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Monday, June 6, 2016

पत्‍ता पत्‍ता बूटा बूटा नौंवी कड़ी- नारियल



साठ और सत्तर के दशक में जवान हो रहे लड़कों के दिल परदे पर मुमताज़ को देखते ही दुगनी-तिगनी रफ़्तार से
धड़कने लगते थे। हमारे भी वो स्कूल-कॉलेज के दिन थे और मुम्मू हमें भी बहुत पसंद थीं। बहुत से शादी-ब्याह, मुंडन-जनेऊ, समारोहों में हमने भी लहक-लहक कर "बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी" और "कोई शहरी बाबू दिल लहरी बाबू" गाया और सहेलियों को नचाया। जितेन्द्र और राजेश खन्ना के साथ उनकी जोड़ी खूब जमती थी। इसके अलावा, उन्होंने मनोज कुमार, धर्मेन्द्र और शशि कपूर के साथ भी काम किया और एक से बढ़कर एक अविस्मरणीय गीत दिये। जैसे फिल्म 'चोर मचाये शोर' का वह गीत, जिसके बिना हर ब्याह-बरात अधूरी-सी लगती है, और जिससे शीर्षक उधार लेकर बनी फ़िल्म, कल्ट स्टेटस पा चुकी है।
ले जायेंगे, ले जायेंगे दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे।


मुमताज़ की एक विशेष बात यह भी थी कि वे शायद ही किसी फ़िल्म में महज़ सजावट का सामान रही हों। ज़्यादातर फ़िल्मों में उन्होंने मेहनत करके अपनी रोज़ी-रोटी ख़ुद कमाने वाली और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाली लड़की की भूमिकायें निभाईं। कभी कारख़ाने की मज़दूर बनीं तो कभी पुलिस जासूस, कभी ढाबेवाली तो कभी बाइस्कोप वाली। कभी नारियल पानी बेचती नज़र आयीं -
ले लो रे ले लो बाबू पी लो नारियल पानी।

गरमी की तपती दुपहरी में ठंडा नारियल पानी कितनी राहत देता है
, ये मैंने दो बरस पहले गोआ में जाना। मेरी बड़ी बुआ की बेटी वास्को में रहती हैं। मैंने उनसे मंगेश और शांतादुर्गा मंदिर ले जाने का अनुरोध किया था। मेज़बान के तौर पर मंजू जीजी और मेहमान के तौर पर मैं इतने अति उत्साह में आ गये कि आठ बजे से तीन बज गये और हमें खाने-पीने की याद ही नहीं आयी। मंगेश मंदिर के परिक्रमा पथ पर पैर बुरी तरह जलने लगे तब घड़ी की सुध आयी। चप्पल पहन रहे थे तो पास में बने तालाब और उसके किनारे नारियल के पेड़ों ने मन मोह लिया। वहीँ एक महिला ताज़े नारियलों का ढेर लगाये बैठी थी। मंजू जीजी ने चुनकर दो नारियल लिये। हमने उनका पानी पिया और फिर मलाई खायी। यकीन जानिये बिलकुल ऐसा लगा जैसे भर पेट खाना खा लिया हो।





नारियल का पानी और गिरी ही नहीं, फूल, छिलके, पत्ते और तना सब कुछ इंसान के काम आता है। बचपन में खजूर के बारे में एक दोहा पढ़ा था -

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।


लेकिन खजूर के साथ रूप-साम्य के बावजूद उसके बेकार होने वाली बात नारियल के पेड़ पर लागू नहीं होती क्योंकि उसके नीचे भले ही हमें नीम या बरगद जैसी छाँह न मिले, लेकिन उसके पानी से प्यास बुझा सकते हैं, फल से भूख मिटा सकते हैं, पत्तों से छप्पर छा सकते हैं, रेशों से रस्सी और ढेरों अन्य चीज़ें बना सकते हैं और तनों को एक साथ बाँधकर कामचलाऊ नाव बना सकते हैं। गुजरात से लेकर बंगाल तक के साधारण किसान के पास अगर नारियल के पेड़ और पोखर में पानी हो तो वह भूखों नहीं मर सकता। देश की लगभग छह हज़ार किलोमीटर लंबी तटरेखा नारियल के पेड़ों से संरक्षित है। ये न सिर्फ़ मिट्टी का कटाव रोकते हैं बल्कि खोपरा और कॉयर उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल भी उपलब्ध कराते हैं। 




तटवर्ती राज्यों के खानपान में नारियल का ख़ूब इस्तेमाल होता है। शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह की व्यंजन विधियों में कच्चे या सूखे नारियल का प्रयोग स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य की भी वृद्धि करता है।


समुद्र तट के अलावा अन्य राज्यों में भी नारियल की प्रतिष्ठा है। कोई भी पूजा, हवन, यज्ञ, बिना नारियल के संपन्न नहीं होते। हवन की पूर्णाहुति हमेशा नारियल होम कर की जाती है।  नई बहू को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देने के लिये उसकी गोद पाँच तरह के मेवों से भरी जाती है। इनमें नारियल का होना अनिवार्य है। गर्भवती स्त्री को मिश्री के साथ नारियल की गिरी खाने की हिदायत दी जाती है, ताकि बच्चा गोरा हो।



बचपन में आपने वह पहेली ज़रूर बूझी-बुझवाई होगी -
कटोरे पे कटोरा
बाप बेटे से गोरा।

इसी तरह नारियल के बारे में संस्कृत में भी एक पहेली है -

वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजस्त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः।

त्वग्वस्त्रधारी न  च  सिद्धयोगी  जलं  च  विभ्रन्न घटो  न  मेघः।।

यानी पेड़ की फुनगी पर रहता है लेकिन पक्षी नहीं है, तीन आँखें होती हैं लेकिन शिव नहीं है, छाल से ढँका रहता है लेकिन सिद्धयोगी नहीं है, और जल से भरा रहता है लेकिन न तो घड़ा है और न बादल। नारियल पेड़ की फुनगी के पास लगता है, जटा-जूट से ढँका रहता है, जटायें उतारने पर जो कड़ा छिलका निकलता है उस पर तीन निशान होते हैं, जो तीन आँखों जैसे लगते हैं। 






अगर चित्र बना सकती तो आपको नारियल बाबा का चित्र बना कर दिखाती। पर क्या करूँ, बचपन से ही सिलाई-कढ़ाई और ड्राइंग में मेरा हाथ ज़रा तंग है। मुश्किल से पास होती थी। तब मेरी गुरु यही मंजू जीजी थीं। मुझे गोआ में उनका घर बहुत पसंद आया। घर का अहाता बहुत बड़ा तो नहीं है पर जीजी ने उसमें लॉन और फूलों के साथ आम और नारियल के पेड़ लगा रखे हैं। सुपारी का पेड़ औऱ पान की बेल भी है। पान-सुपारी को अपने प्राकृतिक परिवेश में देखकर मेरी तबियत खिल उठी। लेकिन जीजाजी के सामने पान-तम्बाखू खाने में ज़रा झिझक होती थी, इसलिये जीजी खाने के बाद मुझे बाहर टहलने का हुकुम सुनातीं और मैं बेल से पान तोड़कर, उसी में ज़र्दा- मसाला लपेटकर अपना बनारसी शौक़ पूरा कर लेती थी।


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