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Friday, October 16, 2009

रात के सुकून भरे कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 15-10-09

हवामहल के बाद 8:15 से क्षेत्रीय कार्यक्रम शुरू हो जाते है फिर हम रात 9 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुडते है।

9 बजे गुलदस्ता कार्यक्रम की शुरूवात होती है परिचय धुन से जो अंत में भी बजती है। छोटी सी पर अच्छी है धुन। यह गैर फिल्मी रचनाओं का कार्यक्रम है। इसमें विभिन्न मूड की रचनाएँ सुनवाई गई।

शुक्रवार को शुरूवात हुई मोबिन के कलाम से -

मैनें तुमको दिल दिया तुमने मुझको रुसवा किया
मैनें तुमसे क्या किया और तुमने मुझसे क्या किया

इसे आवाजे दी - अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन ने

इसके बाद जगजीत सिंह की आवाज में सुना - रिश्तों में दरार आई

फिर माहौल बदला और सोनाली राठौर की आवाज में सुनवाई गई इशारा एलबम से यह रचना -

सुन्दर कोमल सपनों की बरात गुजर गई जाना

समापन हुआ हरिहरन की आवाज में राशिद के कलाम से -

कोई मौसम हो तेरे रंग में ढल जाउंगा
मैं कोई वक़्त नहीं के बदल जाउंगा

शनिवार को आशा भोंसले की आवाज़ में सुनवाया गया निदा फ़ाज़ली का कलाम -

दिल का लगाना खेल न जानो
दिल का लगाना मुश्किल है

फिर बशीर बद्र का कलाम सुना हरिहरन की आवाज़ में -

यूँ ही बेसबब न फिरा करो

इसके अलावा जगजीत सिंह की आवाज़ में अनवर मिर्ज़ापुरी और ग़ुलाम अली की आवाज़ में ज़ाफ़र का कलाम सुनवाया गया। रविवार को कतिल शिफ़ाई का कलाम ग़ुलाम अली की आवाज़ में सुना, इस दिन एक प्रस्तुति अच्छी थी -

आसमानी रंग है आँखों का

पहले कलाम पढा गया फिर ग़ज़ल की शक्ल में सुनवाया गया। सोमवार को पूरा कार्यक्रम शायर निदा फ़ाज़ली के नाम रहा। उन्हीं के चार कलाम चन्दन दास, जगजीत सिंह - लताजी, पंकज उदहास और आशा भोंसले की आवाज़ों में सुनवाए गए। मंगलवार को विभिन्न एलबमों से रचनाएँ सुनवाई गई। चयन अच्छा रहा - बहादुर शाह ज़फ़र का कलाम अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की आवाज़ों में, ज़फ़र गोरखपुरी का कलाम पंकज उदहास की आवाज़ मे और वीनू पुरूषोत्तम की आवाज़ में सुना -

एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहां राह भूल जाता हूँ

बुधवार को अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की युगल आवाज़ों में कबीर राजस्थानी के बोलों को शास्त्रीय पद्धति में सुनना अच्छा लगा -

बोल रहा था कल वो मुझसे

इसके अलावा घनश्याम वासवानी की आवाज़ में निदा फ़ाज़ली की रचना, पंकज उदहास की आवाज़ में सरदार अंजुम का कलाम सुना और दाग़ देहलवी का कलाम भी शामिल-ए-बज्म रहा।

गुरूवार को बहुत लोकप्रिय आवाज़े गूँजी। शुरूवात हुई बेगम अख़्तर से, सुदर्शन फ़ाकिर का कलाम -

ज़िन्दगी कुछ भी नहीं फिर भी जिए जाते है
तुझपे ऐ वक़्त हम एहसान किए जाते है

फिर जुगल आवाज़े रही अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की जिसके बाद मेहदी हसन, पिनाज़ मसाणी और समापन हुआ सुमन कल्याणपुर से। पूरा गुलदस्ता महक उठा।

इस तरह सप्ताह भर गजलों का बोलबाला रहा। एक बात समझ में नहीं आई, इस कार्यक्रम के बारे में कहा जाता है कि यह ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का गुलदस्ता है फिर ग़ज़लें ही ज्यादा क्यों सुनवाई जाती है। गीत शामिल क्यों नहीं किए जाते। योगेश के कई अच्छे गीत है मन्नाडे की आवाज़ में। हेमन्त कुमार, भूपेन हज़ारिका के गाए गीत है। कई ऐसे गीत भी है शान्ता सक्सेना, उषा टंडन, शान्ति माथुर की आवाज़ों में जो अक्सर आकाशवाणी के सुगम संगीत के कार्यक्रम में सुनवाए जाते थे। अनूप जलोटा, अनुराधा पौडवाल के कई गीत है फिर कई नए कलाकार भी तो है। गीत और ग़ज़ल मिलकर सुनेगें तो ज्यादा मज़ा आएगा या फिर इस कार्यक्रम को ग़ज़लों का ही कर दीजिए।

हर दिन इस वाक्य से समापन अच्छा लगा - सुनने वालों के लिए ये था विविध भारती का नजराना - गुलदस्ता

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में शुक्रवार को सुनवाए गए 1965 में रिलीज खानदान फिल्म के गीत. शुरूवात इस गीत से की -

बड़ी देर भई नंदलाला तेरी राह तके बृज बाला

फिल्म से जुड़े सभी के नाम बताए गए और साथ ही सामान्य जानकारी भी दी कि इस फिल्म के लिए अभिनय और गीत के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले पर यह नहीं बताया कि यह मुमताज़ की पहली फ़िल्म है। शनिवार को 1956 में रिलीज़ गुरूदत्त की फ़िल्म सी आई डी के गीत सुनवाए गए। सभी गीत सुनवाए गए जो बहुत लोकप्रिय है जैसे -

बूझ मेरा क्या नाव रे नदी किनारे गाँव रे

आँखों ही आँखों में इशारा हो गया

इस फ़िल्म से जुड़ी सामान्य जानकारी भी दी और फ़िल्म से जुड़े सभी नाम बताए पर यह नहीं बताया कि यह वहीदा रहमान की पहली फ़िल्म है। सोमवार को 1965 में रिलीज़ नीला आकाश फ़िल्म के गीत सुनवाए। साथ ही फ़िल्म से जुड़े सभी नाम बताए। इसके कुछ गीत बहुत अच्छे है -

आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है

तेरे पास आके मेरा वक़्त गुज़र जाता है

मंगलवार को 1958 में रिलीज़ फ़िल्म चलती का नाम गाड़ी फ़िल्म के गीत सुनवाए गए जिसका चयन शायद अशोक कुमार जी के जन्मदिन को ध्यान में रखकर किया गया पर ऐसा कुछ बताया नहीं गया। फ़िल्म से संबंधित कुछ ख़ास बातें भी नहीं बताई, बस इससे जुड़े प्रमुख नाम बताए और सभी गीत सुनवाए जैसे -

हाल कैसा है जनाब का

दे दो मेरा पाँच रूपया बारह आना
मारेगा भय्या न न न न

बुधवार को नई फ़िल्म टशन के गीत सुनवाए गए और फ़िल्म से जुड़े सभी प्रमुख नाम बताए गए।

गुरूवार को सत्तर के दशक की फ़िल्म दाग़ के गीत सुनवाए गए। गीत सुनवाते गए और फ़िल्म से जुड़े नाम बताते गए पर कुछ सामान्य बातें बताई जा सकती थी जो नहीं बताई गई जैसे इस फ़िल्म में पहली बार राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी ने एक साथ काम किया। यह हिट फ़िल्म गुलशन नन्दा के उपन्यास पर बनाई गई जिनके उपन्यासों पर बहुत हिट फ़िल्में बनी है।

इस तरह इस सप्ताह पुरानी फ़िल्मों का बोलबाला रहा।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में ख़्यात गायिका शारदा से युनूस (खान) जी की बातचीत प्रसारित हुई। कार्यक्रम की परम्परा के अनुसार शुरू में शारदा के गीतों का संसार सजाया गया, उनके गीतों के मुखड़े सुनवाए गए। यह सुर संसार भी कुछ कम नहीं है, बढिया गीत गाए है शारदा ने। फिर बातचीत का सिलसिला पिछली कड़ी से आगे बढा। शारदा ने बताया कि आजकल वह बच्चों के लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी में एलबम निकालने में व्यस्त है। गा कर भी सुनाया साधारण सी अंग्रेज़ी में बच्चों का गीत। एक और गीत गाकर सुनाया - जाने भी दे सनम। दो बातें अच्छी और सच्ची बताई - बच्चों के लिए हमारे देश में गीत कम है और दूसरी बात कि जब ईश्वर ने उन्हें कुछ दिया है तो वो भी समाज को कुछ दे। अपने बचपन को याद करते हुए बताया कि तब भी बच्चों के लिए कुछ ख़ास नहीं था और कर्नाटक संगीत की कुछ पंक्तियाँ गाकर सुनाई जो कृष्ण जी के बचपन से संबंधित थी। अपने काम के समय की बात करते हुए प्रख़्यात गायिका नूरजहाँ को शिद्दत से याद किया, उनके गीत भी गुनगुनाए जैसे - मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग। साथ ही याद किया बेगम अख़्तर और इक़बाल बानो को। अच्छी चल रही है बातचीत, इसकी रिकार्डिंग की तस्वीरें विविध भारती की वेबसाइट पर देखी जा सकती है। इस कार्यक्रम का संयोजन निखिल (धामापुरकर) जी के तकनीकी सहयोग से कल्पना (शेट्टी) जी ने किया।

10 बजे छाया गीत में शुक्रवार को कमल (शर्मा) जी की प्रस्तुति बढिया रही. प्यार की शुरूवात से लेकर धीरे-धीरे परवान चढ़ने की बात कही. आलेख भी अच्छा था जैसे - धीरे-धीरे मन की पंखुडियां खिलने लगती है. पचास साठ के दशक के अच्छे गाने चुने गए -

कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी

तेरे मेरे सपने अब एक रंग है

शनिवार को अशोक (सोनावले) जी ने मोहब्बत की बातें की, कुछ यादों की भी बातें हुई जिसमें उर्दू के शब्द बहुत थे। रविवार को युनूस (खान) जी ने प्यार की ऊँचाई की चर्चा की। दोनों ही दिन एक ख़ास बात हुई, कुछ ऐसे गीत भी सुनवाए जो आजकल बहुत ही कम सुनने को मिलते है। अशोक जी ने सुनवाया एक समय का बहुत लोकप्रिय गीत -

हर चेहरा यहाँ चाँद तो हर जर्रा सितारा
ये वादी-ए-कश्मीर है जन्नत का नज़ारा

युनूस जी ने ऐसे गीत शामिल किए जो शायद ही कभी सुने जाते हो -

प्यार की मंज़िल हारी

सोमवार को छायागीत प्रस्तुत किया अमरकान्त जी ने जो छायागीत तो नहीं पर ग़ैर फ़रमाइशी फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम लग रहा था। दो-दो गानों के बाद एकाध वाक्य में कुछ कह दिया। हालांकि बढिया रोमांटिक गीत सुनवाए -

इशारों इशारों में दिल लेने वाले बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से

दीवाना मुझसा नहीं इस अंबर के नीचे

सच्चा झूठा, आराधना, शर्मिली के गाने भी शामिल रहे और जैसा कि अक्सर होता है अमरकान्त जी का कार्यक्रम देव आनन्द की किसी फ़िल्म के गीत के बिना पूरा नहीं होता, इस बार ज्वैल थीफ़ का गीत सुनवाया। क्या ही अच्छा होता अगर हर गीत के आगे-पीछे ज्यादा नहीं सिर्फ़ एक दो वाक्य बोल देते।

मंगलवार को निम्मी (मिश्रा) जी की प्रस्तुति रही। हमेशा की तरह इस बार भी समझ में नहीं आया कि भूले-बिसरे गीत सुन रहे है या छाया गीत, खैर… हमें तो यह गीत अच्छा लगा -

सुनो छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी

बुधवार को राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने अच्छे चुने हुए प्यार भरे गीत सुनवाए -

सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था
आज भी है और कल भी रहेगा

सेहरा, पत्थर के सनम के गीत भी सुनवाए गए। आलेख भी अच्छा रहा।

गुरूवार को रेणु (बंसल) जी की प्रस्तुति रही, प्यार की बातें हुई और सुनवाए गए गीतों में यह गीत भी शामिल थे -

नैन सो नैन नाही मिलाओ

हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ आराम कहाँ

निम्मी जी और रेणु जी में जो ऊर्जा अन्य कार्यक्रमों में नज़र आती है वो छाया गीत में कहीं खो सी जाती है। दोनों छाया गीत बहुत ही सुस्त लगे वैसे आलेख अच्छा रहा।

10:30 बजे से श्रोताओं की फ़रमाइश पर लोकप्रिय गीत सुनवाए गए आप की फरमाइश कार्यक्रम में। यह कार्यक्रम प्रायोजित रहा। हर गीत की फ़रमाइश में देश के कोने-कोने से ढेर से पत्र और हर पत्र में नामों की लम्बी सूची। अधिकतर साठ सत्तर के दशक के गीतों की फ़रमाइश की गई। बुधवार और गुरूवार नई तकनीक का दिन रहा यानि एस एम एस से श्रोता फ़रमाइश भेजते है। अच्छा लगा कि इन दो दिनों में भी पुराने गीतों की फ़रमाइश आई वैसे पुराने गीतों के लिए एकाध एस एम एस ही आए जबकि नए गीतों के लिए 3-4 तक रही संदेशों की संख्या।

शुक्रवार की फिल्में रही - मेरे सनम, अनुपमा, बिन बादल बरसात, पहचान, निकाह और गीत फिल्म का यह गीत -

जिसके सपने हमें रोज आते रहे दिल लुभाते रहे
ये बता दो कहीं तुम वही तो नहीं

शनिवार को सुनवाया गया जिगरी दोस्त का यह गीत -

मेरे देश में पवन चले पुरवाई

आरती, मेरे अपने, अभिमान, तीसरी कसम फ़िल्मों के गीत भी शामिल रहे। रविवार को असली नकली, दिल ने फिर याद किया और दिल एक मन्दिर फ़िल्म का यह गीत शामिल रहा -

रूक जा रात ठहर जा रे चन्दा बीते न मिलन की बेला

सोमवार को शुरूवात हुई शिकार फ़िल्म के गीत से -

पर्दे में रहने दो पर्दा न उठाओ

फिर सुनवाए गए काली टोपी लाल रूमाल, प्यार की जीत, नया दौर और राजपूत फ़िल्मों के गीत।

मंगलवार को आनन्द का गीत सुनवाया गया -

कहीं दूर जब दिन ढल जाए

और चन्द्रकान्ता जैसी पुरानी फ़िल्मों के गीत शामिल रहे।

बुधवार को सुना -

ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ
सुन जा दिल की दास्ताँ

इसके अलावा दिल एक मन्दिर का शीर्षक गीत, गुमराह, आनन्द और नई फ़िल्म कहो न प्यार है का शीर्षक गीत शामिल रहा।

गुरूवार को असली नकली और मेरे महबूब फ़िल्म का यह गीत शामिल था -

जानेमन एक नज़र देख ले

और नई फ़िल्मों में तुम बिन, जानी दुश्मन और कल हो न हो फ़िल्म का शीर्षक गीत फ़रमाइश पर सुनवाया गया।

कभी-कभार आपकी फ़रमाइश की प्रस्तुति में हल्का सा छायागीत का आभास हुआ जो फ़रमाइशी कार्यक्रम के लिए अच्छा नहीं लगा।

11 बजे अगले दिन के कार्यक्रमों की जानकारी दी गई जिसका प्रसारण सीधे केन्द्रीय सेवा से होने से सभी कार्यक्रमों की जानकारी मिली हालांकि क्षेत्रीय प्रसारण के कारण सभी कार्यक्रम यहां प्रसारित नहीं होते. जिसके बाद दिल्ली से समाचार के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

आप सबको दीपावली की शुभकामनाएँ !

1 comment:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

दीपपर्व की अशेष शुभकामनाएँ।
आपकी लेखनी से साहित्य जगत जगमगाए।
लक्ष्मी जी आपका बैलेंस, मंहगाई की तरह रोड बढ़ाएँ।

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