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Friday, December 10, 2010

श्री अमीन सायानी साहब को हर हप्ते सुनिये 'संगीत के सितारों की महेफ़ील'में तथा एकोर्डियन वादक श्री सुमित मित्राजी को फ़िर से याद

आदरणिय पाठक गण,

दो दिन पहेले श्री अमीन सायानी साहब से दूर भाषी बात-चीत के दौरान तथा कल उनके बेटे श्री राजील सायानीजी से मिले फ़ोन के आधार पर यहाँ बात यहाँ आप सभी को बताना चाहता हूँ, कि एक बार भारत के सिर्फ़ तीन शहरोमें रेड एफ एम 93.5 पर और बाद में करीब दो साल पहेले आकाशवाणी के उत्तर और मध्य भारतीय गीने-चूने प्रायमरी और विविध भारती केन्द्रो से प्रसारित संगीत के सितारों की महेफ़ील को अब निज़ी चेनल रेडियो सिटी 91.1 के Ahmedabad, Ahmednagar, Akola, Delhi, Hyderabad, Jaipur, Jalgaon, Lucknow, Mumbai, Nagpur, Nanded, Pune, Sangli, Solapur, Surat and Vadodra (Baroda). से प्रसारित किया जायेगा हर रविवार दो पहर 12 बजे और पुन: प्रसारण रात्री 9 बजे से एक घंटे तक । शहरो की पूरी उनकी तरफ़ से मिले मेईल के बाद वहाँ से कोपी पेस्ट करके यहाँ दी है । तो पूराने अलभ्य गायको गीतकारो और संगीत कारो (जिनमें कई आज हयात नहीं है) एक बार फ़िर सुनिये अमीन सायानी साहब के अनमोल संग्रहालय से और चूकीये मत । श्री अन्नपूर्णाजी की साप्ताहीकी का आज दिन है तो क्या वे दो दिन यानि रविवार सुबह तक ठहर सकती है ?दि.26, नवम्बर, 2010 की मेरी इसी विषय की पोस्ट जो श्री सागर भाईने इस ब्लोग के सम्पादक की हेसीयत से हंगामी रूप से हटा कर रख़ी थी, जो मैनें फ़िर से जारि तो की पर एक जाया टिपणी चिदाम्बर जी के अलावा किसी से नहीं मिली और मिले भी कैसे ? पिछले पन्ने पर कितने लोग जायेंगे ? तो उसे उस कलाकार को जनम दिनकी बधाई के रूपमें इतने दिनों के बाद प्रस्तूत करना तो कोई रूपसे सही तो कैसे लगेगा पर उस कलाकार के बारेमें थोड़ी सी पहचान देने के लिये और जो उन्हें और उनके भारतीय फिल्म संगीत में उनके योददान को जानते है उनको ताझा करने के लिये उनकी जानकारीयोँ में से बहोत कम नीचे इन संजोग के आधीन जरूरी सुधार के साथ प्रस्तूत कर रहा हूँ ।

दि. 26 नवम्बर के दिन मुम्बई स्थित भारतीय फिल्म संगीत में अपने एकोर्डियन वादन द्वारा योगदान प्रदान करने वाले
श्री सुमित मित्राजीने अपना जन्मदिन मनाया था । मैं ख़ुश-किस्मत हूँ कि 21 (शायद?), फरवरी, 2010 के दिन बिल्लीमोरा के मेरे मित्र और वहाँ की गुन्जन ललित कला संस्थाके कर्ताहर्ता श्री नरेश मिस्त्रीजी (खूद भी एकोर्डियन वादक) द्वारा आयोजित एक फिल्म वाद्य संगीत के शो में उनके द्वारा आमंत्रित हो कर मैं मेरे मित्र सुरत के जी. रझाक बेन्ड के श्री फारूक भाई और अन्य मित्र श्री शिरीष भाई के साथ गया था और उस कार्यक्रम में सुमितजी और सेक्सोफोन, क्लेरीनेट और वेस्टर्न फ्ल्यूट वादक श्री सुरेश यादव को बहूत आनंद से सुना और देख़ा था ।

उनकी फिल्मी धुनों की आज तक सिर्फ एक रेकोर्ड उस समय की पोलिडोर नाम धारी रेकोर्ड कम्पनी ने निकाला था जिसमें फिल्म बॉबी के चार गीत उन्होंने एकोर्डियन पर नहीं पर इलेक्ट्रिक ऑर्गन पर बजाई थी, जिसमें उनकी मेरे साथ हुई बात के अनुसार एकोर्डियन पर धीरज कुमार ने साथ दिया था । जब की मूल गानेमें सुमितजीने ही एकोर्डियन बजाया है और बाद में उस इ पी रेकोर्ड को स्व. अरूण पौडवाल की बजाई एकोर्डियन पर फिल्म मेरा नाम जोकर के तीन गानो के ई पी रेकोर्ड की धून के साथ मिली जुली एल पी रेकोर्ड प्रस्तुत हुई थी । उस समय मुझे उनके साथ तसवीर खिंचवाने का मौका मिला था जो फारूक भाई और सुमितजी के सौजन्य से नीचे प्रस्तुत की है ।


नीचे देख़ीये और सुनिये उसी कार्यक्रम में उनके द्वारा बजाई गई फिल्म झुक गया आसमान के शीर्षक गीत की एकोर्डियन पर धुन जिसमें सिन्थेसाईझर पर बडोदरा के श्री दिलीप रावल है और पर्क्यूसन (इस शब्दमें कोई गलती हो तो सुधार बताईए) पर मुम्बईमें फिल्म उद्योग में सालों काम करने वाले श्री नरेन्द्र वकील है ।



नीचे आज रेडियो श्रीलंका पर मेरे द्वारा भेजी गई सूचना के आधार पर सुबह 7.34 पर वहाँ की उद्दघोषिका श्रीमती ज्योति परमारजी ने प्रस्तुत किया हुआ बधाई संदेश सुनिये ।



रेडियोनामा के इस मंच से भी श्री सुमितजी को जनम दिन की ढेर सारी शुभ: कामनाएँ ।
(सामान्य रूप से मेरी यह नीति नहीं रही है कि अन्य पोस्ट लेख़क की पोस्ट पर तूर्त (तुरंत) ही मेरी पोस्ट लिख़ दूँ । पर जनम दिन के बारेमें पोस्ट उसी दिन प्रकाशित करनी होती है, इस लिये संजयजी और अन्नपूर्णाजी क्षमा करें और नये जूडने वाले पाठको से अनुरोध है कि वे पोस्ट भी पढे, हालाकि युनूसजी जैसे तो पढ चूके (चुके) है संजय जी की पोस्ट)
पियुष महेता ।
सुरत ।

Monday, December 21, 2009

श्री अमीन सायानी साहबको जन्मदिन की मुबारकबाद

आज रेडियो प्रसारण और विज्ञापन की दुनिया के बेताज बादशाह और लिविंग लिजन्ड श्री अमीन सायानी साहबका जन्मदिन है । तो रेडियोनामा की औरसे उनको जन्मदिन की तथा स्वस्थ जीवन के लिये तथा इसी क्षेत्रमें उनकी सक्रीयता कायम रहे और हमें वे नयी नयी पूरानी बातों से रेडियो या सीडी के माध्यम से अवगत कराते रहे वैसी शुभ: कामना ।
मेरे साथ की गयी मुलाकात के समय की बातचीत आप

http://radionamaa.blogspot.com/2008/03/blog-post_2082.html

उपर की लिन्क पर देख़ सकेंगे ।


पियुष महेता ।
सुरत-395001.

Friday, October 30, 2009

श्री अमीन सायानी साहब रेडियो श्री लंका से बोले करीब 20 साल बाद !

आदरणिय पाठकगण,

अभी कुछ समय पहेले रेडियो श्रीलंका की वहाँ की ही रहेनेवाली वैसी निवृत पर केझ्यूल उद्दघोषिका श्रीमती पद्दमिनी परेरा एक लम्बे समय भारतमें घूम कर फ़िर सिलोन पहोँच कर रेडियो पर प्रवृत्त हुई । वे जब भारतमें थी, उस दौरान अपनी सुविधा अनुसार कई श्रोतालोगो से मिली (जिसमें मैं शामिल नहीं हूँ ।) और रेडियो श्रोता संधकी सभाओमें भी गयी और रेडियो श्रीलंका से जूडे कई पूराने लोगो से मिली । उनमें श्री गोपाल शर्माजी तो स्वाभावीक ही है पर श्री अमीन सायानी साहब से भी मिली और उनकी व्यस्तता होते हुए भी आगंतूक को उनकी और से प्राप्त होते हुए बहूमान के स्वानुभवसे बहोत ही प्रभावीत हुई और उनके साथ की गयी बातचीत की ध्वनि-मूद्री अपने साथ ले गयी जो दि. 21 अगस्त, 2009 की बात थी । और परसों यानि दि. 29 अक्तूबर, 2009 के दिन सुबह 8 बजे अपने नियमीत कार्यक्रम को स्थगीत करके उसके स्थान पर सुनवाई । हालाकी मैं रेकोर्ड तो नहीं कर सका । पर 1989 में सिलोन रेडियो से सिबाका गीतमाला के साप्ताहीक प्रसारण की समाप्ती के बाद कुछ समय श्री मनोहर महाजन द्वारा प्रस्तूत एक अगरबत्ती बनानेवालो द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमके दौरान उस उत्पादन के विज्ञापन तक करीब एक साल तक सीमीत रही थी । बादमें उनके जन्मदिन पर कुछ साल पहेले एक प्रायोजित कार्यक्रमकी पूरानी रेकोर्डिंग से सिर्फ शुरूके उद्दबोधन को ही प्रसारित किया गया था । तो यह तो एक चमत्कार जैसा ही लगा । रेडियो श्रीलंका से जूडे कई लोगोमें से सिर्फ़ कुछ ही लोगोने उस संस्था को प्यार और आदर से याद रख़ा है, उनमें श्री गोपाल शर्माजी, श्री अमीन सायानी सहब और उनके अलावा शी रिपूसूदन कूमार औलावादी और श्री मनोहर महाजन प्रमूख़ है ।
पद्द्मिनीजी और अमीन सायानी साहब को धन्यवाद और बधाई ।

पियुष महेता ।
नानपूरा, सुरत ।

Sunday, December 21, 2008

21वी डिसम्बर, श्री अमीन सायानी साहब को रेडियोनामा की और से जन्म दिन की बधाई ।

21वी दिसम्बर , श्री अमीन सायानी साहब को रेडियोनामा की और से जन्म दिन की बधाई देते हुए इस मौके पर पिछले सोमवार को प्रसारित पत्रावली कार्यक्रम का एक छोटा सा अंश सुनिये जो श्री अमीन सायानी साहब के बारेमें ही है ।


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मेरे साथ उनसे की गयी बातचीत का दृष्यांकन आप इस लिंक पर http://radionamaa.blogspot.com/2008/03/blog-post_2082.html देख और् सुन सकते है । जो आप रेडियोनामा पर ही पहेले देख चुके हैं। पर रेडियोनामा के नए श्रोताओं के लिए ये लिंक दिया जा रहा है.

पियुष महेता ।
नानपूरा, सुरत ।

Thursday, June 19, 2008

श्री अमीन सायानी साहब की प्रस्तूती : कोलगेट संगीत सितारोंकी मेहफी़ल

आदरणिय पाठकगण,

कल श्री अमीन सायानी साहबसे आकाशवाणी के कुछ: प्रायमरी और कुछ: स्थानिय विविध केन्द्रों से शुरू हुए उनके कार्यक्रम कोलगेट संगीत सितारों की मेहफी़ल के बारेमें सत्तावार जानकारी प्रप्त हुई । यह मेईल नोन युनिकोड आकृति देव फोन्ट्समें होते हुए पढ़ पाना असंभव था । इस लिये मेरी तकलीफ़ के बारेमें मेरे उनको सुचीत करने पर उनके बेटे श्री राजीलजीने उन फोन्ट्स का झिप वर्झन भेजा । तब जो सुचना हिन्दीमें माईक्रो सोफ्ट वर्ड्झमें पढी उसको जेपीजी में परिवर्तीत करके आपके लिये प्रस्तूत करने की कोशिश की है, जिससे संबंधीत श्रोता अपने अपने संबंधित केन्दों से अपने अपने समय पर यह कार्यक्रम श्रंखला सुन शके । एक बात और कहनी है, की यह श्रंखला पहेले आकाशवाणी के करीब ४० केन्दो से प्रसारित होनी तह थी । पर आकाशवाणी द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों के प्रस्तूती दरों में तगडी वृद्धि किये जाने पर इस श्रंखला के प्रायोजकोने अपना बजेट बढाने के बजाय उसको ४० की जगह करीब १३ केन्दों तक सिमीत कर दिया ।
तो पढी़ये श्री अमीन सायानी साहब का संदेश ।


पियुष महेता ।
सुरत ।

Saturday, May 24, 2008

यह विविध भारती का विज्ञापन कार्यक्रम है

अन्नपूर्णाजी,
आपने स्थानीय विज्ञापन प्रसारण सेवा के केन्द्रों के झरोखा की बात प्रस्तुत की है उसमें मुम्बई विज्ञापन प्रसारण सेवा कुछ: इस तरह से अलग रही है । एक समय उस पर मराठी भाषा सिर्फ़ कुछ: गिने चुने विज्ञापनों तक ही सीमीत थी । यह बात करीब १९६७ से १९७० तक की है । यह केन्द्र केन्द्रीय विज्ञापन प्रसारण सेवा से अलग हुआ था । इस लिये शुरूमें वहाँ से सभा की शुरूआत में , बीचमें बार बार और सभा के अन्तमें कहीं भी मुम्बई नाम नहीं था पर सिर्फ़ यह विविध भारती का विज्ञापन कार्यक्रम इस प्रकार से उद्दघोषणा होती थी ।
बादमें अन्य केन्द्रों की तरह ’विविध भारती की विज्ञापन प्रसारण सेवा का यह मुम्बई केन्द्र है ’ बादमें एक दौर इस तरह का आया कि, आमी विविध भारती ची जाहेरात सेवा चे मुम्बई केन्द्रावरण बोलत आहे बोला जाता और बादमें मराठी नाटकरंग और मराठी सुगम और फिल्म संगीत के स्थानीय या कहिये कि केन्द्र के प्रसारण मर्यादा को देख़ते हुए अर्धक्षेत्रीय कार्यक्रमो को छोड़ कर इस मराठी उद्दघोषणा के साथ बोला जाता था कि अब सुनिए झरोखा या मधुमालती या बेलाके फूल जो बही मराठी वाले उद्दधोषक हिन्दीमें बोलना शुरू करते थे। (जिसमें विविध भारती की केन्द्रीय सेवाके आज दिनों के और भूतकाल के भी जानेमाने उद्दघोषक श्री अमरकान्त दुबे जी भी थे) ।
रात्री ११.३० पर अन्तिम स्थानीय कार्यक्रम के बाद सभा समाप्‍ती के पूर्व स्थानीय हवामान सूचना भी हिन्दी में रहती थी पर सभा समाप्ती वही उद्दघोषक मराठी में करते है; हाँ हिन्दी फिल्म संगीत के स्थानिय कार्यक्रमो में वे लोग प्रस्तुति माध्यम अन्य वि.प्र.सेवा की तरह क्षेत्रीय भाषा नहीं पर हिन्दी ही रख़ते है ।

एक बात का ताज्जूब हो रहा है, कि श्री अमीन सायानी साहब को पहेले तकनीकी कारणो सर नहीं देख़ पाने पर जो एक श्री अमीन साहब को सुनने-देखनेकी की इन्तेजारी पाठ़कोमें थी उसकी खुशी यह मोका मिलने के श्री कान्तीभाई, श्रीमती लावण्याजी ,श्री खु़शबूजी और श्री सागरजी (श्री हर्षद भाई तो पुरानी पोस्ट पर देख़ पाने पर ही अपना ख़याल बता चूके थे ) बाद गायब हुई क्यों दिखी यह समझमें नहीं आया । मैंने तो कम बोल कर श्री अमीन साहब को ही ज्यादा बोलने का मोका दिया है ।
इन प्रतिभावो को मैं श्री अमीन साहब को पहोंचाने वाला हूँ । और श्री एनोक डेनियेल्स की पोस्ट वाली धून जो आपका शौक़ की बात है बह भी पता नहीं वला की आपने धूनें सुनी भी या नहीं । श्रीमती ममताजी (गोवा) के भी यह रूचि के विषय है ।
पियुष महेता ।
सुरत ।

Sunday, May 18, 2008

मेरी मुम्बई यात्रा में श्री अमीन सायानीजी से मुलाकात भाग-२

पाठकगण!
मेरी इस श्रंखला जो विडीयो अपलोडिंग के सही नहीं होने के कारण अधूरी छूट गयी थी, इसको इस कडी़ में अपने उन विडीयो रेकोर्डिंग को चार भाग में बांटकर फिर से अलग अलग अपलोड कर रहा हूँ तो देखिये मेरी श्री अमीन सायानी साहब से बातचीत।
: भाग १


भाग २


भाग ३


भाग ४


इस बात के पूरी होने पर श्री सायानीजी ने प्यार से हम दोनों को विदा किया और अपनी केबिन में अपने कुछ दफ्तरी काम में जुट गये। परन्तु अमीन सायानी जी के सुपुत्र श्री राजिलजी ने बाहर के कमरे में अपना काम निपटाते हुए कुछ और समय हमारे साथ बहुत ही निजी़ मूड में बातें जारी रखी।
जैसा मैं आपको पहले बता चूका हूँ, उनसे भी मेरी पहचान रही है और अमीन साहब की तरह राजिल भी बहुत ही मिलनसार हैं। इस तरह करीब ४ बजे हम दोनों दोस्त अपने जीवन के बेहतरीन समय की यादों की बात करते हुए एक ही बस में बैठ कर बीचमें से अलग हो गये ।
रात्री को मैं अपने चचेरे भाई जतिन महेता, उसकी पत्नी श्रीमती रक्षा महेता और उसके बेटे मिलन महेता के यहाँ दो दिन के लिये रुकना हुआ। जतिन भाई मेरे सगे भाई नहीं है परन्तु हम दोनों में सम्बंध सगे से भी बढ़ कर है।
मेरे बहनोई श्री भगवान दास कापडिया (जो हकीकतमें मेरी फूफी की लडकी स्व. शारदा बहन के पति है), मेरे भांजे विनय कापडिया और उनकी पत्नी तृप्ती और उनके बेटे जैमीन के घर से चला। पाठको को इन सब नाम से कोई सीधा लेना देना तो नहीं है। पर जो पियुष महेता आप के सामने पेश हो रहा है, उनमें मुम्बई जैसे शहर में मिले इन सबके सहकार का मेरे मन महत्व होना चाहिए, वह तो आप भी मानेंगे । एक और कुटुम्ब भी है, जिनके नाम अगली पोस्ट में!
.....अगली पोस्ट विविध भारती की मुलाकात के बारे में।

Wednesday, March 19, 2008

मेरी मुंबई यात्रा भाग -- अमीन सायानी के साथ दोपहर का भोजन और उनका वीडियो बनाने का सौभाग्‍य

सूरत निवासी पियूष मेहता रेडियोनामा के प्रेमी हैं । वे अकसर मुंबई आकर प्रसारण की दुनिया की जानी-मानी हस्तियों से मिलते हैं और उनसे बातें करते हैं । पियूष मेहता ने हाल ही में चोटी के ब्रॉडकास्‍टर अमीन सायानी से मुलाक़ात की है । आईये पियूष मेहता से उस मुलाक़ात का ब्‍यौरा जानें । पियूष भाई के आलेख को हमने संशोधित एवं परिवर्तित करके प्रकाशित किया है----यूनुस ।।



इस बार भी हमेशा की तरह मुंबई आने से पहले ही मैंने अमीन सायानी साहब से फोन पर सम्पर्क करके उनसे मिलने का समय तय करवाया लिया था । पर इस बार उन्‍होंने छब्‍बीस फरवरी को दोपहर साढ़े बारह बजे बुलवा लिया । और ये इसरार किया कि मैं दोपहर का भोजन उनके साथ करूं । और ये तस्‍दीक भी कर दी कि खाना शाकाहारी ही रहेगा । यानी मेरे मन का संशय भी अमीन साहब भी जान गये थे ।



अमीन साहब समय के पाबंद हैं । इसलिए मैंने इस बात का ख़ास ख्‍याल रखा था कि कहीं मुझे देरी ना हो जाए । मुझे इस बात की ज्‍यादा चिंता थी कि कहीं मेरे देर से पहुंचने के कारण अमीन साहब को अपने कामकाम में परेशानी ना हो । अमीन साहब के सहायक दिनेश भाई मुझे पहले से जानते हैं । कई बार अमीन साहब से मिलने जो आ चुका हूं मैं । बहरहाल....आधे घंटे पहले पहुंचने के बावजूद दिनेश जी को कोई दिक्‍कत नहीं हुई और उन्‍होंने बड़े आदर और खुशी से मेरा स्‍वागत किया ।



अब मैं अमीन साहब के कमरे में था । जाने माने ब्रॉडकास्‍टर अमीन सायानी को अपना काम करते हुए देख रहा था । बीच बीच में वो बातें भी कर रहे थे मुझसे । उनके बेटे राजिल को भी हमारे साथ ही भोजन करना था । लेकिन उनका फोन आ गया कि उन्‍हें देर हो सकती है । इसलिए तकरीबन एक बजे मैं और अमीन साहब रीगल टॉकीज़ के पास स्थित अपोलो होटेल में आ पहुंचे । अमीन साहब की सिन्‍सीयेरिटी देखिए कि कुक को बुलाकर उन्‍होंने कम मिर्च और कम तेल में अलग से भोजन तैयार करने के निर्देश भी दिये ।



मैंने झिझकते हुए कहा कि मैं उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग करना चाहता हूं, जिसके लिये अमीन साहब सहर्ष तैयार हो गये । लेकिन उन्‍होंने कहा कि उनके स्‍टूडियोज़ या कार्यालय में ही वीडियो बनाना ज्‍यादा ठीक होगा । बातों बातों में मैंने अपने पुराने क़रीबी दोसत सुरेन्द्र रामसिंघानी का जिक्र किया जो किसी ज़माने में मुंबई के एम टी एन एल के कर्मचारी थे । मैंने अमीन साहब से बताया कि सुरेंद्र के साथ ही इत्‍तेफाक से मैं सबसे पहले उनसे मिला था । दरअसल अमीन साहब का हफ्ते भर से ख़राब था और वो काफी़ परेशान थे । सुरेंद्र ने अमीन साहब के कहने पर फटाफट एक घंटे में फोन  दुरूस्‍त करवा दिया था । जिसके बाद अमीन साहब ने सुरेंद्र को अपने दफ्तर में मिलने के लिए बुलवा लिया था । मैं भी सुरेंद्र के साथ था और पहली बार तब ही अमीन साहब से मिला था ।



इसी दौरान मैंने अमीन साहब की इजाज़त से सुरेंद्र को भी बुलवा लिया । और मेरे इसी मित्र की मदद से बातचीत का दृश्यांकन आप तक पहुंच रहा है ।  मैं आपको बताना चाहता हूं कि इस बातचीत को ASF फॉर्मेट से MPEG फॉर्मेट में बदलकर मैंने इसे चार् हिस्‍सों में बांटा है । फिर ई स्निप पर चढ़ाया है । हम पेशेवर फोटोग्राफर या सिनेमेटोग्राफर नहीं हैं । लेकिन इसे संपादित करते हुए मैंने ये ख्‍याल रखा है कि बीच बीच मं हो रही गुजराती बातचीत वैसी ही रहे । ताकि आपको सहज बातचीत का आनंद भी मिल सके । पूरा लोड होने तक आपको इंतज़ार करना होगा । तभी इसे बिना किसी बाधा के देख सकेंगे । उम्‍मीद है कि इस बातचीत को देखकर आपको आनंद आयेगा ।






भाग १


भाग २


भाग ३


भाग 4



इस बात के पूरी होने पर श्री सायानीजी ने प्यार से हम दोनों को विदा किया और अपनी केबिन में अपने कुछ दफ्तरी काम में जुट गये। परन्तु अमीन सायानी जी के सुपुत्र श्री राजिलजी ने बाहर के कमरे में अपना काम निपटाते हुए कुछ और समय हमारे साथ बहुत ही निजी़ मूड में बातें जारी रखी।
जैसा मैं आपको पहले बता चूका हूँ, उनसे भी मेरी पहचान रही है और अमीन साहब की तरह राजिल भी बहुत ही मिलनसार हैं। इस तरह करीब ४ बजे हम दोनों दोस्त अपने जीवन के बेहतरीन समय की यादों की बात करते हुए एक ही बस में बैठ कर बीचमें से अलग हो गये ।
रात्री को मैं अपने चचेरे भाई जतिन महेता, उसकी पत्नी श्रीमती रक्षा महेता और उसके बेटे मिलन महेता के यहाँ दो दिन के लिये रुकना हुआ। जतिन भाई मेरे सगे भाई नहीं है परन्तु हम दोनों में सम्बंध सगे से भी बढ़ कर है।
मेरे बहनोई श्री भगवान दास कापडिया (जो हकीकतमें मेरी फूफी की लडकी स्व. शारदा बहन के पति है), मेरे भांजे विनय कापडिया और उनकी पत्नी तृप्ती और उनके बेटे जैमीन के घर से चला। पाठको को इन सब नाम से कोई सीधा लेना देना तो नहीं है। पर जो पियुष महेता आप के सामने पेश हो रहा है, उनमें मुम्बई जैसे शहर में मिले इन सबके सहकार का मेरे मन महत्व होना चाहिए, वह तो आप भी मानेंगे । एक और कुटुम्ब भी है, जिनके नाम अगली पोस्ट में!
.....अगली पोस्ट विविध भारती की मुलाकात के बारे में।

Saturday, October 27, 2007

रेडियो एनाउंसर को याद रखना चाहिये कि वो स्‍टार नहीं होता, वो परिवार का सदस्‍य होता है---अमीन सायानी से एक साक्षात्‍कार


अमीन सायानी रेडियो की दुनिया की सबसे निराली और यादगार आवाज़ हैं ।
उनका ट्रेडमार्क स्‍टाइल है जो लोगों के दिलों पर छा चुका है । जब वो ख़ास अदा में 'बहनो और भाईयो' बोलते हैं तो लोग फौरन समझ जाते हैं कि ये कौन बोल रहा है ।
कल अन्‍नपूर्णा जी ने रेडियोनामा पर बिनाका गीतमाला का जिक्र किया तो मुझे लगा कि अमीन सायानी के इस पुराने साक्षात्‍कार को छापने का सही वक्‍त आ गया है । मुंबई के एक अख़बार के लिए ये बातचीत रीमा गेही ने की थी । जिसका अनुवाद यहां प्रस्‍तुत है ।

अमीन साहब दो महीने पहले करांची के अमेच्‍योर मेलोडीज़ ग्रुप के आपके एक दोस्‍त सुल्‍तान अरशद ने आपको करांची बुलवाया था, कैसा रहा वो अनुभव
अरे भई सुल्‍तान अरशद कमाल के शख्‍स हैं । उन्‍हें पुरानी फिल्‍मों के गीतों का अथाह ज्ञान है, उनका एक ग्रुप हुआ करता था पुराने गानों के शौकीन लोगों का । वो अपने छोटे छोटे आयोजन भी करते थे । अनिल बिस्‍वास, ओ पी नैयर और सलिल चौधरी इन आयोजनों का हिस्‍सा रह चुके हैं । पर विभाजन के बाद वो करांची चले गये और वहां भी उन्‍होंने इसी तरह का एक ग्रुप बनाया । उन्‍होंने मुझे पाकिस्‍तान इसलिए बुलाया था ताकि मेरे रेडियो प्रोग्राम गीतमाला के लिए मुझे सम्‍मानित कर सकें । मैं एक हफ्ते करांची में रहा और ये देखकर दंग रह गया कि वहां के लोगों को अभी तक गीतमाला की याद है । 1952 से रेडियो सीलोन के ट्रांस्‍मीटरों के ज़रिए मेरा प्रोग्राम गीतमाला पूरे एशिया में सुना जाता रहा है । ये सिलसिला क़रीब 1988 तक जारी रहा । मुझे पाकिस्‍तान में बहुत प्‍यार मिला । ऐसा नहीं लगा कि मैं दूसरे मुल्‍क में हूं ।


आजकल आप क्‍या कर रहे हैं अमीन साहब
देखिए आजकल मैं वही कर रहा हूं जो जिंदगी भर‍ किया है । रेडियो प्रोग्राम बना रहा हूं । जिंगल बना रहा हूं । और उन्‍हें सऊदी अरब, अमेरिका, न्‍यूजीलैन्‍ड और कनाडा के रेडियो स्‍टेशनों को भेज रहा हूं । कोशिश यही है कि जल्‍दी ही साउथ अफ्रीका, मॉरीशस और फिजी में भी दोबारा मेरे प्रोग्राम शुरू हो जाएं । हाल के दिनों में भारत में और विदेशों में मेरा एक शो काफी लोकप्रिय रहा है, जिसका नाम है 'संगीत के सितारों की महफिल' । मैं उसे दोबारा शुरू करना चाहता हूं । सच कहूं तो आज रेडियो की दशा ठीक नहीं है । वैसे रेडियो दुनिया का सबसे चमकीला, सबसे दिलकश माध्‍यम रहा है, वो भी दुनिया भर में । आप चाहें तो रेडियो के प्रोग्राम दिल लगा कर सुन सकते हैं और चाहें तो रेडियो पृष्‍ठभूमि में बजता रहे और आप अपना काम करते रहें । अगर ठीक से इसे संभाला जाये तो रेडियो पर आपको अनगिनत रंग दिखेंगे । बेमिसाल खुशबुएं मिलेंगी । और दिलकश आवाजें मिलेंगी ।




आजकल 'गीतमाला' जैसे शो क्‍यों नहीं हो रहे हैं
आज के ज़माने में गीतमाला जैसा शो कहीं नहीं चल सकता । इसकी वजह ये है कि लगभग हर रेडियो स्‍टेशन अपना काउंट-डाउन या हिट परेड चलाता है । इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि किस चैनल या किस शो की रेटिंग सही हैं । लेकिन मैं गीतमाला के 'रिट्रोस्‍पेक्टिव' के बारे में सोच रहा हूं । हो सकता है कि आप जल्‍दी ही इसे सुनें ।


भारत की आज़ादी के साठ साल हो चुके हैं, मैंने सुना है कि आपका परिवार आज़ादी की लड़ाई से गहरा जुड़ा रहा था । इस बारे में बताईये ना ।
जब भारत की आज़ादी की लड़ाई चल रही थी तो मैं बहुत छोटा था, बहुत उत्‍साही था । मेरा जन्‍म ऐसे परिवार में हुआ जिसमें देशभक्ति और देश के विकास की भावना कूट कूट कर भरी थी । मुझे उस ज़माने के तमाम महान नेताओं को सुनने का सौभाग्‍य मिला । चाहे वो महात्‍मा गांधी हों या पंडित जवाहर लाल नेहरू या फिर सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद ।
बी जी खेर, मोरारजी देसाई और अरूणा आसफ अली जैसे लोग भी हमारे घर आया करते थे । क्‍योंकि मेरे मां गांधी जी की शिष्‍या थीं और समाज-सेवा करती थीं । बचपन में मुझे भी समझ में आ रहा था कि देश में बदलाव हो रहा है । आज़ादी मिलने वाली है । फिर जब मैं मुंबई में न्‍यू ईरा स्‍कूल और ग्‍वालियर के सिंधिया स्‍कूल में पढ़ने गया तब हमारे भीतर ये जज्‍़बा आया कि हम नये भारत के नौजवान हैं ।


आपके काम पर आपके परिवार का क्‍या असर रहा है

मेरी मां गांधीजी से जुड़ी थीं और वयस्‍क नव साक्षरों के लिए एक पाक्षिक पत्रिका निकालती थीं जो हिंदुस्‍तानी ज़बान में होती थी । इस पत्रिका का सारा काम हमारे घर से होता था । इससे मुझे सरल ज़बान में, जनता की ज़बान में अपनी बात रखने के संस्‍कार मिले । और मैंने जिंदगी भर इसी ज़बान में अपनी बात कही है ।


क्‍या ये सही है कि बचपन में आप गायक बनने की तमन्‍ना रखते थे

जी हां । स्‍कूल के दिनों में मैं 'कॉयर' में गाया करता था । मैंने शास्‍त्रीय संगीत की तालीम भी ली । लेकिन तेरह साल का होते होते मेरी आवाज़ फट गयी । और फिर तो एक भी सुर ठीक से नहीं लगता था । जब भी गाने की कोशिश करता तो कोई ना कोई टोक देता । लोग बेसुरा कहते । बस इसके बाद मेरे गाने पर रोक लग गयी । लेकिन मुझे संगीत से प्‍यार तो था ही इसलिए ऐसे पेशे में आ गया जिसका ताल्‍लुक संगीत से ही था ।


आजकल आप स्‍टेज पर ज्‍यादा नज़र नहीं आते, क्‍यों

जी हां लंबा वक्‍त हो गया मैंने किसी स्‍टेज शो का संचालन नहीं किया । हालांकि मैंने तमाम तरह के कार्यक्रमों का संचालन किया है । फिर चाहे वो संगीत के कार्यक्रम हों, वेरायटी शो हों या फैशन शो और अवॉर्ड फंक्‍शन । लेकिन इनमें बहुत मेहनत करनी पड़ती है । आज भी मैं दस से बारह घंटे काम करता हूं । लेकिन पचहत्‍तर साल का हो चुका हूं । इसलिए ज़रा आराम करना चाहता हूं । बस यही वजह है कि आजकल मैं श्रोताओं में बैठकर दूसरों की पेशकश देखता रहता हूं ।


रेडियो की दुनिया में विज्ञापनों की जो भरमार है उसके बारे में आपका क्‍या कहना है
देखिए आज निजी रेडियो स्‍टेशनों की भरमार हो गयी है । इसलिए दिक्‍कत ये हो गयी है कि रेडियो स्‍टेशनों को खुद को जिंदा रखने के लिए जद्दोजेहद करनी पड़ रही है । सबको ऐसे कार्यक्रम करने हैं जो दूसरों से अलग हों । पर हो ये रहा है कि सबके सब एक जैसे कार्यक्रम कर रहे हैं । स्‍टाइल एक जैसा है । इसलिए उन्‍हें ज्‍यादा कामयाबी नहीं मिल रही है ।


रेडियो की दुनिया में अच्‍छी आवाज़ होना कितना जरूरी है ।
मुझे नहीं लगता कि बहुत ज्‍यादा जरूरी है । मेरी आवाज कोई बहुत अच्‍छी नहीं है । हां ये जरूर है कि मैंने हमेशा साफ, दिलचस्‍प और सही बात कहने की कोशिश की है । गुजराती और अंग्रेज़ी ज़बानों की पृष्‍ठभूमि रही है मेरी । इसलिए शुरूआत में सही हिंदी बोलने में काफी परेशानी होती थी । मुझे अपनी भाषा और लहजे को साफ़ बनाने में कई साल लग गये और बड़ी मेहनत करनी पड़ी ।


रेडियो की दुनिया के नये लोगों को आप क्‍या सलाह देना चाहेंगे
देखिए पहले तो उन्‍हें ये बात दिमाग़ में बैठा लेनी चाहिये कि रेडियो अनाउंसर स्‍टार नहीं होता । वो श्रोताओं के परिवार का हिस्‍सा बन जाता है । इसलिए जब आप बोलें तो आपकी विश्‍वसनीयता होनी चाहिये । ऐसा ना लगे कि आप झूठ बोल रहे हैं । जब तक आप ईमानदार नहीं होंगे और जो कह रहे हैं उस पर आपको खुद भरोसा नहीं होगा, लोगों पर आपकी बात का असर नहीं होगा । रेडियो दुनिया का अकेला ऐसा माध्‍यम है जहां आधा काम आपके श्रोता करते हैं । आप अपनी पूरी कोशिश करते हैं, सर्वश्रेष्‍ठ प्रदर्शन करते हैं, फिर हर श्रोता अपनी कल्‍पना और अपनी भावनाओं से आपकी एक तस्‍वीर रचता है और आपसे जुड़ता है । ये कमाल की बात है ।


आभार--रीमा गेही । हिंदुस्‍तान टाइम्‍स मुंबई ।
ये तस्‍वीरें स्‍वर्ण जयंती के अवसर पर मैंने विविध भारती में खींची थीं ।

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