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Friday, November 19, 2010

जब विविध भारती कहे अपने मन की... कर्म की... साप्ताहिकी 18-11-10

विविध भारती रोज श्रोताओं से अपने मन की बात कहती हैं और सप्ताह में एक बार चर्चा करती हैं अपनी उस कार्य प्रणाली की जिससे वो बनी हैं - देश की सुरीली धड़कन। हाँ जी, हम बात कर रहे हैं उन दो कार्यक्रमों की जिसमे श्रोताओं से रूबरू हैं विविध भारती - छाया गीत और पत्रावली

छाया गीत आधे घंटे का दैनिक कार्यक्रम हैं जिसका प्रसारण रात में 10 से 10:30 बजे तक होता हैं। यह पूरी तरह से उदघोषको का अपना कार्यक्रम हैं। इसमे उदघोषक अपनी मर्जी से गीत सुनवाते हैं। कोरे गीत ही नही सुनवाते बल्कि एक भाव लेकर चलते हैं। उस भाव पर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए उस भाव पर आधारित गीत सुनवाते हैं।

बहुत पुराना कार्यक्रम हैं यह। बरसों से सुनते आ रहे हैं। कई उदघोषकों के छाया गीत सुने - बृज भूषण साहनी, राम सिंह पवार, एम एल गौड़, कब्बन मिर्जा, विजय चौधरी, अचला नागर, मोना ठाकुर, अनुराधा शर्मा और भी कई नाम हैं जिनकी आवाजे आज सुनाई नही देती।

विविध भारती में उदघोषक बदलते हैं, आवाज बदलती हैं पर कार्यक्रम वही हैं। एक ही रूप में बरसों से सुनने से आज लगता हैं छाया गीत में ठहराव आ गया। आखिर कितने भाव हैं... प्यार, तकरार, उदासी, रूठना-मनाना, यादे, मौसम, ख्याल, सपना... संख्या तो सौवों में भी नही हैं और कार्यक्रम चल रहा हैं बरसों से।

आखिर एक भाव पर कहते हुए आप कितने समानार्थी शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं, शब्द कोष भी चुक जाता हैं। यादो पर मैंने कई बाते सुनी पर भाव वही रहे - किसी न किसी रूप में याद बनी रहती हैं। यही हाल सभी भावो का हैं। कई बार घूम-फिर कर वाक्य भी वही बन जाता हैं। बड़ी कोफ़्त होती हैं कि एक अच्छा कार्यक्रम दिन पर दिन ऊबाऊ होता जा रहा हैं।
ऐसा लगता हैं यह कार्यक्रम देकर उदघोषक अपनी ड्यूटी ही पूरी कर रहे हैं। कहीं गहरा भावनात्मक लगाव नजर नही आ रहा। एक तो भाव के धरातल पर कार्यक्रम चुकता जा रहा हैं ऐसे में उदघोषक कोई नया प्रयोग भी नही कर रहे हैं। रोज वही.. एक भाव लेते हैं उस पर एक आलेख लिख कर बोल देते हैं और उचित गीत सुनवा देते हैं, हाँ.. आलेख प्रस्तुति जरूर बढ़िया होती हैं। कभी-कभी काव्यात्मक अंदाज बहुत अच्छा लगता हैं।

पहले के उदघोषक गीतों के चुनाव में नए-नए प्रयोग करते थे। जैसे युगल गीत सुनवाते थे पर आवाजे सिर्फ गायकों या गायिकाओं की होती थी। इनमे हर गीत का भाव अलग होता था पर हर गीत, भाव अभिव्यक्त करते हुए ही सुनवाया जाता था। इससे विभिन्न भावो के होते हुए भी कार्यक्रम रोचक बन जाता था।

मुझे याद आ रहे हैं कुछ प्रयोग - ऐसे गीत सुनवाए गए जिनमे ढोलक की थाप हैं, ऐसे गीत जिनकी फिल्मो के नाम अंग्रेजी में हैं जैसे नाईट इन लन्दन, विविध त्यौहारों के गीत - होली, ईद, दीपावली, क्रिसमस, ऐसे गीत जिसके दो संस्करण हैं, शीर्षक गीत वगैरह...

ये थी उदघोषको के मन की॥ अब चर्चा करते हैं उस कार्यक्रम की जहां पत्रों के माध्यम से श्रोताओं से रूबरू होती हैं विविध भारती। 15 मिनट का साप्ताहिक कार्यक्रम हैं पत्रावली। देश के अलग-अलग भागो से श्रोता पत्र भेजते हैं। अधिकाँश पत्र मुझे उथले ही लगते हैं। अक्सर श्रोता लिखते हैं कि उदघोषको की आवाजे अच्छी हैं तो मुझे हँसी आती हैं, अरे भई... आवाज अच्छी हैं तभी तो उदघोषक हैं। कुछ फरमाइशे भी होती हैं, कुछ कार्यक्रम पसंद हैं कुछ नापसंद पर गहराई में नही बताते कि क्यों पसंद हैं क्यों नापसंद।

आइए इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

रात 10 बजे का समय छाया गीत का होता है। शुक्रवार को प्रस्तुत किया कमल (शर्मा) जी ने। रूप सौन्दर्य से शुरूवात की, चौदहवी का चाँद फिल्म का शीर्षक गीत सुनवाया इसके बाद यह गीत सुनना अच्छा लगा जो कम ही सुनवाया जाता हैं -

अपनी आँखों में बसा कर इक़रार करूं
जी में आता हैं के जी भर के तुझे प्यार करूं

फिर प्यार की चर्चा हुई। तीसरी मंजिल फिल्म का गीत सुना। रात के समय की प्रकृति का चित्रण भी हुआ। अनूठे कोमल भावो की प्रस्तुति हुई। साहित्यिक भाषा थी। सब अच्छा था पर सब पुराना लगा, नयापन नही था। एक बात अखर गई सभी गीत रफी साहब के थे और सभी एकल (सोलो)।

शनिवार को प्रस्तुत किया अशोक जी ने। रात की खुशबू, उसका आना पर पास हो कर भी न होने की शिकायत, रूठना-मनाना अधिक होने से रिश्तो में दरार का भय, वफ़ा होनी चाहिए आदि उम्दा भावो पर सुनवाए गीत - कभी रात दिन हम दूर थे
आ जाओ आ भी जाओ

उर्दू के अल्फाजो से सजी चिरपरिचित शैली रही। गानों में भी विविधता रही, गायक गायिकाओं के एकल, युगल गीत। अनपढ़ फिल्म का गीत भी शामिल था और कम सुनवाया जाने वाला यह गीत - सागर नही हैं तो क्या तेरी आँख का नशा तो हैं
इन सब के बावजूद सब पुरानापन रहा, नया कुछ नही लगा।

रविवार को प्रस्तुत किया युनूस (खान) जी ने। इस दिन बाल दिवस था, बेहतर होता बचपन का माहौल रखते पर प्यार का, उदासी का माहौल रखा। पहले दूरी बनाए रखने की बाते हुई और शुरूवात की इस गीत से - सजन संग काहे नेहा लगाए
बाद में साथ की चर्चा हुई - तुम और हम भूल के गम गाए प्यार भरी सरगम

गीत पुराने ही सुनवाए गए। फरार, फैशन फिल्मो के गीत। मैजिक रिंग फिल्म का सुबीर सेन गाया यह गीत भी सुनवाया जिसे मैंने शायद पहली ही बार सुना, अच्छा लगा - बुझ गया दिल का दिया तो चांदनी को क्या कहे

युनूस जी समापन हमेशा बढ़िया करते हैं - गीतों की झलकियों के साथ विवरण बताते हैं।

सोमवार को प्रस्तुत किया अमरकान्त जी ने। हमेशा की तरह संक्षिप्त आलेख रहा और बढ़िया रोमांटिक गीत सुनवाए। चर्चा की कि प्यार में जिन्दगी की नई शुरूवात होती हैं। प्यार के शुरूवात और इक़रार की चर्चा की इन गीतों से - आराधना से कोरा कागज़ था ये मन मेरा, रामपुर का लक्ष्मण से गुम हैं किसी के प्यार में, दीवार और पड़ोसन फिल्म से कहना हैं आज तुमसे ये पहली बार गीत भी शामिल था। अच्छा तो लगा पर नया नही लगा।

मंगलवार को प्रस्तुत किया निम्मी (मिश्रा) जी ने। सभी पुराने गीत थे। अधिकतर गीत जाने-पहचाने थे जैसे - खुदाया काश मैं दीवाना होता

ऐसा गीत भी शामिल था जो बहुत ही कम सुनवाया जाता हैं। इस गीत को भी बहुत दिन बाद सुन कर अच्छा लगा -

किसी की याद में दिल को हैं भुलाए हुए
ज़माना गुजरा हैं अपना ख्याल आए हुए

फिर भी कार्यक्रम में कोई नयापन नही थी।

बुधवार को प्रस्तुत किया राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने। मोहब्बत के नगमे सुनवाए और चर्चा की। अधिकतर जाने-पहचाने गीत सुनवाए जैसे - झलके तेरी आँखों से

सुन ऐ बहार ऐ हुस्न मुझे तुमसे प्यार हैं

यह एक गीत बहुत ही कम सुनवाया जाने वाला गीत भी शामिल था - गुलशन की करने सैर खुदाया खैर

कार्यक्रम इस बार भी अच्छा था पर नया कुछ नही था। सबसे बड़ी अखरने वाली बात यह रही कि इस दिन बकरीद थी, अच्छा होता कुर्बानी, त्याग जैसी भावना पर चर्चा होती, क़व्वाली, गजले सुनवाई जाती।

गुरूवार को रेणु (बंसल) जी ने प्रस्तुत किया। रेणु जी मोहब्बत की चर्चा करती रही और गीत सुनवाती रही और साथ ही खेलो की चर्चा भी होती रही यानि तकनीकी गड़बड़ी से दो केंद्र मिल गए। हालांकि छाया गीत की आवाज तेज थी फिर भी खेलो के बारे में स्पष्ट सुनाई दे रहा था। लगभग अंतराल तक यही हाल रहा। उसके बाद सिर्फ छाया गीत ही सुना लेकिन बहुत धीमी आवाज में। गीतों का चुनाव बढ़िया रहा, गीत गाया पत्थरो से तेरे ख्यालो में हम, मैंने रखा हैं मोहब्बत अपने अफसाने का नाम गीत भी सुना और यह प्यारा सा गीत भी सुनवाया -

नील गगन की छाँव में दिन रैन गले से मिलते हैं
दिल पंछी बन उड़ जाता हैं हम खोए खोए रहते हैं

सोमवार को रात 7:45 पर पत्रावली में श्रोताओं के पत्र पढ़े रेणु (बंसल) जी ने और उत्तर दिए कमल (शर्मा) जी ने। हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान से गाँव, जिलों, शहरो से पत्र आए। लगभग सभी कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। एक छात्र श्रोता की शिकायत थी कि नए गाने नही सुनवाए जाते जिसके उत्तर में गानों के चयन की जानकारी दी कि एकदम नए गाने तो नही सुनवाए जा सकते पर बाजार में आते ही गीत ले लिए जाते हैं और लेते समय इस बात का ध्यान रखा जाता हैं कि विविध भारती पारिवारिक चैनल हैं। क्षेत्रीय कार्यक्रमों के कारण केन्द्रीय सेवा के सभी कार्यक्रम नही सुने जा सकने की शिकायत पर बताया कि क्षेत्रीय केन्द्रों के लिए क्षेत्रीय भाषा के कार्यक्रमों की प्राथमिकता हैं, इसीलिए पूरा प्रसारण लघु तरंग (शॉर्ट वेव) पर सुनने की सलाह दी। हवामहल की कुछ झलकियों और कुछ फिल्मी कलाकारों से बातचीत की भी फरमाइश की गई। अंत में एकाध मिनट के लिए प्रसारण नही सुन पाए फिर संगीत सुना फिर अंतिम पत्र का अंतिम अंश सुना जिसमे आवाज भी साफ़ नही थी और प्रतिध्वनी भी थी। एक बात खली कि अंत में डाक पता और ई-मेल आई डी नहीं बताया गया। शुरू और अंत में उद्घोषणा की युनूस (खान) जी ने। कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक (छिब्बर) जी ने।

1 comment:

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

श्री अन्नपूर्णाजी,
वैसे छाया गीत कार्यक्रम का स्वरूप ही ऐसा है कि हर रोझ नये नये भाव वाली स्क्रीप्ट लिख़नी लम्बे समय बाद किसी भी उद्दघोषक के लिये कठीन होना स्वाभावीक है । आपने नोट किया होगा कि पूराने पूराने छाया गीत के पूरे पूरे एपिसॉड्झ कुछ लम्बी अवधियोँ के बाद फिर प्रसारित होते है । एक बक्त प्रयोग किया गया था कि छाया गीत का प्रसारण पूर्व-ध्वनि-मूद्रीत नहीं हो कर सजीव हो, पर नये केझ्यूल उद्दघोषको पर यह जिम्मेवारी आन पडी थी, तब लोगों का आकर्षण करीब समाप्त हो गया था । क्यों कि इस कार्यक्रम के लिये कवि हृदय चाहीये जो हर किसी के पास नहीं होता है । (जिसमें मैं अपने आप को भी शामिल करता हूँ, उद्दघोषक की हेसियत की बात नहीं है, इन्सान की बात कर रहा हूँ ) जब कि केझ्यूल उद्दघोषक की पसंदमें कल्पनाशीलता की जगह हकीकत को प्रस्तूत करने की क्षमता को ज्यादा अहमियत देनी पडती है । रही पत्रावलि की बात तो लगता है, कि श्री महेन्द्र मोदी साहब के इस कार्यक्रम को छोडने के बाद उनके द्वारा बनाई विविध भारती की बेबसाईट और निम्मीजी की निवृती (वे कुछ कार्यक्रमोमें केझ्यूल के तौर पर आती है वह और बात है ) के बाद श्रोता लोगों के ई मेईल्स देख़ने कम से कम पत्रावलि का सवाल है, बंद ही हो गये लगते है ।

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