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Friday, October 17, 2008

साप्ताहिकी 16-10-08

सप्ताह भर सवेरे 6 बजे समाचार के बाद चिंतन में लोकप्रिय नेताओं, साहित्यकारों जैसे सुभाष चन्द्र बोस, भगवती प्रसाद वाजपेयी, प्रेमचन्द आदि के विचार बताए गए। वन्दनवार में लोकप्रिय भजन सुनवाए गए और अंत में बजते रहे लोकप्रिय देशगान।

7 बजे भूले-बिसरे गीत सोमवार को समर्पित रहा अशोक कुमार और किशोर कुमार को। इस दिन अभिनेता अशोक कुमार का जन्म दिन था और इसी दिन पुण्य तिथि थी गायक, संगीतकार, अभिनेता, निर्माता, निर्देशक किशोर कुमार की। अशोक कुमार ने पुरानी फ़िल्मों में गीत भी गाए है क्योंकि उन दिनों अभिनेता अपने गीत ख़ुद गाते थे, उनका गाया सरस्वती राणी का स्वर बद्ध किया यह लोकप्रिय गीत बहुत दिन बाद सुना - चल चल रे नौजवान। गुरूवार को कुछ अधिक लोकप्रिय गीत बजे। समाप्ति के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीतों से होती रही।

7:30 बजे संगीत सरिता में इस सप्ताह भी प्रसिद्ध गायिका शकुन्तला नरसिंहन की प्रस्तुति में हिन्दुस्तानी और दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक जैसे रागों की चर्चा चली और दोनों विधाओं के कलाकारों से गायन और वादन सुनवाए गए।

त्रिवेणी में भी लगता है प्रसारण दुबारा तिबारा होने लगे है, रविवार को सुनी सकारात्मक सोच की बातें जिसे पाज़िटिव थिंकिंग कहा गया, यह कार्यक्रम लगा शायद पहले दो बार प्रसारित हुआ। कार्यक्रम का समय कम है और विषय तो बहुत सारे मिल सकते है ऐसे में दुबारा प्रसारण ठीक नहीं लगता, चाहे तो यही विषय किसी और तरह से कहा जा सकता है।

दोपहर 12 बजे से प्रसारित होने वाले सुहाना सफ़र कार्यक्रम के अंतिम पथिक संगीतकार थे हिमेश रेशमिया जिनके स्वरबद्ध किए गीत रविवार को सुना कर इस कार्यक्रम को समाप्त किया गया और सोमवार से शुरू हुआ नया नवेला कार्यक्रम - एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने। चलो, पचास के पार विविध भारती भी वी बी एस हो गई जैसे आकाशवाणी ए आई आर और दूरदर्शन डीडी।

पहली कड़ी प्रस्तुत की युनूस जी ने। आपने बताया कि इस कार्यक्रम की टैगलाइन है - 12 बजे 12 गीत, सुनकर लगा कि यह किसी … जी का आयडिया होगा। ख़ैर… आयडिया जिस किसी का भी हो हम उन्हें बधाई देते है विविध भारती पर इस कार्यक्रम की शुरूवात के लिए। वैसे यहाँ निजि एफ़ एम चैनल पर तेलुगु में इस तरह का कार्यक्रम पहले से ही प्रसारित हो रहा है।

शुरूवात में 12 फ़िल्मों के नाम बताए गए। सोमवार को किशोर कुमार की पुण्य तिथि थी इसीलिए उन्हीं के लोकप्रिय गीतों वाली फ़िल्मों को चुना गया जैसे आराधना, शर्मिली, तीन देवियाँ, ज्वैल थीफ़, झुमरू आदि और श्रोताओं से कहा गया इन फ़िल्मों से अपने पसंदीदा गीतों की फ़रमाइश के लिए। एस एम एस करने के लिए नम्बर और तरीका बताया गया और पहला गीत शुरू हुआ आराधना फ़िल्म का और शुरू हुआ सिलसिला श्रोताओं के एस एम एस भेजने का जिसे तुरन्त युनूस जी बताते जा रहे थे - शहर का नाम और भेजने वाले का नाम। प्राप्त संदेशों के आधार पर इन फ़िल्मों के गीत चुन कर सुनवाए जा रहे थे और संदेश भेजने वालों के नाम बताए जा रहे थे, गानों के बीच के संगीत में भी नाम बताए जा रहे थे।

साथ में एस एम एस के बारे में भी बताया गया कि यह सेवा 1985 में शुरू हुई और आज मोबाइल धारकों में से 74% इसका प्रयोग करते है। अंत में अगले दिन के लिए फ़िल्मों के नाम बताए गए। इस अनोखे कार्यक्रम के लिए महेन्द्र मोदी जी को धन्यवाद।

मंगलवार को प्रस्तुत किया अमरकान्त जी ने, फ़िल्में रही - जब जब फूल खिले, अनुरोध, कन्यादान, तीसरी मंज़िल जैसी 12 लोकप्रिय फ़िल्में।

बुधवार को प्रस्तुत किया युनूस जी ने और फ़िल्में रही द ट्रेन, मर्यादा, फ़र्ज़, ज्वैल थीफ़ जैसी 12 फ़िल्में। जब कार्यक्रम में युनूस जी हो तो वो कोई पाठ पढाए बिना नहीं छोड़ते श्रोताओं को, इस दिन सफ़ाई का पाठ पढाया।

गुरूवार की 12 फ़िल्में कटी पतंग, संगम, अभिलाषा, तुम से अच्छा कौन है, अनीता आदि। प्रस्तुति रेणु (बंसल) जी की रही।

इस तरह हर दिन ऐसी लोकप्रिय फ़िल्में चुनी गई जिसके लगभग सभी गीत लोकप्रिय रहे जिनमें से कुछ ऐसे गीतों की फ़रमाइश आई जिन्हें अक्सर सुनवाया जाता है जैसे -

कोरा काग़ज़ था यह मन मेरा (आराधना)
वहाँ कौन है तेरा (गाइड)
अकेले अकेले कहाँ जा रहे हो (एन ईवनिंग इन पेरिस)
होठों में ऐसी बात (ज्वैल थीफ़)

और कुछ ऐसे गीतों की फ़रमाइश भी आई जो बहुत समय बात सुनाई दिए जैसे -

कैसे करूँ प्रेम की मैं बात (अनिता)
यह दिल न होता बेचारा (ज्वैल थीफ़)

हर दिन कार्यक्रम के अंत में अगले दिन की 12 फ़िल्मों के नाम बताए जाते रहे। हमें तो बहुत अच्छा लग रहा है यह कार्यक्रम जिसमें ईंस्टेंट फ़रमाइश पूरी होती है, संदेश भेजो और तुरन्त सुन लो गीत। जिस जोश से प्रस्तुत किया जा रहा है हम उसी जोश से सुन रहे है और जिन्होनें अब तक नहीं सुना है हम उनसे भी उसी जोश से सुनने के लिए कहेंगे।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में राजू सिंह के संगीत में अलका याज्ञिक का गाया जावेद अख़्तर का यह गीत कार्यक्रम के स्वरूप के अनुसार मसालेदार तो नहीं पर अच्छा लगा -

सारे सपने कहीं खो गए
हाय हम क्या से क्या हो गए

शेष गाने सामान्य रहे।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में मिले-जुले गाने सुनवाए गए जैसे सत्तर के दशक की फ़िल्म सावन भादों और नई फ़िल्म मुझसे शादी करोगी के गीत। एक बात यहाँ हम बताना चाहेगें कि अक्सर फ़रमाइश करने वालों के नाम बताते समय जगह का नाम बताते हुए कहा जाता है - हैदराबाद मालकपेट से, यहाँ मैं थोड़ा सा सुधार कर दूँ, यह मालकपेट नहीं मलकपेट है, शायद अंग्रेज़ी में पता लिखे जाने से ऐसी ग़लती होती होगी।

3 बजे का समय मुख्यतः सखि-सहेली का होता है। शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम प्रस्तुत किया कल्पना (शेट्टी) जी ने और फोन पर सखियों से बातचीत की ममता (सिंह) जी ने। पटना के पास के क्षेत्र शायद फटुआ से स्कूल की छात्रा ने बात की और पुरानी फ़िल्म उड़न खटोला के गीत की फ़रमाइश की। खंडवा क्षेत्र से एक कम पढी-लिखी, खेत में काम करने वाली महिला ने नए गीत की फ़रमाइश की - वाह ! कमाल की फ़रमाइश है हमारी श्रोता सखियों की भी।

सोमवार का दिन होता है रसोई का, आलू के कुछ भरवाँ टोस्ट जैसा कुछ बताया गया जो न नया था न विशेष पर त्यौहारों का मौसम होने से कुछ अच्छी और नई बातें बताई गई जैसे एक स्थान मणिकरन में चट्टान के एक ओर ठण्डा और दूसरी ओर गरम पानी का झरना है। इस गरम पानी का उपयोग आसानी से रसोई में किया जाता है। अन्य स्थानों पर भाप पर भोजन बनाने के लिए एक के ऊपर एक मटकों में भोजन बनाया जाता है। मंगलवार को लघु और कुटीर उद्योग जैसे सिलाई, बुनाई करने, ब्यूटी पार्लर, छोटा सा पुस्तकालय खोलने जैसे काम करने की जानकारी दी गई। बुधवार को विभिन्न अवसरों और मौसम के पहरावे की बातें हुई।

इसके अलावा सामान्य जानकारी में डाक टिकट के बारे में जानकारी दी गई। अन्य बातों के साथ यह जानना अच्छा लगा कि सबसे बड़ा डाक टिकटों का नेट भारत में है।

शनिवार रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में हमेशा की तरह लोकप्रिय गीत सुनवाए गए।

इसके बाद नाट्य तरंग में रविवार को सुना मूल गुजराती नाटक का हिन्दी अनुवाद - खेमे जिसके निर्देशक है सत्येन्द्र शरत। बहुत भावुक नाटक था पिछले दिनों से हट कर सामाजिक समस्या अकेलेपन को लेकर।

रविवार को शाम 4 बजे यूथ एक्सप्रेस में आजकल दुनिया देखो स्तम्भ में युनूस जी सैर-सपाटा करवा रहे है। अभी-अभी शुरू हुआ यह स्तम्भ अच्छा लग रहा है। इस अंक में शुरू में कहा गया कि रूमानी यादें रहेगी, गीत भी ऐसे ही चुने गए पर किताबों की दुनिया में चित्रा कुमार की महादेवी वर्मा पर वार्ता सुनवायी गई। महादेवी वर्मा के गद्य में तो ऐसा कुछ है नहीं और काव्य में प्रियतम अलौकिक है। खैर…

4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारे में पिटारा कार्यक्रम में गीतकार शायर शकील बदायूँनी पर आधारित सरगम के सितारे कार्यक्रम प्रसारित हुआ। यह दूसरी कड़ी थी। पहली कड़ी की तरह यह भी अच्छा था। इसमें उनके शास्त्रीय रागों पर आधारित गीतों की चर्चा हुई और गीत भी सुनवाए गए। अन्य गीतो की भी चर्चा हुई जैसे साहब बीबी और ग़ुलाम का गीत - भँवरा बड़ा नादाँ रे

एक ख़ास बात बताई गई कि होली के सबसे अधिक यानि 3 गीत शकील साहब के है, जिन्हें सुन कर भी मज़ा आया। इतने मज़ेदार कार्यक्रम में एक बात अख़रती रही बिल्कुल वैसे ही जैसे अंगूर खाते समय बीच में दाने आते है। युनूस जी कहते गए - पिछले सप्ताह में आपने सुना, जैसा कि पिछले सप्ताह बताया आदि। पिछले सप्ताह यह कार्यक्रम हुआ ही नहीं था। दो कड़ियों के बीच अधिक अंतराल आया। यह दुबारा प्रसारण था और बिना संपादन के प्रसारित हुआ, ऐसे में उचित यही रहता है कि रिकार्डिंग के समय ही पिछले सप्ताह के बजाए पिछले भाग जैसे शब्द कहे जाए तो हर प्रसारण में कार्यक्रम ताज़ातरीन लगता है।

कुछ ऐसा ही हाल रहा सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम का। रेणु (बंसल) जी ने बताया 27 फ़रवरी से 3 मार्च तक अंधत्व निवारण सप्ताह मनाया जाता है। यह सप्ताह आस-पास है इसीलिए इस विषय पर बातचीत के लिए आमंत्रित है डा रमेश शाह। अब बताइए इस अक्तूबर के महीने में यह सप्ताह आस-पास कैसे हुआ। कार्यक्रम अच्छा है और दुबारा प्रसारण भी उचित है पर थोड़ा संपादन कर देते या शुरूवात में यह बता देते कि उस सप्ताह के विशेष कार्यक्रम को आज दुबारा प्रसारित किया जा रहा है।

बुधवार को आज के मेहमान में निर्माता निर्देशक रचयिता शकील नूरानी से बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने। काफ़ी विस्तार से बातें हुई कि कैसे सहायक निर्देशक की हैसियत से करिअर की शुरूवात हुई और वो भी स्कूल की पढाई समाप्त होते ही, अंतर्राष्ट्रीय स्तर के काम की भी चर्चा हुई। सबसे अच्छे लगे गाने ख़ासकर दस्तक फ़िल्म का गीत -

बैंय्या ना धरो ओ बलमा
न करो मोसे रार

हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं के फोनकाल और उनके पसंदीदा गाने सुने। सब कुछ सामन्य लगा कोई विशेष बात नज़र नहीं आई।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानें सामन्य ही रहे।

स्वर्ण जयन्ति के बाद जयमाला पहले की तरह सामान्य हो गई। रोज़ फ़ौजी भाइयों के फ़रमाइशी गीत और शनिवार को विशेष जयमाला। इस सप्ताह यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गीतकार पंछी जालौन ने। एक गीतकार के अंदाज़ में बातें बताई और गीत सुनवाए। रविवार का जयमाला संदेश और सोमवार से शुक्रवार तक अंत में सलाम इंडिया से सुनवाया जाने वाला देशभक्ति गीत का कार्यक्रम स्वर्ण जयन्ति के साथ विदा हो गया।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सबसे पहले सुना अंजन की सीटी फिर इस राजस्थानी गीत के बाद हिमाचल प्रदेश का गीत सुनवाया गया। पत्रावली में शनिवार को पढे गए पत्रों में संगीत सरिता का समय बढाने की फ़रमाइश थी और स्वर्ण जयन्ति के विभिन्न कार्यक्रमों की तारीफ़ थी और सोमवार की पत्रावली सुन कर लगा विविध भारती के वीबीएस होते ही पत्रावली भी हाईटैक हो गई। चिट्ठियों की सौंधी ख़ुशबू उड़ कर नेट तक पहुँच गई। विविध भारती वेबसाइट पर भेजी गई टिप्पणियों को भी पढा गया। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ सुनी। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में गायिका अभिनेत्री विजेता पंडित से रेणु (बंसल) जी ने बातचीत की। अच्छा लगा विजेता पंडित से मुख से अपने काम और जीवन के बारे में सुनना। एक लंबे अंतराल के बाद उनकी चर्चा अच्छी लगी। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने।

8 बजे हवामहल में इस सप्ताह भी तू तू मैं मैं, यह भी ख़ूब रही जैसी पुरानी झलकियाँ ही सुनवाई गई लगता है स्वर्ण जयन्ति के अवसर पर भी नई झलकियाँ नहीं तैयार की गई।

रात 9 बजे गुलदस्ता में जगजीत सिंह, भूपेन्द्र सिंह, मिताली को सुनते रहे, राजेश रेड्डी जी के कलाम भी सुने पर जब सुना बेगम अख़्तर को तो लगा गुलदस्ता महक गया।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में सोमवार को अशोक कुमार के जन्मदिन और किशोर कुमार की पुण्य तिथि को ध्यान में रख कर फ़िल्म चुनी गई - चलती का नाम गाड़ी। हेमा मालिनी के जन्म दिन को ध्यान में रख कर गुरूवार की फ़िल्म रही ड्रीम गर्ल, इसके अलावा कोहिनूर जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत बजे।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अहमद वसी से बातचीत में संगीतकार नौशाद ने अपने गीतों के बनने की बातें बताई।

10 बजे छाया गीत में कोई भी अपना अंदाज़ बदलने के लिए तैयार नहीं लगे।

1 comment:

Anonymous said...

श्री अन्नपूर्णाजी,
इतनी सतर्कता रख़ कर कार्यक्रम सुनने के लिये और किसी प्रासंगीक प्रसारण के पुन:प्रसारण के समय जो सम्पादन होना काहिए वह नहीं होने पर पैदा होती विचीत्र परिस्थिती पर इस मंच से श्रोताओं तथा विविध भारती सेवा से सँकलित लोगो का ध्यान आकषित करने के लिये बधाई । इस दूसरा रास्ता भी है कि, सजीव प्रसारण में फ़र्ज़ पर रहे उद्दधोषक से उस प्रसंग विषेषके समय और? दिन का का और उस प्रसंग विषेष पर प्रसारित उन खाश मुलाकात के पुन: प्रसारण का जिक्र करके भी बिना सम्पादन काम चलाया सकता है ।
पियुष महेता ।
सुरत ।

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