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Wednesday, March 26, 2008

रेडियो के साथ मेरे पचास साल- 1

रेडियो के साथ मेरे पचास साल- 1


- सुषमा अवधिया


ये 1958 की बात है। हम लोग जब छोटे-छोटे हुआ करते थे उस वक्त घर मे रेडियो ऐसे स्थान पर नही हुआ करता था जहाँ सब सुन सके। हम बारह भाई-बहनो मे सबसे बडे भैया के कमरे मे रेडियो था। उनका कमरा पहली मंजिल पर था। उस जमाने मे हम लोग उनके कमरे मे जाकर रेडियो सुनने की बात सोच भी नही सकते थे। तकदीर से वो सर्विस करने बाहर चले गये। बस फिर क्या था मै और मेरे से छोटे दोनो भाई आनन्द और प्रसन्न रात आठ बजते ही बिनाका गीतमाला सुनने उनके कमरे मे पहुँच जाते थे। हम लोग बडे दुखी थे कि ये प्रोग्राम हफ्ते मे एक दिन बुधवार को ही क्यो आता है, रोज क्यो नही आता। काले रंग का अर्ध गोलाकार रेडियो था इको कम्पनी का। उसका पाइंटर 180 डिग्री घूम जाता था। इस रेडियो की आवाज बहुत मीठी हुआ करती थी।


हम तीनो की खुशी की सीमा नही होती थी। एक से एक गाने सुनते। जैसे जरा सामने तो आओ छलिये, छुप-छुप छ्लने मे क्या राज है, है अपना दिल तो आवारा, न जाने किस पर आयेगा, जिन्दगी भर नही भूलेगी वो बरसात की रात, जो वादा किया, वो निभाना पडेगा। कैसा मधुर संगीत, मीठी आवाजे- सब कुछ दिल को छू लेता। मन झूम उठता। हम लोग सुनते-सुनते कयास लगाते कि इस बार कौन से गाने के लिये बिनाका गीतमाला का बिगुल बजेगा। आज भी वो दिन याद कर दिल खुश हो जाता है। हम तीनो ने खूब आनन्द लिया रेडियो का।


इसी बीच जहाँ तक मुझे याद है दोपहर सवा तीन बजे से पौने चार बजे तक पाकिस्तान रेडियो से हिन्दी फिल्मो के एक से एक बेहतरीन गाने सुनवाये जाते थे। मै जब भी घर पर होती यह प्रोग्राम जरुर सुनती थी। ये सिलसिला बमुश्किल साल भर चल पाया होगा। हमारे बडे भैया वापिस जबलपुर आ गये। एक बार फिर हम लोग अपने रेडियो से बिछुड गये।


मै जब दसवी कक्षा मे थी तब हमारी एक टीचर मिस पिल्ले ने हम सब नाटक मे भाग लेने वाली लडकियो को लेकर गणतंत्र दिवस पर एक नाटक तैयार करवाया। हम लोगो को बताया गया कि ये नाटक जबलपुर रेडियो स्टेशन से प्रसारित होगा। हम लोगो ने खूब मेहनत की। बडा उत्साह था, रेडियो स्टेशन जायेंगे, कैसा होता होगा?, कैसे रिकार्डिंग होगी?, मन मे ढेर सारे प्रश्न थे। यूँ तो हम लोग इस अहसास से ही प्रसन्न थे कि नाटक जबलपुर रेडियो स्टेशन से प्रसारित होगा। मालूम नही किस कारणवश इस नाटक की रिकार्डिंग नही हो पायी। लम्बे अंतराल के बाद जब मै रायपुर आकाशवाणी की ड्रामा आर्टिस्ट बनी तब यह स्वप्न साकार हुआ। (क्रमश:)


लेखिका का संक्षिप्त परिचय और चित्र

6 comments:

डॉ. अजीत कुमार said...

पढ कर अच्छा लगा. नीचे दिया गया लिंक नहीं खुल पा रहा है.

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

धन्यवाद ध्यान दिलाने के लिये। अब लिंक काम कर रहा है।

मीत said...

वाह ! बहुत अच्छा लगा पढ़ कर. रेडियो सुनने के मज़े. बचपन की याद दिला दी आप ने. जी हाँ, वही बिनाका गीतमाला, .........., रेडियो सीलोन, ऑल इंडिया रेडियो उर्दू सर्विस, विविध भारती ..... क्या दिन थे.

mamta said...

बहुत अच्छा लगा पढ़कर और सुषमा जी के बारे मे जानकर।

annapurna said...

यहाँ पहली बार आपको पढना अच्छा लगा।

mamta said...

और हाँ दो सौंवी पोस्ट के लिए बधाई।

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