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Thursday, March 20, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-6

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-6


- पंकज अवधिया


बचपन मे जब अंग्रेजी गाने सुनने का शौक जागा तो कैसेटो का सहारा लेना पडा। सीडी तो उस समय मिलती नही थी। कैसेट बहुत महंगे होते थे और एक अच्छे गाने के लिये पूरा कैसेट लेना पडता था। शांत गाने वाले कैसेट नही मिलते थे। अंग्रेजी गाने मतलब तेज शोर वाले गाने। उस समय बोनी एम का हल्ला था। इस ग्रुप के सारे कैसेट मेरे पास थे। उस समय रेडियो पर अंग्रेजी गाने सुन पाना सम्भव नही जान पडता था। रेडियो को आजमाया पर ऐसा कोई चैनल नही मिलता था जो मन पसन्द गाने सुनाता। बरसो बाद वर्ल्ड स्पेस से यह मुराद पूरी हुयी। इसमे एक चैंनल है अमूरे जिसमे चौबीसो घंटे अंग्रेजी प्रेम गीत सुनाये जाते है। मन प्रसन्न हो जाता है। मेरी तो काम करने की क्षमता बढ गयी है। कई बार अच्छे गानो के चक्कर मे नीन्द की कुर्बानी देनी पडती है। अभी भी इस लेख को लिखते समय अमूरे चैनल ही बज रहा है। सम्भवत: यह चैनल विदेश से आता है। अब सब कुछ मन पसन्द मिलने के बाद लगता है कि कोई भारतीय इसके कार्यक्रमो को प्रस्तुत करे तो इन गानो मे चार चाँद लग जाये।


लगातार रेडियो सुनने के कारण कई तरह के सुझाव भी मन मे आते है। पर यह मजबूरी है कि इन सुझावो और शिकायतो को कैसे सही हाथो तक पहुँचाया जाये? यह कटु सत्य है कि रेडियो चैनल अपनी तारीफ सुनना चाहते है और यही कारण है कि तारीफ वाले पत्र ही उनके कार्यक्रम मे प्रस्तुत किये जाते है। कई बार निन्दा वाले पत्र भी प्रस्तुत किये जाते है पर चतुराई से। सुनने वाले सब समझते है। मै जब रेडियो से जुडा था तो पत्र को छाँटते समय हमे प्रशंसा वाले पत्र को ही चुनने के लिये कहा जाता था। इसी बीच मौका पाकर हम अपने रिश्तेदारो और पडोसियो को खुश करने उनके नाम भी डाल देते थे पर निन्दा वाल्रे पत्रो को अलग कर दिया जाता था। निन्दा बुरी लगती है पर सकारात्मक नजरीये से देखे तो निन्दा और निन्दक से काफी कुछ सीखा जा सकता है। कृषि की शिक्षा के दौरान हमारे एक प्रोफेसर ने हमे सीखाया कि निन्दक की बात सुनो और अपनी गल्ती सुधारो। साथ ही किसी न किसी बहाने से उसे अपने से जोडे रखो क्योकि वही सही राह दिखायेगा। मुझे नही लगता कि कोई ऐसा भारतीय रेडियो चैंनल है जो सीधे ही सुनने वालो की बात प्रसारित करता है। निन्दक फोरम के वजूद की अपेक्षा करना दूर की बात है। पर वर्तमान व्यवस्था मे निन्दको के लिये भी जगह होनी चाहिये।


मेरी लेखमाला को पढकर अब हमारे परिवार को रेडियो परिवार का दर्जा मिल गया है। अब आपको दो और सदस्यो के विषय मे बताना चाहूंगा। मेरे बडे भाई उमेश अवधिया आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले युववाणी मे प्रस्तोता रहे। वही उनकी मुलाकात अपनी जीवन संगिनी से हुयी जो कि साथी कम्पीयर थी। आज इंजीनियर भाई साहब भिलाई इस्पात संयंत्र मे ऊँचे पद पर है और कर्ण और ब्रम्हराक्षस का शिष्य़ जैसे नाटको की एकल प्रस्तुति देते है। देश भर मे उनके शो होते रह्ते है और सम्मानो से नवाजा जाता है। भाभी जी जिनका नाम अंजली अवधिया है, भौतिकी की प्राध्यापिका है और अभी पी.एच,डी. कर रही है। पास्तापुर मे कम्युनिटी रेडियो की बात मैने अभी आई.आई.टी. खडगपुर मे एक साल की शिक्षा ले रहे उमेश भाई को बतायी तो वे खुश हुये कि अब स्वप्न साकार हो रहा है। वे बचपन ही से अपना खुद का रेडियो चैनल आरम्भ करना चाहते थे। उस समय यह सम्भव नही लगता था पर अब तो यह सब कुछ आसान लगने लगा है। यदि यह चैनल शुरु हुआ तो मै कृषि और जडी-बूटियो का विभाग सम्भाल लूंगा। गुलमोहर के औषधीय उपयोग बताऊँगा और फिर गाना बजाऊँगा


गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता---

ये हर्बल गाने पूरे देश मे पसन्द किये जायेंगे- ऐसा मुझे लगता है।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

4 comments:

annapurna said...

पंकज जी, आपने लिखा कि रेडियो में अंग्रेज़ी गाने सुनने को नही मिले और बाद में आपने ये गीत रेडियो स्पेस में सुने।

मैं आपको बता दूँ कि आकाशवाणी में युववाणी कार्यक्रमों की शुरूवात शायद 1975 में हुई और बहुत जल्द ही दिल्ली बम्बई के अलावा सभी केन्द्रों से यह सेवा शुरू हो गई।

युववाणी क्षेत्रीय भाषा, हिन्दी, उर्दू के अलावा अंग्रेज़ी में भी शुरू हो गई थी। अंग्रेज़ी युववाणी में अन्य कार्यक्रमों के अलावा अंग्रेज़ी फ़िल्मी और ग़ैर फ़िल्मी गाने बजा करते थे।

युववाणी नियमित कार्यक्रम है और लगभग रोज़ दो बार सुबह और शाम में प्रसारित होता है।

मैं जानना चाहूँगी कि आप रेडियो किस शहर में सुनते थे जहाँ अँग्रेज़ी युववाणी नहीं था।

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

मै रायपुर की बात कर रहा हूँ। उस समय की जब केवल शाम पाँच से छै बजे तक दिन मे एक बार युववाणी आता था। क्या अब यह दो बार आता है? अंग्रेजी युववाणी की बात तो मै पहली बार आपसे सुन रहा हूँ।

annapurna said...

पंकज जी क्या रोज़ शाम में युववाणी में हिन्दी कार्यक्रम ही प्रसारित होते थे ?

मैं भी पहली बार सुन रही हूँ कि किसी केन्द्र में अंग्रेज़ी युववाणी नहीं है।

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

जी बिल्कुल यही कह रहा हूँ। मैने अपने दोनो परिवारजनो से भी कम्फर्म किया है जो युववाणी मे कम्पीयर थे।

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