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Friday, October 3, 2008

साप्ताहिकी 2-10-08

आप सबको ईद मुबारक !
और विविध भारती की स्वर्ण जयन्ति मुबारक !

स्वर्ण जयन्ति वर्ष का अंतिम सप्ताह होने से यह पूरा सप्ताह ख़ास रहा।

सुबह के प्रसारण में समाचारों के बाद चिंतन में स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी जैसे व्यक्तितत्वों के विचार और चाणक्य नीति की बातें बताई गई। वन्दनवार में मंगलवार को नवरात्र के आरंभ पर माँ दुर्गा के भजन से शुरूवात की गई। हर बार साल में दो बार 30 जनवरी और 2 अक्टूबर को सुबह के प्रसारण का आरम्भ वन्देमातरम के बाद मंगल ध्वनि के स्थान पर सम्मिलित स्वरों में भक्ति पद - वैष्णव जन सुनवा कर किया जाता है, यह आयोजन क्षेत्रीय सेवा से होता है। गुरूवार का आरम्भ भी ऐसे ही हुआ। फिर समाचारों के बाद वन्दनवार का आरम्भ लता मंगेशकर की आवाज में इसी भक्ति पद से हुआ। सप्ताह भर लोकप्रिय भजन सुनवाए गए और अंत में लोकप्रिय देशगान।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में शुक्रवार को देवआनन्द के जन्मदिन के अवसर पर उन्हीं पर फ़िल्माए गए गीत सुन कर अच्छा लगा। इसके अलावा बहुत दिन बाद सुना सचिन देव (एस डी) बर्मन का गीत -

सुन मेरे बँधु रे सुन मेरे मितवा

और कृष्णा कल्ले (काले) की आवाज़ भी बहुत दिन बाद सुनी। गुरूवार को भूले-बिसरे गीत में रमजान का माहौल अच्छा लगा। तलत महमूद के पठान फ़िल्म के गीत के साथ कुछ गीत ऐसे थे जिन्हें पहले शायद ही सुना हो। समाप्ति के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीतों से होती रही।

7:30 बजे संगीत सरिता में इस सप्ताह भी हिन्दुस्तानी और दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक जैसे रागों की चर्चा चली और दोनों विधाओं के कलाकारों से गायन और वादन सुनवाए गए। प्रस्तुत कर रही है शकुन्तला नरसिंहन। यह श्रृंखला भी छाया (गांगुली) जी ने तैयार की है और 1993 में पहली बार प्रसारित की गई थी पर विविध भारती की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर नई श्रृंखलाएँ तैयार की जाती तो ज्यादा अच्छा होता।

त्रिवेणी में जीवन की बातों के साथ लोकप्रिय गीत सुने लेकिन मंगलवार को पहेलियों के बारे में और बुधवार को बचपन पर आलेख और गीत अच्छे लगे और इस तरह की प्रस्तुति नई सी लगी। गुरूवार को रेणु (बंसल) जी ने त्रिवेणी बापू को समर्पित की।

दोपहर 12 बजे से शुरू हुआ विशेष प्रसारण - जुबली झंकार फ़्लैश बैक। शुक्रवार को इस कार्यक्रम की शुरूवात कमल (शर्मा) जी और निम्मी (मिश्रा) जी ने की। पूर्व उदघोषकों से मुलाक़ात की - मोना ठाकुर, भारती व्यास जिन्होने पुराने दिन याद किए। पूरे कार्यक्रम को विभिन्न उदघोषको ने प्रस्तुत किया और विभिन्न चरणों में उन हस्तियों से बात की जिन्होनें विविध भारती को संवारा जिसमें लोकेन्द्र शर्मा जी, यतीन्द्र जी, मधुप शर्मा जी, बृजभूषण साहनी जी, रामसिंह पवार जी, विजय चौधरी जी ने अपनी यादों के मोती बिखेरे और अपनी पसन्द के गीत सुनवाए।

सबसे अच्छे लगे मीनाकुमारी और लता मंगेशकर की जयमाला की रिकार्डिंग के संस्मरण।

बीच-बीच में विभिन्न फ़िल्मी हस्तियों की शुभकामनाएँ भी सुनवाई गई - कामिनी कौशल, श्यामा, जैकी श्रौफ़, ॠषि कपूर, सतीश कौशिक। नरेन्द्र शर्मा का गीत अन्नू कपूर के अनुरोध पर सुनवाया गया -

कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से

3 बजे अमीन सयानी से सुना स्टार जयमाला। 1962 से शुरू हुई जयमाला की वीनू मजूमदार द्वारा तैयार संकेत धुन सुनवाई गई। बताया गया कि वर्तमान धुन बाद में तैयार की गई है। कई नई बातें सामने आई जैसे पहले केवल महिला उदघोषक ही जयमाला प्रस्तुत किया करते थे, विशेष जयमाला 1965 से शुरू हुई और पहली विशेष जयमाला नर्गिस ने दिल्ली के स्टुडियो से प्रस्तुत की थी। नर्गिस की बाद में प्रस्तुत की गई जयमाला और हेमन्त कुमार, केदार शर्मा, सुरैया की जयमाला के अंश सुनवाए गए।

शनिवार को आईआईटी के छात्र छाए रहे जिनसे बातचीत की युनूस जी ने। एक छात्र ने खुद की लिखी हिन्दी कविता गोधूलि शीर्षक से सुनाई जिसमें साहित्यिक हिन्दी झलक रही थी। आमतौर पर लगता है कि आईआईटी जैसे क्षेत्र के छात्र हिन्दी बोल ले यही बहुत है पर कविता भी करते है ऐसा परिचय दिलवाने के लिए विविध भारती को धन्यवाद। निदेशक से भी बातचीत हुई। सारी बातचीत का आधार थे कुछ सवाल जिससे कई भ्रम टूटे जैसे इस क्षेत्र के छात्र अपने करिअर के लिए देश आसानी से छोड़ सकते है। फिर बोले सितारे में प्रस्तुति रही मधुश्री की। उसके बाद अमीन सयानी ने प्रायोजित कार्यक्रमों की महफ़िल सजायी। सभी कार्यक्रमों की जानकारी दी और अंश भी सुनवाए जैसे एस कुमार्स का फ़िल्मी मुकदमा से टुनटुन के कार्यक्रम के अंश मज़ेदार रहे और बाद में परिवर्तित इस कार्यक्रम एस कुमार्स की फ़िल्मी मुलाकात में नरेन्द्र शर्मा जी से मुलाकात के अंश।

रविवार को सुनवाया गया कार्यक्रम प्यार हुआ इकरार हुआ और उसके बाद प्यार के गीत गूँजे कवि सम्मेलन में जिसमें प्रतिष्ठित कवियों नें भाग लिया। फिर सुना कुछ कार्यक्रमों का बदला स्वरूप जैसे आज राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुनावाए जाते है पर पहले गीतों के एक स्वरूप पर जानी-मानी हस्तियाँ यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया करती थी। सुनवाया गया संगीतकार लक्ष्मीकान्त द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम जिसमें फ़िल्मों में लोकगीतों की चर्चा करते हुए सुनवाए गए ये फ़िल्मी लोकगीत -

हाय हाय ये मजबूरी ये मौसम और ये दूरी (फ़िल्म - रोटी कपड़ा और मकान)
नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा (फ़िल्म - रोटी)

सोमवार को सुनवाया गया - शीरी शीरी सुर लहरी जिस पर हम विस्तार से पहले ही चिट्ठा लिख चुके है। उसके बाद प्रसारित हुआ आह फ़िल्में वाह फ़िल्में जिसमें चर्चा चली कि क्या फ़िल्में सिर्फ़ मनोरंजन का साधन है ? चर्चा रही कि करोड़ों की लागत से बनने वाली फ़िल्में सिर्फ़ मनोरंजन नहीं संदेश भी देती है।

मंगलवार को सुनवाया गया कैसे कैसे हवा महल जिसमें लोकप्रिय झलकियों के अंश सुनवाए गए जैसे - लोकप्रिय चरित्र ख़लीफ़ा शिद्दू और मुमताज़ पहलवान की झलकी सातवें आसमान की सैर, बीसवीं सदी का बच्चा, मोहब्बत का इंपोर्टेड तरीक़ा, के पी सक्सेना की झलकी नया अलिबाबा और चालीस चोंचलें, हवामहल पर हमला जो महिला वर्ग की थी यानि समाज के विभिन्न वर्ग के लिए तैयार झलकियों के अंश संजो कर विविधता बनाए रखी साथ ही इससे जुड़े विभिन्न सृजनकर्ताओं की रचनाओं को लिया गया जैसे गंगा प्रसाद माथुर, राजकुमार दाग़, दीनानाथ, सत्येन्द्र शरद, लोकेन्द्र शर्मा। चटपटी रही करौंदे की चटनी और मज़ेदार रही उदयपुर की ट्रेन।

इसके बाद बच्चों का कार्यक्रम हुआ जिनमें से एक सई परांजपे की नाटिका और एक नाटक इलाहाबाद केन्द्र का साठ के दशक का था। इसके अलावा बच्चों के गीत भी सुनवाए गए। हमने तो बच्चों का कार्यक्रम विविध भारती पर पहली बार इस जुबली झंकार कार्यक्रम में ही सुना। जिसके बाद सिनेयात्रा की गवाह विविध भारती सुनवाया गया। इस यात्रा में कलाकारों के पहले काम को याद किया गया जिसमें प्राण ने अपनी पहली फ़िल्म ख़ानदान को याद किया तो नरगिस ने तक़दीर को। इसमें सबसे भावुक रहा फ़िल्म तूफ़ान और दिया का संस्मरण, समाज में एक छोटे से बालक को इस फ़िल्म से प्रेरणा लेकर काम करते देखना।

बुधवार को बुज़ुर्गों को समर्पित कार्यक्रम यह शाम मस्तानी प्रसारित हुआ जिसमें आमंत्रित थे अभिनेता रमेश देव और लेखिका श्रीमती राजम पिल्लै और बातचीत कर रहे थे कमल (शर्मा) जी और निम्मी (मिश्रा) जी। श्रोताओं के फोन आते रहे अपने अनुभव सुनाते रहे और चर्चा अच्छी चली। राजम जी अधिक सैद्धान्तिक लगी, उन्होनें सिद्धान्तों की बात अधिक की जिसमें किताबी ज्ञान छलकता रहा जबकि रमेश देव जी अधिक व्यावहारिक लगे। जब राजम जी ने महिलाओं को जीवन की शाम में भी एक जीवन साथी ढूँढने की बात कही तब रमेश देव जी ने कहा कि व्यावहारिक रूप से यह ठीक नहीं। इसी विषय पर बहुत पहले रिकार्ड की गई फ़िल्मकार ख़्वाजा अहमद अब्बास की रिकार्डिंग के अंश सुनवाए गए। गाने भी फोन पर बात करने वाले श्रोताओं की पसन्द से सुनवाए गए और जोधपुर आकाशवाणी द्वारा तैयार रूपक भी सुनवाया गया। इसके बाद लोकलड़ियाँ फ़िल्मी रूनझुन कार्यक्रम में उत्तरप्रदेश के लोकगीत सुनवाए और फ़िल्मी गीत सुनवाए गए। इन गीतों का चुनाव ऐसे किया गया कि फ़िल्मी गीतों में लोक गीत साफ़ झलक आया जैसे सुचरिता गुप्ता की गाई कजरी -

बरसे बदरिया सावन की

और इसी धुन का यह फ़िल्मी गीत -

दिल का खिलोना हाय टूट गया

फ़िल्म मदर इंडिया का गीत - पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली तो एक्दम लोकगीत - मोरे अँगने की सोन चिड़य्या चली पर ही है। नए तरह का कार्यक्रम होने से बहुत अच्छा लगा।

इसके बाद लता मंगेशकर से ममता (सिंह) जी की फोन पर की गई बातचीत सुनवाई गई और सुनवाए गए उनके पसंदीदा गीत जिसका समापन अच्छा था जिसमें लता जी के विभिन्न भाषाओं में गाए गीत सुनवाए गए। शायद दक्षिण की भाषाओं में उन्होनें गीत नहीं गाए या बहुत ही कम गाए। इसके बाद पधारे आज के दौर के गायक कैलाश खेर जिन्होनें खुद के बारे में भी बताया और श्रोताओं से फोन पर बात भी की। बहुत ही स्वाभाविक बातचीत की कैलाश जी ने। बीच-बीच में शुद्ध हिन्दी के शब्द बोलना अच्छा लगा।

गुरूवार को जुबली झंकार सेना को समर्पित रहा। सेना के तीनों अंगों से भेंट हुई। बातचीत हुई, उनके गीत उनकी देश भक्ति की धुनों की गूँज हमें और अधिक सुरक्षा का आश्वास्न दे गई।

शनिवार को अभिनेता मुकेश खन्ना ने प्रस्तुत किया विशेष जयमाला। सभी लोकप्रिय गीत सुनने को मिले जिनमें से पुराने गीत भी थे पर बातचीत में महाभारत छाई रही। रविवार को शेफ़ाली कपूर ने फ़ौजी भाइयों और उनके परिजनों के संदेशों के साथ गाने सुनवाए और साथ ही श्रद्धांजलि दी गायक महेन्द्र कपूर को जो देशभक्ति गीतों के लिए विख्यात रहे। गुरूवार को शुरूवात हुई परिवार फ़िल्म के गीत से -

आज है दो अक्तूबर का दिन आज का दिन बड़ा महान
आज के दिन दो फूल खिले जिनसे महका हिन्दुस्तान
जय जवान जय किसान

शेष दिन नए और कभी-कभार बीच के समय के गाने बजते रहे।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सुनवाए गए पूर्वी लोकगीत। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में पढे गए पत्रों में कुछ नए तरह के पत्र थे जैसे यह पूछा गया कि विविध भारती के कुल कितने केन्द्र है। महेन्द्र मोदी जी ने एक अच्छी ख़बर सुनाई कि सुहाना सफ़र कार्यक्रम 3 अक्तूबर के बाद भी जारी रहेगा। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में क़व्वालियाँ सुनी जिसमें रमज़ान का ध्यान रखा गया। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में गायक महेन्द्र कपूर से की गई बातचीत की रिकार्डिंग सुनवाई गई। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने।

8 बजे हवामहल में गुरूवार को सुना सरस्वती कुमार दीपक का लिखा रूपक पूजा के फूल जो विशेष था 2 अक्तूबर के लिए जिसके निर्देशक थे पुरूषोत्तम दारवेकर। कई-कई बार सुना यह रूपक पर हर बार की तरह कल भी यह नया लगा। शेष दिन सामान्य झलकियाँ सुनवाई गई जैसे काग़ज़ की नाव जिसके निर्देशक है जयदेव शर्मा कमल।

रात 9 बजे गुलदस्ता में हेमन्त कुमार का गीत सुनना अच्छा लगा। अच्छी बंदिश की ग़ज़लें सुनवाई गई वरना कुछ आधुनिक बंदिशों में ग़ज़ल सुनने पर पता ही नहीं चलता कि ग़ज़ल कब शुरू हुई और कब ख़त्म।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में शुक्रवार को देवआनन्द के जन्मदिन को ध्यान में रखकर नवकेतन के बैनर तले बनी फ़िल्म देस परदेस के गीत सुनवाए पर कल सुनवाए गए 2 अक्तूबर फ़िल्म के गीत मौके के अनुसार कुछ जमे नहीं। इसके अलावा मैं सुन्दर हूँ, संघर्ष जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत बजे।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अहमद वसी से बातचीत में संगीतकार नौशाद ने पुराने दिनों को याद किया और बताया कि पहले फ़िल्मों में संगीतकार का अलग से नाम नहीं दिया जाता था। वैसे नाम गीतकार और गायक का भी नहीं दिया था। ग़ुलाम हैदर पहले संगीतकात थे जिनका नाम दिया गया था। साथ ही यह भी बताया कि पैसे भी बहुत कम मिला करते थे, सांजिदों को 10-20 से 50 रूपए तक मिलते थे। न्यू थियेटर की बात करते हुए आर सी बोराल और पंकज मलिक को गुरू माना और देवदास की चर्चा करते हुए जानकारी दी कि इसमें के एल सहगल के गाए सभी गीत विभिन्न रागों पर पूरी तरह आधारित थे।

10 बजे छाया गीत में स्वर्ण जयन्ति का रंग नज़र नहीं आया। सबका वही पुराना अंदाज़ रहा।

4 comments:

neeshoo said...

विविध भारती की बात ही निराली है । और सभी प्रस्तुतकर्ताओं की अपनी अलग छाप है जो बहुत अच्छा । लगता है। हिन्दी साहित्य और भाषा पर आज भी विविध भारती सबसे विविध है ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अन्नापूर्णा जी आप स विस्तार सारे कार्यक्रमोँ की झलकियाँ परोसतीँ रहीँ हैँ आपका ये श्रम काबिले तारिफ है -हमेँ दूर बैठे भी सारी बातोँ की जानकारी हासिल हो जाती है -विविध भारती की स्वर्ण जयँती के उपलक्ष्य मेँ आप को तत्य्हा रेडियोनामा के सारे पाठक समुदाय को हार्दिक शुभकामनाएँ ! लिखने का प्रयास जारी रखियेगा ~~
स स्नेह,
- लावण्या

annapurna said...

धन्यवाद लावण्या जी, नीशू जी !

राजीव said...

क्या के. पि . सक्सेना की व् अन्य झलकियाँ एक बार फिर सुनी जा सकती हैं ?

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