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Friday, August 29, 2008

साप्ताहिकी 28-8-08

इस सप्ताह एक दिन विशेष रहा - जन्माष्टमी

शनिवार को 6:05 पर वन्दनवार में कुछ कृष्ण भक्ति भजन सुनवाए गए पर रविवार को पूरा कार्यक्रम समर्पित रहा। शेष दिन सामान्य रहे भजन। कार्यक्रम के आरंभ में चिंतन में देशी-विदेशी विद्वानों के विचार बताए जाते रहे और समापन पर बजने वाले देशगान का विवरण सप्ताह भर में एकाध बार ही बताया गया।

6:30 बजे तेलुगु भक्ति गीतों के कार्यक्रम अर्चना में नए ज़माने के संगीत में बँधा भजन सुना गिटार पर - कृष्ण वीरूणु - धुन बहुत अच्छी लगी। शेष दिन सामन्य भक्ति गीत रहे।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में शनिवार का कार्यक्रम कृष्णमय था। सप्ताह भर लोकप्रिय गीत के साथ भूले-बिसरे गीत बजते रहे और अंत में सहगल साहेब के गीत।

7:30 बजे संगीत सरिता में भारतीय ताल वाद्य और फ़िल्म संगीत श्रृंखला समाप्त हुई। चर्चा में रहे विभिन्न तालवाद्य। कुछ ऐसे तालवाद्यों की जानकारी दी गई जिनके नाम पहले शायद ही सुने थे - डफ, डबाल (शायद लिखने में ग़लती हो) हालांकि जिन फ़िल्मी गीतों में इनका प्रयोग हुआ वो बहुत ही लोकप्रिय गीत है जैसे अजनबी का -

हम दोनों दो प्रेमी दुनिया छोड़ चले

अंत में विभिन्न ताल वाद्यों की संगीत कचहरी अच्छी लगी जिसमे विभिन्न ताल वाद्यों को एक साथ सुनने में मज़ा आया।

त्रिवेणी में सोमवार को घर विषय पर गीत बजे आलेख भी अच्छा था, शेष दिन भी ठीक ही रहा।

फ़रमाइशी तेलुगु फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम जनरंजनि, हिन्दी फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम मन चाहे गीत, आपकी फ़रमाइश और जयमाला अपने ही अंदाज़ में सप्ताह भर प्रसारित होता रहा, कोई विशेष बात नहीं रही।

10 से 10:30 बजे तक क्षेत्रीय प्रसारण में तेलुगु कार्यक्रम प्रसारित होता है - एक चित्र गानम - इस नाम के हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। इसमें एक ही फ़िल्म के गीत सुनवाए जाते है। विवरण में सिर्फ़ गायक कलाकारों के नाम, गीतकार तथा संगीतकार के नाम ही बताए जाते है फिर एक के बाद एक गीत सुनवाए जाते है। शुक्रवार को नई फ़िल्म मन्दारम के गाने बजे जिसमें हरिहरण, सुखविन्दर सिंह के गाए गीत भी थे। रात में 8:45 से 9 बजे तक भी यही कार्यक्रम प्रसारित होता है पर सुबह और रात में अलग-अलग फिल्मो के गीत सुनवाए जाते है। शनिवार को सुबह भले कृष्नणु और रात में श्री कृष्ण तुलाभारम फिल्मो के गीत बजे। इस कार्यक्रम में नए पुराने सभी तरह की फ़िल्मों के गीत बजते है।

सुहाना सफ़र में दोपहर 12 से 1 बजे तक संगीतकारों का क्रम वही रहा - शुक्रवार को ए आर रहमान, शनिवार को आदेश श्रीवास्तव, रविवार को स्माइल दरबार, सोमवार को नए दौर के संगीतकारों के नए-नवेले गीत, मंगलवार को जतिन-ललित, बुधवार को शिवहरि, गुरूवार को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के संगीतबद्ध किए गाने। जब भी शिवहरि का नाम आया, सिलसिला, चाँदनी, लम्हें के गाने सुनने को मिले। इस नाम से जुड़े यही गाने सुन कर थक गए थे पर इस बुधवार को ताज़े हवा के झोकें की तरह एक आवाज़ गूँजी अफ़रोज़ बानो की, फ़िल्म शायद साहिबां है, गीत सीधा लोक संगीत की दुनिया में ले गया -

पीहरवाँ ओ प्रेम है दीपक राग

1 बजे म्यूज़िक मसाला में शुक्रवार को एलबम मितवा से गीतकार मदन पाल का लिखा रूपकुमार राठौर और सोनाली राठौर का स्वरबद्ध किया और गाया गीत अच्छा लगा -

मुझको मालूम नही अगला जन्म है कि नहीं
यह जनम प्यार में गुज़रे दुआ मांगी है

3 बजे का समय मुख्यतः सखि-सहेली का होता है। शुक्रवार को फोन पर सखियों से बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने। विभिन्न स्थानों जैसे असम, हैदराबाद, काश्मीर, उत्तर प्रदेश से फोन काल आए - शहरों से भी और गाँवों से भी। अलग-अलग स्तर की सखियों ने बात की जैसे छात्राएँ, शिक्षित नौकरीपेशा महिलाएँ, गृहणियाँ। इसी तरह नए-पुराने गाने बजे।

मंगलवार को मुक्त विश्वविद्यालय से संबंधित जानकारी दी गई कि कैसे घर बैठे भी पढा जा सकता है। सोमवार को अंत में पुरानी फ़िल्म क़िस्मत का युगल गीत अच्छा लगा ख़ासकर अमीर बाई कर्नाटकी की आवाज़ सुनना। शेष दिन कार्यक्रम सामान्य रहे।

शनिवार को सदाबहार नग़मों में अभिनेत्री सायरा बानो के जन्मदिन पर उन पर फ़िल्माए गए गीत सुनवाए गए।

इसके बाद नाट्य तरंग में आधुनिक नाटक सुनवाए गए। शनिवार को रोमी शिराज का लिखा नाटक दरिन्दे और रविवार को नाटक सुनवाया गया - एक आवाज़ जो एक पात्र अभिनीत था।

4 बजे पिटारा में सोमवार को सेहतनामा में अंधत्व निवारण सप्ताह पर नेत्र रोग विशेषज्ञ डा श्याम सुन्दर अग्रवाल से रेणु (बंसल) जी की बातचीत बहुत जानकारी दे गई। इसी तरह बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में दूरदर्शन धारावाहिक रजनी फ़ेम करण राज़दान से निम्मी जी की बातचीत रही। रविवार को यूथ एक्सप्रेस एकदम टैम्पो की तरह लगी। गाने-गाने-गाने उफ़फ़्फ़ ! ऐसे लगा जैसे मन चाहे गीत सुन रहे है। केवल एक जानकारी अच्छी थी - सांझी कला जो रंगोली की तरह है जिससे कृष्ण के ज़माने में गोपियाँ अपने आँगन को सजाया करती थी कृष्ण के स्वागत में। शेष जानकारियों में मुझे समझ में नही आया प्रयोगशाला में रक्त बनाने और आँनलाइन परीक्षा की सुविधा देने के इन दो समाचारों को शामिल करना जबकि यह दोनों समाचार अभी-अभी अख़बारों में प्रमुख रहे, यहाँ तक कि अख़बारों की बेबसाइटों पर भी सामने नज़र आए। जो युवा अपना कैरियर बनाने के लिए इस कार्यक्रम को सुनता है उसके पास कुछ देर से ही सही अख़बार तो आता ही होगा। इतने ताज़ा समाचारों को तुरन्त कार्यक्रम में शामिल करने का औचित्य…

इस सप्ताह एक और अजीब बात हुई - शुक्रवार को प्रसारित हुआ पिटारे में पिटारा जिसमें आज के मेहमान कार्यक्रम में वादक कलाकार रामनारायण मिश्र से काँचन (प्रकाश संगीत) जी ने बात की। बुधवार को नियमित आज के मेहमान कार्यक्रम होता है फिर शुक्रवार को भी ऐसा ही कार्यक्रम सुनना ठीक नहीं लगा। शुक्रवार को अलग तरह का कार्यक्रम संजोया जा सकता है। इसी तरह बुधवार को संगीत-सरिता में नई श्रंखला शुरू हुई - बातें गज़लों की जिसमे भूपेन्द्र जी से बात कर रहे है गीतकार राजेश जौहरी और रात में 7:45 को इनसे मिलिए कार्यक्रम में भूपेन्द्र जी से बातचीत की रेणु जी ने। विविध भारती में विविधता बनी न रहे तो अच्छा नहीं लगता।

शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं से फोन पर हल्की-फुल्की बातचीत हुई और उनके पसंदीदा गीत सुनवाए गए हैलो फ़रमाइश में।

5 बजे नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में सप्ताह भर गाने ठीक ही रहे।

शनिवार को विशेष जयमाला अभिनेता मुकेश तिवारी ने प्रस्तुत किया। रविवार को फ़ौजी भाइयों और उनके परिजनों के संदेशों के साथ गाने सुनवाए गए। शेष दिन नए और बीच के समय के गाने बजते रहे।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सुने सिन्धी गीत जिसमें कमला झंगियानी का गीत अच्छा लगा पर यहाँ बोल लिखना कठिन है। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में एकाध शिकायती पत्र और कुछ कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। एक पत्र के जवाब में महेन्द्र मोदी जी ने कहा कि विविध भारती से संबंधित विज्ञापन जिंजल स्वर्ण जयन्ती तक अनिवार्य रूप से सुनवाए जाएगें पर उसके बात बजेगें या नहीं यह निश्चित रूप से उन्होनें नहीं कहा। हमें लगता है बाद में भी कभी-कभार बजते रहेगें तो अच्छा लगेगा। मंगलवार को फ़िल्मी क़व्वालियाँ ठीक ही थी। गुरूवार और रविवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग चारूकेशी पर आधारित संजोग फ़िल्म का गीत - वो भूली दासतां लो फिर याद आ गई

8 बजे हवामहल में शुक्रवार को इब्राहम अश्क की लिखी और गंगाप्रसाद माथुर द्वारा प्रस्तुत झलकी सुनी - ड्रामें का ड्रामा, शनिवार को विजय दीपक द्वारा निर्देशित परोपकार झलकी सुनी। बहरहाल हवामहल सुनना कभी बुरा नहीं लगा।

रात 9 बजे गुलदस्ता में शुक्रवार को राजेन्द्र मेहता नीना मेहता से सुना -

मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना

कई बार सुनने के बावजूद अच्छा लगा। एक और गीत अलका याज्ञिक की आवाज़ मे सुनने में अच्छा लगा पर गुलज़ार के लिखे बोल कुछ पकड़ में नहीं आए।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में गंगा की लहरें, पूरब और पश्चिम, अनाड़ी, सोलहवाँ साल जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में संगीतकार नौशाद से अहमद वसी की बातचीत आगे बढी।

10 बजे छाया गीत में कभी मौसम के तो कभी प्यार के गीत बजते रहे पर कल युनूस जी ने अलग ही समाँ बाँधा ऐसे गीत लेकर आए जो पहले शायद ही सुने गए जैसे फ़िल्म रेल का डिब्बा का आसमानी चूड़ियों वाला गीत। ऐसे नए प्रयोग कार्यक्रम में ताज़गी बनाए रखते है।

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