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Friday, February 18, 2011

विविध भारती के नाटक - साप्ताहिकी 17-2-11

हर दिन नाटक के प्रसारण की शुरूवात विविध भारती ने की। शरू से ही 15 मिनट का कार्यक्रम रहा हवामहल जिसमे हर दिन विभिन्न रूपों के रेडियो नाटक सुनने को मिल रहे हैं - झलकी, नाटिका, प्रहसन। यह सिलसिला आज तक चला आ रहा हैं। नाटकों के दो कार्यक्रम हैं हवामहल और नाट्य तरंग हवामहल रात के प्रसारण का दैनिक कार्यक्रम हैं और नाट्य तरंग सप्ताहांत यानि शनिवार और रविवार को दोपहर बाद प्रसारित होता हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

हवामहल में रात 8 बजे शुक्रवार को लखनऊ केंद्र की प्रस्तुति सुनी - हुजूर की सोहबत। दो बार प्रसारण में व्यवधान आया जिससे मुख्य सीन सुन नही पाए जिससे कुछ ठीक से समझ में नही आया। गैस ख़त्म होने पर पत्नी मिट्टी का तेल लाने के लिए पति से कहती हैं। वो साइकिल लेकर जाता हैं। वहां लम्बी कतार हैं। साइकिल चोरी हो जाती हैं। वहां दोस्त मिलता हैं जो जान-पहचान के हवालदार के पास ले जाता हैं। फिर नाश्ते के लिए दोनों साथ जाते हैं। बिना तेल लिए घर पहुंचता हैं पता चलता हैं साइकिल और तेल घर पहुँच चुके हैं। दोस्त की चिट्ठी मिलती हैं, जाने क्या मजाक था, क्या बात हुई, न सुनने से समझ नही पाए। लेखक राजेश भदौरिया और निर्देशक हैं तस्वीर आबिदी।

शनिवार को नाटिका सुनी - बंजर और हरियाली। शुरूवात हुई विवाहेत्तर सम्बन्ध से। दूसरी महिला तलाकशुदा हैं जिसे पहले पति ने बाँझ होने का आरोप लगा कर तलाक़ दिया। जबकि कमी पति में ही थी। तलाक़ के बाद वह साबित करना चाहती थी कि समाज ने उस पर लगे बेबुनियाद आरोप को सहमती दी हैं। इसीसे अपने कार्यालय में विवाहित व्यक्ति के प्रति अपने आकर्षण को जान-बूझ कर वह बढ़ावा देती रही। इस तरह एक आरोप से मुक्ति पाने के लिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ी। यह उसकी गलती हैं जिसे बाद में उसने स्वीकार भी किया। जब वह गर्भवती हुई और प्रेमी ने जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया तब उसने संतान को जन्म देने का निर्णय लिया। लेकिन साथ ही उसकी जिन्दगी से जाने और पत्नी होने का दावा न करने का भी फैसला सुना गई। उधर पत्नी ने भी अपने पति के दोस्तों से मिली इस जानकरी को पूरी परिपक्वता से सुलझाने का प्रयास किया। पुरूष की कमजोरी को दोनों ने ही माना और समाज की स्थिति को भी और अपने ही बलबूते पर समाज में सही दिशा में बढ़ने का निर्णय लिया। नाटिका क्या थी, समाज की सच्चाई थी। अच्छा तो लगा पर हवामहल एक गुदगुदाने वाला कार्यक्रम माना जाता हैं, वैसे समस्या प्रधान रचनाएं भी शामिल होती हैं लेकिन पारिवारिक कार्यक्रम में इस तरह की परिपक्व नाटिका के प्रसारण से शायद परिवार के साथ बैठ कर सुनने में उलझन हो। अभिलाष की लिखी इस नाटिका के निर्देशक हैं गंगाप्रसाद माथुर। कलाकारों के नाम भी बताए गए।

रविवार को पटना केंद्र की मजेदार प्रस्तुति रही - टेलीफोन का चक्कर। सुन कर लगा बहुत पुराना आलेख हैं क्योंकि इसमे टेलीफोन लगाने का उत्साह भी था और नंबर भी तीन अंको के थे। नए लगे टेलीफोन से कईयों का नंबर घुमा कर कई तरह की बाते करती हैं, कही पार्टी के लिए आर्डर दे रही हैं तो कही कुछ। अंत में पता चलता हैं लाइन फंस गई थी और हर बार एक ही से बात हो रही थी। वह भी आवाज बदल कर बात कर रहा था। आखिर उसी के ऑफिस का था जिसे वह नापसंद करती थी। पर इस तरह फोन लाइन मिली रहने से उनके सम्बन्ध चर्चा में आ गए। लेखक हैं श्याम मोहन अस्थाना और निर्देशक हैं सत्येन्द्र प्रताप सिंह।

सोमवार को झलकी सुनी - गुणी उस्ताद। गुणी और गुणिआनी की नोक-झोक अच्छी लगी। गुणिआनी ने शिकायत की (रसोई) गैस की, गुणी उस्ताद ने समझा पेट की गैस और डाक्टर को बुला लिया। साथ-साथ समझदारी की बाते भी हुई। मोहल्ले की कमेटी के अध्यक्ष हैं गुणी उस्ताद और कमेटी चाहती हैं कि दहेज़, घरेलु हिंसा के मामले आपसी बातचीत से सुलझ जाए। गुणिआनी भी पुरानी बात अब बताती हैं कि पति के दूर रहने पर सास-ससुर ने उसे तंग किया था और वह आत्मनिर्भर हो अपना खर्च चलाती रही पर पति से शिकायत नही की ताकि सम्बन्ध बने रहे। मनोरंजन भी हुआ और सलाह भी मिली। लेखक हैं जय सिंह राठौर। निर्देशक हैं एस एस कपूर। यह जयपुर केंद्र की प्रस्तुति रही।

मंगलवार को क्षमा शर्मा का लिखा प्रहसन सुना - पब्लिसिटी। परचून की दूकान चलाने वाला प्रसिद्ध होना चाहता हैं। कुछ लोगो ने यह व्यापार चला रखा हैं कि पैसे लेकर कोई हथकंडे अपना कर लोकप्रियता दिला देते हैं। इन्ही बातो के सहारे वह बतौर कवि लोकप्रिय होना चाहता हैं। लोकप्रियता तो उसे मिलती हैं पर उसकी पहचान परचून के दूकान वाले की ही रहती हैं। और लोकप्रियता के लिए योजना बनाई जाती हैं कि गुंडे पैसे लेकर उसकी पिटाई करे, पैसे तो वह दे देता हैं पर पैसे लेकर सब भाग खड़े होते हैं। अच्छा व्यंग्यात्मक रहा। दिल्ली की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं कमल दत्त।

बुधवार को संतोष श्रीवास्तव की लिखी झलकी सुनी - छुट्टी। नई लगी यह झलकी, इसमे मैं निकला गड्डी लेके और छैंया छैंया जैसे नए गाने गुनगुनाए गए। कार्यालय का माहौल बताया जहां कर्मचारी देर से आते, छुट्टियां लेते, झूठे बहाने बनाते। एक कर्मचारी ने छुट्टी ली अपने दादाजी के निधन का कारण बता कर और बाद में दादाजी उससे मिलने कार्यालय आ गए। कुछ ज्यादा अच्छी नही लगी यह झलकी। भोपाल केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं असीमुद्दीन।

गुरूवार को संजय श्रीवास्तव की लिखी झलकी सुनी - दरबारी राग। फिल्मो में संगीत देना चाहता हैं। अपने आप को बढ़िया कलाकार मानता हैं। कमरे का किराया नही दे पा रहा। जब मकान मालकिन ने किराया वसूली के लिए गाने की शौकीन अपनी लड़की को गाना सीखने उसके पास भेजा तो वह छेड़छाड़ करने लगा। आलेख उतना अच्छा नही लगा पर कलाकारों की संवाद अदायगी से झलकी ठीक-ठाक रही।

इस तरह इस सप्ताह हवामहल में हास्य के साथ व्यंग्य भी रहा जिससे मनोरंजन भी हुआ। सामाजिक समस्या भी बताई, सलाह भी मिली। प्रस्तुति में भी विविधता नजर आई जैसे झलकी, नाटिका और प्रहसन सुनवाए गए और अलग-अलग राज्यो की प्रस्तुतियो से वहां की प्रतिभाओ से परिचित हुए।

3:30 बजे नाट्य तरंग कार्यक्रम में शनिवार को अंग्रेजी साहित्य के लोकप्रिय चरित्र शरलक होम्स से एक कथांनक का अरूण मारवाहा द्वारा किया गया रेडियो नाट्य रूपांतर सुनवाया गया - किस्सा एक बतख का। केवल टोपी के सहारे व्यक्ति की तलाश और बतख में से निकले हीरे की चोरी का पता लगाया गया। जासूसी कथानक का रोमांच बना रहा। दिल्ली केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं विजय दीपक छिब्बर।

रविवार को मूल कन्नड़ रचना का एस एच रामचंद्र राव द्वारा किया गया रेडियो नाट्य रूपांतर सुनवाया गया - कल आना कल। कार्यालयों की कार्यशैली की झलक मिली, साहब देर से आए, जल्दी आए, साहब का मूड अच्छा हैं, खराब हैं। एक वृद्धजन आए जिनका आजादी के संघर्ष में योगदान रहा, उन्हें इसका प्रमाण पत्र निकलवाना हैं, उनसे पूछा जा रहा हैं आप किसी दलाल के पास क्यों नही गए, यहाँ सीधे क्यों आए, दलाल आपको तो क्या आपके बेटे को भी प्रमाण पत्र दिलवा देता। कड़वी सच्चाई दिखाता नाटक। निर्देशिका हैं निर्मला अग्रवाल।

यहाँ एक बात अखर गई। दोनों ही दिन दूसरी भाषा से किए गए नाट्य रूपांतर सुनवाए गए - एक भारतीय भाषा कन्नड़ और दूसरी विदेशी भाषा अंग्रेजी। एक दिन मूल हिन्दी नाटक सुनवाया जाता तो अच्छा होता। सप्ताह में दो ही नाटक प्रसारित होते हैं जिनमे एक मूल हिन्दी और एक किसी देसी या विदेशी भाषा से रूपांतर होने से अच्छा संतुलन रहेगा।

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