सबसे नए तीन पन्ने :

Friday, May 27, 2011

'27 मई 1964 आकाशवाणी गोवा'.....शुभ्रा शर्मा

कल मैंने आकाशवाणी के समाचार प्रभाग की मशहूर समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा के रेडियोनामा से जुड़ने का ऐलान किया था और लीजिए आज शुभ्रा जी बाक़ायदा रेडियोनामा पर अवतरित हो रही हैं।

इस आत्‍मीय आलेख में शुभ्रा जी ने अपने बचपन की एक बेहद महत्‍वपूर्ण घटना का सुंदर ब्‍यौरा दिया है।
आज पंडित जवाहर लाल नेहरू की पुण्‍यतिथि है। इस आलेख के ज़रिए रेडियोनामा उन्‍हें नमन भी कर रहा है।

ये आलेख शुभ्रा जी की आगामी श्रृंखला से अलग है। उनकी श्रृंखला जून के पहले सप्‍ताह में शुरू होगी और हर हफ्ते आप तक पहुंचेगी।
                                                                                           ......यूनुस ख़ान



बात उन दिनों की है जब गोवा पुर्तगाली शासन से नया-नया मुक्त हुआ था, हालाँकि हवा तब भी साढ़े चार सौ वर्षों की दासता से भारी महसूस होती थी. लोग तब भी देश के अन्य हिस्सों को इंडिया कहते थे, बाज़ारों में विदेशी सामान भरा पड़ा था और समुद्र तट पर १२-१४ वर्ष के बच्चे भी बियर या वाइन का लुत्फ़ लेते देखे जा सकते थे. आकाशवाणी पर भी एमिसोरा  डि गोवा का असर बाक़ी था. दोपहर के लंच के बाद लगभग दो घंटे  सिएस्टा के लिए नियत थे. केंद्र निदेशक का कमरा बहुत बड़ा और सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ था. कमरे
की एक पूरी दीवार शीशे की थी, जहाँ से बगीचे का कोना नज़र आता था. कमरे में एक तरफ आरामदेह सोफा- कम- बेड था, जहाँ पुर्तगाली केंद्र निदेशक सिएस्टा का आनंद लेते थे. नए केंद्र निदेशक मेजर अमीन फौजी व्यक्ति थे, जिन्हें आराम के नाम से चिढ़ थी. वैसे भी वह नेहरूजी के 'आराम हराम है' के नारे वाला दौर था.  मेरे पिताजी, कृष्ण चन्द्र शर्मा 'भिक्खु' सहायक केंद्र निदेशक थे. दोनों अधिकारियों  की पूरी कोशिश रहती कि कम से कम आकाशवाणी से सिएस्टा का चलन ख़त्म हो जाये. लेकिन आह का असर होने के लिए
भी तो एक उम्र दरकार होती है.


गोवा में तब आकाशवाणी के कर्मचारियों को सरकारी आवास उपलब्ध नहीं थे. दोनों बड़े अधिकारी एक होटल में एक-एक कमरा किराये पर लेकर रहते थे. साल में एक बार, गर्मी की छुट्टियों में माँ, डॉ० शकुन्तला शर्मा मुझे लेकर गोवा जाती थीं. उसी एक कमरे में हम दोनों भी समा जाते थे. कमरे में समुद्र की ओर खुलने वाली बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ थीं. उन्हीं में से एक के आगे माँ अपना चूल्हा-चौका जमा लेती थीं. घनघोर मांसाहारी प्रदेश में शाकाहारियों के लिए न तो कोई होटल था और न पंजाबी ढाबा या मारवाड़ी बासा. इसलिए माँ सोचती थीं - डेढ़-दो महीने के लिए ही सही, कम से कम पिताजी को घर का खाना तो खिला दें. आकाशवाणी से होटल की दूरी बस इतनी थी कि पिताजी दोपहर में खाना खाने आ जाते थे. ये और बात थी कि उनके पास एक अदद अम्बेसेडर कार थी जबकि उनका ड्राईवर सिल्वेस्ता मर्सिडीज़ में चलता था. पिताजी अम्बेसेडर में खाना
खाने आते थे, लेकिन शाम को उन्हें घर छोड़ने के बाद सिल्वेस्ता मुझे और मेरे दोस्तों को अपनी मर्सिडीज़ में घुमाने ले जाता था और आइसक्रीम भी खिलाता था.

एक दिन पिताजी खाना खाने बैठे ही थे कि फ़ोन की घंटी बजी. मैंने दौड़कर
फ़ोन उठाया. उधर से आवाज़ आई -
"मिस्टर शर्मा से बात कराइये, हम दिल्ली से बोल रहे हैं."
मैंने कह दिया कि वे खाना खा रहे हैं, लेकिन उधर से आदेश हुआ -" कोई बात
नहीं, उन्हें फ़ोन दीजिये".

मैं ज़रा लाडली बेटी थी, सो अड़ गयी कि थोड़ी देर बाद कर लीजियेगा. लेकिन तब तक दिल्ली का नाम nehru air सुनकर पिताजी उठ कर आ गए. नौ साल की उम्र के गुस्से में बिफरी हुई मैं माँ से शिकायत करने उनके पास चली आई. तभी पिताजी को कहते सुना - "हाय, ये क्या हो गया". फ़ोन रखकर पिताजी वहीँ दीवार से लिपटकर बुरी तरह रोने लगे. मैंने इससे पहले कभी उन्हें रोते नहीं देखा था. मैं बहुत डर गयी और माँ के पास सिमट गयी. माँ ने पूछा - "क्या हुआ?" पिताजी ने उसी तरह बिलखते हुए कहा - "नेहरुजी नहीं रहे".
इस पर माँ भी रोने लगीं. दोनों पुराने कांग्रेसी थे और छात्र जीवन में अपने-अपने तौर पर स्वतंत्रता सेनानी रह चुके थे. हालाँकि इस बात के लिए उन्होंने न तो कभी किसी प्रमाण-पत्र का दावा किया और न ही उसका कोई अन्य लाभ उठाया. उस समय नेहरूजी के इन दोनों आत्मीय स्वजनों को रोते देखकर मेरा क्या हाल हुआ
होगा, आप खुद समझ सकते हैं.

नेहरु जी के निधन के बाद सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा कर दी गयी. आकाशवाणी से जुड़े लोग इस घोषणा के महत्त्व को समझ सकते हैं. सभी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम बंद, गीत-संगीत का प्रसारण बंद, केवल भक्ति-संगीत और वह भी बिना वाद्य-यंत्रों के. किसी और केंद्र पर शायद इतनी कठिनाई नहीं हुई होगी. लेकिन यहाँ तो स्थिति ही अलग थी. एमिसोरा डि गोवा के आर्काइव्स में भला ऐसा भक्ति संगीत कहाँ से मिलता? मगर प्रसारण तो होना ही था. ठीक समय पर होना था. आज की तरह किसी और स्टेशन को पैच करने की सुविधा मौजूद नहीं थी. अब क्या हो? चारों तरफ गाड़ियाँ दौड़ायी गयीं. जहाँ कहीं भी कोई हिंदी- संस्कृत के विद्वान् थे, सादर आमंत्रित किये गए. गायकों- संगीतकारों को स्टूडियो में बुलाकर रेकॉर्डिंग शुरू की गयी. मैंने वह दृश्य अपनी आँखों से देखा है कि प्रोड्यूसर से लेकर केंद्र निदेशक तक सभी स्पूल-टेप लेकर इधर-उधर दौड़े चले जा रहे हैं. धीरे-धीरे एमिसोरा पर आकाशवाणी का रंग छाने लगा. लेकिन अभी तो सात दिनों तक प्रसारण जारी रखना था.

केंद्र निदेशक मेजर अमीन को याद आया कि माँ ने किसी प्रसंग में बताया था कि परिवार में किसी का निधन होने पर उन्होंने पूरी रात बैठकर गीता पाठ किया था. आकाशवाणी से लौटकर वे सीधे माँ के पास आये.  उन्होंने माँ से कहा - मुझे आपसे गीता की रेकॉर्डिंग  करानी है. शर्मा जी से ज़िक्र करने की कोई ज़रुरत नहीं है. उनके जाने के बाद आप तैयार रहिएगा, मैं गाड़ी भेज दूंगा. माँ ने उनसे कहा कि यदि कहीं से रामचरितमानस की व्यवस्था हो जाये तो वे उसके कुछ अंश भी रिकॉर्ड करा देंगी. शोक सप्ताह के बीच एक shubhra sharma रविवार भी पड़ रहा था. उस दिन एक घंटे का बच्चों का कार्यक्रम होता था. मेजर अमीन उस के लिए भी चिंतित थे. क्या करेंगे, कैसे करेंगे? क्या बच्चों को एक घंटे तक सिर्फ नेहरूजी के विषय में ही बताते
रहेंगे? उनकी यह समस्या भी माँ ने हल कर दी. माँ ने उन्हें बताया कि जब मैं कोई पाँच साल की थी, तब नेहरूजी मेरे स्कूल में आये थे. मैंने जिद करके अपने लिए सैनिकों जैसी वर्दी सिलवाई थी और वही पहनकर स्कूल गयी थी. नेहरुजी आये तो बहुत सारी यूनीफॉर्म-धारी बच्चियों के बीच मैं अकेली सैनिक लिबास में थी. सच पूछिए तो नेहरु चाचा के आगे खुद को किसी ब्रिगेडियर से कम नहीं समझ रही थी. वे जब पास आये तो मैंने जमकर सेल्यूट ठोंका. वे हँसे. मेरा नाम पूछा और मुझे गोद में उठाकर आगे बढ़ गए. नेहरूजी
की गोद में चढ़ने के बाद मेरा क्या हुआ, इसका होश मुझे तो है नहीं . लेकिन लोगों ने बताया कि उन्होंने कहा था - हमें इस जैसी ही बच्चियों की ज़रुरत है. माँ से यह किस्सा सुनकर मेजर अमीन समझ गए कि रविवार की बाल सभा का भी इंतज़ाम हो ही गया समझो. कोई भी कुशल इंटरव्यूअर इस घटना को बड़े आराम से एक घंटे तक खींच सकता था और नेहरु चाचा के प्रति बच्चों के प्यार को भी रेखांकित कर सकता था.

अगले दिन मुस्कुराता हुआ सिल्वेस्ता हमें लेने आया. हम केंद्र निदेशक के उसी खूबसूरत कमरे में बिठाये गए. मेजर अमीन ने फ़ोन उठाकर नंबर घुमाया और कहा - "शर्माजी मेरे आर्टिस्ट आ गए हैं. आप ज़रा इनकी रेकॉर्डिंग की व्यवस्था देख लीजिये." कुछ ही देर में पिताजी - "मे आई कम इन सर" कहते हुए कमरे में दाखिल हुए और उनके आर्टिस्ट्स को देखकर दंग रह गए. आकाशवाणी परिवार के सदस्य होने के नाते हमें उस दिन मात्र एक-एक रुपये की टोकन फीस मिली लेकिन हम उसी दिन से बाक़ायदा आकाशवाणी के कलाकार तो बन ही गए.
                                                                                         
-- डॉ0 शुभ्रा शर्मा

21 comments:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

शुभ्रा जी , नमस्ते
आप भी हमारे ' विविध भारती प्रसारण सेवा ' परिवार की सदस्या हैं और आपके बचपन के मार्मिक
अनुभवों के बारे मे पढ़कर प्रसन्नता हुई और किस तरह विविधभारती ने आकार लिया और दूर दराज के केन्द्रों से
भारत को जोड़ कर एकता का सन्देश दिया और महत्त्वपूर्ण कार्य किया उसे उजागर किया आपके सुन्दर आलेख ने ..
यूनुस भाई , ' रेडियोनामा ' पे सुमधुर गीत सुन,
मन प्रसन्न है ..आपके प्रयासों के लिए आपको ,
स स्नेहाशिष ...
अब, शुभ्रा जी के संस्मरणों के
अगले भागों को पढने कि प्रतीक्षा रहेगी ..
शुभ्रा जी ,
आपके गौरवशाली पिताजी व मा जी को सादर नमन ..
भारत के जवाहर हमारे चाचा नेहरू जी को श्रध्धा सुमन
....जय हिंद !
स स्नेह,
- लावण्या

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

Laajwab...

Rajendra said...

Thanks for taking us down memory lane.

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

रेडियो से जुडी उन यादें आज भी तजा हैं .......पर आप लोगों के माध्यम से ऐसा लगता है कि आम श्रोता अब स्टूडियो के पीछे की हलचल भी देख पा रहा है |

Sunil Kumar said...

संस्मरण को बखूबी लिखा है यादों को संजोना जरुरी है

मसिजीवी said...

मार्मिक व स्‍पंदनपूर्ण

मीनाक्षी said...

विविध भारती सुनते हुए उनसे जुड़े लोगों के संस्मरण पढ़ने का अपना ही अनुभव है...नेहरूजी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धाँजलि .. शुभ्राजी की इन यादों को पढ़ने के बाद आगे की श्रंखला का बेसब्री से इंतज़ार है...

Tehseen said...

भाई यह तो कमाल की जगह है...जल्दी में हैं इत्मीनान से देखेंगे...मगर बकोल शाएर...
हुज़ूर आपका भी एहतराम करता चलूँ, इधर से गुज़रा था सोचा सलाम करता चलूँ... आप हुक्म दें तो रोजाना एक बेसाख्ता का वादा कर लें....

Anonymous said...

Tehseen Bhai,
ab jo idhar se guzare hain ehtaram karna hi hoga
roz nahin to har hafte besakhta intzam karna hi hoga.
Shubhra

Dr.Nidhi Tandon said...

शुभ्रा दी ..............मज़ा आ गया पढ़ कर .....भूली बिसरी यादों को आपने जिस खूबी से बाँधा है.......अच्छा लगा.....आपका संस्मरण पढ़ आकर आँखों के आगे सारे चित्र उपस्थित हो गए.....

Archana said...

ये जिन्दगी भी अजीब है कोई कब ,कहाँ ,किससे जुड़ जाए ,कुछ पता नहीं होता..खूब सुना विविध भारती जब सुना..फिर साथ छूटा...अब फिर मिला साथ...और फिर जुड़ना शुरू ..

aarkay said...

nehru ji ko bhavbheeni shraddhanjali se aapne shuruaat ki hai , aage bhi achha hi hoga. sansmaran rochak aur bhav purn laga !

yunus said...

सुभ्रा जी,

आकाशवाणी भी लकी और आप भी...
जहाँ आकाशवाणी को आप मिले, आपको आकाशवाणी...
और देश की जनता को तो आप दोनों ही मिले...
जैसा आपका फैमिली बेकग्राउंड वैसा ही आपका करियर
और आपका जीवन...

एक अर्से बाद
नेहरू जी की जीवंत झलक भी मिली आपके आलेख में...

पढ़ते रहेंगे आपके समय को आपके ज़रिए...
"Please Carry On..

जी जी शेख
गुजरात से
'बज़' पर

Manoj K said...

संस्मरण पढ़कर अच्छा लगा..आकाशवाणी का अपना ही क्रेज हुआ करता था, मुझे अब भी जब रेडियो सुनने का मन करता है सिर्फ़ आकाशवाणी ही सुनता हूँ..

sanjay patel said...

रेडियोनामा पर आपकी आमद का अभिनंदन. समाचार प्रभात में तो आपके स्वर से वाक़फ़ियत थी ही अब शब्द और् क़लम से भी हो जाएगी. युनूस भाई से जैसे ही आपके रेडियोनामा पर आने की ख़बर मिली तो लगा कि अब हमें कुछ अभिनव पढ़ने को मिलेगा,और आज उसकी बानगी मिल गई.

आपने अपनी पहली पोस्ट में नेहरूजी के अवसान के समय आकाशवांणी गोवा के शोक प्रसारणो का मार्मिक विवरण दिया है.बधाई. दर-असल आकाशवाणी की क़ामयाबी में आपके पूज्य पिताजी और् मेजर ....साहब जैसे कई समर्पित सेवियों का अवदान रहा है.आज आकाशवाणी की जो बेहाली है उसका कारण इस महान विरासत वाले संस्थान से निजता और् आत्मीयता का लोप हो जाना है. मेरे पिताजी श्री नरहरि पटेल आकाशवाणी इन्दौर के प्रसारणों की मकबूल आवाज़ रहे हैं. हमने अपने बचपन में मालवा हाउस (आकाशवाणी इन्दौर परिसर इसी नाम से जाना जाता है) में अपनेपन का वह दौर देखा है जब इसके स्टेशन डायरेक्टर्स मेरे पिताश्री जैसे अतिथि कलाकारों को असीम आदर और् स्नेह से भर देते थे. कई बार नाटकों की रिहर्सल्स और् रेकॉर्डिंग्स देर रात तक चलती थी और् ६० से ७० दशक में मालवा हाउस के इर्द-गिर्द कोई रेस्टॉरेंट्स या ढाबे नहीं होते थे जहाँ कोई पेट पूजा की जा सके. पिताजी बताते हैं एकाधिक बार नंदलाल बवेजा,एम.पी.लेले,नगरकर साहब,जयदयाल बवेजा,शिंगलू साहब,प्रभागचंद्र शर्मा,हेमचंन्द्र शर्मा,केशव पाण्डे और् केवलकृष्ण नैयर जैसे प्रशासक सभी कलाकारों को मालवा हाउस परिसर में स्थित अपने निवास पर ले जाकर स्वल्पाहार/भोजन करवाते थे. बात छोटी सी है लेकिन इसमें भावना की जो ख़ुशबू है वह आप जैसी प्रसारणकर्ता समझ सकतीं हैं.उल्लेखनीय है कि कालांतर में उपरोक्त सभी नाम आकाशवाणी निदेशालय में सर्वोच्च ओहदों तक पहुँचे. इस उदाहरण से मैं यही बताना चाहता हूँ कि आकाशवाणी तब तक स्वर्णकाल में रहा जब तक वहाँ लोगों ने नौकरी नहीं की और् रचनात्मकता का जुनून पाला. पिताजी का कोई नाटक प्रसारित होने वाला हो तो हम फ़ोन करके या पत्र लिख कर अपने रिश्तेदारों को सूचित करते थे. ये पारिवारिकता और् अपनत्व अब काफ़ूर हो चला है. आपने अपने आलेख में गुज़रे दौर के आकाशवाणी संस्कृति की याद दिला दी. बधाई और् जारी रहे ये शब्द-यात्रा....

Sandeep Kumar said...

बहुत खुब

सागर नाहर said...

शुभ्राजी, आपका हार्दिक स्वागत है।
शानदार पोस्ट!
इसे कहते हैं ब्लॉग पोस्ट। निश्‍चय ही आपकी पोस्ट् रेडियोनामा की पोस्ट्स से ऊब चुके पाठकों के लिए सुन्दर तोहफा है। तभी तो आफकी पहली ही पोस्ट हिट रही।
अगली कड़ी का इन्तजार है।

धन्यवाद यूनुस भाई।

shadows said...

Beautiful post ma'am. Loved the incident and loved the picture too...

aroonima said...

aap ke radio nama ne bachpan ki yaad dila di. jab bacchon ka karikram aata tha hum sub radio k paas baith jaate the.programme k bhaiya(rajjan lal) karela kehne par rasgulley,rasgulley kehte .bhabhi,aap ki post padh kar bade dino baad kuch nayasa bhut sukhad anubhav hua.aap likhti jaiye, hum padhte jayen .aap k saath basti hui basti bhut khubsoorat saaf sacchi hai, kosish ho gi ki sab kuch itna hi accha chalta rahe . thanks

सागर नाहर said...

अनाम मित्र
आप कृपया किसी के लिए भी व्यक्‍तिगत टिप्पणी ना करें। इस तरह की गैर जरूरी टिप्पणीयों को प्रकाशित नहीं किय जायेगा। रेडियोनामा और रेडियो के प्रसारण या रेडियो विषयक टिप्प्णियों को ही प्रकाशित किया जायेगा। अन्यथा उन्हें मिटा दिया जायेगा।

Radionama said...

Comment Via mail:
'27 मई 1964 आकाशवाणी गोवा'.....शुभ्रा शर्माजी का पहला लेख पढ़ा जिसे पढ़कर आजादी के बाद के दिन भी याद आ गए और आकाशवाणी का उस वक़्त का सफ़र भी थोडासा उजागर हो गया.युनुस खान जी ने जो वादा किया था वो भी पूरा होता नजर आ रहा है. एअक बात सच्चे दिलसे बताना चाहूँगा की मै बचपन से शुभा जी को सुधा शर्मा ही समझ रहा था.आज पत्ता चला की शुभा शर्मा है. इंतजार है अगली कड़ी का ....रेडिओ नामा को धन्यवाद्.
अभिजीत गव्हानकर उमरखे

Post a Comment

आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

अपनी राय दें