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Monday, January 30, 2012

काशीनाथ सिंह के बारे में शेषनारायण सिंह से शुभ्रा शर्मा की बातचीत


जैसा कि आप सभी जानते हैं कि 'काशी का अस्‍सी' के लिए लेखक काशीनाथ सिंह को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार दिये जाने की img040घोषण की गयी है। शुभ्रा जी ने इस मौक़े पर दिल्‍ली के एफ.एम. गोल्‍ड के लिए काशी जी के पुराने मित्र शेष नारायण सिंह से उनके व्‍यक्तित्‍व के कुछ अंतरंग पहलुओं पर बातचीत की।

ये बातचीत एक जनवरी को काशीनाथ सिंह के जन्‍मदिन पर प्रसारित की गयी थी।

रेडियोनामा के पाठकों के लिए इसे यहां प्रस्‍तुत किया जा रहा है। 
पूरी बातचीत तकरीबन दस मिनिट की है।


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Sunday, January 22, 2012

'कविताएं अगर होती परियां'.....जाने-माने न्‍यूज़-रीडर राजेंद्र चुघ की कविताएं

पिछले कुछ दिनों से रेडियोनामा पर ना तो शुभ्रा जी आ रही थीं और ना ही 'न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा' वाले स्‍तंभ की अगली कडियां। नया साल शुरू होते ही शुभ्रा जी ने दो अनमोल प्रस्‍तुतियां रेडियोनामा के लिए तैयार की हैं। इनमें से एक आज। अगली अनमोल प्रस्‍तुति असल में ऑडियो के साथ है। और इसकी प्रतीक्षा कीजिए। क्‍योंकि प्रतीक्षा का फल  'मीठा' होता है। तो लीजिए रेडियोनामा पर रविवार की विशेष पेशकश।  जाने-माने न्‍यूज़-रीडर राजेंद्र चुघ की कविताएं। रेडियोनामा पर चुघ साहब की ये कविताएं पेश करना हमारे लिए सौभाग्‍य ये कम नहीं है। हम शुभ्रा जी और राजेंद्र चुघ दोनों के शुक्रगुज़ार हैं।


 
दोस्तो, आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि मैं इतने दिनों से कहाँ लापता हूँ. तो अर्ज़ कर दूं कि वैसे तो दोस्तों की महफ़िल में बैठना, उनके साथ इधर-उधर की बातें करना, और खुलकर ठहाके लगाना किसे पसंद नहीं आता? लेकिन कभी-कभी इससे भी ज़्यादा "दिलफ़रेब हो जाते हैं ग़म रोज़गार के "....और फिर महिलाओं के ऊपर तो प्रकृति ने दोहरी उदारता दिखाई है.... कि घर भी संभालें और रोज़गार भी. आशा है इस दोहरी मजबूरी को समझते हुए मुझे माफ़ कर देंगे.

जहाँ तक "न्यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा" का सवाल है.... यादों का सिलसिला ऐसे मोड़ पर आ पहुंचा था, जहाँ से कुछ तीखी और तल्ख़ यादें झाँकने लगी थीं इसलिए मैंने रास्ता ही बदल दिया.

आज मैं आपकी चिर-परिचित आवाज़ के एक नये पहलू से आपका परिचय कराने जा रही हूँ. राजेंद्र चुघ की आवाज़ में आप बरसों   से समाचार सुनते आ रहे हैं. वे न सिर्फ हिंदी समाचार कक्ष के हमारे वरिष्ठ सहयोगी हैं बल्कि इस समय मुख्य समाचार वाचक भी हैं. सम-सामयिक विषयों की बहुत अच्छी जानकारी रखते हैं. पंजाबी और हिंदी साहित्य का विशद अध्ययन किया है. ख़ुद भी लिखते रहे हैं. विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में उनकी कहानियां और कवितायेँ बराबर प्रकाशित होती रही हैं. हमारी गप-गोष्ठियों में बहुत इसरार करने पर कभी- कभी अपनी रचनाएँ सुना दिया करते हैं.


1


पंजाब के जालंधर जिले के शाहकोट गाँव से ताल्लुक रखते हैं. गाँव की बातें करते हुए बहुत भावुक हो जाते हैं. शाहकोट मिर्च की बहुत बड़ी मंडी है. मिर्च की तल्ख़ी तो नहीं, हाँ उसका रंग और ख़ूबसूरती चुघ साहब की कविताओं में झलकती है. पहले गाँव, फिर नकोदर और फिर जालंधर से पढ़ाई पूरी की और वहीँ से आकाशवाणी से साथ जुड़ा. पत्नी सीमा सच्चे अर्थों में उनकी सह-धर्मिणी हैं. चुघ साहब बातचीत में अक्सर उन्हें 'मालकिन' कहकर बुलाते हैं. इसी वजह से मैं कभी-कभी उन्हें 'सीमाबद्ध' कहकर चिढ़ाती भी हूँ .

दो बच्चे हैं - संकेत और निष्ठा. संकेत होटल मैनेजमेंट व्यवसाय से जुड़े हैं और निष्ठा ने पत्रकारिता का पेशा अपनाया है. पुत्रवधू जसरिता और दामाद विलास समेत पूरा परिवार आत्मीयता की ऐसी प्यारी डोर से बंधा हुआ है कि देखकर हमेशा यही दुआ करने को जी चाहता है कि यह डोर और मज़बूत हो. यहां ये जिक्र करते चलें कि चुघ साहब के दामाद विलास चित्राकरण दक्षिण भारत के हैं।

चुघ साहब ने अभी पिछले दिनों एक कविता सुनाई. उसे सुनते हुए मुझे अपने पापा  कुछ इस तरह याद आये कि मेरी आँख भीग गयी. यह कविता उन्होंने अपनी बेटी के जन्मदिन पर उसके लिए उपहार के रूप में लिखी थी. मैंने उनसे वह कविता माँग ली और अपने संकलन में संजो कर रख ली. कुछ मित्रों की नज़र पड़ी....कुछ टिप्पणियां भी आयीं. आखिरकार आम सहमति से तय पाया गया कि इन कविताओं को रेडियोनामा के माध्यम से सभी श्रोताओं-पाठकों तक पहुँचाया जाये. अनुमति के लिए चुघ साहब से संपर्क किया तो बोले - चाहे जितनी कवितायेँ ले लो और जहाँ चाहो, चिपका दो.  तो लीजिये, राजेंद्र चुघ की ये कवितायेँ आपके हवाले कर रही हूँ. पढ़ कर देखिये और बताइये कैसी लगीं.



निष्ठा के लिए

कवितायेँ अगर होतीं परियां

बच्चों की कहानियों जैसी

और उतर आतीं लेकर जादू की छड़ी

हर सपना सच करने को ....

कवितायेँ अगर होतीं तितलियाँ

स्वर्ग की क्यारियों जैसी

और उतर आतीं लेकर सारे चमकीले रंग

हर ख्वाब में भरने को .....

कवितायेँ अगर होतीं दुआएं

काबे के आँगन जैसी

और उतर आतीं लेकर मन्नतों का असर

हर ख्वाहिश में भरने को....

तो भेज देता मैं सारी परियों और तितलियों को तुम्हारे घर के पते पर

और बैठा रहता काबे के आँगन में दुआ के लिए हाथ उठाये

तुम्हारे लिए.......उम्र भर.......

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यादें

जाने किस चीज़ से बुनी होती हैं ये यादें,

समय के सूत से या रिश्तों के रेशम से

प्रवासी पंछियों की तरह उड़ आती हैं

बीते की बर्फ से ....

कभी गोद में बैठकर दाढ़ी के बाल टटोलती हैं

कभी दीवार घड़ी से कोयल की तरह निकलकर हर घंटे बोलती हैं

ज़रा सा वक़्त खोलकर शरारत से झाँकती हैं

पुराने पलों पर जमी ज़ंग की परत पोंछ डालती हैं

ये यादें उतार देती हैं पस्त लम्हों की थकान

वे खोल देते हैं आँखें फिर नवजात शिशु के समान

मेरी उँगली पकड़कर इन्द्रधनुष पर झुलाने ले जाती हैं

तेरी यादें ....

इन यादों की उम्र दराज़ हो

और तुम्हारी भी.

-----------

संकेत और जसरिता के नाम

सदियों से घूम रही है धरती अपने सूरज के गिर्द

सदियों से झूल रहा है चाँद अपनी रात के बालों में

सदियों से धो रहा है समंदर अपनी धरती के पैर

सदियों से चूम रही है बर्फ़ अपने पर्वत के होंठ

सदियों से दे रही है बहार अपने मौसम के हाथों फूल

लिखी जा रही है मुहब्बत की

एक मुक़द्दस और मुसलसल दास्ताँ

क़ुदरत के काग़ज़ पर सदियों से...

आओ हम तुम भी आज दस्तख़त करें,

इस दस्तावेज़ के नीचे,

कि हमारी मुहब्बत के निशान

संभालकर रख लें

ये सदियाँ....

-------
बातों ही बातों में चुघ साहब ने यह भी बताया कि बरसों पहले जब उन्होंने कविता की ज़मीन पर पैर रखा तो सबसे पहले यह ग़ज़ल बन गयी थी, जो आज भी उनके दिल के बहुत क़रीब है.....


बेसब्र है बादल उसे तड़पाइयेगा मत

गर टूट के बरसे तो पछताइयेगा मत.

बिजली के नंगे तारों से छींके हैं खतरनाक

इन पर किसी उम्मीद को लटकाइयेगा मत.

वो बांटने तो आये हैं खैरात में सपने

ख़ाली जनाब आप भी घर जाइयेगा मत.

जो ज़िन्दगी को समझते हैं महज़ चुटकुला

कह दो उन्हें कि तालियाँ बजाइयेगा मत.

उनके भी दिल में दर्द है, मैं बहुत सुन चुका

अब इस ख़याल से मुझे बहलाइयेगा मत.

सतलुज की धारा शाहकोट से कुछ ही दूर बहती है. हिंदुस्तान के गावों में बसने वाले लोगों की ज़िन्दगी में नदियों का जो दर्जा है, जो अहमियत है, वह कहने-सुनने की नहीं, समझने और महसूस करने की बात है. चुघ साहब बताते हैं कि वेग से बहते सतलुज में उन्हें अपने दादाजी की झलक मिलती थी. और सतलुज से दूर होने पर तो यह एहसास और भी गहरा होता गया....

ख़ुद रोये और मुझे रुलाये सतलुज

अथरू अथरू रोता जाये सतलुज.

तर दाढ़ी,पगड़ी पर काले धब्बे

रोज़ रात सपनों में आये सतलुज.

हर क्यारी में सूखे खून के छींटे

किस-किस खेत से बचकर जाये सतलुज.

इंतज़ार में जैसे हो महबूबा

ऐसे भागा भागा जाये सतलुज.

जी करता है तुतला तुतला बोलूँ

मुझको अपनी गोद खिलाये सतलुज.

मेरे पंज-आबों की पीड़ हरे जो

उसपे वारी-वारी जाये सतलुज.

Wednesday, November 16, 2011

सुबह आठ और रात पौने नौ बजे का बुलेटिन-न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा: दसवीं कड़ी

रेडियोनामा पर जानी मानी समाचार वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने दिलचस्‍प पाक्षिक संस्‍मरण लिख रही हैं। उनके सारे लेख आप यहां चटका लगाकर पढ़ सकते हैं।


एक समय था जब स्कूल-कॉलेज या ऑफिस जाने वालों के लिए आकाशवाणी का सवेरे आठ बजे का बुलेटिन घर से रवाना होने की पहली घंटी के समान होता था. जिसको जब भी रवाना होना होता था, वह आठ बजे के बुलेटिन को मीन टाइम बनाकर, उसके इर्द गिर्द अपने चाय - नाश्ते का क्रम बता देता था. मसलन मेरी स्कूल बस लगभग पौने नौ बजे आती थी तो मैं घर वालों को आगाह कर देती थी कि मैं बुलेटिन के साथ नहाने जाऊंगी और उसके फ़ौरन बाद नाश्ता करूंगी. मेरे पापा चाय - काफी नहीं पीते थे. तो उनके लिए भी मेरे साथ ही दूध का गिलास तैयार कर दिया जाता क्योंकि वे दूध काफी ठंडा करके पीते थे. पापा हिंदी और अंग्रेज़ी के दोनों बुलेटिन अहिंसा की तरह "परम धर्म" मानकर सुनते थे और उसके बाद स्नान - ध्यान में लग जाते थे. बुलेटिन शुरू होने के समय से घर की घड़ियाँ मिलायी जाती थीं. घड़ी का समय बिलकुल सही है, यह बताने के लिए बस इतना ही कहना काफी होता था कि "रेडियो टाइम" से  मिली है. आगे तर्क की कोई गुंजाईश ही नहीं रह जाती थी.

यह बहुत ख़ुशी की बात है कि तमाम अच्छे - बुरे परिवर्तनों के बीच आकाशवाणी की यह परंपरा आज तक क़ायम है. आठ बजे का बुलेटिन अब भी ठीक आठ बजे प्रसारित होता है .... न एक सेकण्ड पहले, न एक सेकण्ड बाद. पहले इसकी ज़िम्मेदारी दिल्ली केंद्र के तकनीकी सहायकों की होती थी.... अब स्वचालित यंत्रों की है. ठीक समय पर स्टूडियो की लाल बत्ती जल जाती है और शुरू हो जाता है समाचारों का सिलसिला.

आज से कोई २४-२५ वर्ष पहले सुबह आठ बजे और रात पौने नौ बजे के बुलेटिन इतने अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाते थे कि नये वाचकों को कई-कई बरस तक पढ़ने को नहीं मिलते थे. किसी को १३ तो किसी को १७ बरस तक इंतज़ार करना पड़ा.

इस बारे में वरिष्ठ समाचार वाचक हरी संधू एक मज़ेदार क़िस्सा सुनाते हैं. बताते हैं कि उन्हें न्यूज़ रूम में hari sandhu_thumb[16] आये कई साल हो गये थे लेकिन तब भी रात पौने नौ का बुलेटिन पढ़ने को नहीं मिला था. संधू जी को पान खाने का शौक़ है. कई बार दुकान से पान बँधवा कर ले आते हैं. एक दिन न्यूज़ रूम में शाम सात बजे के आस-पास चाय का दौर चला. चूँकि अगले बुलेटिन में अभी काफी देर थी, सो संधू जी ने सोचा - तब तक पान जमाया जाये.

पान का दोना निकाला ही था कि इंदु वाही सामने आ गयीं. इंदु जी ने कहा - पान तो हम भी खायेंगे.

संधू जी ने दोना उनके आगे बढ़ा दिया.

इंदु जी ने उसमें से दो पान निकाले और मुंह में रख लिए. दोना वापस संधू जी के पास आ गया.

इंदु जी ने सिद्धहस्त पान खाने वालों की तरह पान मुंह में घुला तो लिया, लेकिन जैसे ही उसका कुछ अंश भीतर गया.....सर पकड़ कर बैठ गयीं.

नाराज़ होकर बोलीं- संधू, इसमें क्या है ?

संधू जी बोले - पान.

इंदु जी बोलीं- हाँ हाँ, पान तो है लेकिन इसके अंदर क्या है?

संधू जी ने निहायत मासूम अंदाज़ में गिनाना शुरू किया - चूना, कत्था, सुपारी, ख़ुशबू और तम्बाखू .....

तम्बाखू भी था?.....कहती हुई इंदु जी बाहर भागीं.

पान थूकने, कुल्ले करने और ठंडा पानी पीने के बाद भी जब उनकी तबियत नहीं संभली, तब आखिरकार पौने नौ का बुलेटिन उनकी जगह संधू जी को पढ़ना पड़ा.

संधू जी कहते हैं कि उन्होंने जान बूझ कर इंदु जी को तम्बाखू वाला पान नहीं दिया था. उधर, इंदु जी कहती थीं कि पान देने से पहले उन्हें बताना चाहिए था कि उसमें तम्बाखू पड़ा हुआ है. मेरे न्यूज़ रूम में आने के बाद तक दोनों के बीच यह बहस जारी थी.

दूसरी तरफ थीं एक कैजुअल समाचार-वाचिका, जो मेरे लगभग दो वर्ष बाद के पैनल में चुनकर आयी थीं. जिस दिन उनकी न्यूज़ रूम में पहली ड्यूटी लगी, संयोग से मैं भी ड्यूटी पर थी. शायद किसी ने उन्हें मुझसे बात करने और काम समझने की सलाह दी होगी. वे मेरे पास आकर बैठीं. लेकिन मैंने देखा कि उनकी

दिलचस्पी काम समझने में कम और यह समझने में ज़्यादा थी कि न्यूज़ रूम का असली कर्ता-धर्ता कौन है. जब मैंने उनके तिरछे सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया तो उन्होंने सीधे-सीधे पूछ लिया - वाचकों का ड्यूटी चार्ट कौन बनाता है?

मैंने उन्हें बताया कि विनोद कश्यप जी सबसे सीनियर समाचार वाचिका हैं और वे ही वाचन का चार्ट बनाती हैं.

इस पर उन्होंने पूछा कि विनोद जी कब और कहाँ मिलेंगी.

मैंने उन्हें ले जाकर विनोद जी से मिलवा दिया.

उन्होंने नमस्कार किया और कहा - मैं पौने नौ का बुलेटिन पढ़ने आयी हूँ.

मैं और विनोद जी, दोनों अवाक........ बस उनका चेहरा ही देखते रह गये.

फिर विनोद जी ने अपनी गुरु गंभीर आवाज़ में कहा - तो फिर कबसे पढ़ना चाहेंगी?

इसके पहले कि वे कोई और ज़बरदस्त बयान देतीं, मैं उन्हें कोहनी से पकड़ कर विनोद जी के आगे से हटा ले गयी.

अब सुनिए मेरा हाल.... मुझे न्यूज़ रूम में दाख़िल हुए लगभग दो वर्ष हुए थे. जुलाई १९८७ से मैंने आकाशवाणी में ड्यूटी शुरू की थी और यह बात होगी मई १९८९ की. ज़ाहिर है तब तक मैंने न तो सवेरे आठ बजे का कोई बुलेटिन पढ़ा था और न रात पौने नौ का. बल्कि छोटे-मोटे बुलेटिन बनाने या पढ़ने की ज़िम्मेदारी निभाते हुए भी अक्सर लोग-बाग मुझे छेड़ते रहते थे कि - मैडम अब बस एक- दो महीने की बात है. प्रोबेशन पीरियड किसी तरह शांति से बीत जाने दो.   

पिछली किसी कड़ी में मैंने ज़िक्र किया है कि उन दिनों ड्यूटी लगाने से पहले प्रशासन के लोग फोन कर, हमारी सुविधा पूछ लिया करते थे. ऐसे ही एक दिन प्रशासन से गिलानी जी का फोन आया. उन्होंने पहले तो मेरी उपलब्धता पूछी और फिर मुझे बताया कि इस बार वे मेरी ड्यूटी आठ बजे के बुलेटिन के संपादन पर लगा रहे हैं.

मैं बुरी तरह घबड़ा गयी. पहला तर्क तो मुझे यही सूझा कि भाई, जिस व्यक्ति को आप बुलेटिन पढ़ने के योग्य नहीं समझते हैं, उसे संपादन की ज़िम्मेदारी कैसे सौंप सकते हैं?

लेकिन इस तर्क को गिलानी जी ने नकार दिया. बोले - यह सोचिये कि कितने लोग होंगे, जिन्होंने पढ़ने से भी पहले बुलेटिन बनाया होगा?

मैंने तरकश से दूसरा तीर निकाला. कहा - मैं अभी अपने को इस योग्य नहीं समझती.

गिलानी जी ने मेरा यह तीर भी काट दिया. कहने लगे - आप ख़ुद जो चाहे समझें... लेकिन अफसरों ने काफी सोच समझ कर ये फ़ैसला किया है. और आज नहीं तो कल, जब आपको संपादन करना ही है तो आज ही क्यों नहीं कर लेतीं.

मैं और कोई तर्क नहीं दे पायी. मुझे बुलेटिन बनाना ही पड़ा..... और वह भी पढ़ने से पहले.

बहुत सारी यादें उमड़ घुमड़ कर आती जा रही हैं. पहला बुलेटिन बनाना.....पढ़ना....महानिदेशक की बैठक में जाना....आलोचना सुनना..... और बेहतर काम करने का संकल्प लेना और भरसक उस संकल्प को पूरा करना.

आज की हमारी-आपकी बातचीत शुरू हुई थी बुलेटिन के ठीक समय से प्रसारण को लेकर तो चलते- चलते इसी सन्दर्भ में एक क़िस्सा सुनाती चलूँ. हुआ यों कि उस दिन भी मेरी आठ बजे का बुलेटिन बनाने की ड्यूटी थी. बुलेटिन की ख़बरें तो तैयार थीं, मगर यह अंदाज़ नहीं लग रहा था कि हेडलाइन्स क्या होंगी और उनका क्रम क्या होगा. हमारे बुलेटिन का समय पास आता जा रहा था. सिर्फ दो मिनट रह गये थे जब हेडलाइन्स हमारे पास पहुंची. इतना समय नहीं था कि उनका अनुवाद कराया जा सके. मैं अंग्रेज़ी  हेडलाइन्स ही हाथ में लेकर स्टूडियो की तरफ दौड़ी. सोचा था.... ख़बरों के पहले वाक्य हेडलाइन्स के तौर पर पढ़वा दूँगी. लेकिन उसके लिए उन सभी ख़बरों का मेरे हाथ में होना ज़रूरी था. इसलिए दौड़ते-दौड़ते भी ख़बरें छांटती जा रही थी. कमरे के बाहर पैर रखा ही था कि धड़ाम से गिरी.

समाचार पत्रों की सुर्ख़ियों वाला अंश पढ़ने के लिए राजेंद्र चुघ मेरे पीछे आ रहे थे. मुझे गिरते देखा तो एकदम चिल्ला पड़े - अरे रे.... क्या करती हो.

उन्हें देख कर मेरी जान में जान आयी. मैंने कहा- मुझे छोड़ो...  हेडलाइन्स लेकर भागो. मैं आ रही हूँ.

चुघ साहब वाक़ई मेरे हाथ से हेडलाइन्स लेकर बगटूट भागे.

मैं जब तक लंगड़ाती हुई स्टूडियो में पहुंची, वे मुख्य वाचक से हेडलाइन्स पढ़वा चुके थे.

उन्होंने मुझे इशारा किया कि तुम बैठ जाओ .... मैं बुलेटिन पढ़वा देता हूँ.

लेकिन मैंने उन्हें इशारा किया कि मैं अब ठीक हूँ. कर लूंगी.

बुलेटिन के बाद मुझे 'झाँसी की रानी' और 'राणा सांगा' जैसी उपाधियों से नवाज़ा गया. कुछ लोग मेरे गिरने के स्थल पर मरने वाली चींटियों को गिनने भी गये. ड्यूटी के बाद मैं गाड़ी चलाकर घर भी आ गयी.

शाम को मेरे डिब्बे जैसे फूले पैर के एक्स-रे से पता चला कि उसकी एक कोई बेचारी मुन्नी-सी हड्डी टूट गयी है. अब दर्द के बावजूद हंसने की मेरी बारी थी.

Thursday, November 3, 2011

'वरना गत्‍ता उठाकर फेंक देते': न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा: नौंवी कड़ी

रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने बेहद दिलचस्‍प संस्‍मरण लिख रही हैं। इस श्रृंखला का नाम है न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा। ये है इस श्रृंखला की नौंवी कड़ी। शुभ्रा जी के सारे लेख आप यहां चटका लगाकर पढ़ सकते हैं।


पुरानी दिल्ली की अलीपुर रोड की कोठी में न्यूज़ रूम की शुरुआत और फिर वहां से नयी दिल्ली के संसद मार्ग स्थित प्रसारण भवन में आने का क़िस्सा मैंने आपको पिछली कड़ी में आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक श्री पी सी चैटर्जी की ज़ुबानी सुनाया. संसद मार्ग पर प्रसारण भवन की भव्य इमारत के बारे में कुछ ख़ास लोगों, जैसे भीष्म साहनी, गोपीचंद नारंग और रेवती सरन शर्मा की राय से भी मैं आप को परिचित करा चुकी हूँ. आज न्यूज़ रूम के अंदर के कुछ ऐसे लोगों से आपको मिलवाती हूँ, जो दिन-रात समाचारों की दुनिया से जुड़े रहने के बावजूद कभी बाहरी लोगों के सामने नहीं आये. अपने काम की बदौलत न्यूज़ रूम में मिसाल बने..... लेकिन बाहरी दुनिया उनका नाम तक नहीं जान सकी. ऐसे ही एक युगपुरुष थे - नरिंदर सिंह बेदी जी.

मैं जब पहले-पहल हिंदी न्यूज़ रूम में आयी थी और यहाँ का कामकाज सीखने की कोशिश कर रही थी.....उन दिनों मेरे सीनियर्स अक्सर एक जुमला मेरी तरफ उछाला करते थे - " ख़ैर मनाओ कि तुम्हारा यह अनुवाद बेदी साहब के हाथ में नहीं जा रहा है, वरना सीधे गत्ता उठाकर बाहर फेंक देते."

( न्यूज़ रूम में हम ख़बरों को टाइप करवाकर और गत्ते पर लगाकर रखते हैं ताकि न्यूज़रीडर के पढ़ने के समय काग़ज़ की आवाज़ न हो.)

इस तरह शुरूआती दिनों में ही मैं इतना तो समझ गयी थी कि हो न हो बेदी साहब हिंदी न्यूज़ रूम की कोई तोप चीज़ थे. फिर धीरे-धीरे, अलग-अलग लोगों के मुंह से सुनकर जाना कि बेहद बुद्धिमान और समर्पित व्यक्ति थे. अनुवाद और संपादन में ख़ुद तो सिद्ध-हस्त थे ही, बहुत सारे दूसरे लोगों को सिखाने में भी उनका बहुत बड़ा योगदान था. मूर्खता और मूर्ख....दोनों को ही बर्दाश्त नहीं कर पाते थे इसीलिए गत्ते फेंकने की घटनायें होती रहती थीं. लेकिन जिसने उनके गत्ते फेंकने को एक चुनौती की तरह स्वीकार किया और अपने को बेहतर बनाने की कोशिश की...वह ज़रूर आगे बढ़ा.

बेदी साहब का जन्म २४ सितम्बर १९२२ को हुआ था. बी ए करने के बाद कई जगह नौकरी के लिए आवेदन भेजे. मौसम विभाग, वन विभाग और आल इंडिया रेडियो में चयन भी हो गया. कहाँ नौकरी करें, यह चुनने की अब उनकी बारी थी. रेडियो नयी, उभरती विधा थी. उन दिनों इसके साथ ज़बरदस्त ग्लैमर जुड़ा हुआ था. कुछ सार्थक करने का संतोष भी था. लिहाज़ा उन्होंने रेडियो की नौकरी स्वीकार कर ली. दिसंबर १९४४ में वे न्यूज़ रूम में आये. उन दिनों अंग्रेज़ी और हिन्दुस्तानी के बुलेटिन प्रसारित होते थे. हिन्दुस्तानी के बुलेटिन देवनागरी में नहीं बल्कि फ़ारसी लिपि में तैयार किये जाते थे. लाहौर से लेकर दिल्ली तक स्कूली पढ़ाई का माध्यम उर्दू भाषा थी. बेदी साहब को हिन्दुस्तानी के बुलेटिन बनाने का ज़िम्मा सौंपा गया तो उर्दू की पृष्ठभूमि के कारण उन्हें इसमें कोई दिक्क़त पेश नहीं आयी.

दिक्क़त तब हुई, जब १९५१ के आस-पास सरकारी नीति के तहत हिन्दुस्तानी बुलेटिन समाप्त कर उनकी जगह हिंदी और उर्दू के अलग-अलग बुलेटिन शुरू किये गये. बेदी साहब को हिंदी लिपि का बिलकुल ज्ञान नहीं था. उनकी इस दिक्क़त को समझते हुए उन्हें जी एन आर यानी अंग्रेज़ी न्यूज़ रूम में भेज दिया गया. लेकिन बेदी साहब इस तरह हार मानकर बैठ जाने वाले व्यक्ति तो थे नहीं. इसलिए लगभग तीस साल की उम्र में और छः साल की नौकरी के बाद उन्होंने क ख ग से शुरुआत कर हिंदी सीखी और प्रभाकर की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया. और फिर हिंदी में पढ़े-लिखे लोगों को हिंदी में अनुवाद की बारीकियां समझायीं.

बेदी साहब ने १९४४ से १९८० तक आकाशवाणी में काम किया. अपने इस पूरे कार्यकाल के दौरान वे दिल्ली में ही रहे. कभी जी एन आर तो कभी एच एन आर में. उनके बिना दिल्ली के न्यूज़ रूम की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. यह ज़रूर था कि जब कभी आकाशवाणी के किसी नये केंद्र से समाचारों का प्रसारण शुरू होता था तो डमी बुलेटिन बनाने और लोगों में कार्य संस्कृति विकसित करने का ज़िम्मा उन्हीं को सौंपा जाता था. जयपुर और जालंधर केन्द्रों से समाचारों का प्रसारण उन्हीं की देख रेख में शुरू हुआ था.

पूर्व समाचारवाचक कृष्ण कुमार भार्गव बता रहे थे कि बेदी साहब अगर ग़लती करने पर डांट पिलाते थे...तो अच्छा काम करने पर तारीफ करने में भी पीछे नहीं रहते थे. एक बार बुलेटिन पढ़ते-पढ़ते भार्गव जी को लगा कि समाचार कुछ कम पड़ सकते हैं. जैसेकि अगर सामान्य गति से पढ़ते रहने पर तीस पंक्तियों की आवश्यकता थी तो वहां केवल बीस पंक्तियाँ ही उपलब्ध थीं. मौक़े की नज़ाकत को भांपते हुए भार्गव जी ने पढ़ने की गति कम किये बिना, दो पंक्तियों और दो समाचारों के बीच का अंतराल थोड़ा-थोड़ा बढ़ाना शुरू कर दिया और सुनने वालों को यह बिलकुल महसूस नहीं हो सका कि बुलेटिन में पंक्तियाँ कम थीं या पढ़ने की गति धीमी थी. बुलेटिन के बाद बेदी साहब ने धीमे से कहा - "गुड". उनके उस एक शब्द को भार्गव जी आज तक अपना सबसे बड़ा प्रशस्ति-पत्र, सबसे बड़ा मेडल मानते हैं.

बेदी साहब के परिवार के लोग कहते हैं कि उन्होंने शायद ही कभी किसी त्यौहार पर पूरे दिन उनका साथ पाया हो. हर होली, दीवाली, दशहरे पर वे सबसे पहले अपनी ड्यूटी लगाते थे. उसके पीछे शायद यह भावना काम करती थी कि अगर वे ख़ुद ड्यूटी नहीं करेंगे तो दूसरों को ड्यूटी पर आने के लिए कैसे कहेंगे. पत्नी और बच्चे उनकी सारी दुनिया थे ..... लेकिन काम का महत्व उनसे भी कहीं अधिक था.

एक बात और .... जिस बात को सही समझते थे, उसके लिए अड़ जाते थे. यहाँ तक कि नौकरी छूट जाने तक की परवाह नहीं करते थे. एडमंड हिलेरी और तेन्ज़िंग नोर्के ने २९ मई १९५३ को दुनिया की सबसे ऊंची छोटी एवरेस्ट पर चढ़ने में कामयाबी हासिल की. ख़बर न्यूज़ रूम में आ चुकी थी लेकिन अधिकारी चाहते थे कि यह ख़बर सबसे पहले साढ़े आठ बजे के अंग्रेज़ी बुलेटिन में प्रसारित हो. इधर बेदी साहब का मन था कि सवा आठ बजे हिंदी के बुलेटिन में यह ब्रेकिंग न्यूज़ दें. बार-बार अनुरोध के बावजूद अधिकारीगण राज़ी नहीं हुए. समाचार पर २०३० तक प्रतिबन्ध लगा था...लगा ही रहा. बेदी साहब ने अपने समाचारवाचक से मंत्रणा की और बुलेटिन को साढ़े आठ से.... ज़रा आगे तक खींच दिया. प्रतिबन्ध की अवधि समाप्त हो गयी और "मुख्य समाचार एक बार फिर कहकर" समाचारवाचक ने एवरेस्ट विजय का समाचार सुना दिया.

बेदी साहब को शायरी का शौक़ था. ख़ुद भी लिखते थे.

ये रही नरिंदर सिंह बेदी "सुख़न" की शायरी ---

ज़ोर-ओ-जफ़ा को क्या करूँ... नाज़-ओ-अदा को क्या करूँ

इश्क़ है ख़ुद मेरा सिला, अहद-ओ-वफ़ा को क्या करूँ?

उसकी हयात जाँविदा... मेरी हयात चंद रोज़

वो भी तो ख़ुदनवाज़ है... ऐसे ख़ुदा को क्या करूँ?

आज तो हुस्न को भी ख़ुद... मेरी निगह की तलाश है

जलवे ही बेनक़ाब हैं... रस्म-ए-हया को क्या करूँ?

रूह में इक तड़प भी है... ज़हन में कुछ सवाल भी

सजदे को सर न झुक सका, दस्त-ए-दुआ को क्या करूँ?

काविश-ए-फ़न में सबको है... नाम-ओ-नमूद की हवस

मौत के बाद जो मिले... ऐसी बक़ा को क्या करूँ???

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जी का रोग निराला है... जब ये किसू को होले है

तारों के संग जागे है... अश्कों के संग सोले है .

बाद-ए-सबा दीवानी है... गुलशन-गुलशन डोले है

किस जलवे को ढूँढे है... घूँघट-घूँघट खोले है.

ओस बड़ी दीवानी है...दश्त में मोती रोले है

चाँद बड़ा सौदाई है ...दूध में हीरे घोले है.

दिल अपना मस्ताना है, रहबर-रहज़न क्या जाने

जो भी ढब से बात करे... साथ उसी के होले है.

इस तिफ्लों के मेले में... खेल-खिलौने बिकते हैं

आंसू कौन ख़रीदेगा... क्यों पलकों पर तोले है?

ये तो "सुख़न" दीवाना है... इसकी बातें कौन सुने

'फ़ैज़-ओ-फ़िराक़' की महफ़िल में 'मीर' की बोली बोले है.

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मोल-तोल के शहर में आकर हम क्या नफ़ा कमा बैठे

क़िस्मत ने दो आँखें दी थीं... उनको भी धुंधला बैठे.

जब से सफ़र पे निकला हूँ, धूप ने साथ निभाया है

रुका तो साये बन गये साथी, चला तो हाथ छुड़ाया है.

अब तो अपने यार भी हमको किश्तों-किश्तों मिलते हैं

सालिम मिलने वाले जाने किस आकाश पे जा बैठे.

ये तो जहाँ भी जाता है बस उलटी-सीधी कहता है

आज "सुख़न" के आते-आते हम तो बज़्म उठा बैठे.

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ये नया दौर है इस दौर के पैग़ाम समझ

घर उजड़ जाने को ख़ुश-आइए-अय्याम समझ.

ख़ुदफ़रोशी का अगर तुझ में सलीका ही नहीं

छोड़ काऊस.. उसे ज़हमत-ए-नाकाम समझ.

इन फ़िज़ाओं में मयस्सर है किसे उम्र-ए-दराज़

जो भी साँस आये उसे ज़ीस्त का इनाम समझ.

अहदे-जम्हूर, दयानत, नयी रख्शंदा सदी

सब बड़ी बातों को अलफ़ाज़ का इबहाम समझ.

ज़हर-आलूद धुआं हो तो उसे अब्र न जान

शोरिश-ए-ज़हल को मत धर्म का अहकाम समझ

Wednesday, October 5, 2011

पी.सी.चैटर्जी का एक दिलचस्‍प किस्‍सा: न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा, कड़ी 8

मशहूर समाचार वाचिका शुभ्रा शर्मा रेडियोनामा पर अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। पिछले कुछ हफ्तों से छुट्टियां मनाने गईं शुभ्रा जी अब फिर इस श्रृंखला को आगे बढ़ा रही हैं। आठवीं कड़ी में वो बातें कर रही हैं मशहूर प्रसारणकर्ता पी.सी.चैटर्जी की। आपको बता दें कि उनकी दो मशहूर पुस्‍तकें आई हैं। एक है broadcasting in india जो भारत में प्रसारण के इतिहास पर लिखी गयी एक बेहद सटीक और महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक है। उनकी दूसरी पुस्‍तक आत्‍मकथात्‍मक है The Adventure in Indian Broadcasting; A Philosopher's Autobiography. जिसका जिक्र शुभ्रा जी इस संस्‍मरण में कर रही हैं। ये पुस्‍तक आप यहां से प्राप्‍त कर सकते हैं। शुभ्रा जी के बाक़ी लेख पढ़ने के लिए चटका लगायें यहां।


समाचार कक्ष से अपनी यादों की पिछली कड़ियाँ पढ़ रही थी,तो सोचा ऐसा क्यों हुआ कि वहां सिर्फ मेरी यादें हैं? क्या मुझसे पहले...बहुत पहले से.....समाचार तैयार नहीं होते थे, प्रसारित नहीं होते थे? कौन थे वह लोग जिन्होंने इस प्रसारण की शुरुआत की, इसके नियम-क़ायदे बनाये और एक अनवरत परम्परा की नींव रखी?

समाचार सेवा प्रभाग के पुस्तकालय में जिस अलमारी में इस विषय की पुस्तकें रखी जाती थीं, उसे खोलने पर पाया कि देश की जनसंख्या की ही तरह वहां भी पुस्तकों की संख्या में अप्रत्याशित किन्तु अपार वृद्धि हुई है. हो सकता है कि मैं इसे प्रसारण के इतिहास के प्रति जागरूकता और सही दिशा में उठा क़दम मानकर खुश हो लेती मगर इस गुब्बारे से हवा निकल गयी, जब पता चला कि अधिकतर पुस्तकें ऐतिहासिक दस्तावेज़ न होकर मात्र पत्रकारिता के विविध संस्थानों की परीक्षा पास करने के उद्देश्य से जुटायी गयी हैं. लेकिन कहावत है न कि - "जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पैठ" - सो मैं भी लगी रही....देर तक उस पोथी-समुद्र में डूबती-उतराती रही और आख़िरकार एक मोती ढूंढ लायी.

आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक श्री पी सी चैटर्जी ने एक आत्मकथात्मक पुस्तक लिखी थी .... यह तो मुझे मालूम था, लेकिन अपने करियर की शुरुआत उन्होंने समाचार कक्ष से की थी......यह ज्ञात नहीं था. बहरहाल मैंने वह पुस्तक इशु करायी और छुट्टियों के दौरान पढ़ने के लिए अपने साथ ले गयी. और फिर, जैसा कि आम तौर पर होता है, आने-जाने, मिलने-मिलाने और देखने-दिखाने के बीच पुस्तक पढ़ने का मौक़ा हाथ नहीं लगा. दिल्ली लौटने के बाद ही उसे पढ़ पायी. कुछ हिस्से बड़े रोचक लगे.....ख़ास तौर पर शुरुआती दौर के न्यूज़ रूम का वर्णन.... तो सोचा क्यों न उस समय की कुछ बातें रेडियोनामा के अपने पाठकों के साथ शेयर करूँ.

यह घटना १९४३ की है. चैटर्जी साहब के पिता लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ाते थे. बाद में वाइस प्रिंसिपल img037 और प्रिंसिपल भी बने. ख़ुद चटर्जी साहब ने भी वहीँ से दर्शन शास्त्र में एम ए किया था. वायु सेना के लिए चयन हो गया था लेकिन विमानों की कमी के कारण बुलावा नहीं आ रहा था. ख़ाली बैठे क्या करें....यही सोचते हुए दिल्ली में अपने एक मित्र तोतो गुप्ता को पत्र लिखा कि कोई नौकरी ध्यान में हो तो बताना. मित्र ने फ़ौरन जवाब दिया कि ऑल इंडिया रेडियो में भर्ती चल रही है. आवेदन भेज दो. चैटर्जी साहब को यह तक पता नहीं था कि किस पद के लिए भर्ती हो रही है....बस एक सादे काग़ज़ पर अपनी योग्यता लिखकर, एकाध प्रमाण-पत्रों के साथ डायरेक्टर न्यूज़ को भेज दी. जल्दी ही बुलावा भी आ गया और वे दिल्ली आ गये.

दिल्ली में वे विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार राय बहादुर निशिकांत सेन के यहाँ ठहरे. रजिस्ट्रार के बंगले से अलीपुर रोड के एक बंगले से चल रहे ऑल इंडिया रेडियो तक का रास्ता साइकिल से नापते हुए जब वे न्यूज़ रूम में दाख़िल हुए तब उनके मित्र तोतो गुप्ता ने उन्हें सीनियर असिस्टेंट न्यूज़ एडिटर श्री ए एन भनोट से मिलवाया, जो डायरेक्टर के बाद दूसरे सबसे बड़े अधिकारी थे. श्री भनोट ने उनसे कहा कि इंतजार करें. डायरेक्टर श्री चार्ल्स बार्न्स उन्हें बुलाएँगे.

चैटर्जी साहब शाम तक इंतजार करते रहे. पूरे दिन किसी ने उनसे कोई बात नहीं की. सभी लोग अपने काम में व्यस्त थे. संपादक आते-जाते रहे. स्टेनो को ख़बरें लिखवाते रहे. बुलेटिन प्रसारित होते रहे. आखिरकार शाम के करीब छः बजे श्री बार्न्स ने उन्हें बुलवा भेजा. चैटर्जी साहब ने लिखा है कि वे लगभग चालीस मिनट बार्न्स साहब के कमरे में रहे मगर उन्हें बैठने को नहीं कहा गया. बार्न्स साहब ने उन्हें वापस श्री भनोट के पास भेज दिया. भनोट जी ने उन्हें अलग-अलग दिन अलग-अलग शिफ्ट में ड्यूटी दी ताकि वे सभी शिफ्ट्स का कामकाज समझ सकें.

चैटर्जी साहब ने लिखा है कि उन दिनों अंग्रेज़ी में चार महत्त्वपूर्ण बुलेटिन प्रसारित होते थे. सवेरे आठ बजे, दोपहर डेढ़ बजे, शाम छः बजे और रात नौ बजे. सवेरे और रात के बुलेटिन १५-१५ मिनट के होते थे और दिन तथा शाम के बुलेटिन १०-१० मिनट के. अंग्रेज़ी के बुलेटिनों के ठीक बाद हिन्दुस्तानी के बुलेटिन प्रसारित किये जाते थे. चैटर्जी साहब ने इस बात को ख़ास तौर पर रेखांकित किया है कि ये बुलेटिन हिंदी या उर्दू में न होकर हिन्दुस्तानी में होते थे, यानी उस भाषा में जो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आसानी से समझ में आ सके. इसके बाद विभिन्न भारतीय भाषाओँ के १०-१० मिनट के बुलेटिन होते थे.

इन बुलेटिनों के संपादन का काम कुछ इस तरह बाँटा जाता था कि अंग्रेज़ी के लिए दो संपादक होते थे, जिनमें से एक ए एन ई और एक सब-एडिटर होता था. हिन्दुस्तानी के लिए ए एन ई या कोई अनुभवी सब होता था. भाषायी बुलेटिन दूसरे सब-एडिटर सँभालते थे. अंग्रेज़ी का बुलेटिन जैसे-जैसे बनता जाता था...उसकी कॉपी हिन्दुस्तानी और अन्य भाषायी एडिटरों के पास पहुँचती रहती थी. वही उनकी मास्टर कॉपी होती थी.

वैसे रॉयटर्स की ख़बरें टेलीप्रिंटर से आती रहती थीं और यू एन आई से भी दिन में ५-६ बार ख़बरों के टेक्स भेजे जाते थे. इनके अलावा लड़ाई की ख़बरों का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण स्रोत था बी बी सी. चैटर्जी साहब ने लिखा है कि बी बी सी से ख़बरें आती थीं, तब संपादक और स्टेनो हेडफ़ोन लगाकर बैठ जाते थे और यथाशक्ति, यथासंभव सभी समाचारों को नोट करने का प्रयास करते थे. अधिकारी उसी बुलेटिन को अच्छा समझते थे जो भाषा-शैली की दृष्टि से बी बी सी के सबसे निकट होता था.

भनोट साहब ने उन्हें यह सब देखने और सीखने को कहा था. सो, काफी समय तक देखने के बाद चैटर्जी साहब ने ए एन ई से काम माँगा. बड़े मनोयोग से ख़बर की प्रसारण-योग्य कॉपी बनायी लेकिन देखा कि ए एन ई ने उसे एक तरफ फेंक दिया. बेचारे मन मसोस कर रह गये. क्या करते. लेकिन जल्दी ही उन्हें अपनी योग्यता साबित करने का मौक़ा मिला.

तब तक ऑल इंडिया रेडियो का कार्यालय अलीपुर रोड से संसद मार्ग वाले प्रसारण भवन में स्थानांतरित हो गया था. इस वजह से काफी अव्यवस्था फैली हुई थी. उनके मित्र तो गुप्ता ने छुट्टी की अर्जी दी थी कि उनकी पत्नी किसी भी समय बच्चे को जन्म देने वाली थीं. लेकिन उनकी अर्जी कहीं इधर-उधर पड़ी रह गयी और उस पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. एक दिन सुबह ड्यूटी पर आने के बाद चैटर्जी साहब को पता लगा कि गुप्ता जी नहीं आएंगे और उन्हें सवेरे आठ बजे का बुलेटिन अकेले ही बनाना होगा. डायरेक्टर चार्ल्स बार्न्स पूरा बुलेटिन फोन पर पढ़वाकर सुनते थे. उस दिन भी सुना और प्रसारण की अनुमति दे दी.

कोई दस बजे भनोट साहब आये. चैटर्जी साहब ने उन्हें बताया कि गुप्ताजी नहीं आ सके. भनोट साहब का चेहरा फक्क पड़ गया. चिल्ला पड़े - तो फिर बुलेटिन किसने बनाया?

चैटर्जी साहब ने शांत भाव से कहा - मैंने.

भनोट बिगड़े - मुझे ख़बर क्यों नहीं की?

चैटर्जी साहब ने कहा - चिंता की कोई बात नहीं है. मैंने बार्न्स साहब को पढ़कर सुना दिया था और उनकी मंज़ूरी ले ली थी.

इसके बाद दोनों अधिकारियों के बीच जो भी सलाह-मशविरा हुआ हो उसका तो पता नहीं, लेकिन उस दिन से चैटर्जी साहब को अकेले बुलेटिन की ज़िम्मेदारी सौंपी जाने लगी.

चैटर्जी साहब की पुस्तक में यह प्रसंग पढ़ने के बाद से मैं बराबर सोच रही हूँ कि १९४३ के न्यूज़रूम से आज २०११ के न्यूज़रूम तक क्या और कितना परिवर्तन हुआ है. यह तो स्पष्ट है कि बुलेटिनों की संख्या बढ़ी है, उनकी अवधि बढ़ी है, तकनीकी प्रगति के कारण अब हम दूर दराज़ के संवाददाताओं की आवाजें सीधे बुलेटिनों में शामिल कर पाते हैं. लेकिन क्या आज भी न्यूज़रूम में पहली बार प्रवेश करने वाला व्यक्ति अपने आप को डायरेक्टर चार्ल्स बार्न्स  के सामने खड़ा हुआ नहीं पाता, क्या उसके मेहनत से किये गये काम को उठाकर एक तरफ नहीं फेंक दिया जाता और सबसे बड़ी बात यह कि क्या कोई उसे धैर्य के साथ उसका काम समझाता है?  

Wednesday, August 31, 2011

कथा लकीर के फ़कीरों की-न्‍यूज़-रूम ये शुभ्रा शर्मा कड़ी सात।

रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपनी यादें हमारे साथ बांट रही हैं। ये है इस श्रृंखला की सातवीं कड़ी। इस अंक में वे बात रही हैं कुछ 'लकीर के फ़कीरों' के बारे में। इस श्रृंखला के बाक़ी लेख यहां पढ़े जा सकते हैं।

अगस्त के महीने में न सिर्फ हम इतिहास को याद कर रहे थे, बल्कि इतिहास को बनते भी देख रहे थे. अन्ना के आन्दोलन का अंततः क्या हश्र होगा यह अभी से कहना कठिन है, लेकिन दिल्ली में रामलीला मैदान और इंडिया गेट पर जिस तरह के जन-पारावार को उमड़ते देखा, और देश के कोने-कोने से उसे जिस तरह का समर्थन मिलने की ख़बरें पढ़ी-सुनीं उससे इतना तो तय हो गया कि हम क्षेत्र-भाषा-जाति-वर्ग के कितने ही टुकड़ों में बँटे हुए क्यों न हों ......सबके सब भारतीय हैं....जब चाहें एक सुदृढ़ दीवार बनकर खड़े हो सकते हैं.

अपने मिनी भारत की यानी हमारे हिंदी न्यूज़ रूम की भी कुछ ऐसी ही कैफियत है. आपस में उलझते रहते हैं,cartoon-vulture-nasty-review-hurtful-writer एक-दूसरे की टांग खींचते रहते हैं, महीनों तक बोलचाल भी बंद हो जाती  है...लेकिन जब कभी अंग्रेज़ी न्यूज़ रूम का कोई व्यक्ति हमारे किसी सदस्य पर हावी होने की या उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता है...तब देखिये हमें. सुमित्रानंदन पन्त जी के शब्दों में कहूं तो ..."लोहे की दीवार गरजती" सामने आ खड़ी होती है. और अंग्रेज़ी न्यूज़ रूम ही क्यों, कभी-कभी हमारे अपने न्यूज़ रूम में कोई ऐसे अधिकारी आ जाते हैं, जो हमारी एकता को ललकार देते हैं.

एक ऐसे ही अधिकारी आये थे, जो थे तो ए एन ई (एसिस्टेंट न्यूज़ एडिटर) ही, लेकिन हमें सुधारने का बीड़ा उठा चुके थे. हममें से कोई भी जब न्यूज़ रूम में प्रविष्ट होता तो उनकी निगाहें घड़ी की तरफ उठ जाती थीं. शायद लेखा-जोखा रखते थे कि कौन कितने बजे आया और कितने बजे गया, दफ्तर के समय में से कितना समय व्यर्थ गंवाया.

राष्ट्र भाषा समिति की सिफारिश पर समाचार कक्ष में हिंदी में काम-काज को बढ़ावा देने के लिए हिंदी पूल की व्यवस्था शुरू हुई. समिति के सदस्यों को आमंत्रित किया गया था ताकि उसका विधिवत उद्घाटन कराया जा सके. कार्यक्रम साढ़े तीन बजे से था. हमारे अधिकारी जी बढ़िया कोट-पैंट पहनकर आये थे. वैसे उनकी ड्यूटी दिन शिफ्ट में थी, जो ३ बजे समाप्त हो जाती है. लेकिन वे अपने कोट की जेब में हाथ डाले, इधर-उधर घूमते हुए तैयारियों का जायज़ा ले रहे थे. तभी उनके घर से फ़ोन आया. शायद वे घर पर कहना भूल गये थे कि देर से पहुंचेंगे. बहरहाल, हमने सुना वे पत्नी से कह रहे थे - "समझती नहीं हो, हम अभी कैसे आ सकते हैं. इतना बड़ा कार्यक्रम है. हम अधिकारी हैं, हमें ही सब प्रबंध देखना है."

इसी के बाद हमने आधिकारिक तौर पर उनका नाम "अधिकारी जी" रख दिया था. उनकी अधिकारिता के अलग-अलग क़िस्से अलग-अलग लोगों से सुने जा सकते हैं. मेरे साथ जो हुआ, वो मैं आपको सुनाये देती हूँ. कोई टेस्ट मैच चल रहा था...शायद भारत और इंग्लैंड के बीच. अंग्रेज़ी का आइटम उन्होंने मुझे अनुवाद के लिए दिया. उसमें लिखा था आज मैच के "पैन- अल्टीमेट" दिन अमुक टीम ने इतने रन बनाये. मैंने अनुवाद करते हुए लिख दिया कि आज मैच के चौथे दिन....

अधिकारी जी बिगड़ गये. बोले - "यह चौथा दिन कहाँ से आ गया?"

मैंने कहा- यह ख़बर रोज़ जा रही है. आज चौथा दिन है.

कहने लगे - इस ख़बर में यह बात कहाँ लिखी है ?

मैंने चिढ़कर कहा - यहाँ तो पैन-अल्टीमेट लिखा है, तो क्या अंतिम दिन के पहले दिन लिखूं?

बोले - और नहीं तो क्या? यह तो लिखना ही पड़ेगा.

मैंने समझाने की कोशिश की कि महराज टेस्ट मैच ५ दिन का होता है और पैन-अल्टीमेट चौथा दिन ही है.

कहने लगे - वाह, क्या चार या छः दिन का नहीं हो सकता?

मैंने कहा कि अगर होता तो साफ लिखा होता कि चार दिन के इस टेस्ट-मैच में या छः दिन के मैच में....

लेकिन उन्हें नहीं मानना था नहीं माने.

इसी तरह के एक और अधिकारी से साबका पड़ा एक बार. उस दिन मेरी वाचन की ड्यूटी थी. रिहर्स कर रही थी. एक ख़बर पर नज़र पड़ी तो ठिठक गयी. लगा, कहीं कुछ गड़बड़ है. ख़बर ज़रा ध्यान से पढ़ी. कुछ ऐसा हुआ था कि एक मोटर नौका एर्णाकुलम से लक्ष-द्वीप के लिए रवाना हुई थी लेकिन उसका तट से संपर्क टूट गया था. इसके बाद के वाक्य से मैं चौंक गयी थी. लिखा था- हमारे कलकत्ता (हाँ, तब तक कलकत्ता ही था, कोलकाता नहीं हुआ था) संवाददाता ने बताया है कि .....

मैंने संपादक से कहा - एर्णाकुलम से नाव चली... लक्ष द्वीप जा रही थी...इसके बारे में भला कलकत्ता संवाददाता क्यों बोल रहा है?

संपादक महोदय ने पहले तो मेरी आपत्ति पर ही आपत्ति व्यक्त की. बोले- आपके साथ यही मुश्किल है, हर बात में तर्क करने लगती हैं.

लेकिन जब मैंने भारत के मानचित्र पर तीनों स्थान दिखाकर फिर अपनी आपत्ति दोहरायी तो बोले - अरे भाई, कलकत्ता संवाददाता छुट्टी मनाने वहां गया होगा. आपको इससे क्या मतलब? आप बाकी आइटम देखिये.

बात कुछ हज़म नहीं हुई वाले अंदाज़ में मैंने उनसे उस आइटम की अंग्रेज़ी कॉपी मांगी और तब तक मांगती रही, जब तक उन्होंने उसे ढूंढकर मेरे हवाले नहीं कर दिया. पता है, उसमें क्या लिखा था? जी हाँ, बिलकुल ठीक समझे आप. जल्दबाज़ी या गफ़लत में कालीकट का कलकत्ता हो गया था.

एक और अधिकारी थे, जिन्हें तमाम घरेलू बुलेटिनों से ज़्यादा फ़िक्र सुबह ०८५० के विदेश प्रसारण सेवा के बुलेटिन की थी. आम तौर पर ड्यूटी पर आते ही लोग सबसे पहले आठ बजे का बुलेटिन ध्यान से देखते-पढ़ते हैं. लेकिन इन सज्जन की तो बात ही कुछ और थी. आठ बजे का बुलेटिन किनारे धर देते और पूरे मनोयोग से ०८५० का बुलेटिन देखते. फिर पूछते किसने बनाया, किसने पढ़ा और ख़ुदा न खास्ता अगर दोनों में से कोई उनके सामने पड़ जाता तो ख़ैर नहीं थी. विदेश प्रसारण के बुलेटिन कैसे होने चाहिए- कैसे नहीं, इस पर अच्छा-ख़ासा भाषण सुनना पड़ता.

पहले अक्सर इस बुलेटिन पर कैजुअल संपादक और वाचक की ड्यूटी लगती थी लेकिन उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि केवल रेगुलर लोग ही यह बुलेटिन बनायेंगे और पढेंगे. उन दिनों मैं ज़्यादातर सुबह की शिफ्ट में ड्यूटी किया करती थी. सो हफ्ते में कम से कम तीन-चार दिन यह सौभाग्य मुझे प्राप्त होने लगा - पहले तो "सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बुलेटिन" बनाने या पढ़ने का और उसके बाद अधिकारी महोदय की लेक्चर क्लास अटेंड करने का. मुझे याद है एक बार जब मैं लगातार तीसरे दिन यह ड्यूटी कर रही थी, तब मेरे सहयोगी जोगिन्दर शर्मा मेरी मेज़ के पास आये, पानी छिड़का, लाल फूलों की माला चढ़ायी और अगरबत्ती जलाकर बोले - "लो, अब यह बलि का बकरा तैयार है".

Wednesday, August 17, 2011

'प्रसारण-भवन का इतिहास'- न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा (छठी कड़ी का संशोधित रूप)

रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। पिछली कड़ी में शुभ्रा जी ने आकाशवाणी के इतिहास का एक महत्‍वपूर्ण पन्ना था। लेकिन उन्‍हें बाद में लगा कि कुछ अनकहा रह गया। इसलिए उन्‍होंने इसमें कुछ और हिस्‍सा जोड़ा है। इसलिए हम इस कड़ी को revive करके प्रस्‍तुत कर रहे हैं। शुभ्रा जी की पूरी श्रृंखला यहां क्लिक करके पढ़ी जा सकती है।

फेसबुक पर रेडियोनामा और श्रोता बिरादरी समूह इन दिनों इतिहास के समंदर में गोते लगा रहे हैं. दो बड़े अवसर तब आये जब ३१ जुलाई को रफ़ी साहब को और ४ अगस्त को किशोर दा को ज़ोर-शोर से याद किया गया. कुछ पुराने रेडियो सेटों की चर्चा हुई.  प्रसारण के इतिहास के कुछ सुनहरे पलों का भी ज़िक्र हुआ.

वैसे भी हम भारतीयों के लिए अगस्त का महीना विशेष महत्त्व रखता है. सन बयालीस के "भारत छोड़ो" आन्दोलन और १५ अगस्त सन सैंतालिस के नेहरु जी के "ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी" उद्बोधन की याद दिलाने वाला महीना है यह. तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं भी अपने पाठकों के लिए इतिहास  के समंदर से एक मोती चुनकर लेती चलूँ.

अलग-अलग राज्यों के शौकिया रेडियो प्रसारणों को छोड़ दें तो अखिल भारतीय स्तर पर इंडियन स्टेट img036_thumb3 ब्रॉडकास्टिंग सर्विस के दिल्ली केंद्र से प्रसारण की विधिवत शुरुआत १ जनवरी १९३६ से हुई. १९ जनवरी को पहला समाचार बुलेटिन प्रसारित हुआ और उसी वर्ष ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो रखा गया.

शुरू-शुरू में ये प्रसारण १८, अलीपुर रोड पर स्थित एक कोठी से किये जाते थे. यह कोठी प्रसारण के उद्देश्य से तो बनी नहीं थी इसलिए इसमें ध्वनि नियंत्रण यानी साउण्ड-प्रूफिंग की व्यवस्था करना टेढ़ी खीर थी. हंसराज लूथरा साहब ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जब कभी किसी विशिष्ट व्यक्ति को रिकॉर्ड करना होता था, तब बाहर सड़क पर दो लोगों को खड़ा किया जाता, जो वहां से गुजरने वाली गाड़ियों से कुछ देर रुकने या कम से कम हॉर्न न बजाने का अनुरोध करते थे. बाद में साउण्ड-प्रूफिंग की कामचलाऊ व्यवस्था की गयी. अलीपुर रोड की यह कोठी सात साल तक दिल्ली केंद्र के तौर पर काम करती रही, जब तक कि संसद मार्ग स्थित प्रसारण भवन बनकर तैयार नहीं हो गया.

प्रसारण भवन की परिकल्पना और उसके निर्माण का श्रेय भारत के पहले प्रसारण नियंत्रक लियोनेल फ़ील्डन को जाता है. उनका कहना था कि प्रसारण भवन का डिज़ाइन कुछ ऐसा होना चाहिए कि स्थापत्य से ही उसके काम काज का आभास मिल सके. अगर आप साथ दिये चित्र को ध्यान से देखें तो पायेंगे कि वह आपको ग्रामोफोन रिकॉर्ड और स्पूल टेप की याद दिलाता है. रिकॉर्ड और टेप की तरह इस भवन का डिज़ाइन भी गोल चक्रों को केंद्र में रखकर किया गया है. सामने से देखने पर भवन के तीन चक्र नज़र आते हैं, जिन्हें ध्यान से देखें तो ऐसा लगता है जैसे टेप मशीन पर चढ़ा हुआ स्पूल टेप हो. प्रसारण भवन के बीचोबीच एक लम्बा ऊंचा गुम्बदनुमा चक्र है और दोनों सिरों पर कुछ छोटे दो चक्र हैं. तीनों को आपस में जोड़ते लम्बे गलियारे हैं, जिनके पीछे बने कमरों में कला, संस्कृति, साहित्य और संगीत की एक से एक दिग्गज हस्तियों को भरपूर मान-सम्मान और प्रोत्साहन मिला. पीछे की ओर एक चौथा चक्र भी है, जो संसद मार्ग से नज़र नहीं आता. प्रारंभ में हिंदी और अंग्रेज़ी के न्यूज़ रूम यहीं हुआ करते थे.

इस प्रसारण भवन का उद्घाटन ६ फरवरी १९४३ को हुआ. विश्व युद्ध का ज़माना था, इसलिए जल्दी-जल्दी में, लम्बे-चौड़े समारोह के बिना ही दिल्ली केंद्र यहाँ स्थानांतरित कर दिया गया. वर्ष २००३ में प्रसारण भवन की हीरक जयंती के अवसर पर एक स्मारिका प्रकाशित की गयी थी, जिसमें रेडियो से जुड़े बहुत सारे लोगों ने इस भवन के विषय में अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं. उनमें से कुछ मैं यहाँ आपके लिए चुरा लायी हूँ.

कमलेश्वर :

यह मात्र एक खूबसूरत इमारत नहीं, बल्कि सन १९४३ से लेकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सन १९४७ में जीती गयी आज़ादी के संघर्षपूर्ण इतिहास का तथा भारतीय लोकतंत्र की स्थापना व इस देश के संवैधानिक मान-मूल्यों का सबसे बड़ा अभिलेखागार और संग्रहालय भी है. यही वह इमारत है, जिसमें भारत की विविधतावादी समन्वित संस्कृति के स्वर, महान लोगों की आवाजें और शब्द सुरक्षित हैं. मैं जहाँ तक जानता हूँ, इसके आधार पर कह सकता हूँ कि संस्कृति, कलाओं और विचार का ऐसा अभिलेखागार दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है.

प्रो. गोपीचंद नारंग :

पार्लियामेंट स्ट्रीट पर ऑल इंडिया रेडियो की जगमगाती इमारत हम नौजवानों के दिलों की धडकनों में शामिल थी. आते-जाते मेरी निगाहें रह-रह कर इसकी तरफ उठती थीं. इसके दूधिया बरामदे और हरे-भरे लॉन अजीब बहार रखते थे.......इमारत के रखरखाव और सफाई सुथराई के अपने क़ायदे थे, जिनकी निहायत सख्ती से पाबंदी की जाती थी. ...पचास-पचपन साल की यादें और पुरानी बातों का एक रेला है जो काफिला-दर काफिला उम्दा चला आता है. कहाँ तक ज़िक्र किया जाये और क्या लिखा जाये.

       कुछ हवा तेज़ थी, खुली थी किताब

       एक पिछला वरक़ पलट आया.

भीष्म साहनी :

शाम का वक़्त रहा होगा जब मैंने पहली बार इसे देखा. यह बिल्डिंग अपने फैलाव के बावजूद मुझे बड़ी नाज़ुक सी नज़र आयी थी. इसमें अपनी एकविशेष कमनीयता थी, एक तरह का इकहरापन, कुछ-कुछ खिलौने जैसा हल्का-फुल्का. इमारत तो बहुत सी ज़मीन को घेरे हुए थी पर उसके निर्माण में एक छरहरापन सा था, जो आँखों को बंधता था. उस वक़्त शाम के साये उतर रहे थे, इस कारण भी उसकी छवि और भी प्रभावशाली लग रही थी.

रेवती सरन शर्मा :

क्या नाज़ुक सपने सी इमारत थी..... ऐसी हलकी-फुल्की, न आयताकार न चौकोर, न भव्य न ठोस, न किसी की देखी न किसी की सोची, गोलाकार भी और गोलाकार नहीं भी. लेखकों, गायकों और कल्पना में खोये लोगों के लिए ऐसी ही इमारत होनी चाहिए, जो किसी बड़े पक्षी के उड़कर आये पंख की तरह हौले से आकर धरती पर टिक जाए - बिना बोझ का, बिना जब्र का एहसास दिलाये.

तो इस परों सी उड़कर आयी और धरती पर हौले से टिक गयी इमारत में प्रवेश करते हुए मन में कैसे-कैसे ख्याल आते थे, आपको क्या बताऊँ. कुछ-कुछ "आज कल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे" वाली कैफियत होती थी. बीच वाले गुम्बद में प्रविष्ट होते ही सामने दीवार पर किम्वदंतियों सरीखे स्वामी हरिदास और तानसेन के पत्थर पर उत्कीर्ण चित्र जहाँ संगीत को ईश्वर की आराधना का माध्यम बनाने वालों की याद दिलाते; वहीँ पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर, भातखंडे जी, बड़े ग़ुलाम अली खान और फ़य्याज़ खान साहेब की आवक्ष प्रतिमाएं उसे जन-जन तक पहुँचने वालों का गुणगान करती नज़र आतीं.

बायीं ओर स्टूडियोज़ का प्रवेश द्वार है, जहाँ से अंदर जाते हुए मैं हमेशा ठिठक जाती थी और सोचने लगती थी कि अब तक न जाने कितनी विभूतियों ने इन्हीं स्टूडियोज़ में बैठकर अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करायी होंगी. देश की स्वतंत्रता की कितनी ढेर सारी खुशियों और देश के विभाजन के कैसे असहनीय दुःख को यहाँ से अभिव्यक्ति मिली होगी. साहित्य और संगीत के न जाने कितने दिग्गज इन्हीं गलियारों से होकर गुज़रे होंगे, हँसे-बोले होंगे, और उनकी आवाज़ यहाँ से हवा के पंख लगाकर सीधी लाखों करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दिलों तक पहुंची होगी. इतिहास की कितनी सारी घटनाओं का मूक साक्षी होगा यह.

अगर यह हमसे बातें कर सकता तो कितना कुछ कहता, कौन -कौन सी घटनाएँ सुनाता.... शायद ३ जून १९४७ की उस परिचर्चा का विवरण सुनाता, जब लॉर्ड माउन्टबेटन,जवाहर लाल नेहरु, मोहम्मद अली जिन्ना और बलदेव सिंह ने पहली बार पार्टीशन का कड़वा सच देश की जनता के सामने रखा था.

या फिर ३० जनवरी १९४८ की उस काली रात का हाल सुनाता जब नेहरु जी ने रुंधे गले से कहा था - हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है और चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा है.

या निरंतर आगे बढ़ते इस देश की तमाम सफलताओं को एक-एक कर गिनवाता ....१९७१ की विजय का उल्लास, पोखरण परमाणु परीक्षण, एशियाई खेलों का सफल आयोजन और अंतरिक्ष से आती राकेश शर्मा की आवाज़ - यहाँ से तो मैं बस यही कह सकता हूँ कि "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसतां हमारा" .....

बचपन से इस प्रसारण भवन में आती-जाती रही हूँ, पिछले २६ वर्षों से तो हर रोज़ ही आना हुआ है, लेकिन पहली बार गंगा में डुबकी लगाते समय जो क्षण भर के लिए साँस रुक जाने जैसी अनुभूति होती है, कुछ वैसा ही मेरे साथ प्रसारण भवन में प्रवेश करते समय भी होता है. अंदर आते ही कभी स्वामी हरिदास तो कभी बड़े ग़ुलाम अली खान साहब की तरफ आँखें घूम जाती हैं और तब अपना आप बहुत छोटा, बड़ा तुच्छ महसूस होता है. मैं जानबूझ कर स्टूडियो के प्रवेश द्वार पर लिखा गांधीजी का वह सन्देश पढ़ने लगती हूँ, जिसमें उन्होंने कहा था कि

"मैं यह नहीं चाहता कि मेरे घर के सारे दरवाज़े-खिड़कियाँ बंद कर दी जायें. मैं चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियाँ यहाँ हवा की तरह खुलकर आयें-जायें. लेकिन ऐसा भी न हो कि वे हवायें मेरे पैरों को मेरी ही ज़मीन से उखाड़ दें".

इतने लम्बे समय तक इतिहास के साक्षी रहे प्रसारण भवन में अब कुछ कार्यालय और कुछ रेकॉर्डिंग स्टूडियो ही शेष रह गये हैं. प्रसारण का लगभग पूरा काम-काज इस भवन के ठीक पीछे बने नये प्रसारण भवन या न्यू ब्रॉडकास्टिंग हाउस से होने लगा है.लाखों रूपये की लागत से बनी यह इमारत भी शानदार है, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन मेरे लिए इस इमारत के साथ वह तिलिस्म जुड़ा हुआ नहीं है, जो मेरे बी एच यानी पुराने प्रसारण भवन के साथ जुड़ा था, जिसमें पैर धरते ही मेरा सर अचानक, अनायास गर्व से ऊंचा हो जाता था.

Wednesday, August 10, 2011

प्रसारण भवन का इतिहास: 'न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा' कड़ी 6 (संशोधित)

रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। पिछली कड़ी में रेडियो-जगत में चाय-पुराण की बातें की गयी थीं। चूंकि इन दिनों हम रेडियो के इतिहास में खूब ग़ोते लगा रहे हैं इसलिए शुभ्रा जी ने इस बार आकाशवाणी के इतिहास का एक महत्‍वपूर्ण पन्‍ना पेश किया है। शुभ्रा जी की पूरी श्रृंखला यहां क्लिक करके पढ़ी जा सकती है।

फेसबुक पर रेडियोनामा और श्रोता बिरादरी समूह इन दिनों इतिहास के समंदर में गोते लगा रहे हैं. दो बड़े अवसर तब आये जब ३१ जुलाई को रफ़ी साहब को और ४ अगस्त को किशोर दा को ज़ोर-शोर से याद किया गया. कुछ पुराने रेडियो सेटों की चर्चा हुई.  प्रसारण के इतिहास के कुछ सुनहरे पलों का भी ज़िक्र हुआ.

वैसे भी हम भारतीयों के लिए अगस्त का महीना विशेष महत्त्व रखता है. सन बयालीस के "भारत छोड़ो" आन्दोलन और १५ अगस्त सन सैंतालिस के नेहरु जी के "ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी" उद्बोधन की याद दिलाने वाला महीना है यह. तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं भी अपने पाठकों के लिए इतिहास  के समंदर से एक मोती चुनकर लेती चलूँ.

अलग-अलग राज्यों के शौकिया रेडियो प्रसारणों को छोड़ दें तो अखिल भारतीय स्तर पर इंडियन स्टेट img036 ब्रॉडकास्टिंग सर्विस के दिल्ली केंद्र से प्रसारण की विधिवत शुरुआत १ जनवरी १९३६ से हुई. १९ जनवरी को पहला समाचार बुलेटिन प्रसारित हुआ और उसी वर्ष ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो रखा गया.

शुरू-शुरू में ये प्रसारण १८, अलीपुर रोड पर स्थित एक कोठी से किये जाते थे. यह कोठी प्रसारण के उद्देश्य से तो बनी नहीं थी इसलिए इसमें ध्वनि नियंत्रण यानी साउण्ड-प्रूफिंग की व्यवस्था करना टेढ़ी खीर थी. हंसराज लूथरा साहब ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जब कभी किसी विशिष्ट व्यक्ति को रिकॉर्ड करना होता था, तब बाहर सड़क पर दो लोगों को खड़ा किया जाता, जो वहां से गुजरने वाली गाड़ियों से कुछ देर रुकने या कम से कम हॉर्न न बजाने का अनुरोध करते थे. बाद में साउण्ड-प्रूफिंग की कामचलाऊ व्यवस्था की गयी. अलीपुर रोड की यह कोठी सात साल तक दिल्ली केंद्र के तौर पर काम करती रही, जब तक कि संसद मार्ग स्थित प्रसारण भवन बनकर तैयार नहीं हो गया.

प्रसारण भवन की परिकल्पना और उसके निर्माण का श्रेय भारत के पहले प्रसारण नियंत्रक लियोनेल फ़ील्डन को जाता है. उनका कहना था कि प्रसारण भवन का डिज़ाइन कुछ ऐसा होना चाहिए कि स्थापत्य से ही उसके काम काज का आभास मिल सके. अगर आप साथ दिये चित्र को ध्यान से देखें तो पायेंगे कि वह आपको ग्रामोफोन रिकॉर्ड और स्पूल टेप की याद दिलाता है. रिकॉर्ड और टेप की तरह इस भवन का डिज़ाइन भी गोल चक्रों को केंद्र में रखकर किया गया है. सामने से देखने पर भवन के तीन चक्र नज़र आते हैं, जिन्हें ध्यान से देखें तो ऐसा लगता है जैसे टेप मशीन पर चढ़ा हुआ स्पूल टेप हो. प्रसारण भवन के बीचोबीच एक लम्बा ऊंचा गुम्बदनुमा चक्र है और दोनों सिरों पर कुछ छोटे दो चक्र हैं. तीनों को आपस में जोड़ते लम्बे गलियारे हैं, जिनके पीछे बने कमरों में कला, संस्कृति, साहित्य और संगीत की एक से एक दिग्गज हस्तियों को भरपूर मान-सम्मान और प्रोत्साहन मिला. पीछे की ओर एक चौथा चक्र भी है, जो संसद मार्ग से नज़र नहीं आता. प्रारंभ में हिंदी और अंग्रेज़ी के न्यूज़ रूम यहीं हुआ करते थे.

इस प्रसारण भवन का उद्घाटन ६ फरवरी १९४३ को हुआ. विश्व युद्ध का ज़माना था, इसलिए जल्दी-जल्दी में, लम्बे-चौड़े समारोह के बिना ही दिल्ली केंद्र यहाँ स्थानांतरित कर दिया गया. वर्ष २००३ में प्रसारण भवन की हीरक जयंती के अवसर पर एक स्मारिका प्रकाशित की गयी थी, जिसमें रेडियो से जुड़े बहुत सारे लोगों ने इस भवन के विषय में अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं. उनमें से कुछ मैं यहाँ आपके लिए चुरा लायी हूँ.

कमलेश्वर :

यह मात्र एक खूबसूरत इमारत नहीं, बल्कि सन १९४३ से लेकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सन १९४७ में जीती गयी आज़ादी के संघर्षपूर्ण इतिहास का तथा भारतीय लोकतंत्र की स्थापना व इस देश के संवैधानिक मान-मूल्यों का सबसे बड़ा अभिलेखागार और संग्रहालय भी है. यही वह इमारत है, जिसमें भारत की विविधतावादी समन्वित संस्कृति के स्वर, महान लोगों की आवाजें और शब्द सुरक्षित हैं. मैं जहाँ तक जानता हूँ, इसके आधार पर कह सकता हूँ कि संस्कृति, कलाओं और विचार का ऐसा अभिलेखागार दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है.

प्रो. गोपीचंद नारंग :

पार्लियामेंट स्ट्रीट पर ऑल इंडिया रेडियो की जगमगाती इमारत हम नौजवानों के दिलों की धडकनों में शामिल थी. आते-जाते मेरी निगाहें रह-रह कर इसकी तरफ उठती थीं. इसके दूधिया बरामदे और हरे-भरे लॉन अजीब बहार रखते थे.......इमारत के रखरखाव और सफाई सुथराई के अपने क़ायदे थे, जिनकी निहायत सख्ती से पाबंदी की जाती थी. ...पचास-पचपन साल की यादें और पुरानी बातों का एक रेला है जो काफिला-दर काफिला उम्दा चला आता है. कहाँ तक ज़िक्र किया जाये और क्या लिखा जाये.

       कुछ हवा तेज़ थी, खुली थी किताब

       एक पिछला वरक़ पलट आया.

भीष्म साहनी :

शाम का वक़्त रहा होगा जब मैंने पहली बार इसे देखा. यह बिल्डिंग अपने फैलाव के बावजूद मुझे बड़ी नाज़ुक सी नज़र आयी थी. इसमें अपनी एकविशेष कमनीयता थी, एक तरह का इकहरापन, कुछ-कुछ खिलौने जैसा हल्का-फुल्का. इमारत तो बहुत सी ज़मीन को घेरे हुए थी पर उसके निर्माण में एक छरहरापन सा था, जो आँखों को बंधता था. उस वक़्त शाम के साये उतर रहे थे, इस कारण भी उसकी छवि और भी प्रभावशाली लग रही थी.

रेवती सरन शर्मा :

क्या नाज़ुक सपने सी इमारत थी..... ऐसी हलकी-फुल्की, न आयताकार न चौकोर, न भव्य न ठोस, न किसी की देखी न किसी की सोची, गोलाकार भी और गोलाकार नहीं भी. लेखकों, गायकों और कल्पना में खोये लोगों के लिए ऐसी ही इमारत होनी चाहिए, जो किसी बड़े पक्षी के उड़कर आये पंख की तरह हौले से आकर धरती पर टिक जाए - बिना बोझ का, बिना जब्र का एहसास दिलाये.


तो इस परों सी उड़कर आयी और धरती पर हौले से टिक गयी इमारत में प्रवेश करते हुए मन में कैसे-कैसे ख्याल आते थे, आपको क्या बताऊँ. कुछ-कुछ "आज कल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे" वाली कैफियत होती थी. बीच वाले गुम्बद में प्रविष्ट होते ही सामने दीवार पर किम्वदंतियों सरीखे स्वामी हरिदास और तानसेन के पत्थर पर उत्कीर्ण चित्र जहाँ संगीत को ईश्वर की आराधना का माध्यम बनाने वालों की याद दिलाते; वहीँ पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर, भातखंडे जी, बड़े ग़ुलाम अली खान और फ़य्याज़ खान साहेब की आवक्ष प्रतिमाएं उसे जन-जन तक पहुँचने वालों का गुणगान करती नज़र आतीं.

बायीं ओर स्टूडियोज़ का प्रवेश द्वार है, जहाँ से अंदर जाते हुए मैं हमेशा ठिठक जाती थी और सोचने लगती थी कि अब तक न जाने कितनी विभूतियों ने इन्हीं स्टूडियोज़ में बैठकर अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करायी होंगी. देश की स्वतंत्रता की कितनी ढेर सारी खुशियों और देश के विभाजन के कैसे असहनीय दुःख को यहाँ से अभिव्यक्ति मिली होगी. साहित्य और संगीत के न जाने कितने दिग्गज इन्हीं गलियारों से होकर गुज़रे होंगे, हँसे-बोले होंगे, और उनकी आवाज़ यहाँ से हवा के पंख लगाकर सीधी लाखों करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दिलों तक पहुंची होगी. इतिहास की कितनी सारी घटनाओं का मूक साक्षी होगा यह.

अगर यह हमसे बातें कर सकता तो कितना कुछ कहता, कौन -कौन सी घटनाएँ सुनाता.... शायद ३ जून १९४७ की उस परिचर्चा का विवरण सुनाता, जब लॉर्ड माउन्टबेटन,जवाहर लाल नेहरु, मोहम्मद अली जिन्ना और बलदेव सिंह ने पहली बार पार्टीशन का कड़वा सच देश की जनता के सामने रखा था.

या फिर ३० जनवरी १९४८ की उस काली रात का हाल सुनाता जब नेहरु जी ने रुंधे गले से कहा था - हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है और चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा है.

या निरंतर आगे बढ़ते इस देश की तमाम सफलताओं को एक-एक कर गिनवाता ....१९७१ की विजय का उल्लास, पोखरण परमाणु परीक्षण, एशियाई खेलों का सफल आयोजन और अंतरिक्ष से आती राकेश शर्मा की आवाज़ - यहाँ से तो मैं बस यही कह सकता हूँ कि "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसतां हमारा" .....

बचपन से इस प्रसारण भवन में आती-जाती रही हूँ, पिछले २६ वर्षों से तो हर रोज़ ही आना हुआ है, लेकिन पहली बार गंगा में डुबकी लगाते समय जो क्षण भर के लिए साँस रुक जाने जैसी अनुभूति होती है, कुछ वैसा ही मेरे साथ प्रसारण भवन में प्रवेश करते समय भी होता है. अंदर आते ही कभी स्वामी हरिदास तो कभी बड़े ग़ुलाम अली खान साहब की तरफ आँखें घूम जाती हैं और तब अपना आप बहुत छोटा, बड़ा तुच्छ महसूस होता है. मैं जानबूझ कर स्टूडियो के प्रवेश द्वार पर लिखा गांधीजी का वह सन्देश पढ़ने लगती हूँ, जिसमें उन्होंने कहा था कि

"मैं यह नहीं चाहता कि मेरे घर के सारे दरवाज़े-खिड़कियाँ बंद कर दी जायें. मैं चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियाँ यहाँ हवा की तरह खुलकर आयें-जायें. लेकिन ऐसा भी न हो कि वे हवायें मेरे पैरों को मेरी ही ज़मीन से उखाड़ दें".

इतने लम्बे समय तक इतिहास के साक्षी रहे प्रसारण भवन में अब कुछ कार्यालय और कुछ रेकॉर्डिंग स्टूडियो ही शेष रह गये हैं. प्रसारण का लगभग पूरा काम-काज इस भवन के ठीक पीछे बने नये प्रसारण भवन या न्यू ब्रॉडकास्टिंग हाउस से होने लगा है.लाखों रूपये की लागत से बनी यह इमारत भी शानदार है, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन मेरे लिए इस इमारत के साथ वह तिलिस्म जुड़ा हुआ नहीं है, जो मेरे बी एच यानी पुराने प्रसारण भवन के साथ जुड़ा था, जिसमें पैर धरते ही मेरा सर अचानक, अनायास गर्व से ऊंचा हो जाता था.

Wednesday, July 27, 2011

चाय-पुराण-'न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा' कड़ी 5

रेडियो वालों (रेडियो कर्मचारियों और श्रोताओं दोनों) का काम चाय के बिना नहीं चल सकता। दिलचस्‍प बात ये है कि कई महत्‍त्‍‍वपूर्ण आयडियाज़ 'चाय-पान' के दौरान ही आते हैं। इस एक चाय ने जाने कितने गुल खिलाए हैं रेडियो में। आज जानी-मानी न्‍यूज़-रीडर शुभ्रा शर्मा अपनी श्रृंखला में लेकर आईं हैं समाचार-कक्ष का चाय-पुराण।  


हमारे हिंदी समाचार कक्ष में जितना महत्त्व अनुवाद, संपादन और वाचन का है, उतना ही चाय का भी है. जब तक बुलेटिन का प्रसारण नहीं होता तब तक यही तीनों बातें सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बनी रहती हैं. लेकिन बुलेटिन पूरा होते ही सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न होता है कि आज चाय कौन पिलाएगा. बात दो-चार चाय की तो होती नहीं. न्यूज़ रूम में एक समय में कम से कम पंद्रह चायार्थी मौजूद होते हैं. ऐसे में बेचारे चाय पिलाने वाले को भी सोचना पड़ता है....किसे याद रक्खूँ, किसे भूल जाऊँ ....

जन्मदिन, विवाह की सालगिरह, बच्चों के परीक्षा परिणाम जैसे विशेष अवसर हों तो लोग ख़ुद ही ख़ुशी-ख़ुशी चाय मंगवा देते हैं. नयी गाड़ी, नया फ्लैट या नयी पोस्टिंग भी इसी श्रेणी में आती है, जब चाय पिलायी जाती है.

कुछ दोयम दर्जे के अवसर भी आते हैं...जैसे अख़बार में नाम या फोटो छपना, मोहल्ले या शहर स्तर का Publication1कोई पुरस्कार मिलना, बच्चे को मनचाहे कॉलेज में प्रवेश मिलना, चिटफंड या लॉटरी जीतना, वगैरह वगैरह.... लोग इन अवसरों को  छिपाने की कोशिश में रहते हैं लेकिन किसी न किसी स्रोत से ख़बर न्यूज़ रूम तक पहुँच ही जाती है और चाय पिलाना लाज़मी हो जाता है.

पुरानी परंपरा के अनुसार पहली बार मेजर बुलेटिन (जैसे सुबह आठ या रात पौने नौ बजे का) पढ़ने या बनाने वाले को भी चाय पिलानी पड़ती है. अगर वह इस परंपरा को निभाने में आनाकानी करे तो उसे सहज ही छोड़ा नहीं जाता. वसूली करने वाले बड़े सख्त दिल लोग हैं. बातों से टाले नहीं जा सकते. इनमें मेरा नाम भी काफ़ी ऊपर आता है. ऊपर लिखी बातों के अलावा मैंने कमीज़ या साड़ी सुन्दर लगने के उपलक्ष में भी भाई लोगों को चाय पिलवायी है. बल्कि हमारे एक सहयोगी जोगिन्दर शर्मा तो यहाँ तक कहते थे कि ये काशी की बाम्हन सुबह-सुबह जजमान की तलाश में ही ऑफिस आती है. 

इन तमाम गौरवशाली परम्पराओं के बावजूद कई दिन ऐसे भी होते हैं जब कोई जजमान हाथ नहीं लगता, तब ख़ुद ही पैसे ख़र्च कर चाय पीनी पड़ती है. हालाँकि इसमें बड़ा जी दुखता है.

एक बार यह नयी परंपरा शुरू करने की भी कोशिश हुई कि हर व्यक्ति सिर्फ अपनी चाय के पैसे दे लेकिन इतनी अधिक लोकतान्त्रिक परंपरा हिंदी समाचार कक्ष में निभ नहीं सकी. छुट्टे पैसों यानी चिल्लर का अभाव भी इसके आड़े आया.

दरअसल हमारे इस चाय प्रेम के लिए काफ़ी हद तक शिफ्ट ड्यूटी भी ज़िम्मेदार है. सुबह की ड्यूटी हो तो नींद भगाने के लिए, दोपहर की हो तो काम का मूड बनाने के लिए और शाम की हो तो खाना हज़म करने के लिए चाय की ज़रुरत पड़ती ही है.

अबसे कोई बीस साल पहले की याद करूँ तो सुबह की ड्यूटी तब इतने सवेरे शुरू होती थी कि घर से निकलते समय चाह कर भी कुछ खाया नहीं जा सकता था. आठ बजे के बुलेटिन तक पूरा ध्यान उसी में लगा रहता था. लेकिन सवा आठ के बाद इतने ज़ोर की भूख लगती कि संयम नहीं होता था. ऐसे में वो गाना याद आता था.....कहाँ जायें हम दो मोहब्बत के मारे .... अंतर सिर्फ इतना था कि यहाँ मोहब्बत के बजाय भूख के मारे होते थे और दो से कहीं ज़्यादा होते थे.

आकाशवाणी की कैंटीन में तब तक चूल्हा जलने की प्रक्रिया शुरू हो रही होती थी, जबकि वहां से थोड़ी सी दूरी पर समाचार एजेंसी यू एन आई की कैंटीन में तब तक न सिर्फ चूल्हा जल चुका होता था, बल्कि इडली-उपमा-वडा भी तैयार हो चुका होता था. इसलिए हम सब अक्सर बच्चन जी के शब्दों में ..... बस वही एक राह पकड़कर चल पड़ते थे और इच्छानुसार नाश्ता पा जाते थे.

विशेष अवसरों पर अच्छे बुलेटिन की शाबाशी के रूप में भी चाय-नाश्ते की परंपरा थी. मुझे याद है, वह १५  अगस्त पर मेरी पहली ड्यूटी थी. लाल क़िले से प्रधान मंत्री के भाषण का सीधा प्रसारण होना था और उसके फ़ौरन बाद हिंदी का बुलेटिन जाना था. भाषण का आलेख नहीं था, टीवी या रेडियो से सीधा प्रसारण सुनकर उसे नोट करना था....फिर उसे न्यूज़ आइटम के रूप में सम्पादित करना था और महत्त्वपूर्ण बातों का हेडलाइन के रूप में उल्लेख करना था. इन सब कामों के लिए वरिष्ठ संपादक और स्टेनो पहले से तैनात थे लेकिन फिर भी यूनिट के प्रभारी अविनाश गोयल जी बराबर मौजूद थे. हर व्यक्ति को सहयोग दे रहे थे, हर काम पर बारीकी से नज़र रख रहे थे. बुलेटिन के प्रसारण के बाद उन्होंने सबको बधाई दी और कलेवा (गोल मार्केट की एक प्रसिद्ध मिठाई की दुकान) से बढ़िया नाश्ता मंगवाकर सबको खिलाया.

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बुलेटिन की किसी बारीकी को लेकर दो-तीन लोगों में मतभेद हो जाता है, या फिर

किसी राजनीतिक या साहित्यिक विषय पर गर्मागर्म बहस छिड़ जाती है, तब उनका कैंटीन में बैठकर, चाय की चुस्कियों के साथ मुद्दे की उलझन को सुलझाना तो समझ में आता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो बिला वजह, सिर्फ पैसे बचाने की नीयत से, चुपचाप एक-दो लोगों के साथ खिसक जाते हैं और चाय-पानी कर आते हैं.

ऐसे एक सज्जन के बारे में मुझे भी बताया गया था. कहा तो यहाँ तक गया था कि इनसे चाय पीकर दिखाओ तो जानें. मैंने चुनौती स्वीकार कर ली और मौके की तलाश में रहने लगी. उन्हीं दिनों पुणे में राष्ट्रीय खेलों का आयोजन हुआ. आकाशवाणी की ओर से उन सज्जन को कवरेज पर भेजा गया. उन दिनों स्टेट्समैन अख़बार में हर हफ्ते 'लिसनिंग पोस्ट' नाम से आकाशवाणी के कार्यक्रमों की समीक्षा छपा करती थी. उस कॉलम में खेलों की कवरेज की काफी प्रशंसा छपी. मैंने उसे काटकर नोटिस बोर्ड पर चस्पाँ कर दिया. वे जब पुणे से लौटकर आये तो मैंने उन्हें बधाई दी और वह कटिंग दिखाई. वे बड़े खुश हुए. बस, लोहा गर्म देख मैंने फ़ौरन वार किया.

कहा - देखिये, आपकी इतनी तारीफ छपी है, हम सब की चाय तो बनती है न?

पीछे से किसी ने आवाज़ लगायी - नहीं जी, इस पर तो पकौड़े और बर्फी भी बनती है.

न्यूज़ रूम में तब तेरह लोग मौजूद थे. किसी ने इंकार नहीं किया. सब यही कहते गये कि हाँ-हाँ, बड़ी ख़ुशी की बात है. हम भी खायेंगे.

लेकिन असली मज़ा तब आया, जब उस दिन की दावत से वंचित रह गये हमारे एक साथी ने कहा - शुभ्रा, सुना है कि तूने तो कटड़ा दुह लिया. 

'न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा' इस श्रृंखला की बाक़ी कडियां पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए।

Wednesday, July 13, 2011

तिनके विच जान--'न्यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा' कड़ी 4

रेडियोनामा पर जानी-मानी न्‍यूज़-रीडर शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं--'न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा'। ये इस श्रृंखला की चौथी कड़ी है जिसमें वो समाचार-लेखन और संपादन की बारीकियों से अवगत करा रही हैं।


रात भर की ड्यूटी में ठीक-ठाक प्रदर्शन रहा होगा, क्योंकि जल्दी ही मेरी ड्यूटी रात दस और ग्यारह बजे के बुलेटिन पढ़ने पर भी लगने लगी थी. अधिकतर रात की पारी हम कैजुअल लोग ही सँभालते थे. कभी-कभी कुछ महत्त्वपूर्ण दिनों में नियमित लोग भी रात की ड्यूटी करते थे. जैसे कि एक बार बजट का दिन था. पौने नौ के बुलेटिन के बाद शाम की शिफ्ट के सभी लोग जा रहे थे. मैं छह-सात पन्नों का बजट का आइटम देखकर बहुत परेशान थी कि इसे कहाँ से और कैसे काटूँगी. पाँच मिनट के बुलेटिन में काटना ज़रूरी था जबकि मुझे हर बात महत्त्वपूर्ण लग रही थी. ऐसे में पता चला कि एक नियमित संपादक ड्यूटी पर हैं, जो आगे के बुलेटिन बनायेंगे. कुछ हिम्मत बढ़ी, लेकिन उनकी काटने की कला देखकर मैं दंग रह गयी. मसलन उन्होंने गेहूं के दाम बढ़ाये तो अरहर-चने के काट दिए, पेट्रोल- डीज़ल के बढ़ाये तो मिटटी के तेल और रसोई गैस के काट दिए, आयात की बात बतायी तो निर्यात की ग़ायब कर दी. बहरहाल मैं इस बात से खुश थी कि मुझे अपना दिमाग़ लगाये बग़ैर बना-बनाया बुलेटिन मिल गया था.

रात की शिफ्ट की एक घटना और याद आ रही है. भुवन चन्द्र खंडूरी (उत्तराखंड के पूर्व मुख्य मंत्री नहीं, हमारे एक सहायक संपादक) हिंदी समाचार कक्ष में नये-नये आये थे और रात की ड्यूटी कर रहे थे. तब तक रात भर, हर घंटे अंग्रेज़ी और हिंदी के पाँच-पाँच मिनट के बुलेटिन शुरू हो गये थे. लेकिन उनका क्रम एक सा नहीं था, कभी हिंदी का पहले होता तो कभी अंग्रेज़ी का. बार-बार चार्ट देखना पड़ता था कि हमारा बुलेटिन तीन बजे है या तीन बजकर पाँच मिनट पर. खंडूरी जी और मैं बुलेटिन तैयार करके बैठे थे कि समय हो तो पढ़ने जायें. रेडियो धीमी आवाज़ में चला रखा था. तभी अनाउंसर ने क्यू दिया - अब आप समाचार सुनेंगे. पहले अंग्रेज़ी और उसके बाद हिंदी में.

लेकिन ये क्या? ....समाचार शुरू ही नहीं हुए.

मुझे लगा कहीं ऐसा तो नहीं, हिंदी का बुलेटिन पहले जाना हो.

मैं फ़ौरन बुलेटिन लेकर स्टूडियो की तरफ दौड़ी. पीछे-पीछे खंडूरी जी भी थे.

उन्होंने कहा भी कि मैं देखकर आया हूँ, अभी हमारा नहीं अंग्रेज़ी का बुलेटिन है.

लेकिन मुझे लग रहा था कि पांच मिनट तक आकाशवाणी से कोई प्रसारण न होना तो बड़ी लज्जाजनक बात होगी. इस तर्क के साथ मैं अंग्रेज़ी के समाचार स्टूडियो में चली गयी और वहां से अपना हिंदी का बुलेटिन पढ़ना शुरू कर दिया. इसी बीच अंग्रेज़ी के समाचार वाचक भी पहुँच गये थे. खंडूरी जी ने उन्हें बाहर ले जाकर स्थिति समझायी और उन्होंने पाँच मिनट बाद हिंदी के स्टूडियो से अपना बुलेटिन पढ़ा.

बाद में इस गफ़लत के लिए अंग्रेज़ी समाचार वाचक के साथ मुझे भी मेमो मिला, जिसमें कहा गया था कि आइन्दा मैं अपने काम से काम रखूँ. सफ़ाई देने का कोई मौक़ा नहीं. बस एकतरफ़ा नसीहत !

मुझे बड़ा ग़ुस्सा आया. मैंने आकाशवाणी को ब्रेक डाउन से बचाया और वे मुझे ही ग़लत साबित कर रहे हैं. तब शांत हुई जब पापा ( आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा ) ने मुझे समझाया कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी सिर्फ तुम्हारे चंक की है. अंग्रेज़ी की जगह तो तुमने भर दी लेकिन अगर तुम्हारे चंक पर ब्लैंक जाता तो वह और भी गंभीर अपराध होता.

जिन दिनों रात के साथ तड़के शिफ्ट की भी ड्यूटी करती थी, उन दिनों कुछ ऐसे लोग भी आते थे जिनका या तो स्कूटर स्टार्ट नहीं होता था या फिर ऑफिस की गाड़ी छोड़कर चली आती थी. जब कई बार....लगातार... उनसे  देर से आने का यह कारण सुन चुके तो हम सब सतर्क हो गये और एक दूसरे को आगाह करने लगे कि भैया, इनकी ड्यूटी हो तो छह बजे की तैयारी ख़ुद ही कर लेना  ....क्योंकि वे बस ऐसे समय पहुंचेंगे कि आपके बनाये बुलेटिन को थोड़ा सा उलट-पुलट कर मंज़ूरी दे देंगे और स्टूडियो ले जाकर पढ़वा देंगे. यह अनौपचारिक अनुवाद और संपादन  करते- करते हमें तनाव के माहौल में, जल्दी-जल्दी में काम करने की आदत होने लगी.

वैसे विधिवत अनुवाद सीखने की शुरुआत शाम की शिफ्ट में हुई थी. पहले-पहल वर्षा और बाढ़ के समाचार अनुवाद के लिए दिए गये. मैंने उन्हीं में अपना पूरा पांडित्य झोंक दिया -

"ब्रह्मपुत्र एवं उसकी अनुवर्ती नदियों के जल स्तर में अत्यंत तीव्रता से वृद्धि हो रही है. असम में अभूतपूर्व बाढ़ की परिस्थितयां उत्पन्न हो गयी हैं."

इसे लेकर मैं सीधे ब्रजराज तिवारी जी के पास पहुँच गयी, जो उस दिन पौने नौ के बुलेटिन के सुपरवाइज़र थे. उनसे कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं मिली बल्कि उन्होंने बड़े शांत भाव से मुझे सुभाष सेतिया जी के पास भेज दिया. सेतिया जी ने एक नज़र अनुवाद पर डाली, एक नज़र मुझ पर, और पूछा - कहाँ से आई हैं आप?

मैंने बड़े गर्व से बताया कि मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम ए और पी एच डी की है.

सेतिया जी ने चुन-चुन कर सजाये मेरे सारे शब्दों पर बांये हाथ से एक आड़ी रेखा खींची और ऊपर लिखा - "असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का पानी चढ़ने से बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है."

उस दिन प्रसारण का यह सबसे महत्त्वपूर्ण पाठ सीखा कि रेडियो कम्युनिकेशन का माध्यम है, ज्ञान प्रदर्शन का नहीं. जब वही बात सीधे सादे शब्दों में कही जा सकती है, तो बेवजह बड़े बड़े शब्दों का प्रयोग क्यों किया जाये? बनारस में पढ़ते समय, जिस संस्कृतनिष्ठ भाषा का प्रयोग बड़े मनोयोग से सीखा था, उसे भुलाने में काफी समय लगा लेकिन अब वही भाषा बोलती और लिखती हूँ, जो ज़्यादा से ज़्यादा लोग आसानी से समझ सकें.

सेतिया जी को मैं आज भी गुरु मानती हूँ क्योंकि अगर उस दिन उन्होंने "जल स्तर में वृद्धि" को काटकर "पानी चढ़ना" न सिखाया होता तो शायद मैं इतनी तेज़ी से आगे नहीं बढ़ पाती.

उन्होंने एक बात और सिखाई थी, जिसे मैंने आज तक पल्ले से बाँध रखा है. कहने लगे कि अगर अच्छा संपादक बनना है तो समाचारों को पूरी बेरहमी से काटना सीखो. अगर शब्दों का मोह करोगी तो बुलेटिन के साथ नाइंसाफी होगी.

सेतिया जी अवकाश ग्रहण कर चुके हैं, लेकिन सुपरवाइज़र के तौर पर अब भी ड्यूटी करते हैं. और रेडियो के नियमित श्रोता तो हैं ही. जब कभी किसी कार्यक्रम की प्रस्तुति, या किसी क्रिस्प हेडलाइन, या किसी बुलेटिन के सम्पादन पर उनसे शाबाशी मिलती है तो बड़ी अतोल ख़ुशी होती है.

किसी सरकारी नियम के तहत हमसे पहले के कुछ समाचारवाचक केवल वाचन का काम करते थे, जबकि कुछ लोग वाचन के साथ-साथ संपादन की दोहरी भूमिका निभाते थे. मेरे आने तक पहले वर्ग में केवल विनोद कश्यप जी और रामानुज जी रह गये थे, बाक़ी सभी लोग संपादन भी करते थे. इंदु जी और मनोज जी की कार्य शैली को निकट से जानने- समझने का मुझे अवसर नहीं मिला लेकिन और लोगों से मैंने बहुत कुछ सीखा.

जैसे कि कृष्ण कुमार भार्गव जी से सही उच्चारण जानने का आग्रह. भार्गव जी ने समाचार कक्ष में दो खूब मोटे मोटे रजिस्टर रखवा रखे थे - एक व्यक्तियों और दूसरा स्थानों के नाम के लिए. जब भी कोई नया नाम सामने आता, वे फ़ौरन उसे दर्ज कर देते थे. इसके अलावा उन्होंने पुस्तकालयों जैसा कैटलॉग भी बनाकर रखा था. छोटी-छोटी दराजों में कार्ड पिरोये हुए थे जिनमें बहुत सारे नामों के सही उच्चारण लिखकर रखे रहते थे. शुरू-शुरू में हम सभी लोग उसका बराबर उपयोग भी करते थे. बाद में भार्गव जी ने विश्व उच्चारण कोष नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित करवायी, जिसकी भूमिका पापा ने लिखी थी. इसमें उन्होंने देश-विदेश के बहुत सारे नामों के सही उच्चारण के साथ यह जानकारी भी दी है कि किसी विशेष भाषा समूह में किसी वर्ण का उच्चारण कैसे किया जाता है. फ़्रांस, चीन या मध्य यूरोप के सन्दर्भ में इन नियमों की जानकारी वाक़ई प्रसारणकर्ताओं के लिए बड़े काम की है.

भार्गव जी से मैंने एक और बात सीखी. काम करते हुए मेज़ को साफ सुथरा और व्यवस्थित रखना. सुबह आठ बजे का बुलेटिन बनाते समय उनसे किसी भी आईटम की अंग्रेज़ी कॉपी मांग लीजिये, फ़ौरन दे सकते थे. जबकि दूसरे कई संपादक ऐसी किसी माँग पर आइटम .......ढूंढते ही रह जाते थे.

रविंदर सभरवाल से मैंने बंचिंग सीखी, यानी बुलेटिन में कौन सा आइटम किस जगह लिया जाना चाहिए. पंद्रह ravider ji मिनट के बुलेटिन के तीन हिस्से या बंच होते हैं. आम तौर पर इनमें से पहले हिस्से में बड़ी हेडलाइन्स और राष्ट्रीय महत्त्व के समाचार, दूसरे में राज्यों, राजनीतिक दलों और विकास कार्यों के समाचार और तीसरे हिस्से में विदेश, खेल और पुरस्कार आदि लिए जाते हैं.

मुश्किल तब पेश आती है जब पहली या दूसरी हेडलाइन विदेश की हो. उसे पढ़वाने के बाद वापस देश लौटा जाये या विदेशों के ग़ैर-ज़रूरी आइटम पढ़वाए जायें? यह फ़ैसला करने की सलाहियत धीरे-धीरे, समय के साथ ही आती है और जब तक नहीं आती, तब तक किसी से पूछकर फ़ैसला करने में शर्म की कोई बात नहीं है. हाँ, किससे पूछना है, यह फ़ैसला ज़रूर थोड़ा सोच-समझ कर करना चाहिए. वरना ऐसा भी हो सकता है कि .......अंधेहि अंधे ठेलिया दून्येउ कूप पडंत.

बंचिंग के सिलसिले में एक बात याद आ रही है, बताती चलूँ. हमारे एक काफी वरिष्ठ सहयोगी ने एक दिन मुझे दिन में तीन बजे का बुलेटिन बनाकर दे दिया. वरिष्ठता के अभिमान में मेरे साथ स्टूडियो नहीं गये. पाँच मिनट के बुलेटिन में दो मुख्य समाचारों के बाद पाँच आइटम लगातार दुर्घटनाओं के थे. कहीं रेल पटरी से उतर गयी, कहीं ट्रैक्टर से भिड़ गयी और कहीं पटरी पार कर रहे लोगों को कुचल गयी. बुलेटिन रिहर्स करते हुए मुझे बहुत ही अटपटा लग रहा था, लिहाज़ा मैंने समाचारों को इस तरह जमा लिया कि एक दुर्घटना के बाद किसानों या आम नागरिकों के हित की कोई बात आ जाये और तब दूसरी दुर्घटना हो.

बुलेटिन पढ़ने के बाद जब मैं समाचार कक्ष में आयी तो उन्होंने मुझे फटकारा - हमने आपको बुलेटिन लगाकर दिया था. आपने क्रम क्यों बदला?

मैंने कहा - सर, ऐसा लग रहा था जैसे देश भर की गाड़ियों ने तय कर लिया था कि आज हम अपनी मनमानी करेंगी और आकाशवाणी के बुलेटिनों में छायी रहेंगी. इसलिए मैंने बीच-बीच में कुछ और समाचार ले लिए.

बड़े नाराज़ हुए .... आपको कुछ पता भी है हमने मैचिंग मिलाकर दिया था.

अब बताइये, मैं उनकी मैचिंग तोड़ने पर डांट कैसे नहीं खाती?

एक बात और कहना चाहूंगी. तमाम शिक्षण संस्थान और लम्बे-चौड़े डिग्री कोर्स जो बातें दो-तीन सालों में नहीं सिखा पाते, वह समाचार कक्ष में सिर्फ दूसरों की बातें सुनने से सीखा जा सकता है. मैं जब कैज़ुअल ड्यूटी करती थी, तब समाचार कक्ष के युवा तुर्क - राजेंद्र चुघ बुलेटिन पढ़कर लौटने के बाद अक्सर उसकी और संपादक दोनों की धज्जियाँ उड़ाते थे. पहले-पहल तो उनका रौद्र रूप देखकर मैं काफी सहम गयी थी. लेकिन बाद में देखा कि उनकी आपत्तियों में दम होता था. वे जो भी कहते थे, किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना न होकर केवल बुलेटिन को बेहतर बनाने का प्रयास होता था. क्योंकि जिस व्यक्ति पर वे अभी-अभी इतना चिल्ला रहे थे, दस मिनट बाद उसी के साथ चाय पीते देखे जा सकते थे.

तनाव भरे माहौल को हल्का और ख़ुशगवार बनाना कोई हरी संधू से सीखे. बैठे- बैठे ऐसी फुलझड़ी छोड़ते हैं hari sandhu कि जिस पर निशाना साधा गया हो, वह भी दूसरों के साथ हँसे बिना नहीं रह पाता. हमारी एक नयी सहयोगी आयी थीं जो बहुत ही दुबली-पतली थीं. कुर्सी पर बैठी कुछ काम कर रही थीं.

संधू बंधू उनकी कुर्सी के पीछे खड़े होकर बोले -  शुभ्रा जी.

मैंने कहा - आहो जी.

आसमान की तरफ निगाहें उठाकर बोले - ख़ुदा दी शान ...

शेर के पहले मिसरे की तरह मैंने दोहराया - ख़ुदा दी शान..

उन्होंने सहयोगी की तरफ हाथ दिखाकर कहा- तिनके विच जान ....

सबके साथ वह सहयोगी भी हँस पडीं. इसी तरह ड्यूटी पूरी होने के बाद जब कोई सहयोगी जाने की बात करता है , तो संधुजी बड़ी गंभीरता से कहते हैं - अरे, चल दिये? दो- चार दिन तो रह लेते.

और अगर कोई दो-तीन बार जाने को कह कर भी रवाना नहीं होता, तो बड़े भोलेपन से पूछ लेते हैं - ते फेर त्वाडे लाई मंजी पवावां (तो फिर तुम्हारे लिए पलंग बिछवा दूं )? 

और जाने वाला बेचारा खिसियानी हँसी हँसता हुआ रवाना हो ही जाता है.

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Wednesday, June 29, 2011

shifts के किस्‍से: न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा कड़ी 3


रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। आज तीसरी कड़ी। पुरानी सभी कडियों को पढ़ने के लिए आप टैग news room se shubhra sharma का इस्‍तेमाल कर सकते हैं।

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न्यूज़ रूम से यादों का सिलसिला क्या शुरु हुआ जैसे हम सभी रेडियो-प्रेमी पुराने दिनों की यादों की रिमझिम फुहारों से भीग उठे. न्यूज़ रूम के मेरे उन शुरुआती दिनों के साथी डॉ हेमंत जोशी ने कहा कि उनकी यादें ताज़ा हो गयीं. संजय पटेल भाई ने लेख में आये नामों के अलावा और भी बहुत से नाम याद दिलाये. लोकेन्द्र शर्मा जी अपनी यादों का पिटारा खोलने को तैयार हो गए. और यूनुस खान ने तो फरमाइशों की झड़ी ही लगा दी. उनकी आधी फरमाइश तो मैंने पूरी कर दी है - मेलविल डि मेलो साहब के बारे में अपना संस्मरण भेजकर. आधी फिर कभी.

आज जो बात सबसे ज़्यादा याद आ रही है, वहीँ से शुरुआत करती हूँ. पहले-पहल रात की ड्यूटी मिला करती on-air-radio थी. नौ बजे से ढाई बजे तक. एक या डेढ़ महीने में ड्यूटी लगती थी और एक बार में सिर्फ छह. यानी लगातार छह रातों का जागरण. बाद में मैंने इसका एक तोड़ निकाल लिया था. बजाय छह रात लगातार रात की ड्यूटी करने के, एक रात और एक तड़के की ड्यूटी एक साथ करने लगी. इस तरह एक रात जागने के बाद एक रात सोने को भी मिल जाता था. यह भी सुविधा थी कि प्रशासनिक स्टेनो नौटियाल जी ड्यूटी लगाने से पहले फ़ोन करके पूछ लेते थे कि अगले सप्ताह आपकी ड्यूटी लगने जा रही है, आप उपलब्ध हैं या नहीं. इस एक फोन कॉल के कारण कितना झमेला बच जाता था. अगर हमें कोई असुविधा होती तो हम कह देते थे और हमारी ड्यूटी नहीं लगायी जाती थी.

तड़के शिफ्ट की ड्यूटी तीन बजे से शुरू होती थी हालाँकि उसके लिए ऑफिस की गाड़ी सवा दो बजे ही मेरे घर पहुँच जाती थी. बनारसी होने के नाते नहाने का मर्ज़ मुझे शुरू से रहा है. डेढ़ बजे का अलार्म लगाती और नहा-धोकर गाड़ी के इंतजार में कालोनी के मेन गेट पर जाकर बैठ जाती थी. सर्दियों में भी यही सिलसिला जारी रहा. नतीजतन ऐसा ज़बरदस्त ज़ुकाम हुआ कि लगभग ढाई महीने माइक के सामने फटक भी नहीं सकी. लेकिन इस आदत की वजह से ऑफिस के सभी ड्राईवर मुझसे बहुत खुश रहते थे कि मैं उन्हें कभी इंतजार नहीं करवाती थी. उन दिनों का एक मज़ेदार क़िस्सा याद आ गया. पहले वही सुन लीजिये.

एक दिन ड्राईवर राजेंद्र सिंह ने मुझे पिक-अप करने के बाद कहा - ज़रा संभलकर बैठिएगा.

मैंने कहा - क्यों क्या बात है?

बोला - कुछ नहीं, आपको एक मज़ा दिखाता हूँ. 

मैं ज़रा पाँव जमाकर बैठ गयी और गेट के ऊपर लटका हैंडल कसकर पकड़ लिया.

अगले पिक-अप के लिए हम एक गेट के अन्दर जाकर, कई बार दाहिने-बाँये मुड़ते हुए आखिर एक फ्लैट तक पहुंचे. कोई सात मिनट तक हॉर्न बजाने के बाद एक महिला ने बालकनी से इशारा किया कि ठहरो आ रही हूँ. और पूरे दस मिनट बाद वे गाड़ी में प्रविष्ट हुईं. बैठते ही उन्होंने मेरी तरफ सवाल दाग़ा - न्यू ?

मैंने शराफत से हाँ में सर हिला दिया.

उन्होंने फिर पूछा - इंग्लिश?

मैंने कहा - जी नहीं, मैं अभी-अभी हिंदी में कैज़ुअल न्यूज़रीडर चुनी गयी हूँ.

उनका अगला सवाल मुझे चौंका गया - नहाकर आई हो क्या?

मैंने डरते डरते हामी भरी, जैसे यह बड़ी शर्मिंदगी की बात हो. 

उन्होंने मुझे समझाया - ऐसी बेवकूफी मत किया करो. बेकार बीमार पड़ जाओगी. इस ड्यूटी पर आने के लिए जो कपड़े पहनने हों, रात ही में पहन कर सो जाओ. और जब गाड़ी हॉर्न दे तब आकर उसमें बैठ जाओ. इस तरह नींद कम से कम ख़राब होती है.

अब तक हम उनकी कालोनी से बाहर मेन रोड पर आ गये थे. मैंने देखा कि उन्होंने भी मेरी तरह छत से लटकता हैंडल पकड़ा और आँखे बंद कर लीं. जब तक गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ी, वे गहरी नींद में थीं.

राजेन्द्र ड्राईवर ने फुसफुसा कर मुझसे कहा - संभलना.

और अगले मोड़ पर गाड़ी कुछ ऐसी अदा से मोड़ी कि मेरे साथ बैठी मैडम मेरे साथ बैठी न रह सकीं बल्कि 'नागिन सी भुइं लोटी' पायी गयीं.

बाद में उनसे अच्छा परिचय हो गया था. वे विदेश प्रसारण सेवा की एनाउंसर थीं और पापा को भी जानती थीं. लेकिन उनकी पल भर में सो जाने वाली अदा ऐसी दिलफ़रेब थी कि बस कुछ मत पूछिए. एक बार मैं खाड़ी देशों के लिए २३:४५ से २३:५५ तक प्रसारित होने वाला बुलेटिन पढ़ने पहुंची. उन्होंने मुझे क्यू किया. मैंने बुलेटिन शुरू कर दिया. उन्होंने कंसोल पर एक बाँह फैलायी, उस पर सर टिकाया और क्षण भर में जा पहुंची स्वप्नलोक में. इधर मेरा बुलेटिन ख़त्म हो रहा था. मैं बार-बार उनकी तरफ देख रही थी कि वे उठें और मेरा फेडर बंद करें. पर शायद उस दिन उनके सपने कुछ ज़्यादा ईस्टमैनकलर में रंगे हुए थे. मैंने बुलेटिन समाप्त कर दिया. वे फिर भी नहीं उठीं. मेरी समझ में नहीं आ रहा था क्या करूँ. आख़िरकार मैं कुर्सी से उठी, उनके पास जाकर धीरे से उनका कन्धा हिलाया. वे चौंककर जागीं. एक आश्वस्त करने वाली मुस्कान मेरी दिशा में फेंकी और फेडर ऑन करके कहने लगीं - अभी आप सुन रहे थे समाचार. भारतीय समय के अनुसार इस समय रात के साढ़े बारह बजा चाहते हैं......जबकि उस समय बारह भी नहीं बजे थे.    

उन दिनों आकाशवाणी से "चौबीस घंटे - हर घंटे" समाचार प्रसारित नहीं होते थे. ज़्यादातर स्टेशन ग्यारह बजे और बचे हुए बारह बजे समाचार प्रसारित करने के बाद सभा समाप्त कर देते थे. साढ़े बारह बजे के ग्रेट ब्रिटेन के बुलेटिन के बाद सीधे ०४:३५ पर दक्षिण-पूर्व एशिया का ही बुलेटिन होता था. यानीकि एक बजे से चार बजे तक कोई खास काम नहीं होता था. बस, कहीं कोई अप्रत्याशित घटना न हो जाये, इसलिये न्यूज़ रूम में मौजूद रहना ज़रूरी था. समय काटे नहीं कटता था. सर्दियों में तो स्वेटर बुन लेती थी पर गर्मियों में किताबें भी नींद के झोंके रोकने में कारगर साबित नहीं होती थीं. सरकारी कैंटीन यों तो २४ घंटे चलने का दावा करती थी, मगर रात ग्यारह बजे के बाद उससे चाय तक की उम्मीद रखना फ़िज़ूल था. उसका कौन सा कर्मचारी, किस बोतल के तरल पदार्थ का सेवन कर, कहाँ लुढ़का पड़ा होगा, यह देवता भी नहीं बता सकते थे, मनुष्य की तो बिसात ही क्या.

ऐसे में बातचीत के अलावा समय काटने का और कोई साधन नहीं था. इसीलिए उन दिनों जिन सहकर्मियों से जान-पहचान और दोस्ती हुई, बहुत गहरी और पक्की हुई. उमेश जोशी, हेमंत जोशी, मुकेश कौशिक, अजित गाँधी, रवि कपूर, राकेश चौधरी, रीता पॉल, सतपाल जी और छाया जी ऐसे ही कुछ नाम हैं. इनमें से कुछ लोग फिर कभी नहीं मिले, लेकिन जो मिल जाते हैं, उनके साथ मानो २५ वर्ष पुराने दिन भी वापस लौट आते हैं और हम उन मस्ती भरे दिनों को याद कर हँस लेते हैं.

इनमें से एक थे - जयभगवान पाराशर. विनोद जी के बाद वही मेरे दूसरे गुरु बने. रोहतक के पास के किसी गाँव में अध्यापक थे और ढाई बजे तक ड्यूटी करने के बाद न जाने कहाँ से बस पकड़कर सीधे स्कूल पहुँचते थे. एक-दो साल के बाद उन्हें कभी नहीं देखा लेकिन उँगली पकड़कर चलना सिखाने वाले बड़े भाई जैसी उनकी छबि आज तक मन में है. उसके बाद एक छोटा भाई भी मिला - शुभेंदु अमिताभ के रूप में. काफी दिनों तक उसके साथ रस्मो-राह रही. बल्कि जिस दिन सवेरे आठ बजे का समाचार प्रभात अपने मौजूदा रूप में शुरू हुआ, उस दिन मुख्य बुलेटिन राजेन्द्र अग्रवाल जी ने, समीक्षा मैंने और समाचार पत्रों की सुर्ख़ियाँ शुभेंदु ने पढ़ी थीं. इस बात का मुझे आजतक गर्व है जबकि कुछ अन्य लोगों को आज तक मलाल है.

कुछ संपादकों से भी जान-पहचान हुई. इनमें सबसे पहले तो वही शम्भू जी थे, जिनकी चर्चा मैं पिछली कड़ी में कर चुकी हूँ. उनके अलावा भी कुछ उल्लेखनीय हस्तियाँ थीं, जैसे सुरेश मिश्र जी, जो सुना है एक दिन पौने नौ का बुलेटिन बनाते-बनाते अचानक बाहर चले गये. लोगों ने सोचा कि किसी से मिलने या किसी अन्य आवश्यक काम से गये होंगे, कुछ देर में लौट आयेंगे. जब आधे घंटे तक नहीं लौटे तो इधर-उधर फोन करके ढूँढा गया. कुछ पता नहीं चला. किसी जानकार ने कहा घर पर फोन करके देखो, वहाँ तो नहीं पहुँच गये. वाक़ई वे घर पहुँच गये थे. पान खाने निकले थे, अपने घर जाने वाली बस दिख गयी तो उसी में चढ़ गये.

एक नन्दगोपाल गोयल जी थे. होम्योपैथी के डॉक्टर थे या शायद शौकिया दवा देते थे. बुलेटिन बनाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी, बस उन्हें इसको-उसको फोन करके ये बताना अच्छा लगता था कि वे आकाशवाणी में ड्यूटी पर हैं. एक-एक समाचार की कई- कई कापियां टाइप करा लेते कि कहीं कम न पड़ जायें और स्टूडियो में जाकर यही भूल जाते थे कि कौन सी ख़बर पढ़वा चुके हैं और कौन सी बाकी है. कभी बांये हाथ का गत्ता आगे बढ़ाते तो कभी दाहिने हाथ का. कई बार तो समाचार उनसे छीनकर पढ़ना पड़ता था. बाद में इस दुर्दशा से बचने के लिए मैं काफी देर पहले उनसे बुलेटिन मांग लेती थी और ख़ुद ही उसे अंतिम रूप दे देती थी. बेचारे बड़ा अनुगृहीत महसूस करते थे और हर बार मुझे मोटापा कम करने की अचूक दवा लाकर देने का वादा करते थे.

एक रिटायर्ड फ़ौजी खनका जी भी आया करते थे. सुबह ६ बजे का बुलेटिन बड़ी निष्ठा से बनाते और पढ़वाते थे. उसके बाद हम सबको ज़बरदस्ती कैंटीन लेकर जाते और चाय पिलवाते थे.

कभी-कभी राजेन्द्र धस्माना जी आया करते थे. उनके बारे में एक क़िस्सा मशहूर था. एक दिन उन्हें सुबह आठ बजे का बुलेटिन बनाना था. कोई चार बजे ऑफिस आये और काम में लग गये. जब बुलेटिन प्रसारित हो गया तो लोगों ने कहा - चलिए कैंटीन में चलकर चाय पी जाये.

बोले - नहीं मैं घर जाऊंगा.

लोगों ने कहा - ऐसी भी क्या जल्दी है, चाय पीकर चले जाइएगा.

तब बोले  - रात पिताजी का देहांत हो गया है. घर में अभी शायद किसी को पता भी न हो. दरअसल ऑफिस आने से पहले उनके कमरे में गया, तो देखा वे जा चुके हैं. तो मैंने सोचा तुम लोग इतने कम नोटिस पर संपादक कहाँ से लाओगे, इसलिए उनका दरवाज़ा बाहर से बंद करके चला आया. अब जाकर सारे इंतजाम करने होंगे.

चाय की ज़िद करने वाले अवाक् खड़े रह गये. ऐसी कर्तव्य निष्ठा भी होती है आज के ज़माने में!

Wednesday, June 15, 2011

न्‍यूज़-रूम में गाना बजाना: न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा कड़ी 2

रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। इस श्रृंखला का शीर्षक है 'न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा'। आज दूसरी कड़ी।

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रेडियोनामा के एक पाठक ने लिखा है कि बचपन से जिन आवाज़ों को सुनते और पहचानते आ रहे हैं, उनमे से एक आवाज़ मेरी भी है. इसलिए अपने श्रोताओं के सामने यह स्वीकार करते हुए मैं हिचक रही थी कि रेडियो में नौकरी मैंने स्वेच्छा से नहीं, मजबूरी में की.

पढ़ने-लिखने में अच्छी थी इसलिए घर वाले चाहते थे कि मैं प्रशासनिक सेवाओं में जाऊं जबकि मुझे विश्वविद्यालय में पढ़ाना सबसे अधिक रुचिकर काम लगता था. पटना विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग में नियुक्ति भी हो गयी थी, लेकिन पारिवारिक कारणों से वह नौकरी छोड़कर दिल्ली आना पड़ा. दिल्ली के कई कालेजों में कोशिश की लेकिन बात कुछ बनी नहीं. वे कहते थे इतिहास में एम ए कर लीजिये और मेरा तर्क यह था कि अगर मैं पटना में स्नातकोत्तर छात्रों को पढ़ाने के क़ाबिल थी तो दिल्ली में स्नातक छात्रों को क्यों नहीं पढ़ा सकती. लेकिन सच्चाई यह थी कि मुझे उस समय तत्काल एक अदद नौकरी की बहुत सख्त ज़रुरत थी.

पता चला कि आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग में कैजुअल समाचार वाचकों की बुकिंग की जाती है. हालाँकि उनके चयन की प्रक्रिया उन दिनों काफी सख्त थी - अनुवाद पर खासा जोर दिया जाता था और करेंट अफेयर्स की अच्छी जानकारी भी लाज़मी थी. गोयाकि बनारस-पटना से दिल्ली आते-आते मुझे भी वैदिक काल से राजीव काल तक का सफ़र तय करना था. पाठ्य पुस्तक जैसी तन्मयता से अख़बार पढ़ने शुरू किये, पुराने पत्रकारों की शागिर्दी की और पड़ोस में रहने वाले आकाशवाणी के दिग्गज प्रसारणकर्त्ता श्री मेलविल डि मेलो को अपना 'पितु मातु सहायक स्वामि सखा' बनाया. लगभग महीने भर की तैयारी के बाद परीक्षा दे आयी. कुछ दिनों बाद स्वर परीक्षा का भी पत्र आ गया और इस तरह लिखित और मौखिक परीक्षाएं पास करते हुए मैं कैजुअल समाचारवाचक - अनुवादक बन गयी.

जुलाई १९८७ में बुलावा आया और मैं इन-उन देवी-देवताओं का नाम लेते प्रसारण भवन के हिंदी समाचार कक्ष में दाखिल हुई. कंप्यूटर का युग शुरू नहीं हुआ था. कई छोटी-बड़ी मेजों पर मशीन-गनों की तरह टाइप-राइटर सजे हुए थे. उनके पीछे उन्हें चलाने वाले स्टेनो सन्नद्ध थे. उन्हीं में से एक के पास मैं भी बैठ गयी. जादुई दुनिया लग रही थी. रात पौने नौ बजे के बुलेटिन की तैयारियां चल रही थीं. सभी लोग बेहद व्यस्त नज़र आ रहे थे.

मैं जिन स्टेनो के पास बैठी थी, उन्हीं से परिचय बढ़ाना शुरू किया. बड़े सौम्य-से व्यक्ति थे, मोहन बहुगुणा. वे भी बीच-बीच में व्यस्त हो जाते थे. लेकिन जब खाली होते तब मेरे प्रश्नों के उत्तर देते जा रहे थे. कमरे के बीच में एक बड़ी सी मेज़ थी, जिस पर कोई टाइप-राइटर नहीं था. एक तरफ बुर्राक़ सफ़ेद कुरते-पायजामे में एक सज्जन फ़ोन पर बतिया रहे थे और दूसरी तरफ एक महिला बड़े मनोयोग से कुछ पढ़ रही थीं. बहुगुणा जी ने बताया कि वह रामानुज प्रसाद सिंह और विनोद कश्यप हैं, जो पौने नौ बजे का बुलेटिन रिहर्स कर रहे हैं.

अब हम ठहरे उस पीढ़ी के लोग, जिसे पौने नौ के बुलेटिन को वाक़ई आकाश से आती हुई वाणी समझने का संस्कार मिला था. रेडियो से पिप्स आयें और घन गंभीर आवाज़ कहे - "ये आकाशवाणी है" - तबसे लेकर - "समाचार समाप्त हुए" निनादित होने तक कुछ भी बोलना खुद अपनी शामत बुलाने जैसा होता था. बल्कि मेरे और मेरी कुछ सहेलियों के बीच यह क़रार हुआ था कि अगर फ़ोन पर लम्बी बात करनी हो तो यही समय सबसे उपयुक्त है, जब बड़े इस बात पर ध्यान नहीं देते कि हम चौदह मिनट से फ़ोन पर लगे हुए हैं. लेकिन पन्द्रहवां मिनट शुरू होते ही फ़ोन रख देना भी ज़रूरी था. तो उसी पौने नौ के बुलेटिन को अपनी आँखों के सामने बनता-सँवरता देखकर मैं सकते में थी.

तभी बहुगुणा जी ने याद दिलाया कि मैं भी समाचारवाचक हूँ और मुझे जाकर अपने सीनियर्स से मिलना चाहिए. मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी लेकिन मैंने प्रकट तौर पर यही कहा कि वे रिहर्स कर रहे हैं, मैं उन्हें डिस्टर्ब कैसे करूँ.

बहुगुणा जी ने हिम्मत बंधाते हुए कहा - जाइये, अभी बुलेटिन में काफी समय है.

मैं झिझकते हुए विनोद जी के पास पहुंची और उन्हें अपना नाम बताया. विनोद जी शायद ड्यूटी चार्ट बनाती थीं क्योंकि नाम सुनते ही उन्होंने कहा कि हाँ, आज तुम्हें २१:५० का बुलेटिन पढ़ना है. मेरे होश उड़ गए. मैं आकाशवाणी की नियमित टॉकर ज़रूर थी मगर उसकी तो हमेशा रेकॉर्डिंग ही होती थी. कभी किसी लाइव कार्यक्रम में शामिल नहीं हुई थी. दूसरे, विनोद जी से बातें करते हुए दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे लग रहा था- उन्हें भी आवाज़ ज़रूर सुनाई दे रही होगी. मैंने कहा - मैं अभी बुलेटिन नहीं पढ़ सकूंगी.

उन्होंने पूछा - क्यों?

मैंने कहा - पहले काम सीख लूं, उसके बाद बुलेटिन पढूंगी.

कहने लगीं - ठीक है. देखो, वो सज्जन २१:५० का बुलेटिन बना रहे हैं, उनके साथ बैठकर सीखो.

जान बची तो लाखों पाए. मैंने फ़ौरन उन सज्जन को घेरा और उनसे बुलेटिन बनाने के गुर सीखना शुरू कर दिया. वे सज्जन शम्भू बहुगुणा थे और ज़्यादातर २१:५० का बुलेटिन वही बनाते थे, जो खाड़ी और अफ़्रीकी देशों के लिए प्रसारित होता था. बुलेटिन बनाना उन्होंने मुझे दो मिनट में सिखा दिया. पौने नौ के समाचारों की कापियां जमा करो और गत्तों पर लगा लो, फिर जब बुलेटिन शुरू हो तो रेडियो के पास बैठ जाओ और अपने गत्ते बुलेटिन के क्रम के अनुसार लगा लो. इस तरह १५ मिनट का बुलेटिन तैयार हो जायेगा. फिर जो-जो समाचार तुम्हें अच्छे न लगें, उन्हें फेंक दो, बस बन गया बुलेटिन.

वह तो अच्छा हुआ कि जल्द ही मेरा परिचय रविंदर सभरवाल से हो गया, जिन्होंने मुझे सही दिशा-निर्देश दिए, वर्ना मैं आज तक २१:५० ही बना रही होती. रविंदर जी ने मुझे शम्भू जी और २१:५० के बुलेटिन का एक रोचक संस्मरण सुनाया. हिंदी के समाचारवाचक आम तौर पर पाँच मिनट में लगभग साठ पंक्तियाँ पढ़ते हैं. कुछ लोग साठ से अधिक या कम भी पढ़ते हैं, लेकिन औसत गति यही होती है. दस मिनट के बुलेटिन में इससे दुगनी, लगभग १२० पंक्तियाँ तैयार की जाती हैं. हालाँकि उसमें आगे और पीछे मुख्य समाचार भी होते हैं इसलिए कुछ कम पंक्तियाँ पढ़ी जाती हैं लेकिन बुलेटिन बनाने वाले इस बात का ध्यान रखते हैं कि बुलेटिन शोर्ट न हो जाये, यानीकि पंक्तियाँ कम न पड़ जायें. एक बार की बात है कि शम्भू जी की टेलीफ़ोन वार्ता कुछ ज़्यादा ही लम्बी खिंच गयी. उनका बनाया २१:५० का बुलेटिन रविंदर जी को पढ़ना था. जब वे साढ़े नौ बजे तक भी फ़ोन के सम्मोहन से मुक्त नहीं हुए तो रविंदर जी ने उनसे बुलेटिन की मांग की. शम्भू जी ने पाँच मिनट तक विधिवत फोनस्थ मित्र से विदा ली और अगले पाँच मिनट के अंदर गत्तों पर पन्ने टाँककर बुलेटिन रविंदर जी के हवाले कर दिया. विदेश प्रसारण का स्टूडियो दूर था, रिहर्स करने का समय नहीं रह गया था, रविंदर जी बुलेटिन लेकर चली गयीं. इधर शम्भू जी रेडियो के साथ कान लगाकर बैठ गए. किसी ने पूछा - क्या बात है? आज बुलेटिन कैसे सुना जा रहा है?

तो शरारती हँसी हँसकर बोले - मैंने उसे दस मिनट के बुलेटिन में सिर्फ ७० लाइनें दी हैं, देखूं क्या करती है.

उधर, स्टूडियो में रविंदर जी के पसीने छूट गए. सत्तर पंक्तियों को धीरे धीरे पढ़कर और कुछ समाचारों को दोबारा पढ़कर किसी तरह समय पूरा किया.

यह किस्सा सुनाते हुए उन्होंने मुझे बताया कि केवल वाचन ही नहीं अनुवाद, संपादन जो कुछ भी करो, पूरे मनोयोग से करो और हर बुलेटिन को अपनी और आकाशवाणी की प्रतिष्ठा मानकर चलो. रविंदर जी आजकल वाचन नहीं करतीं लेकिन हिंदी समाचार कक्ष की वरिष्ठ और कर्मठ सदस्या हैं. मैं आज भी अगर कहीं अटकती हूँ तो सीधे उन्हीं के पास पहुँच जाती हूँ. वे सभी को खरी- खरी सुनाती हैं लेकिन शम्भू जी से हार गयीं, उन्हें कोई सुधार नहीं सका.

आप सोच रहे होंगे कि मैं बुलेटिन बनाने में क्यों उलझ गयी......वाचन का क्या हुआ? तो दोस्तो, हक़ीक़त यह है कि मैं तीन महीने तक बुलेटिन पढ़ने से बचती रही. फिर एक दिन विनोद जी ने मुझे डांटा कि आखिर तुम पढ़ने से भागती क्यों हो?

मैंने कह दिया - मुझे डर लगता है.

बोलीं - किस बात से डर लगता है?

मैंने कहा - इतनी बड़ी संस्था का इतना महत्त्वपूर्ण काम, कहीं मुझसे कोई ग़लती हो जाये तो?

कहने लगीं - अच्छा, मेरे साथ चलो.

मुझे लेकर न्यूज़ स्टूडियो में गयीं. पहले मुझसे कुछ पढ़वाया. फिर मुझे बताया कि माइक से कितनी दूरी रखूँ, किन अक्षरों का उच्चारण करते समय ध्यान रखूँ कि साँस माइक से न टकराए, साँस को कब और कैसे तोडूँ. उसके बाद पूरा बुलेटिन मुझसे पढ़वाया और खुद पैनल पर बैठकर सुना. जब संतुष्ट हो गयीं तभी मुझे छुट्टी दी.

कितने विशाल ह्रदय और विराट व्यक्तित्व थे वे सब. उन दिनों के हिंदी समाचार कक्ष को याद करती हूँ तो कितने सारे चित्र उभरते हैं. Devkinandan Pande-1 अपने जीवनकाल में ही किंवदंती बन चुके देवकीनंदन पाण्डेय जी, ढीले पायजामे और काली शेरवानी में समाचारवाचक कम और शायर ज़्यादा लगते थे. कमरे में आकर अख़बार उठाते तो पहले पन्ने से आखिरी पन्ने तक बांचने के बाद ही उसे तह करते. नतीजा यह कि संपादक की कोई भी चूक उनकी पैनी निगाहों से हरगिज़ नहीं छिप सकती थी. बुलेटिन पढ़ते-पढ़ते भूल सुधार लेते, फेडर बंद कर संपादक को गाली देते और फिर फेडर खोलकर अगला समाचार पढ़ने लगते.

अशोक वाजपेयी जी अपनी भूलने की आदत की वजह से मशहूर थे. उनके बारे में एक क़िस्सा सुनाया जाता है कि एक दिन आते ही नाराज़ होने लगे कि ये क्या हो रहा है?.........सुबह का बुलेटिन एनाउन्सर से क्यों पढ़वाया गया? मैं घर में दाढ़ी बना रहा था, जब बुलेटिन शुरू हुआ. आवाज़ पहचान में नहीं आई तो मैंने ड्यूटी रूम में फ़ोन किया. उन्होंने बताया कि समाचारवाचक नहीं पहुंचे इसलिए उद्घोषक से पढ़वाया गया. किसकी ड्यूटी थी?

सब लोग चुप. जब किसी ने जवाब नहीं दिया तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर ड्यूटी चार्ट देखा...वहां उन्हीं का नाम लिखा हुआ था.

इंदु वाही बहुत अच्छा गाती थीं, ये बहुत कम लोग जानते होंगे. अक्सर मेज़ पर बैठी गुनगुनाती रहती थीं लेकिन खुलकर शायद ही कभी गाया हो. मेरा बेटा शानू उस समय कोई पाँच बरस का रहा होगा. कोई नया गीत सीखकर आया था और चाहता था कि मैं फ़ौरन सुन लूं. मैं आकाशवाणी में थी. मैंने समझाने की कोशिश की कि घर आकर इत्मीनान से सुनूंगी लेकिन बाल हठ...."अभी सुनो" कहकर वो गाने लगा. इंदुजी ने इशारे से पूछा कि गा रहा है क्या. मैंने हाँ में सर हिलाया तो उन्होंने मेरे हाथ से फ़ोन ले लिया और गाना सुनने लगीं.

बाद में उन्होंने शानू से कहा - वाह भाई, आप तो बहुत अच्छा गाते हैं.

शानू भाई बोले - आप कौन हैं?

इंदुजी ने कहा - मैं आपकी इंदु वाही आंटी हूँ.

बोले - आंटी हैं तो गाना सुनाइये.

इंदुजी बोलीं - अभी यहाँ बहुत सारे लोग हैं. जब कोई नहीं होगा तब सुनाऊँगी.

शानू न्यूज़रूम देख चुके थे, बोले - वहां तो हमेशा बहुत सारे लोग रहते हैं तो आप कैसे गायेंगी? मुझे कुछ नहीं पता. आपको अभी गाना पड़ेगा.

और वाक़ई इंदु जी को गाना पड़ा.

कृष्ण कुमार भार्गव जी थोड़ा सा अनुरोध करते ही गा दिया करते थे. गाना हमेशा एक ही होता था -

ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हसीं और मैं जवाँ .........

और सचमुच भार्गव जी अब तक जवानों जैसे सक्रिय बने हुए हैं. वर्षों पूर्व अवकाश ग्रहण कर चुकने के बावजूद नियमित रूप से एफ़ एम गोल्ड का मार्केट मंत्र कार्यक्रम तो करते ही हैं, गाहे-बगाहे खेलों का आँखों देखा हाल भी सुनाते हैं.

चलते-चलते एक बात और याद आ गयी. अब से कोई दस साल पहले हमारे हिंदी समाचार कक्ष में सभी प्रमुख पार्श्वगायकों की आवाजें मिल जाया करती थीं. हरी संधू रफ़ी साहब के ज़बरदस्त फैन हैं और हूबहू उनकी आवाज़ में गा सकते हैं. राजेन्द्र चुघ सही मूड में हों तो मुकेश के गाने सुनाते हैं. संजय बैनर्जी के पीछे पड़-पड़ कर मैंने उन्हें हेमंत दा के दो चार गाने रटवा दिए थे और वो भी महफ़िल से उठकर जाने वालों को "बेक़रार करके हमें यूँ न जाइये" सुनाने लगे थे.

एक दिन कहने लगे - क्यों हम सिर्फ हेमंत कुमार ही क्यों गायेंगे? हम मोहम्मद रफ़ी भी गायेंगे.

हमने कहा - ठीक है, रियाज़ करके आओ. सुनकर बतायेंगे.

दो-चार दिन बाद मैं और हरी संधू समाचार प्रभात पढ़कर वापस न्यूज़ रूम में आकर बैठे ही थे कि संजय सामने आकर खड़े हो गए और दोनों आँखे बंद कर, हाथ फैला कर गाने लगे - चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे ......

मैं पर्स में हाथ डालकर चाय के लिए पैसे निकाल रही थी. मैंने एक चवन्नी संजय के हाथ पर रखी और कहा - बस बाबा, आगे बढ़ो.

इतने ज़ोर का ठहाका लगा कि ड्यूटी रूम से लोग घबड़ाकर भागे आये. लेकिन उसमें मेरा और संजय का भी पूरा-पूरा योगदान था.
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संबधित कड़ियाँ:

यह आकाश वाणी है, अब आप देवकीनंदन पाण्डे से समाचार सुनिए- संजय पटेल

अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिए- इरफान (टूटी हुई बिखरी हुई)


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