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Saturday, May 3, 2008

नए फिल्मी गीतकारों का दर्द

हम साहिर लुधियानवी , मज़रूह सुल्तानपुरी , आनन्द बक्षी के नाम अच्छी तरह जानते हैं परन्तु हम में से ज्यादातर लोगों के लिए प्रसून जोशी , स्वानन्द किरकिरे , पियूष मिश्रा , सय्यद क़ादरी जैसे नए गीतकार अपरिचित क्यों हैं ? इनके नए होने के अलावा इनकी एक जायज शिकायत है । एफ़ एम रेडियो और संगीत चैनल गीत प्रसारित करने के पहले आकाशवाणी और विविध भारती की तरह गीतकार का नाम की घोषणा नहीं करते । इरफ़ान भाई जवाब दो ?
नए गीतकारों से बातचीत के आधार पर कल के ' द हिन्दू ' के शुक्रवारीय परिशिष्ट में अनुज कुमार ने एक अच्छा लेख लिखा है । आप भी पढ़ें

2 comments:

सागर नाहर said...

साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, आनन्द बक्षी आदि गीतकारों को उतने ही महान संगीतकारों का साथ मिला करता था जैसे नौशाद साहब, अनिल बिश्‍वास,... किन किन के नाम लिखूं और किनके छोड़ूं ? बड़ी दिकत है।
और आज प्रसून और स्वानद किरकिरे .. जैसों को मिलते हैं अन्नू मल्लिक और प्रीतम जैसे संगीतकारों का ... बेचारे कितना ही बढ़िया गीत लिख लें संगीतकार अपने ऊलूल जूलूल संगीत से उस रचना का सत्यानाश कर देते है और जनता उन गानों को सुनना पसंद नहीं करती।
मेरी राय से दोष गायकों और गीतकारों का नहीं बल्कि संगीतकारों का ही है।

Manish Kumar said...

सही सवाल किया आपने। वैसे नाम पता हो तब तो बेचारे एनाउंस करं। नए FM चैनलों की प्रोग्रामिंग के पीछे कोई ना सोच है ना कोई कानसेप्ट। मुझे नहीं लगता कि निजी चैनलों के उद्घोषक थोड़ा भी वक़्त देते होगें गीत के पीचे के किरदारों को जानने समझने के लिए।

आपने देखा होगा कि गुलज़ार और जावेद साहब के आलावा ये नए गीतकार मेरी वार्षिक संगीतमालाओं मे हमेशा से जगह बनाते रहे हैं। अनुज जी ने ठीक लिखा कि इनका गीत सुनवाते समय संगीतकार, गीतकार, फिल्म आदि का नाम बताया जाना चाहिए जैसा कि विविधभारती में हमेशा से होता आया है।

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