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Sunday, January 11, 2009

आकाशवाणी अमदावाद का माहवार कार्यक्रम 'ग्रामोफोन'

पिछली एक पोस्ट में मैंनें एक प्रादेशिक केन्द्र के अनोखे कार्यक्रमके बारेमें लिख़ने का इशारा दिया था, तो आज वह बात लिख़ रहा हूँ । साथमें इ स. 2009 के साल यह पहली पोस्ट लिख़ते हुए सभी को नव वर्ष की शुभ: कामनाएं देता हूँ ।
हालाकि सुरतमें आकाशवाणी अमदावाद रेडियो पर रिसीव करना बहोत ही मुश्कील है, क्यों कि वह मिडियम वेव (मध्यम तरंग) पर आता है, जो बेंड स्थानिय वीज उपकरणों, यातायात और हवामान की असर से पूरा प्रभावीत रहता है । इस लिये इस कार्यक्रम के प्रसारण के बारेमें जानकारी होते हुए भी नहीं सुन सकता था । पर इस बार यानिकी दिनांक 24 डिसम्बर, 2008 की रात्री 9.30 पर् मेरे घरमें सब टी वी धारावाहिक छोड़ कर इस कार्यक्रमको डी टी एच पर सुनने के लिये राजी हो गये और मैंनें अपने लेपटॉपको सेटटोप बोक्ष के साथ जोड़ दिया । फिर भी वोल्यूम लेवेल सेटींग की कमी आने पर सुनने में थोड़ी सी अन्य डिस्ट्रबंस की आवाझ आयेगी पर शब्द और गाना पूरा समझमें आयेगे ।
तो इस कार्यक्रम आकाशवाणी अमदावाद पर किस समय और किस व्यक्ती की कल्पना से किर किन केन्द्र निर्देषक के समय शुरू हुआ था इसका व्योवरा तो मेरे पास नहीं है, पर इतना तो जरूर कहूँगा कि हाल के लोकाभीमूख़ केन्द्र निर्देषक जिनका जिक्र मैं विविध भारती के 50 साल पूरे होने पर जो श्री कमल शर्माजी (संवादाता)ने मेरा पहला लेख प्रकाशित किया था, उसकी आपूर्ति रूप दूसरे लेखमें कर चूका हूँ, वैसे श्री भगिरथ पंड्या साहबने जारी रख़ा है । और उसके निर्माता है श्री रमेश प्रजापती और प्रस्तूत कर्ता उद्दघोषक है श्री प्रविण दवे । स्वाभाविक है कि बातचीत का माध्यम गुजराती भाषा है । इस कार्यक्रममें कई रॆर गानो के संग्राहको को उनके संग्रह में से कुछ: अनमोल मोती के साथ बूलाया जाता है । और कई नामी लोगोने इसको अपनी आवाझे और इन अनमोल मोतीयॉं से सजाया है, जिसमें श्री नलिन शह (मुम्बई), मधूसूदन भट्ट (राजकोट), श्री अरविन्द पटेल (भूत पूर्व सांसद ), श्री उर्विष कोठारी (गुजराती संवादाता और लेख़क ) से इस कार्यक्रम शोभित हुआ है । इस कार्यक्रम हर माह के चोथे बुधवार को रात्री 9.30 से 10.30 तक (अगर कोई राष्ट्रीय प्रसारण को सह प्रसारित नहीं होना होता है तब) प्रसारित होता है । इस बार श्री प्रविण दवेने श्री उर्विष कोठारी के बड़े भाई श्री बिरेन कोठारी, जो खूद् भी एक लेख़क है,उनसे बातें की थी और इस कार्यक्रम का एक अंश (बातचीत और गाना-जो भजन गायिका के रूपमें जानी पहचानी ज्यूथीका रॉय की गायी हुई कव्वाली हओ- दोनो) नमूने के तोर पर इधर प्रस्तूत है । (अगर मेरे पिछली एक पोस्टमें लिख़ने के अनुसार प्रादेशिक राज्य के मूख़्य केन्द्र को राज्यव्यापी एफ एम नेटवर्क मिलता तो कितना साफ़ सुनाई पड़ता !)


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पियुष महेता ।
नानपूरा-सुरत-395001.

3 comments:

अजित वडनेरकर said...

सुंदर प्रस्तुति...जुथिका राय की कव्वाली सुनना अद्भुत अनुभव रहा।
रिकार्डिंग में आती खरखराहट ने एकदम पुराने ज़माने में पहुंचा दिया । शुक्रिया...

सागर नाहर said...

बहुत मजेदार.. ज्युथिका रॉय की आवाज में कव्वाली सही सुन नहीं पाये पर फिर भी बहुत अच्छा लगा, उसके बाद गोपाल शर्माजी की आवाज, बहुत खूब।
आपकी मेहनत और रेडियोप्रियता को सलाम!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

मकर सँक्राति पर आपको सपरिवार शुभकामनाएँ पियूष भाई
ये पोस्ट ने तो पुराने दिनोँ मेँ पहुँचा दिया -बहुत अभूतपूर्व रहा ज्यूथिका रोय जी को कव्वाली गाते सुनना -
रोचक

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