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Tuesday, April 8, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-7

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-7

- पंकज अवधिया


श्रीलंका मे सुनामी के बाद पहले पहल पहुँचने वाले विदेशी पत्रकारो मे एक मेरे मित्र भी थे जिन्होने कोलम्बो के होटल मे डेरा डाला था। इस सितारा होटल ने विपत्ति मे सबके लिये दरवाजा खोल दिया था और आलम यह था कि सभी ओर प्रभावित ही नजर आते थे। पत्रकार मित्र श्री शुभ्रांशु चौधरी किसी विदेशी रेडियो की ओर से गये थे। उन्होने अपने अनुभव मुझे बताये। उनका कहना था कि सुनामी की पूर्व चेतावनी देने मे स्थानीय रेडियो स्टेशन अहम भूमिका निभा सकते थे। पर ऐसा नही हुआ। बाद मे बचाव कार्यो के दौरान भी रेडियो की कमी उन्हे महसूस होती रही। प्रभावितो को महामारी से बचने के सरल उपायो से लेकर तरह-तरह की अफवाहो पर भी लगाम रेडियो द्वारा कसी जा सकती थी।


उडीसा मे आये सुपर साइक्लोन की चर्चा पिछले वर्ष मै नियमगिरि जाते हुये ट्रेन मे सहयात्रियो से कर रहा था। चक्रवात का वर्णन करते समय उनकी आँखो मे खौफ को स्पष्ट देखा जा सकता था। सब कुछ तबाह हो गया। जब मैने पूछा कि क्या रेडियो ऐसे मे काम आता तो उन्होने कहा कि टेलीफोन सुविधा ठप्प होने के कारण वे बाहरी दुनिया से रेडियो के माध्यम से सम्पर्क मे रहे। पहले मौसम की खराबी से सुनने मे दिक्कत हुयी पर बाद मे यह समस्या भी दूर हो गयी। बीबीसी के माध्यम से उन्होने जाना कि क्या हो रहा है उनके आस-पास।


दुनिया भर मे बहुत से ऐसे वाक्ये हुये है जिसमे ऐन तूफान के समय रेडियो ने ढाढस बन्धाने से लेकर राहत मुहैया करवाने मे अहम भूमिका निभायी है। अब जब रेडियो फिर से जन-जन तक क्रांति के रूप मे पहुँच रहा है तो यह उम्मीद जगती है कि प्राकृतिक आपदाओ मे ये विशिष्ट भूमिका निभायेंगे। यदि मै गलत नही हूँ तो अभी भी दुनिया मे आपदाओ पर केन्द्रित कोई रेडियो नही है जो चौबीसो घंटे सिर्फ इसी विषय पर चर्चा करे और विशेषज्ञो के माध्यम से दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने मे राहत के लिये तरस रहे प्रभावितो को उनकी भाषा मे मदद दे सके। आज ऐसे रेडियो की जरुरत है। भले ही यह आम लोगो के दान से शुरु हो पर इसे अस्तित्व मे आना ही होगा।


वैज्ञानिक होने के नाते कई तरह के विचार मन मे आते है। आज हम किसी भी भाषा मे लिखे गूगल मे माध्यम से उसे दूसरी भाषाओ मे पल भर मे रुपांतरित किया जा सकता है। क्या ऐसा भी कोई दिन आयेगा जब श्री युनुस खान हिन्दी मे बोलेंगे और पूरा देश मन चाही भाषा मे उन्हे सुन सकेगा? यदि ऐसा हुआ तो एक केन्द्रीय आपदा दल दिल्ली मे बैठकर पूरे देश के प्रभावितो को सीधे ही मदद कर पायेगा। मुझे उम्मीद है कि देश के योजनाकार इस दिशा मे भी सोच रहे होंगे।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

3 comments:

annapurna said...

रेडियो से संबधित बात आपने अच्छी उठाई है पर आपकी वैज्ञानिक सोच से मैं सहमत नहीं हूँ। प्राकृतिक आपदा और विज्ञान अक्सर रेल की पटरियों की तरह चलते है। मौसम की जानकारियों का हम सबको अनुभव है किसान और मछुवारे तो अक्सर नुकसान ही उठाते है क्योंकि मौसम का पूर्वानुमान जो विज्ञान देता है उसे अक्सर प्रकृति बदल देती है।

अन्नपूर्णा

सागर नाहर said...

ऐसे समय पर अक्सर हेम रेडियो ओपरेटर्स मुफ्त में सेवा देते आये हैं परन्तु उनकी भी सीमायें है।

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

सागर जी और अन्नपूर्णा जी आपकी टिप्पणियो के लिये आभार।


अन्नपूर्णा जी, आपकी बात सही है पर आपदा के समय रेडियो की भूमिका केवल मौसम की भविष्यवाणी तक ही सीमित नही है। इसकी तैयारी से लेकर बचाव और इसके बाद लम्बे समय तक इससे उबरने तक रेडियो की भूमिका हो सकती है। मौसम की भविष्य़वाणी मे हमारे पंचांग और इससे सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान आज के विज्ञान से अधिक सक्षम है।

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