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Wednesday, June 1, 2011

मैच का फै़सला बाद में होगा: न्यूज़रूम से शुभ्रा शर्मा (कड़ी 1)

प्रिय मित्रो
रेडियोनामा पर आकाशवाणी की मशहूर समाचार वाचिका शुभ्रा शर्मा का एक संस्‍करण आप पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुण्‍यतिथि पर पढ़ और सराह चुके हैं। हमें खु़शी है कि आज से शुभ्रा जी अपने संस्‍मरणों की पाक्षिक श्रृंखला लेकर आ रही है--न्‍यूज़रूम से शुभ्रा शर्मा। व्‍यस्‍तताओं की वजह से वो एक बुधवार छोड़कर ही लिख सकेंगी। उनका हौसला बढाएं और अपनी राय देते रहें। ........यूनुस ख़ान
 




रेडियोनामा पर अवतरित होते ही ऐसा लगा उतरी नहीं बल्कि सीधे सातवें आसमान पर चढ़ा दी गयी. चारों ओर से इतनी प्रशंसा, इतना अपनापन, ऐसा स्वागत. सच कहती हूँ मैंने इसकी कल्पना तक नहीं की थी. करती भी कैसे? लगभग २५ वर्ष से आकाशवाणी पर समाचार पढ़ती आ रही हूँ. कभी जाना ही नहीं कि लोग मेरे नाम से परिचित हैं या नहीं. अक्सर यही सुनने को मिला कि आजकल रेडियो सुनता ही कौन है. सरकारी सर्वेक्षणों के आंकड़े भी यही साबित करने पर आमादा रहते हैं कि आकाशवाणी के कार्यक्रम या तो पान वाले की दुकान पर सुने जाते हैं या फिर चलती ट्रक में. बल्कि एक घटना तो मेरे साथ ऐसी हुई, जिसे सुनकर आप हंसेगे लेकिन है सोलहों आने सच.

हुआ यों कि एक बार बड़ी-बड़ी हस्तियों से सुशोभित एक बड़े से कार्यक्रम में भूल से किसी ने मुझे भी बुला लिया था. भूल ही हुई होगी क्योंकि इतने सारे गण्यमान्य लोगों में मुझे भूले से भी अपना कोई परिचित नज़र नहीं आ रहा था. तभी तीन-चार लोगों का एक दल मुझे संकोच से इधर-उधर घूमते देख सहानुभूतिपूर्वक मेरे पास आया. उनमे से एक सज्जन ने कहा - "माफ़ कीजियेगा मैंने आपको पहचाना नहीं."

मैंने उन्हें अपना नाम बताया और यह भी जोड़ दिया कि मैं आकाशवाणी में समाचार वाचन करती हूँ.

चारों लोगों ने जैसे बहुत कुछ समझते हुए हाँ में सर हिलाए.

फिर उनमे से एक सज्जन बोले - "वही तो, मैं  बड़ी देर से सोच रहा था कि आपका चेहरा बड़ा जाना पहचाना लग रहा है. अब समझ में आया कि आपको अक्सर ख़बरें पढ़ते देखा है."

जब चारों लोग एक बार फिर सहमति में सर हिला चुके तब मैंने विनयपूर्वक उन्हें बताया कि मैं टीवी पर नहीं रेडियो पर ख़बरें पढ़ती हूँ और दिखाई नहीं सिर्फ सुनाई देती हूँ.

दरअसल रेडियो का समाचारवाचक बड़ा ही निरीह और दयनीय प्राणी होता है. वो कहावत है न कि "गरीब की जोरू, सबकी भाभी" - वह हमारे ऊपर हूबहू लागू होती है. भूल करते हैं समाचार लिखने या अनुवाद करने वाले और डांट खाता है समाचारवाचक. विदेशी खिलाडियों या नेताओं के नामों को नए-नए तरीकों से लिख देता है स्टेनो और झिडकियां खाता है समाचारवाचक. और तो और, स्टूडियो में कभी कलम घसीटकर तो कभी हाथ-मुंह के अजीबोग़रीब इशारे करके नए-नए निर्देश देता है संपादक और उन्हें न समझने का दोष मढ़ा जाता है समाचारवाचक के सर. एक दिन मेरे एक संपादक बोले - "आप तो इशारे भी नहीं समझतीं". मैंने कहा - "आपने ज़रा देर कर दी, २०-२५ बरस पहले करते तो समझने की पूरी कोशिश करती."

बहरहाल, समाचार कक्ष का बड़े से बड़ा अपराधी भी श्रोताओं की नज़र से ओझल रहता है - सामने आता है तो बस बेचारा समाचारवाचक. भूल अनुवादक करे, स्टेनो करे या संपादक करे, श्रोता को इससे क्या लेना देना? वह तो सिर्फ समाचार पढ़कर सुनाने वाले को ही दोषी मानता है. यही जान पाता है कि आज शुभ्रा शर्मा ६ बजे के बुलेटिन में ६ बार अटकी. यह कोई नहीं जान पाता कि शुभ्रा शर्मा के सामने जो कागज़ आया था उस पर लिखा हुआ था - अमरीका केविदेश मंत्री श्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा है कि ........अब अगर शुभ्रा शर्मा यह जानती है कि श्री क्लिंटन

वह थे जिन पर महाभियोग लगते लगते बचा था और श्रीमती क्लिंटन वह, जो उस समय चट्टान जैसी दृढ़ता से उनके साथ खड़ी रही थीं....... तो ज़ाहिर है कि वह क्षण भर को तो अटकेगी ही. श्रोता इस श्री -श्रीमती के द्वंद्व को देख नहीं पाता इसलिए उसे पढ़ने वाले में ही दोष नज़र आता है.

ऐसे समय के लिए अधिकारियों के निर्देश भी दुधारी तलवार जैसे होते हैं. कभी तो कहेंगे -  "जो कुछ आपके सामने लिखकर आएगा वही पढ़िए. ऊपर से लेकर नीचे तक इतने लोगों की नज़र से गुज़री हुई खबर ग़लत नहीं हो सकती". इस आशय का प्रपत्र भी निकलवा देंगे.

और फिर तीसरे ही दिन कहेंगे - "मान लीजिये कि उनसे ग़लती हो गयी लेकिन क्या आपको नहीं देखना चाहिए था. आप इतनी सीनियर हैं, आपने ग़लत कैसे बोला."

ऐसे मामलों में सबसे बढ़िया रवैया राजेंद्र अग्रवाल जी का होता था. पहले चुपचाप खबर पढ़कर एक तरफ रख देते थे. कोई टोका-टोकी नहीं, कोई बहस-मुबाहिसा नहीं. फिर जब उठकर स्टूडियो जाने लगते, तब चलते-चलते कहते - "हाँ भाई, ये जो ऐसा लिखा हुआ है, ये ऐसा ही पढ़ना है न?" अब बेचारे संपादक महोदय घबड़ाते कि पता नहीं कौन से आईटम में क्या ग़लती रह गयी है, इतनी जल्दी कैसे ढूंढें. सो, वे तत्काल शरणापन्न हो जाते. कहते, "अरे भाई ठीक कर लीजिये न". अग्रवाल जी मुस्कुराते हुए स्टूडियो चले जाते और लौटने पर ग़लती सुधारने की एवज़ में संपादक से चाय मंगवाते.

उन्हें देखकर हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी ने भी एक दिन कुछ ऐसा ही पराक्रम कर दिखाया. एक दिन स्टूडियो से लौटकर बोले - "आज तो चाय नहीं कॉफ़ी पिलानी होगी. हमने तुम्हारी नौकरी बचायी है".

संपादक ने कहा - "कॉफ़ी के साथ पकौड़े भी खा लीजियेगा, पहले ये तो बताइए ग़लती क्या है".

कहने लगे - "देखो तुमने क्या लिख दिया था, पर हमने संभाल दिया".

क्रिकेट का आईटम था. लाहौर के मैच का हाल बताया गया था और अंतिम वाक्य था कि अगला मैच फैसलाबाद में होगा, जिसे वे पढ़ आये थे अगले मैच का फैसला बाद में होगा.

इसके विपरीत हमारे एक-दो साथी ऐसे भी हैं, जो ऐसी कोई ग़लती देखते ही आगबबूला हो जाते हैं. गत्ता( जिन पर समाचारों के पन्ने क्लिप करके दिए जाते हैं ताकि माइक पर उनके सरसराने- फडफड़ाने की आवाजें न आयें ) जोर से पटककर ललकारते हैं - "ये किसका काम है? इतना भी नहीं जानते कि हिलेरी क्लिंटन आदमी है कि औरत. अरे यार, सरकार अख़बार खरीदने के पैसे देती है. कभी तो अख़बार पढ़ लिया करो".

इसके विपरीत मनोज जी (स्वर्गीय मनोज कुमार मिश्र) इस तरह की कोई भूल देखते थे तो उसे चुपचाप सुधार लेते थे और पलटकर कभी उसका ज़िक्र तक नहीं करते थे. बुलेटिन पूरा रिहर्स करते थे. फ़िज़ूल की एक भी बात नहीं करते थे. अपने काम से काम रखते थे. लेकिन बुलेटिन के संपादन और वाचन दोनों में महारत रखते थे. हाँ, उनके आने-जाने का समय उनकी मन-मर्ज़ी का होता था, इसीलिए लोग उन्हें राजा साहब कहते थे.

पुराने लोगों में एक जयनारायण शर्मा जी भी थे. ज़्यादातर सवेरे की ड्यूटी करते थे. सरकारी गाड़ी से कोई सवा चार बजे आते. एक तरफ के दरवाज़े से अन्दर आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते और दूसरे दरवाज़े से बाहर चले जाते थे. कोई सवा पाँच बजे फिर नमूदार होते और धड़ाधड़ ६ बजे का बुलेटिन बनाने में लग जाते थे. मैं तब कैजुअल न्यूज़रीडर के तौर पर रात की ड्यूटी करती थी. ड्यूटी चार्ट में उनका नाम देखकर मुझे बड़ा अच्छा लगता. बड़ी राहत महसूस होती कि चलो ६ या ७ बजे तक रुकना नहीं पड़ेगा. कह भी देते कि जाना हो तो चली जाओ, हम ६ बजे का बुलेटिन देख लेंगे. बस एक ही बुरी आदत थी उनमें. गालियाँ बहुत देते थे. कोई चुटकुला सुना रहे हों, या ऑफिस की कोई गप या कोई और बात....बग़ैर गाली के पूरी ही नहीं होती थी. पहले-पहल तो मुझे बहुत बुरा लगता था पर कहती कैसे? लेकिन बाद में थोड़ी झिझक मिट जाने पर मैंने उन्हें टोका और कहा कि अब से जब भी समाचार कक्ष में कोई महिला होगी तब आप गाली नहीं देंगे. कहने लगे कि कोशिश कर सकता हूँ वादा नहीं कर सकता.  मैंने कहा अगर हमारे सामने गाली देंगे तो जुरमाना भरना पड़ेगा. बोले कि भाई, साला टाइप हलकी-फुलकी गाली का और महिलाओं की शान में गुस्ताख़ी वाली गालियों का एक सा रेट तो नहीं होना चाहिए. काफी मोल-भाव के बाद तय हुआ कि पहले प्रकार की गालियों पर २५ पैसे और दूसरे प्रकार की गाली पर एक रुपया देना होगा. मैंने गालियों का हिसाब जोड़ना शुरू कर दिया. कुछ रुपये जमा हो जाने पर उन्होंने एक बार सबको चाय भी पिलवा दी लेकिन उसके बाद मुकर गए. बोले कि बड़ी गाली का आठ आना ही तय हुआ था. मैं हिसाब ही जोड़ती रह गयी और वे रिटायर होकर चले भी गए.

          -----शुभ्रा शर्मा

30 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

आपके अनुभव,

Anonymous said...

Shubhra ji, Namaskaar.
Dher saari badhaayi sweekaar karein iss aalekh ke liye ! Ek toh bebaaki aur saath mein rochakta ka anupam mishran hai.
Haalaanki main samaachaar vaachak toh nahin par Akashwani se jude hone ke kaaran kai baar Aap-beeti si maaloom huyi.
Saadar Saadhuwaad aur Dhanyawaad.
Anil Munshi.

Chidambar said...

बहुत बढिया। अगर यह श्रृंखला ध्वनि रूप(PODCAST) में भी प्राप्त हो जाए तो सोने पर सुहागेवाली बात होगी ।


चिदंबर काकतकर
मंगलूर कर्नाटक

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

श्रीमती शुभ्राजी ने जो माहोल बताया है वह मैं खूड रेडियोकर्मी नहीं होते हुए भी रेडियो केन्दों से कुछ हद तक नज़दीक रहने के कारण समाचारों को छोड कर अन्य कार्यक्रमों के उद्दधोषको के बारेमें भी ऐसी परिस्थितीयोंमें फसने के बारेमें जानता हूँ । और कभी कभी मेरे कई श्रोता मित्रो को इस प्रकारकी गलतीयोँमें फसने के समय समझाने की कोशिश करता हूँ ।
पियुष महेता ।
सुरत-395001.

Dr.Nidhi Tandon said...

शुभ्रा दी............पढ़ कर मज़ा आ गया .....मुझे लगा कि आपके साथ मैं भी रेडियो के समाचार कक्ष में पहुँच गयी हूँ........आपने इतना अच्छा लिखा है कि सारी चीज़ें आँखों के आगे होती हुई सी प्रतीत होती हैं .

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

रोचक बातें। हम रात पौने नौ बजे का पंद्रह मिनट वाला बुलेटिन सुनकर ही बड़े हुए हैं। सरकारी समाचारों में जो कमी रह जाती थी उसे बीबीसी-हिंदी सर्विस से पूरा करते थे।

हम शुभ्रा जी की आवाज आज भी पहचान सकते हैं।

Abhishek Ojha said...

बहुत अच्छा लगा चटपटे अंदाज में पढना. "दरअसल रेडियो का समाचारवाचक बड़ा ही निरीह और दयनीय प्राणी होता है." हा हा. कभी सोचा नहीं था कोई समाचारवाचक ऐसा भी सोच सकता है :)

Manoj K said...

शुभ्रा जी को हम पहचानते हैं.. आवाज़ से ..

शुभ्रा जी, आपके यह संस्मरण हमें अपने ऑफिस में होने वाले छोटे छोटे वाक्यात याद दिलाते हैं..

फैसला बाद में वाली बात और गालियों वाली चवन्नी और १ रुपये वाली बात पर खूब हंसी आई.

युनुस भाई को कोटि-कोटि धन्यवाद.

Sarita said...

Dear Subhra,

I was waiting for your article and today I read and enjoyed it. Your writing is beautiful and gives a clear picture of the situation. I have not heared you on radio or watched you reading news on TV, but I remember your sense of humour since our college days.

I am waiting for your next writing.

Sarita Lakhotia

shruti said...

नमस्कार शुभ्रा जी ,ये लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा ,आज पता चला न्यूज़ रीडर को कितनी परेशानी होती है

shruti said...

नमस्कार शुभ्रा जी ,ये लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा ,आज पता चला न्यूज़ रीडर को कितनी परेशानी होती है

shruti said...

नमस्कार शुभ्रा जी ,ये लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा ,आज पता चला न्यूज़ रीडर को कितनी परेशानी होती है

yunus said...

Yes, it is but natural that people woule blame news reader if there is any mistake but on the other hand he/she takes all the credit if bulletin is good one. A lay man marvels at the knowledge of news reader thinking how on earth he/she knows everything of everything. He does not know that he/she is reading a copy prepared by a team of editors/correspondents/translators.

फेसबुक पर भुवन खंडूरी की टिप्‍पणी।

yunus said...

copy may be of others but style is always of the newsreader for which she deserves full marks without any deductions.


कुलदीप सिंह धतवालिया
फेसबुक पर।

yunus said...

aaj pata chala news reader ko kitni pareshaani hoti hai.

श्रुति रिछारिया
जबलपुर। फेसबुक पर।

yunus said...

aaj pata chala news reader ko kitni pareshaani hoti hai.

श्रुति रिछारिया
जबलपुर। फेसबुक पर।

yunus said...

interesting... galiyo ka hisaab, hisaab hi rah gaya... FAISLA na ho saka...


अविनाश पारीक
फेसबुक पर।

yunus said...

ache sasmaran hain. shubraj, apki ispar kitab bhi ani cahiye,

वेद विलास उनियाल
फेसबुक पर

दिलचस्प संस्मरण । वैसे आज भी आकाशवाणी के समाचारो का जो स्तर है उसका मुकाबला कोई भी न्युज चैनल नहीँ कर सकता.

दिलीप शर्मा
फेसबुक पर।


Wah maza aagya. . . Faisala baad aur galion wali badi dilchasp hai.

अखिलेंद्र प्रताप यादव लखनऊ
फेसबुक पर।

mai pakistan gaya hu aur faisabaad ki kahani dilchasap lagi

संदीप कुमार अमृतसर
फेसबुक पर

Dr. Hemant Joshi said...

बहुत खूब..पुरानी यादें ताज़ा हो गईं..बहुत सी है पर सब यहाँ बताई भी नहीं जा सकतीं...

उन्मुक्त said...

लेकिन क्या समाचार वाचक समाचार पढ़ने से पहले उस पर नज़र नहीं डालते। मेरे विचार से ऐसा अवश्य करना चाहिये।

यदि श्रीमती की जगह श्री जैसी गलती हो जाय तब समाचार लिखने वाले को बताना चाहिये। अन्यथा वह इस तरह की गलती कभी भी नहीं सुधारेगा।

Archana said...

Rochak anubhav........har jagah hote hai bhala Akashwani se nahi judi par Samachar bahut sune-----us samay pitaji ko dena hota tha "Transister"....(Hindi me yaha se type nahi kar pa rahi aur Eng.me spelling nahi aati...aise hi samajhana hoga kya kahan chahati hu--sorry)

sanjay patel said...

शुभ्राजी आपके रेडियोनामा पर नमूदार होने से नज़रों से ओझल और सिर्फ़ आवाज़ से दीन-दुनिया का सूरतेहाल बताने वाले शख़्स की ज़िम्मेदारियों और विवशताओं का पता चलता है.

इसमें कोई शक नहीं कि इंटरनेट के पहले और अख़बार के अलावा आकाशवाणी समाचार ही एक विश्वसनीय माध्यम रहा है जो आपको ज़माने की सुख/दु:ख की घटनाओं से बाख़बर करता रहा है.

मेरे दादा रतलाम ज़िले के छोटे से गाँव सैलाना में रहते थे और उनके पास फ़िलिप्स बहादुर रेडियो सैट था जिसे न केवल हमारा परिवार बल्कि पूरा मोहल्ला सुनने घर के ओटले पर एकत्र हो जाता था. घर में घड़ी नहीं थी और जब कभी सुबह आठ बजे वाला समाचार शुरू होता और दादी हमारे दादा से समय पूछतीं कि कई बखत व्यो (टाइम क्या हुआ) तो दादा कहते हमीचार अई रिया हे;आठ वज गी वेगा (समाचार आ रहे हैं,आठ बज गये होंगे)

आज सुबह ही समाचार प्रभात सुनते हुए मैंने अपनी श्रीमती से कहा देखो समाचार का कितना मज़ा है,बाबा रामदेव,सानिया मिर्ज़ा,बोपन्ना,फ़्रेंच ओपन,उत्तर-पूर्व का मौसम सब कुछ बिना आँखों पर ज़ोर ड़ाले हम सुनते जा रहे हैं.

समाचार ज़िन्दगी को एक बिना क़ीमत का ख़ज़ाना मुहैया करवाता रहा है और कितनी भी तकनीक और साधन बदलें;इसकी अहमियत नहीं बदलगी.

लिखते रहिये..शुभ्राजी हम मालामाल हो रहे हैं !

shubhra sharma said...

देखिये इसीलिए कह रही थी - सातवें आसमान तक पहुँच जाने जैसा महसूस करने लगती हूँ जब इतने सारे लोग मेरा लिखा पढ़ते हैं और पसंद करते हैं. हौसला बढ़ जाता है. मन करता है बहुत सी पुरानी बातें याद करती जाऊं और अपने इस बड़े परिवार को सुनाती जाऊं. लेकिन आप भी इसी तरह अपनी राय देते जाइएगा. स्तुतिः क: न प्रीयते ?
विनयावनत

GGShaikh said...

शुभ्र जी,
'ये आकाशवाणी है, अब आप.... से, समाचार सुनिए'.
आज भी यह आवाज़ जैसे कानों में गूँज रही हो ...! सहज ही बस गई थी यह आवाज़
हमारे जीवन में, हमारी दिनचर्या में, जिंदगी के हर उस बदलते हुए परिवेश में.. सुबह में, दोपहर शाम में, देर रात में, कितने ही लम्हों में यह आवाज़ अपनत्व लिए हमारे साथ-साथ चली... जैसे व्याप्त कलात्मकता का सा एक आष्लेश हमारा, हमारे परिवेश का ...
वैसी बात आज के चैनल समाचारों में कहाँ...!

उसी आकाशवाणी की अंदरूनी दुनिया की खट्टी-मीठी बातें, यादें, छुपी कश्मकशैं, बिपदाएं,सहयोगियों का साथ-सहयोग या बेरुखी सब कुछ बिना रूखापन के आप लिख रही हैं...जिसे पढ़, बड़ा ही अच्छा लग रहा है...

yunus said...

अभी अभी मेल पर विविध-भारती के नामी ब्रॉडकास्‍टर लोकेंद्र शर्मा की ये टिप्‍पणी मिली है। साथ ही ये ख़ुशख़बरी भी कि वे जल्‍दी ही रेडियोनामा पर आपसे मु़खातिब होंगे।

शुभ्रा जी का संस्मरण पढ़ कर, मेरी स्मृतियों में भी कुछ पुराने दिन जाग उठे. मैंने न्यूज़ रूम में तो कभी काम नहीं किया लेकिन विविध विविध में जाने के लिए उसके बगल से ही गुज़रना पड़ता था, सो वहां के लोगों से दुआ सलाम हो ही जाता था. वैसे भी उन दिनों ( सन १९६४-१९७० की बात है) आकाशवाणी दिल्ली की इमारत में काम करने वाले सभी लोग एक दूसरे को बखूबी जानते थे. सर्वश्री देवकी नंदन पाण्डे, अशोक बाजपेई, जयदेव त्रिवेदी, विनोद कश्यप आदि कई महारथियों को नज़दीक से देखने और जानने का सौभाग्य मुझे मिला. कई बार स्टूडियो में उनके साथ एक ही माइक्रोफोन पर बोलने का अवसर भी मिला. मैं विविध भारती में कैजुअल एनाउंसर था. लेकिन नियम ऐसा था कि हर महीने कांट्रेक्ट दिया जाता था, इसलिए लगभग परमानेंट जैसा ही अनुभव होता था. शुभ्रा जी को तो मैंने शायद नहीं देखा, लेकिन उनके पिता श्री भिक्खू जी से परिचय था. बल्कि आकाशवाणी मथुरा के लिए मेरा चुनाव उन्होंने ही किया था .
.... लगता है पिछले जनम की बातें कर रहा हूँ

sanjay patel said...

यूनुस भाई;लोकेन्द्र जी टिप्पणी में जिन नामों का ज़िक्र हुआ है उन्हीं से यादों के तार झनझना उठे और इंदु वाही, रामानुजप्रसादसिंह (जो आकाशवाणी समाचार प्रसारण में सबसे ज़्यादा फ़ंबल करने वाले वाचक रहे होंगे)ब्रज शर्मा भी याद आ गये.(ब्रजजी आकाशवाणी इन्दौर में भी रहे और कालांतर में वॉइस ऑफ़ अमेरिका चले गये थे )इस कमेंट को लिखने का मोह संवरण इसलिये न कर सका कि कम से कम इस बहाने दस्तावेज़ीकरण तो हो जाएगा.

मीनाक्षी said...

हम रेडियो सुनने वालों में से जो बस आँख बन्द कर कानों से आवाज़ों की खूबसूरती देखते हैं...तकनीकी बातें तो आप जानें...शुभ्राजी के संस्मरण बेहद रोचक हैं..

Rachana said...

shubhra ji ati sunder aanad aaya padh kar bahut rochal laga yahan America me mera bhi radio se bahut gahra nata hai .atah padh kar aur bhi aanand aaya
rachana

shadows said...

28 comment hai mujhse pehle, aur mera sirf ek sawaal. when do u start a book?

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Shubhra ji ,

Kem cho ? Tamaro aalekh / sansmaran bahu gamyo
Well written ....interesting & fun ..

It will be a good idea to hear this + other posts
by you in your voice . Good luck always

Sa sneh,
- Lavanya

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