़ी पर भड़क जाये। लेकिन हमारे भोले बाबा को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। उनकी हर बात निराली है। दूसरे देवी-देवताओं को जहाँ एक से एक सुन्दर और सुगन्धित फूल पसंद हैं - वहीँ आप जनाब को क्या पसंद है? बेल का पत्ता और आक-धतूरे के फूल। वो भी बड़ी श्रद्धा भावना से चढाने की ज़रुरत नहीं। जाने-अनजाने चढ़ा दो, गुस्से से फेंक दो, खेल-खेल में फेंक दो - उनको सब चलता है। हमारी बात का विश्वास न हो तो तुलसी बाबा की बात तो सच मानेंगे आप। उन्हीं से सुनिये -

स्यंदन,गयंद,बाजिराज,भले भले भट 
धन धाम-निकर करनि हू न पूजै क्वै। 
बनिता बिनीत, पूत पावन सोहावन औ 
बिनय बिबेक बिद्या सुलभ, सरीर ज्वै।।  
इहाँ ऐसो सुख परलोक सिवलोक ओक 
जाको फल तुलसी सो सुनौ सावधान ह्वै। 
जाने, बिनु जाने, कै रिसाने, केलि कबहुँक 
सिवहि चढ़ाये ह्वैहैं बेल के पतउआ द्वै।।                                                                         

कहने का मतलब यह कि बेल के दो पत्ते किसी तरह उन तक पहुँचा दीजिये, उसके बदले वे इस जीवन में रथ, हाथी-घोड़े, वीर सैनिक, धन-धान्य, कई-कई मकान, विनीत पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र, सुन्दर शरीर, विनय, विवेक, विद्या और भरपूर सुख देते हैं और मृत्यु के बाद शिवलोक में स्थान देते हैं। 
और मान लीजिए बेल का पेड़ ऊँचा हो गया हो, उसके पत्ते आपकी पहुँच से बाहर हो गए हों तो घर के बाहर निकलकर देखिये - आक-धतूरे के पौधे तो मिल ही जायेंगे। वही चढ़ा दीजिये। उनसे भी काम सिद्ध हो जायेगा -
इहाँ ऐसो सुख, सुरलोक सुरनाथ पद 
जाको फल तुलसी सो कहैगो बिचारि कै। 
आक के पतउआ चारि, फूल कै धतूरे के द्वै   
दीन्हे ह्वैहैं बारक पुरारि पर डारि कै।  

शिव जी के इस अवढरदानी स्वभाव से बेचारे ब्रह्मा जी बड़े परेशान हैं। तंग आकर पार्वती से शिकायत करते हैं कि देवि! तुम्हारा यह पति तो निरा बावला है। ऐसा दानी है कि जिन लोगों ने कोई अच्छे कर्म नहीं किये उन्हें भी देता रहता है। इससे वेद की मर्यादा नष्ट होती है। जिसके भाग्य में मैंने सुख की कोई निशानी तक नहीं लिखी है, ऐसे रंकों को स्वर्ग भेजते-भेजते मेरी नाक में दम हो गया है। 
बावरो रावरो नाह भवानी। 
दानि बड़ो दिन देत दये बिनु, बेद-बड़ाई भानी।। 
जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुख की नहीं निसानी 
तिन रंकन को नाक सँवारत हौं आयो नकबानी।।
 

7 comments:

Abhishek Bhadauria said...

madam sahi me jaise moti piroye jate h bas waise hi aap shabd piroti ho.
awesome....
dictionary khol li h aapke liye koi naya or aur acha word bolne k liye.

Deepika Joshi said...

बहुत ही मार्मिक चित्रण। बेल तो हमें भी बचपन में खाने पड़े और आप की ही तरह। मामाजी के यहाँ और वो भी गुड का शर्बत बना कर। शक्कर बहुत महगी थी ना ।आप ने तो बचपन में पहुचा दिया। बहुत खूब।

Deepika Joshi said...

बहुत ही मार्मिक चित्रण। बेल तो हमें भी बचपन में खाने पड़े और आप की ही तरह। मामाजी के यहाँ और वो भी गुड का शर्बत बना कर। शक्कर बहुत महगी थी ना ।आप ने तो बचपन में पहुचा दिया। बहुत खूब।

Shubhra Sharma said...

Suman Sharma :
You are doing a wonderful job. श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी से अधिक कुबेरनाथ राय के विषाद योग के ललित निबंध मुकुलोद्गम के बहुत करीब है आपकी यह रचना।

Shubhra Sharma said...

कुबेर नाथ जी का ललित निबंध कल दिन में फिर पढूँगी। अभी तो बस इतना ही कहूँगी कि कहाँ विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय सरीखे उद्भट विद्वान और कहाँ मैं! हाँ, श्रीलाल शुक्ल जी की तरह चुटकी लेने की आदत ज़रूर है लेकिन 'राग दरबारी' का पासंग भर भी लिख पाऊँ तो सबसे पहले आपको धन्यवाद दूँगी - हौसला बढ़ाने के लिए। धन्यवाद सुमन जी।

Shubhra Sharma said...

L.K.Pande :
वाह ! बहुत ही सुन्दर लिखती हो !
शब्द शब्द से रस झरता है ...
बहुत स्नेहाशीष !

Shubhra Sharma said...

Sarita Lakhotia :
Beauuuutiful Shubhra.... Aaj ka Lekh maine apne Poteram ke saath padha....He enjoyed... Banaras me Bel khane aur pine ka riwaaj bachpan se dekhti aa rahi hoon aur ham sab iska paalan bhi karte aaye hain.....mujhe aaj bhi iske samaan doosra Shrbat nahi lagta..... aur phalse ke to kya kahane !! Sharbat ka rang...uska swaad...sugandh !! sab Man ko andar tak aalhadit kar de !! Garmi door bhagane ke Prakriti ne naayaab tohafe bhent kiye hain....aushdhiya gunon ke saath !! Ab aaj ki generation ke paas itna vakt kahan ki Bel laaye....fode...bhingaye....chaane....:(
Phir bhi tumhara aalekh padh kar kuch Young logon ko subuddhi aa jaye to Shiv ji prasann honge......:)

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