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Wednesday, July 13, 2011

तिनके विच जान--'न्यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा' कड़ी 4

रेडियोनामा पर जानी-मानी न्‍यूज़-रीडर शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं--'न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा'। ये इस श्रृंखला की चौथी कड़ी है जिसमें वो समाचार-लेखन और संपादन की बारीकियों से अवगत करा रही हैं।


रात भर की ड्यूटी में ठीक-ठाक प्रदर्शन रहा होगा, क्योंकि जल्दी ही मेरी ड्यूटी रात दस और ग्यारह बजे के बुलेटिन पढ़ने पर भी लगने लगी थी. अधिकतर रात की पारी हम कैजुअल लोग ही सँभालते थे. कभी-कभी कुछ महत्त्वपूर्ण दिनों में नियमित लोग भी रात की ड्यूटी करते थे. जैसे कि एक बार बजट का दिन था. पौने नौ के बुलेटिन के बाद शाम की शिफ्ट के सभी लोग जा रहे थे. मैं छह-सात पन्नों का बजट का आइटम देखकर बहुत परेशान थी कि इसे कहाँ से और कैसे काटूँगी. पाँच मिनट के बुलेटिन में काटना ज़रूरी था जबकि मुझे हर बात महत्त्वपूर्ण लग रही थी. ऐसे में पता चला कि एक नियमित संपादक ड्यूटी पर हैं, जो आगे के बुलेटिन बनायेंगे. कुछ हिम्मत बढ़ी, लेकिन उनकी काटने की कला देखकर मैं दंग रह गयी. मसलन उन्होंने गेहूं के दाम बढ़ाये तो अरहर-चने के काट दिए, पेट्रोल- डीज़ल के बढ़ाये तो मिटटी के तेल और रसोई गैस के काट दिए, आयात की बात बतायी तो निर्यात की ग़ायब कर दी. बहरहाल मैं इस बात से खुश थी कि मुझे अपना दिमाग़ लगाये बग़ैर बना-बनाया बुलेटिन मिल गया था.

रात की शिफ्ट की एक घटना और याद आ रही है. भुवन चन्द्र खंडूरी (उत्तराखंड के पूर्व मुख्य मंत्री नहीं, हमारे एक सहायक संपादक) हिंदी समाचार कक्ष में नये-नये आये थे और रात की ड्यूटी कर रहे थे. तब तक रात भर, हर घंटे अंग्रेज़ी और हिंदी के पाँच-पाँच मिनट के बुलेटिन शुरू हो गये थे. लेकिन उनका क्रम एक सा नहीं था, कभी हिंदी का पहले होता तो कभी अंग्रेज़ी का. बार-बार चार्ट देखना पड़ता था कि हमारा बुलेटिन तीन बजे है या तीन बजकर पाँच मिनट पर. खंडूरी जी और मैं बुलेटिन तैयार करके बैठे थे कि समय हो तो पढ़ने जायें. रेडियो धीमी आवाज़ में चला रखा था. तभी अनाउंसर ने क्यू दिया - अब आप समाचार सुनेंगे. पहले अंग्रेज़ी और उसके बाद हिंदी में.

लेकिन ये क्या? ....समाचार शुरू ही नहीं हुए.

मुझे लगा कहीं ऐसा तो नहीं, हिंदी का बुलेटिन पहले जाना हो.

मैं फ़ौरन बुलेटिन लेकर स्टूडियो की तरफ दौड़ी. पीछे-पीछे खंडूरी जी भी थे.

उन्होंने कहा भी कि मैं देखकर आया हूँ, अभी हमारा नहीं अंग्रेज़ी का बुलेटिन है.

लेकिन मुझे लग रहा था कि पांच मिनट तक आकाशवाणी से कोई प्रसारण न होना तो बड़ी लज्जाजनक बात होगी. इस तर्क के साथ मैं अंग्रेज़ी के समाचार स्टूडियो में चली गयी और वहां से अपना हिंदी का बुलेटिन पढ़ना शुरू कर दिया. इसी बीच अंग्रेज़ी के समाचार वाचक भी पहुँच गये थे. खंडूरी जी ने उन्हें बाहर ले जाकर स्थिति समझायी और उन्होंने पाँच मिनट बाद हिंदी के स्टूडियो से अपना बुलेटिन पढ़ा.

बाद में इस गफ़लत के लिए अंग्रेज़ी समाचार वाचक के साथ मुझे भी मेमो मिला, जिसमें कहा गया था कि आइन्दा मैं अपने काम से काम रखूँ. सफ़ाई देने का कोई मौक़ा नहीं. बस एकतरफ़ा नसीहत !

मुझे बड़ा ग़ुस्सा आया. मैंने आकाशवाणी को ब्रेक डाउन से बचाया और वे मुझे ही ग़लत साबित कर रहे हैं. तब शांत हुई जब पापा ( आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा ) ने मुझे समझाया कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी सिर्फ तुम्हारे चंक की है. अंग्रेज़ी की जगह तो तुमने भर दी लेकिन अगर तुम्हारे चंक पर ब्लैंक जाता तो वह और भी गंभीर अपराध होता.

जिन दिनों रात के साथ तड़के शिफ्ट की भी ड्यूटी करती थी, उन दिनों कुछ ऐसे लोग भी आते थे जिनका या तो स्कूटर स्टार्ट नहीं होता था या फिर ऑफिस की गाड़ी छोड़कर चली आती थी. जब कई बार....लगातार... उनसे  देर से आने का यह कारण सुन चुके तो हम सब सतर्क हो गये और एक दूसरे को आगाह करने लगे कि भैया, इनकी ड्यूटी हो तो छह बजे की तैयारी ख़ुद ही कर लेना  ....क्योंकि वे बस ऐसे समय पहुंचेंगे कि आपके बनाये बुलेटिन को थोड़ा सा उलट-पुलट कर मंज़ूरी दे देंगे और स्टूडियो ले जाकर पढ़वा देंगे. यह अनौपचारिक अनुवाद और संपादन  करते- करते हमें तनाव के माहौल में, जल्दी-जल्दी में काम करने की आदत होने लगी.

वैसे विधिवत अनुवाद सीखने की शुरुआत शाम की शिफ्ट में हुई थी. पहले-पहल वर्षा और बाढ़ के समाचार अनुवाद के लिए दिए गये. मैंने उन्हीं में अपना पूरा पांडित्य झोंक दिया -

"ब्रह्मपुत्र एवं उसकी अनुवर्ती नदियों के जल स्तर में अत्यंत तीव्रता से वृद्धि हो रही है. असम में अभूतपूर्व बाढ़ की परिस्थितयां उत्पन्न हो गयी हैं."

इसे लेकर मैं सीधे ब्रजराज तिवारी जी के पास पहुँच गयी, जो उस दिन पौने नौ के बुलेटिन के सुपरवाइज़र थे. उनसे कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं मिली बल्कि उन्होंने बड़े शांत भाव से मुझे सुभाष सेतिया जी के पास भेज दिया. सेतिया जी ने एक नज़र अनुवाद पर डाली, एक नज़र मुझ पर, और पूछा - कहाँ से आई हैं आप?

मैंने बड़े गर्व से बताया कि मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम ए और पी एच डी की है.

सेतिया जी ने चुन-चुन कर सजाये मेरे सारे शब्दों पर बांये हाथ से एक आड़ी रेखा खींची और ऊपर लिखा - "असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का पानी चढ़ने से बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है."

उस दिन प्रसारण का यह सबसे महत्त्वपूर्ण पाठ सीखा कि रेडियो कम्युनिकेशन का माध्यम है, ज्ञान प्रदर्शन का नहीं. जब वही बात सीधे सादे शब्दों में कही जा सकती है, तो बेवजह बड़े बड़े शब्दों का प्रयोग क्यों किया जाये? बनारस में पढ़ते समय, जिस संस्कृतनिष्ठ भाषा का प्रयोग बड़े मनोयोग से सीखा था, उसे भुलाने में काफी समय लगा लेकिन अब वही भाषा बोलती और लिखती हूँ, जो ज़्यादा से ज़्यादा लोग आसानी से समझ सकें.

सेतिया जी को मैं आज भी गुरु मानती हूँ क्योंकि अगर उस दिन उन्होंने "जल स्तर में वृद्धि" को काटकर "पानी चढ़ना" न सिखाया होता तो शायद मैं इतनी तेज़ी से आगे नहीं बढ़ पाती.

उन्होंने एक बात और सिखाई थी, जिसे मैंने आज तक पल्ले से बाँध रखा है. कहने लगे कि अगर अच्छा संपादक बनना है तो समाचारों को पूरी बेरहमी से काटना सीखो. अगर शब्दों का मोह करोगी तो बुलेटिन के साथ नाइंसाफी होगी.

सेतिया जी अवकाश ग्रहण कर चुके हैं, लेकिन सुपरवाइज़र के तौर पर अब भी ड्यूटी करते हैं. और रेडियो के नियमित श्रोता तो हैं ही. जब कभी किसी कार्यक्रम की प्रस्तुति, या किसी क्रिस्प हेडलाइन, या किसी बुलेटिन के सम्पादन पर उनसे शाबाशी मिलती है तो बड़ी अतोल ख़ुशी होती है.

किसी सरकारी नियम के तहत हमसे पहले के कुछ समाचारवाचक केवल वाचन का काम करते थे, जबकि कुछ लोग वाचन के साथ-साथ संपादन की दोहरी भूमिका निभाते थे. मेरे आने तक पहले वर्ग में केवल विनोद कश्यप जी और रामानुज जी रह गये थे, बाक़ी सभी लोग संपादन भी करते थे. इंदु जी और मनोज जी की कार्य शैली को निकट से जानने- समझने का मुझे अवसर नहीं मिला लेकिन और लोगों से मैंने बहुत कुछ सीखा.

जैसे कि कृष्ण कुमार भार्गव जी से सही उच्चारण जानने का आग्रह. भार्गव जी ने समाचार कक्ष में दो खूब मोटे मोटे रजिस्टर रखवा रखे थे - एक व्यक्तियों और दूसरा स्थानों के नाम के लिए. जब भी कोई नया नाम सामने आता, वे फ़ौरन उसे दर्ज कर देते थे. इसके अलावा उन्होंने पुस्तकालयों जैसा कैटलॉग भी बनाकर रखा था. छोटी-छोटी दराजों में कार्ड पिरोये हुए थे जिनमें बहुत सारे नामों के सही उच्चारण लिखकर रखे रहते थे. शुरू-शुरू में हम सभी लोग उसका बराबर उपयोग भी करते थे. बाद में भार्गव जी ने विश्व उच्चारण कोष नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित करवायी, जिसकी भूमिका पापा ने लिखी थी. इसमें उन्होंने देश-विदेश के बहुत सारे नामों के सही उच्चारण के साथ यह जानकारी भी दी है कि किसी विशेष भाषा समूह में किसी वर्ण का उच्चारण कैसे किया जाता है. फ़्रांस, चीन या मध्य यूरोप के सन्दर्भ में इन नियमों की जानकारी वाक़ई प्रसारणकर्ताओं के लिए बड़े काम की है.

भार्गव जी से मैंने एक और बात सीखी. काम करते हुए मेज़ को साफ सुथरा और व्यवस्थित रखना. सुबह आठ बजे का बुलेटिन बनाते समय उनसे किसी भी आईटम की अंग्रेज़ी कॉपी मांग लीजिये, फ़ौरन दे सकते थे. जबकि दूसरे कई संपादक ऐसी किसी माँग पर आइटम .......ढूंढते ही रह जाते थे.

रविंदर सभरवाल से मैंने बंचिंग सीखी, यानी बुलेटिन में कौन सा आइटम किस जगह लिया जाना चाहिए. पंद्रह ravider ji मिनट के बुलेटिन के तीन हिस्से या बंच होते हैं. आम तौर पर इनमें से पहले हिस्से में बड़ी हेडलाइन्स और राष्ट्रीय महत्त्व के समाचार, दूसरे में राज्यों, राजनीतिक दलों और विकास कार्यों के समाचार और तीसरे हिस्से में विदेश, खेल और पुरस्कार आदि लिए जाते हैं.

मुश्किल तब पेश आती है जब पहली या दूसरी हेडलाइन विदेश की हो. उसे पढ़वाने के बाद वापस देश लौटा जाये या विदेशों के ग़ैर-ज़रूरी आइटम पढ़वाए जायें? यह फ़ैसला करने की सलाहियत धीरे-धीरे, समय के साथ ही आती है और जब तक नहीं आती, तब तक किसी से पूछकर फ़ैसला करने में शर्म की कोई बात नहीं है. हाँ, किससे पूछना है, यह फ़ैसला ज़रूर थोड़ा सोच-समझ कर करना चाहिए. वरना ऐसा भी हो सकता है कि .......अंधेहि अंधे ठेलिया दून्येउ कूप पडंत.

बंचिंग के सिलसिले में एक बात याद आ रही है, बताती चलूँ. हमारे एक काफी वरिष्ठ सहयोगी ने एक दिन मुझे दिन में तीन बजे का बुलेटिन बनाकर दे दिया. वरिष्ठता के अभिमान में मेरे साथ स्टूडियो नहीं गये. पाँच मिनट के बुलेटिन में दो मुख्य समाचारों के बाद पाँच आइटम लगातार दुर्घटनाओं के थे. कहीं रेल पटरी से उतर गयी, कहीं ट्रैक्टर से भिड़ गयी और कहीं पटरी पार कर रहे लोगों को कुचल गयी. बुलेटिन रिहर्स करते हुए मुझे बहुत ही अटपटा लग रहा था, लिहाज़ा मैंने समाचारों को इस तरह जमा लिया कि एक दुर्घटना के बाद किसानों या आम नागरिकों के हित की कोई बात आ जाये और तब दूसरी दुर्घटना हो.

बुलेटिन पढ़ने के बाद जब मैं समाचार कक्ष में आयी तो उन्होंने मुझे फटकारा - हमने आपको बुलेटिन लगाकर दिया था. आपने क्रम क्यों बदला?

मैंने कहा - सर, ऐसा लग रहा था जैसे देश भर की गाड़ियों ने तय कर लिया था कि आज हम अपनी मनमानी करेंगी और आकाशवाणी के बुलेटिनों में छायी रहेंगी. इसलिए मैंने बीच-बीच में कुछ और समाचार ले लिए.

बड़े नाराज़ हुए .... आपको कुछ पता भी है हमने मैचिंग मिलाकर दिया था.

अब बताइये, मैं उनकी मैचिंग तोड़ने पर डांट कैसे नहीं खाती?

एक बात और कहना चाहूंगी. तमाम शिक्षण संस्थान और लम्बे-चौड़े डिग्री कोर्स जो बातें दो-तीन सालों में नहीं सिखा पाते, वह समाचार कक्ष में सिर्फ दूसरों की बातें सुनने से सीखा जा सकता है. मैं जब कैज़ुअल ड्यूटी करती थी, तब समाचार कक्ष के युवा तुर्क - राजेंद्र चुघ बुलेटिन पढ़कर लौटने के बाद अक्सर उसकी और संपादक दोनों की धज्जियाँ उड़ाते थे. पहले-पहल तो उनका रौद्र रूप देखकर मैं काफी सहम गयी थी. लेकिन बाद में देखा कि उनकी आपत्तियों में दम होता था. वे जो भी कहते थे, किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना न होकर केवल बुलेटिन को बेहतर बनाने का प्रयास होता था. क्योंकि जिस व्यक्ति पर वे अभी-अभी इतना चिल्ला रहे थे, दस मिनट बाद उसी के साथ चाय पीते देखे जा सकते थे.

तनाव भरे माहौल को हल्का और ख़ुशगवार बनाना कोई हरी संधू से सीखे. बैठे- बैठे ऐसी फुलझड़ी छोड़ते हैं hari sandhu कि जिस पर निशाना साधा गया हो, वह भी दूसरों के साथ हँसे बिना नहीं रह पाता. हमारी एक नयी सहयोगी आयी थीं जो बहुत ही दुबली-पतली थीं. कुर्सी पर बैठी कुछ काम कर रही थीं.

संधू बंधू उनकी कुर्सी के पीछे खड़े होकर बोले -  शुभ्रा जी.

मैंने कहा - आहो जी.

आसमान की तरफ निगाहें उठाकर बोले - ख़ुदा दी शान ...

शेर के पहले मिसरे की तरह मैंने दोहराया - ख़ुदा दी शान..

उन्होंने सहयोगी की तरफ हाथ दिखाकर कहा- तिनके विच जान ....

सबके साथ वह सहयोगी भी हँस पडीं. इसी तरह ड्यूटी पूरी होने के बाद जब कोई सहयोगी जाने की बात करता है , तो संधुजी बड़ी गंभीरता से कहते हैं - अरे, चल दिये? दो- चार दिन तो रह लेते.

और अगर कोई दो-तीन बार जाने को कह कर भी रवाना नहीं होता, तो बड़े भोलेपन से पूछ लेते हैं - ते फेर त्वाडे लाई मंजी पवावां (तो फिर तुम्हारे लिए पलंग बिछवा दूं )? 

और जाने वाला बेचारा खिसियानी हँसी हँसता हुआ रवाना हो ही जाता है.

इससे पहली की कडियों को एक साथ पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए।

16 comments:

Anonymous said...

"सर, ऐसा लग रहा था जैसे देश भर की गाड़ियों ने तय कर लिया था कि आज हम अपनी मनमानी करेंगी और आकाशवाणी के बुलेटिनों में छायी रहेंगी. इसलिए मैंने बीच-बीच में कुछ और समाचार ले लिए."..I am still laughing..........Shubraji​, Very Nice and Thanx for sharing these golden moments with us.

आकाशवाणी बड़ौदा के उदघोषक अभिषेक शाह। फेसबुक पर।

डॉ. अजीत कुमार said...

शुभ्रा जी, आपके संस्मरणों को पढ़ कर काफी अच्छा लग रहा है.. सच कहूँ तो मजा आ रहा है. आकाशवाणी से जुड़े लोगों के बारे में जानना काफी रोचक है. कुछ लोगों की अव्वाजें तो हमारे दिलों में बसी हैं. उनके बारे में पढता हूँ तो लगता है की उनसे मिलने की ख़ुशी हो रही है. यही बात है की जब आपने रामानुज जी की बात की. जब मैं वो आवाज़ याद करता हूँ तो मानों अपने उन्हीं बचपन के दिनों में लौट जाता हूँ. जब शायद ६.५५ सुबह पर संस्कृत का समाचार आता था.. पापा कहते थे बेटा समाचार सुनो और अनुवाद करके मुझे सुनाओ...क्यूंकि संस्कृत में ज्यादा नंबर जो आया करते थे.. वो आवाज़.. इयं आकाशवाणी.. सम्प्रति वार्ताः श्रुयांताम. प्रवाचकः बलदेवा नन्दः सागरः... और मैं कोशिश करता अनुवाद करने की. और ठीक सात बजे वो आवाज़ गूंजती. .. ये(एक ठहराव) आकाशवाणी है. अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए. उनके उस रामानुज कहने की वो अदा बहुत पसंद थी.. वो ठहराव और गहराई मैंने कम ही सुनी है. आपने राजेन्द्र चुघ जी का नाम लिया , उनकी आवाज़ का भी मैं बहुत प्रशंशक हूँ. संजय बनर्जी को मैं तब से जानता हूँ जब वो आकाशवाणी पटना के लिए खेल परिक्रमा किया करते थे. सिर्फ एक नाम मेरी फेहरिश्त में फिट नहीं बैठता तो वो हैं हरि संधू जी. कृपया वे अन्यथा ना लें, पता नहीं क्यूँ पर मुझे कभी कभी लगता है कि वे शब्दों को अनावश्यक खिंचाव देते हैं. कभी लगेगा कि जाने पहचाने शब्द या कहें चीजों को बोलने में वे अनजानापन सा दिखला जाते हैं. बाक़ी ऊनकी आवाज़ का भी कोई सानी नहीं है.
एक बार फिर से पोस्ट के लिए धन्यवाद.

sanjay patel said...

शुभ्रा जी की पोस्ट्स समाचार वाचन की बाइबिल बनती जा रही है. बातें अरु क़िस्से बहुत छोटे छोटे से हैं लेकिन उनमें छुपा मर्म बड़ा है. मुझे लगता है कि रेडियोनामा पर दो-तीन अग्रणी समाचार वाचक और आ जाएँ तो समाचार वाचन पर एक किताब की संभावना बन जाएगी.मुझे नहीं लगता कि इस तरह का कोई दस्तावेज़ हाल-फ़िलहाल बाज़ार में मौजूद होगा.डाक साब आपसे सहमत हूँ कि संधुजी का स्वर प्रसारण के लिये एकदम फ़िटफ़ाट है लेकिन पंजाबी लहजे के कारण कुछ कुछ शब्द अलग सुनाई देते हैं.

nisha said...

bahoot maza aaya mam padhkar, aur ye jaan kar jinse bahoot saare log aaj bhi darte hai aur jo radio ke kai logo ko galat baat ko lekar daant deti hai unhone bhi kabhi khoob daant khaaye hai!
aur jaisa aapne sikha wahi aaj hamein bhi sikha rahi hai aap to unke jaise ban gaye magar hum aapke jaise kabhi nahin ban paayenge. aapki daant main jo pyar hai wo aage badhne wale aur sikhne wale he samjh sakte hai. jyada to nahin magar bahoot kuch aapse humne sikha, aapke har lekh ka main intezaar karti hoon aur poori shiddat se padhti hoon .shukriya

Roshan Jaswal said...

सस्‍मरणों ने आत्‍मविभोर किया। अगले लेख की प्रतीक्षा रहेगी

Rajesh Ojha said...

आपके इस पोस्ट की कई बातें प्रेरणादायक हैं। घटनाओं की सहज, सरस और स्वाभाविक प्रस्तुति बेजोड़ है। आपके अगले पोस्ट की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी।

GGS said...

GGShaikh said:

मूल्यपरक भी, रसप्रद भी... आलेख पसंद आ रहे हैं...

सेतिया जी का भाषा लाघव और आपकी उनसे और सभी से सीखने की जिज्ञासा,अनूठी विशेषता व्यक्तित्व की ...

आपकी बातों का जादू धीरे-धीरे हमारे सर चढ़ रहा है. बहुत सी रसप्रद बातें हम तक अस्खलित पहुँच रही है.

शुभ्रा जी, मैंने आपको कभी समाचार पढ़ते हुए सुना हो, याद नहीं. बाकी कुछ नामों की सहज पहचान, आलेख में पढ़कर ही दिमाग़ में कौंध जाती हैं जैसे एक नाम अभी पढ़ा 'राजेंद्र चुघ',
शायद उनके सरनेम की विशेषता रही हो जो नाम आजतक याद रहा.

डॉ. अजीत कुमार said...

@निशा जी, आपकी टिप्पणी को देख कर ऐसा लगता है कि आप भी रेडियो से जुड़ी हुई हैं, या यूं कहें एक प्रस्तोता हैं. कितना अच्छा हो अगर आप भी हमारे इस रेडियोनामा परिवार का एक हिस्सा बनें. आप अपने संस्मरण लिपिबद्ध कर हमें भेज दें. हमें उन्हें प्रकाशित करने में काफी प्रसन्नता होगी.

अनूप सेठी said...

बहुत अच्‍छे! रोचक, सोचक और मोचक किस्‍सा. अर्थात् आपने आकाशवाणी के जिंदादिल माहौल की याद दिला दी जो रोचक तो होता ही था (जितना मैंने देखा), दिमाग को भी खुला और चालू (सोचक) हालत में रखता था. यह जिंदादिली मोक्ष भाव (मोचकता) से कम नहीं थी. शुभ्रा जी धन्‍यवाद और यूनस जी इस ठिकाने तक पहुंचाने के लिए आपका विशेष धन्‍यवाद.

nisha said...

ajit sir aapka bahoot bahoot dhanywad jo aapne mujhe kuch likhne ka awasar diya magar shubhra jee ka anubhav barso ka hai aur hamara chand saalo ka hum to waha chhote se paashinde haijab kabhi shubhra jee hamara jikr karengi apne sansmaran main tab shayad main kuch kahoon ,radio ki yaaden to bahoot hai magar anubhav bahoot kadve hai phir bhi hum radio ka ek hissa hai kahte huye garv mahsoos hota hai!

सागर नाहर said...

@nisha ji
अनुभव खट्टे-मीठे हों या कड़वे, पढ़ने-सुनने वालों को अक्सर गुदगुदाते हैं, कुछ याद दिलाते हैं, कई बार प्रेरणा भी देते हैं, सो आप लिखने की तैयारी तो कर ही लें। सही समय आने पर और आपके कहने पर ही हम उन्हें छापेंगे।
यह रेडियोनामा टीम की तरफ से अनुरोध है।

सागर नाहर said...

शुभ्राजी,
"ब्रह्मपुत्र एवं उसकी अनुवर्ती नदियों के जल स्तर में अत्यंत तीव्रता से वृद्धि हो रही है. असम में अभूतपूर्व बाढ़ की परिस्थितयां उत्पन्न हो गयी हैं."
हिन्दी की यह पंक्तियां इतनी भी क्लिष्‍ट तो नहीं है, कि किसी को समझ में नहीं आती। और क्या आपको यह नहीं लगता कि हमें इस हिन्दी को क्लिष्‍ट मानने की आदत हो चली है और इस वजह से हिन्दी के कई शब्द गायब से हो गए हैं।

सागर नाहर said...

परसों रात जीटीवी पर सारेगामा के दौरान हर्ष मुझसे बोले कि देखिए पापा कैलाश खैर को सही हिन्दी बोलना भी नहीं आता, कैसी अजीब सी हिन्दी बोलते हैं।
मुझे कहना पड़ा "बेवकूफ़- कैलाश खैर को तो सही हिन्दी बोलनी आती है लेकिन आपको सही हिन्दी समझ में नहीं आती है।
:)

GGS said...

GGShaikh said:

सारेगामा में सच में कैलाश ख़ैर की हिंदी अचंभित करती है...
बेहद सहज हिंदी के सही-सही शब्द उनके मुंह से निकलते हैं
जो इस बात का एहसास कराती है कि वह हिंदी भाषा सीख
रहे हैं और भाषा का शास्त्रीय अध्ययन भी कर रहे हैं...

निशा जी हमारे यहाँ कौन सी ऐसी संस्था है जहाँ कड़वे अनुभव
नहीं होते...? मनुष्य की महत्वाकांक्षा, स्वार्थ, ईर्षा, स्पर्धा, भय, गुरु-लघु ग्रंथि से ग्रस्त होना, अहं इत्यादि सभी जगह एक से होते हैं...

पर यहाँ मीठे-मधुर अनुभव न हो ऐसा भी नहीं...

Anonymous said...

Shubhraji ek teer se do nishane saadh rahi hein. Newsroom ki andar ki baaten ujaagar ker ke bahar walon se wah wahi loot rahi hein aur Ravinder tatha Sandhu jaise tathakathit Newsreaders ko Hero bana ker newsroom mein sasti lokpriyata haasil ker rahi hein. Ravinderji se to shayad hi kisi ne koi bulletin suna hoga aur jo log Sandhuji ke bulletin sunte hein wo unki qabliyat pehchaan sakte hein. Aaj tak Prasaran ko Persaran hi bolte hein. Han, News mein Drama sun ne shokeen shrota un se zarur prabhavit ho sakte hein , kyonki Sandhuji news ko bina samjhe jo padhte hein.

Gaurav Tyagi said...
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