जयमाला में सोमवार से शुक्रवार तक फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर फ़िल्मी गीत सुनवाए जाते है। कार्यक्रम के अंत में देश भक्ति गीत सुनवाया जाता है जो फ़रमाइशी नहीं होता। इस फ़िल्मी देश भक्ति गीत के पहले और बाद में सलाम इंडिया की उदघोषणा के साथ विशेष संगीत भी बजता है।
यह फ़िल्मी देश भक्ति गीत 15 अगस्त और 26 जनवरी के साथ-साथ और भी कुछ अवसरों पर सुनवाए जाते है। मेरा सुझाव है कि इन फ़िल्मी देश भक्ति गीतों की जगह फ़ौजी भाइयों के गाए गीत सुनवाए जा सकते है।
सेना का अपना बैंड होता है। उनके द्वारा तैयार किए गए गीत भी होते है। मुझे याद आ रहा है एक पुराना गीत -
नौजवानों भारत की तस्वीर बना दो
फूलों के इस गुलशन से काँटों को हटा दो
गीतों के अलावा कुछ धुनें भी फ़ौजी बैंड द्वारा तैयार की जाती है। कई बार परेड ग्राऊंड पर सुनने को मिली विशेष अवसरों पर बजाई गई इस क़ौमी तराने की धुन -
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
कुछ मार्च पास्ट की धुनें भी होती है। अगर सप्ताह में कम से कम एक दिन फ़ौजी भाइयों से इन गीतों और धुनों को सुनवाया जाए तो फ़ौजी भाइयों की कला से भी हम श्रोता परिचित होंगें।
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Friday, May 9, 2008
Thursday, April 24, 2008
कला और सैन्य शक्ति का संगम
कल रात जयमाला के बाद हमेशा की तरह बुधवार को प्रसारित होने वाला साप्ताहिक कार्यक्रम इनसे मिलिए सुना। सीमा सुरक्षा बल के डिप्टी कमान्डेंट आर एन राय से भेंट वार्ता की अशोक (सोनावले) जी ने।
सहज स्वाभाविक बातचीत थी। सेना में आने का इरादा और भर्ती से लेकर बातचीत में व्यक्तिगत जीवन की भी झलकियाँ मिली। इससे एक संगम की झलक मिली - कला और सैन्य शक्ति का संगम।
आखिर बंगाल है ही रविन्द्रनाथ टैगोर और सुभाष चन्द्र बोस की भूमि। एक ओर कला तो दूसरी ओर सेना पर दोनों के मूल में है देश भक्ति। आज भी सेना में यह देखने को मिलता है।
राय साहब ने सेना के बैंड और धुनों के बारे में भी बताया कि कैसे अभ्यास किए जाते है। कैसे यह सब उनके कार्यक्रमों का एक हिस्सा होते है।
राय साहब ने बताया कि उनके पिता संगीत से जुड़े थे। फिर उन्होनें बताया कि कैसे उनकी नौकरी में विविध भारती उनका साथी रहा। अशोक जी ने जयमाला के बारे में भी बात की। किसी फ़ौजी से जयमाला के बारे में बहुत ही कम सुनने को मिलता है वरना फ़िल्म वाले ही इस बारे में बात करते है।
सीमा सुरक्षा से संबंधित काम की भी उन्होनें जानकारी दी। प्रशिक्षण के बारे में बताया। कुल मिलाकर बातचीत सभी पहलुओं को छूती हुई श्रोताओं को कुछ अधिक जानकार बना गई।
मैनें इस कार्यक्रम में पहली बार किसी फ़ौजी अफ़सर से बातचीत सुनी। लगता है विविध भारती की टीम द्वारा की गई जैसलमेर की यात्रा का यह एक अंश है। क्या वहाँ विशेष जयमाला की भी रिकार्डिग की गई ? क्या कमल (शर्मा) जी ने फ़ौजी भाइयों के जयमाला संदेश भी रिकार्ड किए ? क्या आने वाले दिनों में यह सब हम सुन पाएगें ?
सहज स्वाभाविक बातचीत थी। सेना में आने का इरादा और भर्ती से लेकर बातचीत में व्यक्तिगत जीवन की भी झलकियाँ मिली। इससे एक संगम की झलक मिली - कला और सैन्य शक्ति का संगम।
आखिर बंगाल है ही रविन्द्रनाथ टैगोर और सुभाष चन्द्र बोस की भूमि। एक ओर कला तो दूसरी ओर सेना पर दोनों के मूल में है देश भक्ति। आज भी सेना में यह देखने को मिलता है।
राय साहब ने सेना के बैंड और धुनों के बारे में भी बताया कि कैसे अभ्यास किए जाते है। कैसे यह सब उनके कार्यक्रमों का एक हिस्सा होते है।
राय साहब ने बताया कि उनके पिता संगीत से जुड़े थे। फिर उन्होनें बताया कि कैसे उनकी नौकरी में विविध भारती उनका साथी रहा। अशोक जी ने जयमाला के बारे में भी बात की। किसी फ़ौजी से जयमाला के बारे में बहुत ही कम सुनने को मिलता है वरना फ़िल्म वाले ही इस बारे में बात करते है।
सीमा सुरक्षा से संबंधित काम की भी उन्होनें जानकारी दी। प्रशिक्षण के बारे में बताया। कुल मिलाकर बातचीत सभी पहलुओं को छूती हुई श्रोताओं को कुछ अधिक जानकार बना गई।
मैनें इस कार्यक्रम में पहली बार किसी फ़ौजी अफ़सर से बातचीत सुनी। लगता है विविध भारती की टीम द्वारा की गई जैसलमेर की यात्रा का यह एक अंश है। क्या वहाँ विशेष जयमाला की भी रिकार्डिग की गई ? क्या कमल (शर्मा) जी ने फ़ौजी भाइयों के जयमाला संदेश भी रिकार्ड किए ? क्या आने वाले दिनों में यह सब हम सुन पाएगें ?
Thursday, March 6, 2008
फ़ौजी बहन क्यों नहीं ?
इस सप्ताह अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। यह समय है अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की छवि के लेखा-जोखे का। विविध भारती ने भी अपने मंथन कार्यक्रम में ऐसी ही परिचर्चा का आयोजन किया है। तो क्यों न आज इस चिट्ठे पर इसी विषय पर चर्चा की जाए ?
इसी सप्ताह प्रसारित जुबली झंकार कार्यक्रम में जैसलमेर के फ़ौजी भाइयों की धूम थी। उन्हीं परिवारों के बीच सखि-सहेली कार्यक्रम भी रचा गया और जब इसकी चर्चा मैंनें अपने पिछले चिट्ठे में की तो वहां स्पष्ट रूप से मैनें लिखा था कि कार्यक्रम में कुछ अधूरापन है। आज चर्चा करेंगे इसी अधूरेपन की।
सखि-सहेली की शुरूवात में कंपनी कंमाडर की पत्नी से बातचीत हुई। पत्नी जी ने अपने पति महोदय के कारनामे बताए कि कैसे वो कंपनी को कमांड करते है। क्या ही अच्छा होता यदि महिला खुद अपने सैन्य कारनामों की बात करती। क्या जैसलमेर में एक भी महिला सैनिक किसी भी पद पर विराजमान नहीं है ?
अगर ऐसा ही है तो कितना अच्छा लगता कि सखि-सहेली जैसे कार्यक्रम की शुरूवात ही इस बात से की जाती कि यहां एक भी सखि-सहेली इस क्षेत्र में कार्यरत नहीं है। इसीलिए यह कार्यक्रम महिला सैनिकों के बजाय उनकी पत्नियों के साथ किया जा रहा है।
बात सिर्फ़ इसी कार्यक्रम की नहीं है। जयमाला सबसे पुराना कार्यक्रम है विविध भारती का।
पचास के दशक से शुरूवात हुई इस कार्यक्रम की। साठ के दशक में चीन से सत्तर के दशक में पाकिस्तान से और कुछ ही वर्ष पहले कारगिल में भी हमारा युद्ध हुआ।
हर युद्ध में किसी न किसी स्तर पर सेना में महिलाओं की भागीदारी रही है। चाहे वे सेना में कर्नल मेजर जैसे पदों पर हो या डाक्टर हो या रेड क्रास जैसी संस्था से जुड़ कर सेना के लिए काम करती हो।
जिस उद्येश्य को लेकर जयमाला की शुरूवात हुई वहां एक सैनिक के रूप में महिलाओं की छवि ज़रूर रही होगी क्योंकि उस समय नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के सैन्य संगठन का स्वरूप सामने ज़रूर रहा होगा। फिर उनकी दुर्गा वाहिनी को कैसे भुला दिया गया।
जिस दुर्गा वाहिनी की कैप्टन लक्ष्मी सहगल रही हो जिसकी चर्चा हाल ही में देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति के लिए की गई। आज भी कई महिलाएं छोटे-बड़े विभिन्न पदों पर सेना में है फिर भी शुरू से लेकर आज तक जयमाला का संबोधन फ़ौजी भाई ही है। फ़ौजी भाई-बहन कभी नहीं रहा।
यहां तक कि विशेष जयमाला में आने वाले मेहमान भी फ़ौजी भाई ही कहते है और बातें भी भाइयों के लिए ही करते है। कभी फ़ौजी बहनों के लिए कोई बात नहीं कहीं गई।
हर रविवार को प्रसारित होने वाले जयमाला संदेश में भी फ़ौजी भाई अपने परिवार को संदेश भेजते है और परिवार वाले फ़ौजी भाइयों को। क्या किसी फ़ौजी बहन को अपने परिवार की याद नहीं आती ? क्या परिवार वाले भी अपनी बेटियों को फ़ौज में भेजने के बाद उनकी सुध नहीं लेते ? किसी भी परिवार ने आज तक इस कार्यक्रम में अपनी फ़ौजी बेटी को संदेश नहीं भेजा।
बचपन से मैं सुनती आई हूं जयमाला में रोज़ फ़रमाइश करने वाले फ़ौजी भाइयों के नाम पर कभी किसी बहन का नाम नहीं सुना। लगता है फ़ौजी बहनें अपने साथियों के पसन्द किए गए गीतों को सुनकर ही ख़ुश हो जाती है।
महिला दिवस की रौनक तो तब और बढ जाएगी जब महिला सैनिक अपने अनुभव सुनाएगी। तभी माना जाएगा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की ताक़त को और तभी जयमाला के फूलों की सुगन्ध भी विश्व भर में फैल पाएगी।
इसी सप्ताह प्रसारित जुबली झंकार कार्यक्रम में जैसलमेर के फ़ौजी भाइयों की धूम थी। उन्हीं परिवारों के बीच सखि-सहेली कार्यक्रम भी रचा गया और जब इसकी चर्चा मैंनें अपने पिछले चिट्ठे में की तो वहां स्पष्ट रूप से मैनें लिखा था कि कार्यक्रम में कुछ अधूरापन है। आज चर्चा करेंगे इसी अधूरेपन की।
सखि-सहेली की शुरूवात में कंपनी कंमाडर की पत्नी से बातचीत हुई। पत्नी जी ने अपने पति महोदय के कारनामे बताए कि कैसे वो कंपनी को कमांड करते है। क्या ही अच्छा होता यदि महिला खुद अपने सैन्य कारनामों की बात करती। क्या जैसलमेर में एक भी महिला सैनिक किसी भी पद पर विराजमान नहीं है ?
अगर ऐसा ही है तो कितना अच्छा लगता कि सखि-सहेली जैसे कार्यक्रम की शुरूवात ही इस बात से की जाती कि यहां एक भी सखि-सहेली इस क्षेत्र में कार्यरत नहीं है। इसीलिए यह कार्यक्रम महिला सैनिकों के बजाय उनकी पत्नियों के साथ किया जा रहा है।
बात सिर्फ़ इसी कार्यक्रम की नहीं है। जयमाला सबसे पुराना कार्यक्रम है विविध भारती का।
पचास के दशक से शुरूवात हुई इस कार्यक्रम की। साठ के दशक में चीन से सत्तर के दशक में पाकिस्तान से और कुछ ही वर्ष पहले कारगिल में भी हमारा युद्ध हुआ।
हर युद्ध में किसी न किसी स्तर पर सेना में महिलाओं की भागीदारी रही है। चाहे वे सेना में कर्नल मेजर जैसे पदों पर हो या डाक्टर हो या रेड क्रास जैसी संस्था से जुड़ कर सेना के लिए काम करती हो।
जिस उद्येश्य को लेकर जयमाला की शुरूवात हुई वहां एक सैनिक के रूप में महिलाओं की छवि ज़रूर रही होगी क्योंकि उस समय नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के सैन्य संगठन का स्वरूप सामने ज़रूर रहा होगा। फिर उनकी दुर्गा वाहिनी को कैसे भुला दिया गया।
जिस दुर्गा वाहिनी की कैप्टन लक्ष्मी सहगल रही हो जिसकी चर्चा हाल ही में देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति के लिए की गई। आज भी कई महिलाएं छोटे-बड़े विभिन्न पदों पर सेना में है फिर भी शुरू से लेकर आज तक जयमाला का संबोधन फ़ौजी भाई ही है। फ़ौजी भाई-बहन कभी नहीं रहा।
यहां तक कि विशेष जयमाला में आने वाले मेहमान भी फ़ौजी भाई ही कहते है और बातें भी भाइयों के लिए ही करते है। कभी फ़ौजी बहनों के लिए कोई बात नहीं कहीं गई।
हर रविवार को प्रसारित होने वाले जयमाला संदेश में भी फ़ौजी भाई अपने परिवार को संदेश भेजते है और परिवार वाले फ़ौजी भाइयों को। क्या किसी फ़ौजी बहन को अपने परिवार की याद नहीं आती ? क्या परिवार वाले भी अपनी बेटियों को फ़ौज में भेजने के बाद उनकी सुध नहीं लेते ? किसी भी परिवार ने आज तक इस कार्यक्रम में अपनी फ़ौजी बेटी को संदेश नहीं भेजा।
बचपन से मैं सुनती आई हूं जयमाला में रोज़ फ़रमाइश करने वाले फ़ौजी भाइयों के नाम पर कभी किसी बहन का नाम नहीं सुना। लगता है फ़ौजी बहनें अपने साथियों के पसन्द किए गए गीतों को सुनकर ही ख़ुश हो जाती है।
महिला दिवस की रौनक तो तब और बढ जाएगी जब महिला सैनिक अपने अनुभव सुनाएगी। तभी माना जाएगा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की ताक़त को और तभी जयमाला के फूलों की सुगन्ध भी विश्व भर में फैल पाएगी।
Friday, January 25, 2008
कभी किसी फ़ौजी भाई की आवाज़ नहीं सुनी
विविध भारती के सबसे पुराने कार्यक्रमों में से है जयमाला। हमेशा से ही इस कार्यक्रम का स्वरूप लगभग एक जैसा रहा है। बहुत ही हल्का सा परिवर्तन इसमें नज़र आया।
सालों से सुन रहे है शाम का समय और फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर बज उठते है गीत। वही एक तरीका - फ़िल्म का नाम, गीतकार संगीतकार गायक का नाम, फ़ौजी भाइयों के नामों की सूची उनके पदनामों के साथ जैसे हवालदार, ग्रेनेडियर (शायद लिखने में ग़लती हो), मेजर, पहले ये पदनाम बहुत सुनाई देते थे - लांसनायक और रेडियो आपरेटर
शनिवार आया तो प्रसारित हो गई विशेष जयमाला जिसमें किसी फ़िल्मी हस्ती की आवाज़ सुनाई देती है और साथ में बजते है उस हस्ती की मर्ज़ी से कुछ गीत।
कुछ समय से रविवार को जयमाला संदेश कार्यक्रम प्रसारित होता है। इसमें भी पत्र ही पढे जाते है। कभी किसी फ़ौजी का पत्र परिवार वालों के लिए तो कभी परिवार के लोग अपने फ़ौजी भाई के नाम संदेश भेजते है।
मुद्दा ये कि जयमाला में फ़ौजी भाइयों की आवाज़ सुनाई नहीं देती है। अन्य कार्यक्रमों में हम श्रोताओं की आवाज़ सुनते है।
हैलो फ़रमाइश में श्रोता फोन पर बात करते है और अपनी पसन्द के गीत बताते है। हैलो डाक्टर में डाक्टर साहेब बीमारियों की बात करते है। मंथन में श्रोता फोन पर किसी मुद्दे पर चर्चा करते है।
और तो और विविध भारती परिवार की नई-नवेली सदस्या सखि-सहेली को देखिए। विविध भारती परिवार में सखि-सहेली का जन्म हुआ तीन साल पहले और इतनी कम आयु में हर शुक्रवार फोन पर कहती है - हैलो सहेली और देश के कोने-कोने की सहेलियों से बतियाती है। फिर जयमाला में फ़ौजी भाइयों की आवाज़ क्यों नहीं ?
रोज़ सवेरे-शाम मैं जहां से गुज़रती हूं वहां रास्ते में एक मिलिट्री स्टेशन है। बहुत बड़ा परिसर है। यह वही जगह है जहां पिछले साल विश्व स्तर पर खेलों का आयोजन हुआ था। ऐसी और भी सैनिक छावनियां है शहर में। अन्य शहरों में भी सैनिक छावनियां है।
अच्छा लगेगा अगर विविध भारती की टीम इन छावनियों में ड्यूटी पर तैनात सैनिकों से बात करें और इस रिकार्डिंग को जयमाला में उन्हीं की फ़रमाइश के गीतों के साथ प्रस्तुत करें।
हम सुनना चाहते है फ़ौजी भाइयों की आवाज़। बंदूक थामे लोहे के हाथ वाले इन फ़ौजी भाइयों की आवाज़ क्या गरजदार रौबदार है या शहद सी मीठी है।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर विविध भारती से यही मेरा अनुरोध है। आप सबको
गणतंत्र दिवस की बधाई !
सालों से सुन रहे है शाम का समय और फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर बज उठते है गीत। वही एक तरीका - फ़िल्म का नाम, गीतकार संगीतकार गायक का नाम, फ़ौजी भाइयों के नामों की सूची उनके पदनामों के साथ जैसे हवालदार, ग्रेनेडियर (शायद लिखने में ग़लती हो), मेजर, पहले ये पदनाम बहुत सुनाई देते थे - लांसनायक और रेडियो आपरेटर
शनिवार आया तो प्रसारित हो गई विशेष जयमाला जिसमें किसी फ़िल्मी हस्ती की आवाज़ सुनाई देती है और साथ में बजते है उस हस्ती की मर्ज़ी से कुछ गीत।
कुछ समय से रविवार को जयमाला संदेश कार्यक्रम प्रसारित होता है। इसमें भी पत्र ही पढे जाते है। कभी किसी फ़ौजी का पत्र परिवार वालों के लिए तो कभी परिवार के लोग अपने फ़ौजी भाई के नाम संदेश भेजते है।
मुद्दा ये कि जयमाला में फ़ौजी भाइयों की आवाज़ सुनाई नहीं देती है। अन्य कार्यक्रमों में हम श्रोताओं की आवाज़ सुनते है।
हैलो फ़रमाइश में श्रोता फोन पर बात करते है और अपनी पसन्द के गीत बताते है। हैलो डाक्टर में डाक्टर साहेब बीमारियों की बात करते है। मंथन में श्रोता फोन पर किसी मुद्दे पर चर्चा करते है।
और तो और विविध भारती परिवार की नई-नवेली सदस्या सखि-सहेली को देखिए। विविध भारती परिवार में सखि-सहेली का जन्म हुआ तीन साल पहले और इतनी कम आयु में हर शुक्रवार फोन पर कहती है - हैलो सहेली और देश के कोने-कोने की सहेलियों से बतियाती है। फिर जयमाला में फ़ौजी भाइयों की आवाज़ क्यों नहीं ?
रोज़ सवेरे-शाम मैं जहां से गुज़रती हूं वहां रास्ते में एक मिलिट्री स्टेशन है। बहुत बड़ा परिसर है। यह वही जगह है जहां पिछले साल विश्व स्तर पर खेलों का आयोजन हुआ था। ऐसी और भी सैनिक छावनियां है शहर में। अन्य शहरों में भी सैनिक छावनियां है।
अच्छा लगेगा अगर विविध भारती की टीम इन छावनियों में ड्यूटी पर तैनात सैनिकों से बात करें और इस रिकार्डिंग को जयमाला में उन्हीं की फ़रमाइश के गीतों के साथ प्रस्तुत करें।
हम सुनना चाहते है फ़ौजी भाइयों की आवाज़। बंदूक थामे लोहे के हाथ वाले इन फ़ौजी भाइयों की आवाज़ क्या गरजदार रौबदार है या शहद सी मीठी है।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर विविध भारती से यही मेरा अनुरोध है। आप सबको
गणतंत्र दिवस की बधाई !
Wednesday, December 5, 2007
फ़ौजी भाइयों की जय !
रेडियो से जुड़ा हर श्रोता चाहे वो नया हो या पुराना विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम से ज़रूर परिचित रहता है। इस कार्यक्रम में फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर फ़िल्मी गीत सुनवाए जाते है।
पहले सप्ताह में एक बार शनिवार को कोई फ़िल्मी हस्ती विशेष जयमाला प्रस्तुत करती और यही कार्यक्रम अगले दिन यानि रविवार को तीन बजे दुबारा प्रसारित किया जाता। दो-चार कार्यक्रम क्रिकेट खिलाड़ियों ने भी प्रस्तुत किए जैसे सुनील गावस्कर।
जहां तक मेरी जानकारी है एकाध कार्यक्रम फ़ौजी अफ़सरों ने भी प्रस्तुत किया। इसके अलावा कभी इस कार्यक्रम में फ़ौजी भाइयों से सीधे बात नहीं हुई। कुछ ही समय से हर रविवार जयमाला संदेश कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है जिसमें फ़ौजी भाइयों के और उनके परिजनों के संदेश प्रसारित किए जाते है और उससे जुड़े उन्हीं की फ़रमाइश पर फ़िल्मी गीत भी सुनवाए जाते है।
पहली बार विविध भारती की स्वर्ण जयन्ती पर ३ दिसम्बर को मासिक पर्व कार्यक्रम में सबसे बड़े युद्धपोत विक्रान्त से जुड़े फ़ौजी भाइयों से सीधी बात की गई। सुनना बहुत अच्छा लगा।
इतना ही नहीं 4 दिसम्बर को सुबह वन्दनवार में तो विविध भारती ने तो अपने श्रोताओं को चकित ही कर दिया। देश गान से पहले नेवी दिवस के अवसर पर विंग कमांडर इन चीफ़ का संदेश प्रसारित किया गया जिसके बाद एक ऐसा देशगान प्रसारित हुआ जो शायद नेवी का ही था। अंग्रेज़ी में बहुत ही उचित शब्द है - प्लेज़ेन्ट सरप्राइज़। यही संदेश रात में जयमाला की समाप्ति पर भी प्रसारित किया गया।
जयमाला में सोमवार से शुक्रवार तक पांच दिन फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर फ़िल्मी गीत एक ही अंदाज़ में बरसों से सुनते आ रहे है। कई कार्यक्रमों में बदलाव आए परन्तु इस कार्यक्रम में अधिक बदलाव नहीं आए। मै यहां कुछ सुझाव देना चाहती हूं -
इन पांच दिनों में से किसी एक दिन हैलो फ़रमाइश कार्यक्रम जिसमें फ़ौजी भाई सीधे फोन पर बात करें और अपनी फ़रमाइश का गीत बताए।
कभी-कभार शनिवार की विशेष जयमाला फ़ौजी अधिकारियों से प्रस्तुत करवाए।
जिस तरह से नेवी दिवस पर संदेश प्रसारित हुआ उसी तरह 6 दिसम्बर झंडा दिवस, वायु सेना दिवस ( जो शायद सितम्बर में होता है) , 15 अगस्त और 26 जनवरी पर भी ऐसे ही संदेश पसारित किए जा सकते है।
देशगान में सप्ताह में एक बार सेना में तैयार देश भक्ति गीत और उनकी धुनें, बैंड भी सुनवाए जाए तो अच्छा लगेगा।
पहले सप्ताह में एक बार शनिवार को कोई फ़िल्मी हस्ती विशेष जयमाला प्रस्तुत करती और यही कार्यक्रम अगले दिन यानि रविवार को तीन बजे दुबारा प्रसारित किया जाता। दो-चार कार्यक्रम क्रिकेट खिलाड़ियों ने भी प्रस्तुत किए जैसे सुनील गावस्कर।
जहां तक मेरी जानकारी है एकाध कार्यक्रम फ़ौजी अफ़सरों ने भी प्रस्तुत किया। इसके अलावा कभी इस कार्यक्रम में फ़ौजी भाइयों से सीधे बात नहीं हुई। कुछ ही समय से हर रविवार जयमाला संदेश कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है जिसमें फ़ौजी भाइयों के और उनके परिजनों के संदेश प्रसारित किए जाते है और उससे जुड़े उन्हीं की फ़रमाइश पर फ़िल्मी गीत भी सुनवाए जाते है।
पहली बार विविध भारती की स्वर्ण जयन्ती पर ३ दिसम्बर को मासिक पर्व कार्यक्रम में सबसे बड़े युद्धपोत विक्रान्त से जुड़े फ़ौजी भाइयों से सीधी बात की गई। सुनना बहुत अच्छा लगा।
इतना ही नहीं 4 दिसम्बर को सुबह वन्दनवार में तो विविध भारती ने तो अपने श्रोताओं को चकित ही कर दिया। देश गान से पहले नेवी दिवस के अवसर पर विंग कमांडर इन चीफ़ का संदेश प्रसारित किया गया जिसके बाद एक ऐसा देशगान प्रसारित हुआ जो शायद नेवी का ही था। अंग्रेज़ी में बहुत ही उचित शब्द है - प्लेज़ेन्ट सरप्राइज़। यही संदेश रात में जयमाला की समाप्ति पर भी प्रसारित किया गया।
जयमाला में सोमवार से शुक्रवार तक पांच दिन फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर फ़िल्मी गीत एक ही अंदाज़ में बरसों से सुनते आ रहे है। कई कार्यक्रमों में बदलाव आए परन्तु इस कार्यक्रम में अधिक बदलाव नहीं आए। मै यहां कुछ सुझाव देना चाहती हूं -
इन पांच दिनों में से किसी एक दिन हैलो फ़रमाइश कार्यक्रम जिसमें फ़ौजी भाई सीधे फोन पर बात करें और अपनी फ़रमाइश का गीत बताए।
कभी-कभार शनिवार की विशेष जयमाला फ़ौजी अधिकारियों से प्रस्तुत करवाए।
जिस तरह से नेवी दिवस पर संदेश प्रसारित हुआ उसी तरह 6 दिसम्बर झंडा दिवस, वायु सेना दिवस ( जो शायद सितम्बर में होता है) , 15 अगस्त और 26 जनवरी पर भी ऐसे ही संदेश पसारित किए जा सकते है।
देशगान में सप्ताह में एक बार सेना में तैयार देश भक्ति गीत और उनकी धुनें, बैंड भी सुनवाए जाए तो अच्छा लगेगा।
Saturday, November 3, 2007
जयमाला-प्रेमियों के लिये तीन विशिष्ट चित्र स्मृतियाँ.



अमीन सायानी साहब ने स्टार जयमाला प्रस्तुत कर 3 नवम्बर का दिन जैसे यादगार ही बना दिया. इन्हीं दिनों अपनी किताबों को अवेरते मेरे हाथ किसी ज़माने में दिल्ली से निकलने वाली आकाशवाणी पत्रिका का अंक हाथ आ गया. आवरण के भीतर वाले पन्ने पर तीन विशिष्ट (या महान कहूँ तो भी ग़लत नहीं होगा)के श्वेत-श्याम चित्र दिखे. सोचा आज जब जयमाला की जय-जयकार होरही है तो मैं भी क्यों न अपना स्वर भी मिला दूँ ? तो जनाब देखिये ये तीनख़ास चित्र हैं भारतीय कत्थक नृत्य के साक्षात नटराज गोपीकृष्ण , सुर-सरिता आशा भोंसले और सर्वकालिक महान फ़िल्मकार वी.शांताराम के.ये तीनों सत्तर के दशक में विविध भारती के स्टुडियोज़ में जयमाला प्रस्तुत करने तशरीफ़ लाएथे.इस पत्रिका के बारे में फ़िर कभी लेकिन हाल-फ़िलहाल तो आप इन अविस्मरणीय चित्रों का मज़ा लीजिये.
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