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Friday, August 15, 2008

साप्ताहिकी 14-8-08

रेडियोनामा के सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

आज से हम शुरू कर रहे है रेडियो कार्यक्रमों की साप्ताहिक समीक्षा का सिलसिला। तो आइए चर्चा करते है पिछले सप्ताह भर प्रसारित हुए कार्यक्रमों की…

विविध भारती पर पहली सभा का पहला-पहला कार्यक्रम होता है 6:05 पर हिन्दी समाचारों के बाद - वन्दनवार। भक्ति संगीत के इस कार्यक्रम की शुक्रवार को शुरूवात हुई संतोषी माता के भजन से जिसके बाद साढे छह बजे स्थानीय केन्द्र से तेलुगु भक्ति संगीत के कार्यक्रम अर्चना की शुरूवात हुई वाणी जयराम की आवाज़ में देवी स्तुति माला से -

जय-जय-जय महिशासुर मर्दिनीरम्यक शैल

इसके हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। इस तरह सप्ताह में एकाध बार पारम्परिक भक्ति रचना ज़रूर सुनवाई जाती है। मुझे लगता है कि वाणी जयराम और अनुराधा पौड़वाल की गाई तेलुगु में पारम्परिक रचनाएँ है तो हिन्दी में भी ज़रूर होगी। लेकिन वन्दनवार में हनुमान चालिसा और कभी-कभार मुकेश की आवाज़ में रामचरित मानस के अंश के अलावा और कोई पारम्परिक रचना मैनें नहीं सुनी। यहाँ सिर्फ़ भक्त कवियों की रचनाएँ ही प्रस्तुत होती है। सोमवार को शुरूवात हुई शिव भक्ति गीत से -

गौरापति शम्भु है कैलाश के वासी

इसके साथ कबीर, सूरदास के पुराने भजनों के साथ नए भजन भी सप्ताह भर बजते रहे। कार्यक्रम का समापन होता है देशगान से। एक बार भी सुनवाए गए गीत का विवरण नहीं बताया गया। यहाँ तक कि नौ अगस्त भारत छोड़ो आन्दोलन की वर्षगांठ का दिन होने के बावजूद भी बिना विवरण के देशगान सुनवाया गया।

इसके बाद प्रसारित होने वाला भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम आजकल बहुत अच्छा और सच्चा हो गया है। सच्चा इसीलिए कि इसमें वाकई भूले-बिसरे गीत प्रसारित हो रहे है। कुन्दनलाल (के एल) सहगल के गीत के अलावा एकाध गीत ही लोकप्रिय होता है। गीतकार, संगीतकार, गायक और यहाँ तक कि फ़िल्मों के भी कुछ ऐसे नाम सुने जो बहुत ही कम या पहली बार सुने गए। ऐसे गीतों को सुनना अच्छा लगा। रविवार को संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश की स्मृति में यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया पर उनके गीतों के साथ अन्य संगीतकारों के गीत भी सुनवाए गए।

भूले-बिसरे गीत के बाद साढे सात बजे का समय होता है संगीत-सरिता का। इन दिनों श्रृंखला चल रही है - भारतीय ताल वाद्य और फ़िल्म संगीत। इसमें जाने-माने तबला वादक श्री बालकृष्ण अय्यर से निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत चल रही है। शुरूवात में वही रटी-रटाई शैली में निम्मी जी ने कह दिया उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय संगीत में ताल वाद्य। क्या पूर्व और पश्चिम भारत में संगीत नहीं है ? या संगीत बग़ैर ताल का है।

त्रिवेणी के तट पर शिक्षा के छीटों से भीगते रहे कभी ज़िन्दादिली की बातें और कभी व्यक्तितत्व से फूलों की महक की बातें सुनते हुए।

स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर दोपहर 12 से 1 बजे तक प्रसारित होने वाले सुहाना सफ़र कार्यक्रम में फिर से परिवर्तन हुआ है। लेकिन इस बार भी संगीतकारों की ही रचनाएँ सुनवाई जा रही है गीतकारों की नहीं। शुक्रवार के संगीतकार है ए आर रहमान, शनिवार को आदेश श्रीवास्तव, सोमवार को पहले सभी दौर के कम चर्चित संगीतकार थे पर अब नए दौर के कम चर्चित संगीतकारों के गीत बज रहे है। मंगलवार को पहले की तरह ही अन्नू मलिक है। बुधवार का दिन शानदार है शिव-हरि के गीत बज रहे है। गुरूवार को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जिनके गीत 15 अगस्त को ध्यान में रख कर चुने गए। कुल मिलाकर पाश्चात्य और भारतीय संगीत में रचे-बसे, नए-पुराने लोकप्रिय और कम चर्चित गीतों का अनूठा आनन्द मिल रहा है।

एक बजे प्राइवेट गीतों के कार्यक्रम म्यूज़िक मसाला में कभी-कभार बहुत अच्छे गीत सुनने को मिलते है। जैसे बुधवार को सुना वसुंधरा की आवाज़ में मेरी जान एलबम का गीत -

फिर भी मुझे जुनून क्यों है मेरी जांमेरी जां, मेरी जां, मेरी

नए गाने जिस तरह से कंपोज़ हो रहे है उनमें से इसकी कंपोज़िशन बहुत अच्छी है।

फ़रमाइशी गीतों के कार्यक्रम में 1:30 बजे मन चाहे गीत, 7 बजे जयमाला और 10:30 बजे आपकी फ़रमाइश में नए पुराने अच्छे गीत सुनवाए जा रहे है। इसी तरह के गीत फ़ोन-इन-कार्यक्रमों - हैलो फ़रमाइश, हैलो सहेली में भी सुनवाए जाते है साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के श्रोताओं जैसे ब्यापार करने वाले, पढने वाले छात्र, घरेलु महिलाएँ आदि से हल्की-फुल्की बातचीत भी अच्छी लगती है। सबसे बड़ी बात पत्रों और फ़ोन कालों से यह पता लगता है कि देश के कोने-कोने के श्रोता आज भी विविध भारती से सक्रिय रूप से जुड़े है।

इस सप्ताह सखि-सहेली में निम्मी जी और सुधा जी की जोड़ी ने कार्यक्रम प्रस्तुत किए और शुक्रवार को हैलो सहेली में रेणु जी ने फोन पर सखियों से बात की। सोमवार को बातें होती है रसोई की जिसमें किसी श्रोता सखि की भेजी गई यह जानकारी अच्छी थी कि दाल और अंकुरित अनाज के दाने एक साथ न खाए क्योंकि दोनों में प्रोटीन अधिक होने से पाचन कठिन होता है। शेष कार्यक्रम के लिए हम तो कहेंगे कि शुक्रवार को पिटारा में पिटारा के अन्तर्गत रेणु जी द्वारा प्रस्तुत चूल्हा-चौका के अंश यहाँ प्रसारित किए जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा। मंगलवार को कैरियर बनाने की बातें बताई जाती जिसे ध्यान में रख कर युनूस जी द्वारा शूटर उपासना परसुरामपुरिया से की बातचीत का अंश सुनवाया गया। बुधवार को ख़ूबसूरती बनाए रखने के घरेलु नुस्ख़े बताए गए। गुरूवार को निम्मी जी के साथ थी चंचल जी और माहौल रहा आज़ादी का और राखी का। हम कमलेश (पाठक) जी को धन्यवाद देना चाहेंगे कि पिछले कुछ समय से सखि-सहेली के अवतार में हल्का सा परिवर्तन कर इसे निखारा गया है, पहले कोई भी बात हो उदघोषिकाएँ ही बताती थी पर अब विभिन्न क्षेत्रों की सफल महिलाओं से बातचीत कर जानकारी दी जाती है।

शनिवार और रविवार को तीन बजे आनन्द लिया सदाबहार नग़मों का और साढे तीन बजे तो और भी आनन्द आया। नाट्य तरंग में निर्मला अग्रवाल के निर्देशन में अमीर ख़ुसरो के जीवन पर आधारित नाटक सुना - डगर पनघट की। इस नाटक से जानकारी भी बढी, पहले ख़ुसरो के बारे में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया तक ही जानकारी थी पर अब बलबन के बारे में भी जाना। बहुत ख़ास रही अमीर ख़ुसरो की इस ख़ास रचना की प्रस्तुति -

छाप-तिलक तज दीन्हीं रे तोसे नैना मिला के।

4 बजे पिटारा के अंतर्गत सोमवार को रेणु (बंसल) जी की मनोरोग चिकित्सक डा देवेन्द्र सावे से बातचीत प्रसारित हुई। डाक्टर साहब ने पागलपन और मनोरोग में फ़र्क बताया। अब तक अधिकतर यही समझा जाता था कि मानसिक तनाव से नाड़ियों के खिंचाव से रोग होते है पर अब यह भी जाना कि शरीर में रासायनिक क्रियाएँ भी इसका कारण है। इलेक्ट्रिक शाँक के बारे में भ्रम दूर हुआ कि सिर्फ़ एक सेकेण्ड के झटके से तकलीफ़ नहीं होती। बुधवार को जैसलमेर में बीसएफ़ के बटालियन कमांडेट रामनारायण राम से कमल (शर्मा) जी की बातचीत सुनी। अपने जीवन और काम के बारे में उन्होनें बताया साथ ही गाने भी सुनवाए। मुझे लगता है अगर इसमें से कमल जी की आवाज़ हटा दी जाए तो यह कार्यक्रम विशेष जयमाला के रूप में बहुत अच्छा लगेगा। रविवार को यूथ एक्सप्रेस में शुरूवात क़दम क़दम बढाए जा गीत से हुई। कार्यक्रम में माहौल आज़ादी का रखा गया पर अवसर का भी ध्यान रखा गया और बारिश के मौसम में आजकल प्रचलित रेन वाटर हार्वेस्टिंग टेकनीक यानि वर्षा के पानी के संग्रह पर प्रो रामचन्द्र मिश्र की वार्ता सुनवाई गई।

5 बजे प्रसारित होने वाले फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में बिल्कुल नई फ़िल्मों के गीत सुनने को मिलते है। सुदेश भोंसले की आवाज़ में एक गीत सुना तो याद आ गया सत्तर के दशक की महमूद की लोकप्रिय फ़िल्म कुँवारा बाप का लोकप्रिय गीत - हाँ जी

शुक्रवार को जयमाला संदेश में कमल जी ने पढ कर सुनाए फ़ौजी भाइयों के संदेश उनके परिजनों के नाम और उनके परिजनों के संदेश फ़ौजी भाइयों के नाम उनके पसन्दीदा फ़िल्मी गीतों के साथ। इसके बाद 7:45 पर सुना लोक संगीत जिसमें बुन्देलखण्डी गीत सुनवाए गए। एक पारम्परिक गीत सुनवाया गया पर आवाज़ किसकी है यह नहीं बताया गया। गीत सुन कर मैं हैरान रह गई, आप भी हैरान हो जाएगें गीत के बोल पढकर -

जो मैं होती राजा जल की मछरिया उठाए जाल काए दय्या रे
जो मैं होती राजा बन की कोयलिया तुम बहेलिया लगाए घात रे

याद आ गया आशा भोंसले का फ़िल्मी गीत जो शायद देवाआनन्द की फ़िल्म काला पानी का है -
नज़र लागी राजा तोरे बँगले पे जो मैं होती राजा बेला चमेलिया लिपट रहती राजा तोरे बँगले पे
शनिवार और सोमवार को पत्रावली में थे निम्मी जी और युनूस जी। एक पत्र शिकायती तो चार पत्रों में विभिन्न कार्यक्रमों की तारीफ़। दोनों दिन यही अनुपात रहा पर पत्र प्राप्त हुए देश के विभिन्न राज्यों से।
8 बजे का समय होता है हवामहल का। सभी झलकियाँ अच्छी थी पर सभी पुरानी। एक संवाद था - लाओ पाँच का नोट दो सामान लाना है। हमने सोचा आजकल तो पाँच का नोट ढूँढना पड़ता है फिर पाँच के सिक्के से सामान खरीदना - उफ़्फ़फ़्फ़ ! खैर हवामहल के लिए हम तो यही कहेंगे ओल्ड इज़
गोल्ड

9 बजे गुल्दस्ता अच्छा लगा। वाणी जयराम को आजकल बहुत कम ही सुनने को मिलता है। बशीर बद्र का कलाम भी अच्छा लगा। इसके बाद 9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में क्रान्ति, पत्थर के सनम, मधुमति इस तरह नई पुरानी सभी फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए। उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में वर्ष 2000 में रिकार्ड की गई संगीतकार नौशाद से अहमद वसी जी की बातचीत सुनी जो शुरूवाती दौर की थी। कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता थे कमल जी।

10 बजे छाया गीत में भी कुछ नए और पुराने गीत सुनवाए जाते है। यहाँ गीतों से ज्यादा प्रस्तुति अच्छी लगती है और इन प्रस्तुतियों में रात के समय पुराने गीत सुनना और भी अच्छा लगता है पर लोकप्रिय गीत लेकिन निम्मी जी की प्रस्तुति में पता ही नहीं चला कि छाया गीत सुन रहे है या भूले-बिसरे गीत। वैसे यह उदघोषकों का कार्यक्रम है इसीलिए कुछ कहना ठीक नहीं लगता फिर भी हम कहेगें पसन्द अपनी अपनी ख़्याल अपना अपना।

3 comments:

mamta said...

अन्नपूर्णा जी ये आपने बहुत अच्छी शुरुआत की है। इसके लिए बधाई।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आजाद है भारत,
आजादी के पर्व की शुभकामनाएँ।
पर आजाद नहीं
जन भारत के,
फिर से छेड़ें, संग्राम एक
जन-जन की आजादी लाएँ।

Udan Tashtari said...

स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

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