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Tuesday, April 8, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-7

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-7

- पंकज अवधिया


श्रीलंका मे सुनामी के बाद पहले पहल पहुँचने वाले विदेशी पत्रकारो मे एक मेरे मित्र भी थे जिन्होने कोलम्बो के होटल मे डेरा डाला था। इस सितारा होटल ने विपत्ति मे सबके लिये दरवाजा खोल दिया था और आलम यह था कि सभी ओर प्रभावित ही नजर आते थे। पत्रकार मित्र श्री शुभ्रांशु चौधरी किसी विदेशी रेडियो की ओर से गये थे। उन्होने अपने अनुभव मुझे बताये। उनका कहना था कि सुनामी की पूर्व चेतावनी देने मे स्थानीय रेडियो स्टेशन अहम भूमिका निभा सकते थे। पर ऐसा नही हुआ। बाद मे बचाव कार्यो के दौरान भी रेडियो की कमी उन्हे महसूस होती रही। प्रभावितो को महामारी से बचने के सरल उपायो से लेकर तरह-तरह की अफवाहो पर भी लगाम रेडियो द्वारा कसी जा सकती थी।


उडीसा मे आये सुपर साइक्लोन की चर्चा पिछले वर्ष मै नियमगिरि जाते हुये ट्रेन मे सहयात्रियो से कर रहा था। चक्रवात का वर्णन करते समय उनकी आँखो मे खौफ को स्पष्ट देखा जा सकता था। सब कुछ तबाह हो गया। जब मैने पूछा कि क्या रेडियो ऐसे मे काम आता तो उन्होने कहा कि टेलीफोन सुविधा ठप्प होने के कारण वे बाहरी दुनिया से रेडियो के माध्यम से सम्पर्क मे रहे। पहले मौसम की खराबी से सुनने मे दिक्कत हुयी पर बाद मे यह समस्या भी दूर हो गयी। बीबीसी के माध्यम से उन्होने जाना कि क्या हो रहा है उनके आस-पास।


दुनिया भर मे बहुत से ऐसे वाक्ये हुये है जिसमे ऐन तूफान के समय रेडियो ने ढाढस बन्धाने से लेकर राहत मुहैया करवाने मे अहम भूमिका निभायी है। अब जब रेडियो फिर से जन-जन तक क्रांति के रूप मे पहुँच रहा है तो यह उम्मीद जगती है कि प्राकृतिक आपदाओ मे ये विशिष्ट भूमिका निभायेंगे। यदि मै गलत नही हूँ तो अभी भी दुनिया मे आपदाओ पर केन्द्रित कोई रेडियो नही है जो चौबीसो घंटे सिर्फ इसी विषय पर चर्चा करे और विशेषज्ञो के माध्यम से दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने मे राहत के लिये तरस रहे प्रभावितो को उनकी भाषा मे मदद दे सके। आज ऐसे रेडियो की जरुरत है। भले ही यह आम लोगो के दान से शुरु हो पर इसे अस्तित्व मे आना ही होगा।


वैज्ञानिक होने के नाते कई तरह के विचार मन मे आते है। आज हम किसी भी भाषा मे लिखे गूगल मे माध्यम से उसे दूसरी भाषाओ मे पल भर मे रुपांतरित किया जा सकता है। क्या ऐसा भी कोई दिन आयेगा जब श्री युनुस खान हिन्दी मे बोलेंगे और पूरा देश मन चाही भाषा मे उन्हे सुन सकेगा? यदि ऐसा हुआ तो एक केन्द्रीय आपदा दल दिल्ली मे बैठकर पूरे देश के प्रभावितो को सीधे ही मदद कर पायेगा। मुझे उम्मीद है कि देश के योजनाकार इस दिशा मे भी सोच रहे होंगे।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Wednesday, March 26, 2008

रेडियो के साथ मेरे पचास साल- 1

रेडियो के साथ मेरे पचास साल- 1


- सुषमा अवधिया


ये 1958 की बात है। हम लोग जब छोटे-छोटे हुआ करते थे उस वक्त घर मे रेडियो ऐसे स्थान पर नही हुआ करता था जहाँ सब सुन सके। हम बारह भाई-बहनो मे सबसे बडे भैया के कमरे मे रेडियो था। उनका कमरा पहली मंजिल पर था। उस जमाने मे हम लोग उनके कमरे मे जाकर रेडियो सुनने की बात सोच भी नही सकते थे। तकदीर से वो सर्विस करने बाहर चले गये। बस फिर क्या था मै और मेरे से छोटे दोनो भाई आनन्द और प्रसन्न रात आठ बजते ही बिनाका गीतमाला सुनने उनके कमरे मे पहुँच जाते थे। हम लोग बडे दुखी थे कि ये प्रोग्राम हफ्ते मे एक दिन बुधवार को ही क्यो आता है, रोज क्यो नही आता। काले रंग का अर्ध गोलाकार रेडियो था इको कम्पनी का। उसका पाइंटर 180 डिग्री घूम जाता था। इस रेडियो की आवाज बहुत मीठी हुआ करती थी।


हम तीनो की खुशी की सीमा नही होती थी। एक से एक गाने सुनते। जैसे ‘जरा सामने तो आओ छलिये, ‘छुप-छुप छ्लने मे क्या राज है’, ‘है अपना दिल तो आवारा, न जाने किस पर आयेगा’, ‘जिन्दगी भर नही भूलेगी वो बरसात की रात’, ‘जो वादा किया, वो निभाना पडेगा’। कैसा मधुर संगीत, मीठी आवाजे- सब कुछ दिल को छू लेता। मन झूम उठता। हम लोग सुनते-सुनते कयास लगाते कि इस बार कौन से गाने के लिये बिनाका गीतमाला का बिगुल बजेगा। आज भी वो दिन याद कर दिल खुश हो जाता है। हम तीनो ने खूब आनन्द लिया रेडियो का।


इसी बीच जहाँ तक मुझे याद है दोपहर सवा तीन बजे से पौने चार बजे तक पाकिस्तान रेडियो से हिन्दी फिल्मो के एक से एक बेहतरीन गाने सुनवाये जाते थे। मै जब भी घर पर होती यह प्रोग्राम जरुर सुनती थी। ये सिलसिला बमुश्किल साल भर चल पाया होगा। हमारे बडे भैया वापिस जबलपुर आ गये। एक बार फिर हम लोग अपने रेडियो से बिछुड गये।


मै जब दसवी कक्षा मे थी तब हमारी एक टीचर मिस पिल्ले ने हम सब नाटक मे भाग लेने वाली लडकियो को लेकर गणतंत्र दिवस पर एक नाटक तैयार करवाया। हम लोगो को बताया गया कि ये नाटक जबलपुर रेडियो स्टेशन से प्रसारित होगा। हम लोगो ने खूब मेहनत की। बडा उत्साह था, रेडियो स्टेशन जायेंगे, कैसा होता होगा?, कैसे रिकार्डिंग होगी?, मन मे ढेर सारे प्रश्न थे। यूँ तो हम लोग इस अहसास से ही प्रसन्न थे कि नाटक जबलपुर रेडियो स्टेशन से प्रसारित होगा। मालूम नही किस कारणवश इस नाटक की रिकार्डिंग नही हो पायी। लम्बे अंतराल के बाद जब मै रायपुर आकाशवाणी की ड्रामा आर्टिस्ट बनी तब यह स्वप्न साकार हुआ। (क्रमश:)


लेखिका का संक्षिप्त परिचय और चित्र

Thursday, March 20, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-6

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-6


- पंकज अवधिया


बचपन मे जब अंग्रेजी गाने सुनने का शौक जागा तो कैसेटो का सहारा लेना पडा। सीडी तो उस समय मिलती नही थी। कैसेट बहुत महंगे होते थे और एक अच्छे गाने के लिये पूरा कैसेट लेना पडता था। शांत गाने वाले कैसेट नही मिलते थे। अंग्रेजी गाने मतलब तेज शोर वाले गाने। उस समय बोनी एम का हल्ला था। इस ग्रुप के सारे कैसेट मेरे पास थे। उस समय रेडियो पर अंग्रेजी गाने सुन पाना सम्भव नही जान पडता था। रेडियो को आजमाया पर ऐसा कोई चैनल नही मिलता था जो मन पसन्द गाने सुनाता। बरसो बाद वर्ल्ड स्पेस से यह मुराद पूरी हुयी। इसमे एक चैंनल है अमूरे जिसमे चौबीसो घंटे अंग्रेजी प्रेम गीत सुनाये जाते है। मन प्रसन्न हो जाता है। मेरी तो काम करने की क्षमता बढ गयी है। कई बार अच्छे गानो के चक्कर मे नीन्द की कुर्बानी देनी पडती है। अभी भी इस लेख को लिखते समय अमूरे चैनल ही बज रहा है। सम्भवत: यह चैनल विदेश से आता है। अब सब कुछ मन पसन्द मिलने के बाद लगता है कि कोई भारतीय इसके कार्यक्रमो को प्रस्तुत करे तो इन गानो मे चार चाँद लग जाये।


लगातार रेडियो सुनने के कारण कई तरह के सुझाव भी मन मे आते है। पर यह मजबूरी है कि इन सुझावो और शिकायतो को कैसे सही हाथो तक पहुँचाया जाये? यह कटु सत्य है कि रेडियो चैनल अपनी तारीफ सुनना चाहते है और यही कारण है कि तारीफ वाले पत्र ही उनके कार्यक्रम मे प्रस्तुत किये जाते है। कई बार निन्दा वाले पत्र भी प्रस्तुत किये जाते है पर चतुराई से। सुनने वाले सब समझते है। मै जब रेडियो से जुडा था तो पत्र को छाँटते समय हमे प्रशंसा वाले पत्र को ही चुनने के लिये कहा जाता था। इसी बीच मौका पाकर हम अपने रिश्तेदारो और पडोसियो को खुश करने उनके नाम भी डाल देते थे पर निन्दा वाल्रे पत्रो को अलग कर दिया जाता था। निन्दा बुरी लगती है पर सकारात्मक नजरीये से देखे तो निन्दा और निन्दक से काफी कुछ सीखा जा सकता है। कृषि की शिक्षा के दौरान हमारे एक प्रोफेसर ने हमे सीखाया कि निन्दक की बात सुनो और अपनी गल्ती सुधारो। साथ ही किसी न किसी बहाने से उसे अपने से जोडे रखो क्योकि वही सही राह दिखायेगा। मुझे नही लगता कि कोई ऐसा भारतीय रेडियो चैंनल है जो सीधे ही सुनने वालो की बात प्रसारित करता है। निन्दक फोरम के वजूद की अपेक्षा करना दूर की बात है। पर वर्तमान व्यवस्था मे निन्दको के लिये भी जगह होनी चाहिये।


मेरी लेखमाला को पढकर अब हमारे परिवार को ‘रेडियो परिवार’ का दर्जा मिल गया है। अब आपको दो और सदस्यो के विषय मे बताना चाहूंगा। मेरे बडे भाई उमेश अवधिया आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले युववाणी मे प्रस्तोता रहे। वही उनकी मुलाकात अपनी जीवन संगिनी से हुयी जो कि साथी कम्पीयर थी। आज इंजीनियर भाई साहब भिलाई इस्पात संयंत्र मे ऊँचे पद पर है और ‘कर्ण’ और ‘ब्रम्हराक्षस का शिष्य़’ जैसे नाटको की एकल प्रस्तुति देते है। देश भर मे उनके शो होते रह्ते है और सम्मानो से नवाजा जाता है। भाभी जी जिनका नाम अंजली अवधिया है, भौतिकी की प्राध्यापिका है और अभी पी.एच,डी. कर रही है। पास्तापुर मे कम्युनिटी रेडियो की बात मैने अभी आई.आई.टी. खडगपुर मे एक साल की शिक्षा ले रहे उमेश भाई को बतायी तो वे खुश हुये कि अब स्वप्न साकार हो रहा है। वे बचपन ही से अपना खुद का रेडियो चैनल आरम्भ करना चाहते थे। उस समय यह सम्भव नही लगता था पर अब तो यह सब कुछ आसान लगने लगा है। यदि यह चैनल शुरु हुआ तो मै कृषि और जडी-बूटियो का विभाग सम्भाल लूंगा। गुलमोहर के औषधीय उपयोग बताऊँगा और फिर गाना बजाऊँगा


‘गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता---‘

ये हर्बल गाने पूरे देश मे पसन्द किये जायेंगे- ऐसा मुझे लगता है।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Monday, March 17, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-5

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-5


- पंकज अवधिया


यूँ तो बचपन ही से आकाशवाणी, रायपुर से प्रसारित किसलय कार्यक्रम को मै ध्यान से सुनता था पर यह नही जानता था कि कभी बतौर बाल कलाकार इस कार्यक्रम को प्रस्तुत करने का अवसर भी मिलेगा। मेरे एक मित्र विनोद के कहने पर मैने फार्म भरा और पहुँच गया आडिशन देने। कोई अनुभव नही था। कोई हालिया संस्मरण सुनाने को कहा गया। कुछ दिनो पहले दीवाली मनायी थी अपने गाँव मे सो पारम्परिक दीवाली के विषय मे बताया। परीक्षक खुश दिखे। अचानक जबान फिसली और मै ‘स’ को ‘श’ कह गया। तुरंत परीक्षक ने उसे दोहराने की जिद की। मैने उस शब्द को नही दोहराया। दूसरा शब्द कहा। फिर तो परीक्षक ने ठान लिया कि वे वही शब्द सुनकर ही रहेंगे। आधे घंटे बात होती रही पर मैने उस शब्द का प्रयोग ही नही किया सारे यत्नो के बावजूद। हँसते हुये मेरा चयन कर लिया गया। बाद मे परीक्षक माननीय लाल राम कुमार सिंग जो कि छत्तीसगढ के जाने-माने उदघोषक और कलाकार है, ने चतुराई की तारीफ की और सीखाया कि कैसे उच्चारण सुधारा जाये। यह सबक बहुत काम आया।


आज जब मै विज्ञान सम्मेलनो मे दुनिया भर के वैज्ञानिको के सामने व्याख्यान देता हूँ तो बडे गौर से सुना जाता है और उच्चारण की तारीफ की जाती है। यदि आप साफ बोलते है तो एक अलग तरह का आत्म-विश्वास आपमे आ जाता है। आज भी मूल भारतीय रेडियो अपने इसी गुण के कारण पहचाना जाता है। आज का जमाना निजी चैनलो का है जहाँ शायद ही इस पर कोई ध्यान दिया जाता है। मुझे लगता है कि प्रतिस्पर्धा की भावना को छोडकर युवाओ को आकाशवाणी मे कार्य कर रहे वरिष्ठो से सीखना चाहिये। मुझे मालूम है वरिष्ठ आगे आकर उन्हे नया रास्ता दिखायेंगे। उच्चारण के मामले मे बीबीसी हिन्दी और नये रेडियो मे वर्ल्ड स्पेस का कोई जवाब नही है। मै यहाँ हिन्दी और उर्दू चैनल की बात कर रहा हूँ।


किसलय मे शामिल होने के बाद मेरी आवाज की कीमत बढ गयी थी। ज्यादा नही पर फिर भी पन्द्रह रुपये का चेक मिलता था हर कार्यक्रम के बाद। मुझसे कहा गया कि किसी अनजाने से कुछ नही खाना। कोई दुश्मन आवाज खराब करने के लिये कुछ भी खिला सकता है। बचपन मे मै सर्दी से परेशान रहता था। ज्यादा कुछ पता नही था इसलिये गरम पानी से गरारे कर लेता था और पैदल जाते समय विक्स ले लेता था। यह सब लम्बे समय तक चला फिर जब हिम्मत करके इनके बिना कार्यक्रम प्रस्तुत किया तो वो ज्यादा प्रभावकारी रहा। सारा मामला आत्मविश्वास मे कमी का था। बाद मे जब मैने ड्रम बजाना आरम्भ किया तो शो से पहले थोडा से ‘पीने’ और इसी तरह नाटक के शो से पहले दर्द नाशक के साथ पुदीन हरा खाने कहा गया। बचपन का सबक इन दोनो से बचाता रहा। आज जब जडी-बूटी पर लिखता हूँ तो बहुत सारे रेडियो जाकी के सन्देश आते है कि आवाज सुधारने वाली वनस्पति बताये। आज बडे खजाने की जानकारी है मेरे पास। मुलैठी से लेकर बच तक। काश यह जानकारी पहले भी होती।


मेरी इस लेखमाला से सबसे अधिक लाभ यह हुआ कि इसे पढकर माताजी ने इच्छा जतायी है कि वे भी अपने अनुभव लिखना चाहती है। वे आकाशवाणी मे नाट्य कलाकार है और एक सफल लेखक है। पर इंटरनेट और कम्प्यूटर से कोसो दूर है। पहले सोचा कि मै ही उनका अनुभव पोस्ट कर दूंगा पर युनुस जी के उत्साहवर्धन के बाद मैने उनका ब्लाग बनाया है ‘स्नेह बिखेरती जिन्दगी’ और वे जल्दी ही रेडियोनामा मे रेडियो से जुडे अपने अनुभव लिखेंगी। उम्मीद है कि पिताजी को भी इससे जोड पाऊंगा क्योकि उनको रेडियो के ‘असली जमाने’ के बारे मे जानकारी है। उनके पास आज भी तरह-तरह के नये-पुराने रेडियो है। उन्हे पढना सचमुच सभी के लिये रोचक रहेगा।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Thursday, March 13, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-4

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-4


- पंकज अवधिया


कुछ वर्षो पहले जब मै रायगढ के मुडागाँव पहुँचा तो देवनाथ को अकेले पाया। बडा ही उदास सा कोने मे बैठा था। घर के लोग काम पर गये थे। देवनाथ की उम्र 18 से ऊपर है पर देखने से लगता है कि बच्चा है। उसके गाँव का पानी उसके लिये अभिशाप बन गया। पानी मे फ्लोराइड की बहुत अधिक मात्रा है। यही कारण है कि गाँव का एक बडा हिस्सा शारीरिक और मानसिक विकृति से जूझ रहा है। देवनाथ के शरीर मे चौबीसो घंटे तेज दर्द होता रहता है। जब घर वाले कुछ कमाते है तो दर्द मिटाने वाले इंजेक्शन का जुगाड होता है। मै अपनी रपट के लिये देवनाथ की तस्वीरे उतारने लगा। मन था कि कुछ मदद करुँ उसकी पर समझ मे नही आया। उससे पूछा कि पूरा दिन कैसे कटता है तो उसने बताया पहले रेडियो था पर वह खराब हो गया है। आनन-फानन मे उसके लिये रेडियो की व्यवस्था की गयी। उसके चेहरे मे खुशी छा गयी। मानो सारा दर्द काफूर हो गया। ऐसा जादू चलता है रेडियो का भारत मे।


बचपन मे पार्टी देकर जन्म दिवस मनाने के बाद ऐसा लगा कि जन्मदिन के दिन कुछ भलाई वाला काम करना चाहिये। चूँकि जुलाई के जन्मदिन पडता है इसलिये मई-जून मे छुट्टियो मे नगर के ब्लाइंड स्कूल मे चला जाया करता था। दो महिने बच्चो के साथ गुजारने के बाद फिर जन्मदिन के दिन बच्चो के साथ खुशियाँ मना लेता था। जब भी मै बच्चो जोकि उम्र मे मुझसे थोडे ही छोटे होते थे, के पास जाया करता तो उन्हे रेडियो से चिपका हुआ पाता था। वे बडे गौर से रेडियो सुनते थे और उदघोषको की कमाल की नकल उतारते थे। स्कूल मे टी.वी. भी था पर रेडियो की ओर झुकाव ज्यादा था। वे देख नही पाते थे इसलिये मै पूरे समय ‘देखना’ शब्द न निकले मुँह से इस प्रयास मे रहता था पर वे बेझिझक कहते थे कि अभी रेडियो सुन रहे है और अब टी.वी. ‘देखना’ है। उनसे बात करने पर वे अक्सर कहते थे कि उनके जैसा जीवन जी रहे लोग क्यो नही उनके दर्द की बाते रेडियो मे करते है? वे मुझसे पूछते थे कि क्या कभी मैने ब्लाइंड उदघोषक को व्लाइंड बच्चो की बाते करते सुना है? मै निरुत्तर हो जाता था। यदि मै गलत नही हूँ तो ऐसा कार्यक्रम अभी भी नही आता है।


पिछले कुछ दशको से मेरी नजर ग्रामीण हाटो पर है और इनके बदलते स्वरूप पर मै लगातार लिखता रहा हूँ। जब से छत्तीसग़ढ मे एफ.एम. चैनलो की बाढ आयी है तब से हाटो मे रेडियो की दुकान विशेष आकर्षण का केन्द्र बन गयी है। सभी के लिये रेडियो है। सी.डी. का क्रेज कुछ घट सा गया है। सुबह-सुबह काम की तलाश मे जब ग्रामीण साइकिल मे सैकडो की संख्या मे शहर आते है तो रेडियो सुनते (या कहे सुनाते) आते है। यह सब बडा ही रोचक दृश्य उपस्थित करता है।



‘
तो बच्चो रेडियो कितने प्रकार के होते है?’ आधुनिक गुरुजी अब यह प्रश्न कर सकते है। दो प्रकार के। एक घर मे सुनने वाला और दूसरा सब जगह सुना जाने वाला। आप भी चौक गये ना। जी, मेरा वर्ल्ड स्पेस रेडियो केवल घर मे चलता है। उसे लटकाकर मै जडी-बूटी खोजने जंगल जाने की सोचूँ तो यह सम्भव नही है। कम से कम अभी तो सम्भव नही है। वैसे यह उम्मीद की जा सकती है जल्दी ही कार रेडियो मे भी वर्ल्ड स्पेस के चैनलो को सुना जा सकेगा।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Saturday, March 8, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-3

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-3

- पंकज अवधिया

जिन दिनो मै पढाई कर रहा था उन दिनो गजलो का दौर अपने चरम पर था। पंकज उधास से लेकर जगजीत सिह जैसे गायको के कैसेट सुने जाते थे। ये गजले मुझे बहुत अच्छी लगती थी पर शराब और शबाब पर आधारित होने के कारण इन्हे घर मे सुने तो सुने कैसे? बडे भाई काँलेज पहुँचने वाले थे सो वे सुन सकते थे। इसी बहाने मै भी सुन लेता था। फिर जब मै सुनने लायक (?) हुआ तो यह दौर ही खत्म हो गया। कैसेट मिलने बन्द हो गये। रेडियो पर भी कम ही गजले आती थी। एक दशक बाद जब घर पर वर्ल्ड स्पेस रेडियो लगाया तो पता चला कि गजलो के लिये चौबीस घंटो का एक अलग चैनल ही है। रेडियो फलक से रुबरू हुआ और यह मेरा पसन्दीदा चैनल बन गया। इस चैंनल मे भारतीय गायको के अलावा पाकिस्तानी गायको को सुनने मिलता है। कव्वालियाँ भी सुनी जा सकती है। जो उदघोषक इसमे बोलते है उनकी उर्दू बडी ही उम्दा होती है। जाहिर है बहुत से शब्द समझ से परे होते है पर जिस अन्दाज से उन्हे प्रस्तुत किया जाता है वह मन को प्रसन्न कर देता है। लाइव रिकार्डिंग का एक बडा संग्रह है इनके पास। तलत अजीज को महफिलो मे सुनना एक अलग ही अनुभव है। आबिदा परवीन के सूफीयाना गीतो की बात निराली है।


इस चैनल मे एक बात बडी अजीब लगती है और वह है एक ही उदघोषक नाम बदल-बदल कर अलग-अलग आवाजो मे कार्यक्रम पेश करते है। जब मै लगातार आठ घंटो तक इसे सुनता हूँ तो इस नाटकीयता से ऊब जाता हूँ। क्या इतने बडे देश मे प्रस्तुतकर्ताओ की कमी है? उम्मीद करता हूँ कि इन उदघोषको के अलग-अलग रूपो को अलग-अलग तनख्वाह भी मिलती होगी। मेरे एक मित्र ने कहा कि हो सकता है उदघोषक अलग-अलग हो पर किसी एक से प्रभावित हो इसलिये सब उसी के जैसे बोलते हो। यह सम्भव है पर यदि ऐसा ही है तो भी दर्शको पर इसका अच्छा असर नही पड रहा है। वर्ल्ड स्पेस के सभी चैनल मे कमोबेश यही स्थिति लगती है। चैनल स्पीन मे जो उदघोषक रवि बन कर आता है वही फरिश्ता मे प्रेमचन्द बन जाता है। फिर वही गन्धर्व नामक चैनल पर भी आ जाता है। यदि यह कोई नया प्रयोग है तो भी ठीक नही जान पडता है।


इतने सारे रेडियो के आने से अब बीबीसी सुनना एकदम बन्द सा हो गया है। वर्ल्ड स्पेस के एक चैनल मे बीबीसी अंग्रेजी सुना जा सकता है पर महिने भर मे कभी ही इसका मौका आता है। बीबीसी हिन्दी सुनने से जो ज्ञानवर्धन होता है उसकी बात ही कुछ और है। अब लगता है कि इसके लिये अलग से समय निकालना होगा।


मै अपने हेल्थ क्लब के मैनेजर से जब पूछता हूँ कि कौन सा चैनल ज्यादा सुनाते हो लोगो को तो वह सिर पकडकर कहता है कि दिन भर एफ एम सुनते (और सुनाते) रहने के लिये हौसला चाहिये। गाडी चलाते समय सुनना अलग बात है और एक ही तरह के तेज संगीत को दिन भर सुनना अलग बात है। हेल्थ क्लब मे रेडियो मिर्ची बजता था पर अब कुछ लोग घर से सीडी ले आते है और उसे ही बजवाते है। स्थानीय एफ.एम. चैनल के एक ही तरह के विज्ञापनो से लोग अब ऊब रहे है। अभी जो तीन एम.एम. चैनल रायपुर मे आ रहे है उसमे से लोग कम विज्ञापन वाले चैनलो को सुनना पसन्द कर रहे है।


मै ऐसे चैनल की खोज मे हूँ जो दिन भर विज्ञान की बात बताये जैसे कि टीवी पर कई चैनल है। रेडियो पर यूजीसी के कार्यक्रमो को सुनने का सुझाव न दे। उन्हे सुनते ही क़क्षा का माहौल तैयार हो जाता है और रोंगटे खडे हो जाते है। बातो-बातो मे जो ज्ञान बाँटे क्या ऐसा कोई चैनल निकट भविष्य मे आयेगा भारत मे?


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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