यह पोस्ट मैं युनूस जी से हाथ जोड़ कर क्षमा याचना सहित लिख रही हूँ।
मनोहारी दादा के निधन का शोक समाचार सबसे पहले पीयूष (मेहता) जी ने रेडियोनामा पर दिया 13 जुलाई को। उसके अगले दिन 14 जुलाई को युनूस जी ने अपने ब्लॉग रेडियोवाणी पर यह समाचार देते हुए पोस्ट लिखी। अपनी पोस्ट में युनूस जी ने लिखा कि मनोहारी दा से उनकी मुलाक़ात विविध भारती के दो महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में हुई - संगीत सरिता और आज के मेहमान जिनमे से एक में युनूस जी ने खुद उनसे बातचीत की। बावजूद इसके युनूस जी ने इस पोस्ट को रेडियोनामा पर देना उचित नही समझा। हालांकि रेडियोनामा पर ऎसी कोई पाबंदी नहीं हैं कि एक ही विषय पर दो व्यक्ति दो पोस्ट नहीं लिख सकते। वैसे भी कुछ ही दिन पहले मैंने युनूस जी की एक पोस्ट पर टिप्पणी लिख कर उनकी रेडियोनामा से दूरी की चर्चा की थी।
अपनी पोस्ट पर युनूस जी ने उन गानों की फेहरिस्त भी दी जिसमे मनोहारी दादा का सेक्सोफोन गूंजता हैं। इन गीतों को लोकप्रिय बनाने में विविध भारती का कितना योगदान हैं यह युनूस जी बेहतर जानते हैं। कितना भावुक होकर उन्होंने यह पोस्ट लिखी इसका अंदाजा इसी से होता हैं कि आज के मेहमान को उन्होंने हमारे मेहमान लिखा और अमीर गरीब फिल्म के गीत की पंक्ति लिखी - मैं आया हूँ लेकर जाम हाथो में जबकि यह गीत जोशीला फिल्म का हैं और पंक्ति हैं - मैं आया हूँ लेकर साज हाथो में। यह साज हैं गिटार और इस साज के साथ जोशीला फिल्म के इस गीत की विस्तृत चर्चा रेडियोवाणी पर खुद ही की थी... खैर...
श्रद्धांजलि की पोस्ट पर पीयूष (मेहता) जी ने अपनी टिप्पणी में लिखा कि इस महान कलाकार को यहाँ सही सम्मान और श्रद्धांजलि हैं। टिप्पणियों की लम्बी कतार देखी और उसमे विविध भारती का जिक्र भी देखा, समझ में नहीं आया यह कलाकार के प्रति सम्मान हैं या युनूस जी की पोस्ट पर टिप्पणियाँ देने की आदत ? इस स्थिति में रेडियोनामा पर बहुत ही कम दी जाने वाली टिप्पणियों पर बहुत पहले लिखी गई डा अजीत कुमार जी की पोस्ट याद आ गई।
जिन गानों से इस कलाकार की पहचान हैं उन गीतों का गढ़ हैं विविध भारती और उसके अपने ब्लौग पर पहले दी गई श्रद्धांजलि पर टिप्पणी लिखना जरूरी नही समझा जाता जबकि व्यक्तिगत ब्लौग पर टिप्पणियों की लाइन लगती हैं, समझ में नही आता लोग पोस्ट पढ़ते हैं या ब्लौग ?
खुद रेडियोनामा के सदस्य ही इसे गंभीरता से नही लेते। हर सप्ताह मैं साप्ताहिकी लिखती हूँ जिसमे उन्ही कार्यक्रमों की चर्चा होती हैं जो हैदराबाद में प्रसारित होते हैं, ऐसे कार्यक्रम भी हैं जो हैदराबाद में प्रसारित नही होते पर दूसरे शहरों में होते हैं जिन पर कुछ लिखा जा सकता हैं जिससे विविध भारती के समूचे प्रसारण की जानकारी सबको मिल सकती हैं, सभी कार्यक्रमों पर चर्चा हो सकती हैं पर कोई ध्यान देना ही नही चाहता। मेरा लेखन मेरा अपना नजरिया हैं, अगर दूसरे लिखेगे तो एक ही कार्यक्रम पर अलग-अलग नजरिए से चर्चा हो सकेगी। एकाध बार सागर नाहर जी ने संगीत सरिता पर समीक्षा लिखी थी पर सिलसिला आगे नहीं बढ़ा। जब भी रेडियोनामा खोलो दो ही नाम नजर आते हैं, मेरा और पीयूष जी का।
आशा हैं युनूस जी सहित सभी सदस्य इस मुद्दे पर ध्यान देगे जिससे किसी कलाकार को लोकप्रिय बनाने वाली विविध भारती के धरातल पर ही सार्थक चर्चा हो सके।
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Saturday, July 17, 2010
Wednesday, July 29, 2009
विविध भारती के श्रोताओं के लिये खुश खबरी
सबसे पहले सुप्रसिद्ध अभिनेत्री लीला नायडू के निधन पर हार्दिक श्रद्धान्जली..
कुछ दिनों पहले संगीत सरिता में एक कार्यक्रम आया था जिसमें एक राग की दूसरे राग की परछाई के बारे में बारे में बताया जाता था, इस कार्यक्रम के बाद हिन्दुस्तानी शैली और कर्नाटक शैली में समानताओं और रूद्र वीणा जैसे कई कार्यक्रम आये पर वैसा आनन्द नहीं मिल पाया जैसा छाया राग वाले कार्यक्रम में पाया था।
आज सुबह एक बार फिर वि.भा. ने खुश कर दिया क्यों कि आज से सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार स्व. मदनमोहन जी द्वारा संगीतबद्ध गीतों में शास्त्रीय संगीत पर चर्चा की गई, आज पहली ही कड़ी में मेरा पसंदीदा गीत दुखियारे नैना ढूंढे पिया को निशदिन करे पुकार सुनाया... जो कि राग गौड़ सारंग में ढला हुआ है। सच इस गीत को सुबह सुबह सुनकर आनन्द आ गया, कई घंटों तक खुमारी बनी रही।
आपने यह गीत सुना कि नहीं? अगर नहीं तो आईये हमने कुछ दिनों पहले ही महफिल पर इस गीत को सुनाया था..
दुखियारे नैना ढंढे पिया को: मदनमोहन जी द्वारा संगीतबद्ध सुन्दर गीत
आप मित्रों से अनुरोध है कि अगर किसी के पास इस कार्यक्रम को रिकॉर्ड करने की सुविधा हो तो इसे रिकॉर्ड करे ताकि हम इसे बाद में रेडियोनामा पर और मित्रों को भी सुना सके।
धन्यवाद
कुछ दिनों पहले संगीत सरिता में एक कार्यक्रम आया था जिसमें एक राग की दूसरे राग की परछाई के बारे में बारे में बताया जाता था, इस कार्यक्रम के बाद हिन्दुस्तानी शैली और कर्नाटक शैली में समानताओं और रूद्र वीणा जैसे कई कार्यक्रम आये पर वैसा आनन्द नहीं मिल पाया जैसा छाया राग वाले कार्यक्रम में पाया था।
आज सुबह एक बार फिर वि.भा. ने खुश कर दिया क्यों कि आज से सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार स्व. मदनमोहन जी द्वारा संगीतबद्ध गीतों में शास्त्रीय संगीत पर चर्चा की गई, आज पहली ही कड़ी में मेरा पसंदीदा गीत दुखियारे नैना ढूंढे पिया को निशदिन करे पुकार सुनाया... जो कि राग गौड़ सारंग में ढला हुआ है। सच इस गीत को सुबह सुबह सुनकर आनन्द आ गया, कई घंटों तक खुमारी बनी रही।
आपने यह गीत सुना कि नहीं? अगर नहीं तो आईये हमने कुछ दिनों पहले ही महफिल पर इस गीत को सुनाया था..
दुखियारे नैना ढंढे पिया को: मदनमोहन जी द्वारा संगीतबद्ध सुन्दर गीत
आप मित्रों से अनुरोध है कि अगर किसी के पास इस कार्यक्रम को रिकॉर्ड करने की सुविधा हो तो इसे रिकॉर्ड करे ताकि हम इसे बाद में रेडियोनामा पर और मित्रों को भी सुना सके।
धन्यवाद
Thursday, July 23, 2009
गंगू बाई हँगल का जाना और संगीत सरिता का निर्बाध गति से बहना
संगीत जगत की महान हस्ती गंगूबाई हँगल हमारे बीच नहीं रही। इस शोक समाचार को समाचार जगत ने महत्वपूर्ण स्थान दिया। समाचार पत्र, इंटरनेट, आकाशवाणी और दूरदर्शन के समाचार बुलेटिनों में उचित स्थान पर यह समाचार रहा। कुछ समाचार पत्र तो पहले से ही उनके अस्वस्थ रहने का समाचार दे रहे थे। लेकिन विविध भारती का इस क्षेत्र का प्रमुख और एकलौता कार्यक्रम संगीत सरिता इससे बेख़बर रहा।
विविध भारती के शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में तो हम कलाकारों के केवल गायन और वादन ही सुन पाते है पर संगीत सरिता ही अकेला ऐसा कार्यक्रम है जहाँ कलाकारों का पूरा परिचय मिलता है जैसे उनका जीवन, उनकी शिक्षा, उनकी संगीत यात्रा और उनकी उपलब्धियाँ। इतना ही नहीं यहाँ आकर कलाकार अन्य कलाकारों के प्रति भी अपने विचार बताते है। सीधी सी बात है कि इस कार्यक्रम में शास्त्रीय संगीत की जानकारी के अलावा इस जगत की हस्तियों के बारे में भी जानकारी मिलती है और यह सब रोज़मर्रा के कार्यक्रम में शामिल है ऐसे में किसी कलाकार के गुज़र जाने की चर्चा तक न हो तो अजीब लगता है।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ। दरअसल इस तरह की चर्चा या समाचार इस कार्यक्रम में हमने कभी सुना ही नहीं। कुछ समय पहले उस्ताद बिस्मिला खाँ के बारे में भी कोई समाचार नहीं दिया गया था। इस बार भी वही हुआ। शाम में और रात में समाचारों मे देखते सुनते रहे अगले दिन सुबह संगीत सरिता कार्यक्रम शुरू हुआ रोज़ के अंदाज़ में और श्रृंखला रूद्र वीणा की अगली कड़ी प्रसारित हुई। कम से कम कार्यक्रम शुरू करने से पहले उदघोषणा में इतना तो कहा होता कि इस जगत की एक हस्ती गंगूबाई हँगल अब नहीं रही जबकि भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में यह भी बताया उदघोषक ने कि इस समय सूर्य ग्रहण है। ऐसी कई छोटी-बड़ी बातें होती है जो कार्यक्रम के दौरान बताई जाती है पर संगीत सरिता में ऐसी महत्वपूर्ण बात भी क्यों नहीं बताई जाती ? एक दिन का एक अंक उस कलाकार को क्यों समर्पित नहीं किया जा सकता ? आखिर यह एकमात्र कार्यक्रम है। यही पर उस कलाकार से संबंधित उचित जानकारी मिल सकती है।
विविध भारती के शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में तो हम कलाकारों के केवल गायन और वादन ही सुन पाते है पर संगीत सरिता ही अकेला ऐसा कार्यक्रम है जहाँ कलाकारों का पूरा परिचय मिलता है जैसे उनका जीवन, उनकी शिक्षा, उनकी संगीत यात्रा और उनकी उपलब्धियाँ। इतना ही नहीं यहाँ आकर कलाकार अन्य कलाकारों के प्रति भी अपने विचार बताते है। सीधी सी बात है कि इस कार्यक्रम में शास्त्रीय संगीत की जानकारी के अलावा इस जगत की हस्तियों के बारे में भी जानकारी मिलती है और यह सब रोज़मर्रा के कार्यक्रम में शामिल है ऐसे में किसी कलाकार के गुज़र जाने की चर्चा तक न हो तो अजीब लगता है।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ। दरअसल इस तरह की चर्चा या समाचार इस कार्यक्रम में हमने कभी सुना ही नहीं। कुछ समय पहले उस्ताद बिस्मिला खाँ के बारे में भी कोई समाचार नहीं दिया गया था। इस बार भी वही हुआ। शाम में और रात में समाचारों मे देखते सुनते रहे अगले दिन सुबह संगीत सरिता कार्यक्रम शुरू हुआ रोज़ के अंदाज़ में और श्रृंखला रूद्र वीणा की अगली कड़ी प्रसारित हुई। कम से कम कार्यक्रम शुरू करने से पहले उदघोषणा में इतना तो कहा होता कि इस जगत की एक हस्ती गंगूबाई हँगल अब नहीं रही जबकि भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में यह भी बताया उदघोषक ने कि इस समय सूर्य ग्रहण है। ऐसी कई छोटी-बड़ी बातें होती है जो कार्यक्रम के दौरान बताई जाती है पर संगीत सरिता में ऐसी महत्वपूर्ण बात भी क्यों नहीं बताई जाती ? एक दिन का एक अंक उस कलाकार को क्यों समर्पित नहीं किया जा सकता ? आखिर यह एकमात्र कार्यक्रम है। यही पर उस कलाकार से संबंधित उचित जानकारी मिल सकती है।
Thursday, May 28, 2009
शहनाई के रंग- फिल्मी गीतों के संग
पत्नी की छुट्टियां इस बार मेरे लिये कम से कम एक मामले में सुखद सी रही, रो सुबह वन्दनवार, भूले बिसरे गीत, संगीत सरिता और त्रिवेणी पिछली सात मई से रोजाना सुन पाता हूं, खाना बनाते बनाते :) यह अलग बात है कि खाना बनाना मेरे लिये कितना दुखद रहता है।
खैर..
पिछले बारह दिनों से चल रही इस सीरीज की ग्यारहवी कड़ी के साथ इस सुन्दर कार्यक्रम का आज समापन हो गया। ( आप सोच रहे होंगे कि बारह दिनों में ग्यारह कड़ी कैसे? तो यहां बताना चाहूंगा कि दसवीं कड़ी दो बार प्रसारित हो गई थी) आमंत्रित कलाकार कृष्णा राम जी चौधरी मेरे प्रिय संगीतकार और शहनाई नवाज राम लाल जी के भतीजे हैं जानकर एक सुखद आश्चर्य हुआ। रामलाल जी को जवाहरात पहनने का बहुत शौक था इसलिये फिल्म जगत में उन्हें रामलाल हीरापन्ना के नाम से भी जाना जाता था। कार्यक्रम की एंकर कांचन प्रकाश संगीत का संगीत ज्ञान भी इस कार्यक्रम से पता चला, कि कैसे फटाफट वे रागों को पहचान जाती है।
पता नहीं क्यों इस कार्यक्रम को सुनने के बाद लगता है कि अभी इस में बहुत सी कड़ियां और आ सकती थी, अन्तिम दो दिन तो बहुत जल्दी बीत गये। देखते हैं विविध भारती कल कौनसा नया कार्यक्रम लेकर आती है।
:)
खैर..
पिछले बारह दिनों से चल रही इस सीरीज की ग्यारहवी कड़ी के साथ इस सुन्दर कार्यक्रम का आज समापन हो गया। ( आप सोच रहे होंगे कि बारह दिनों में ग्यारह कड़ी कैसे? तो यहां बताना चाहूंगा कि दसवीं कड़ी दो बार प्रसारित हो गई थी) आमंत्रित कलाकार कृष्णा राम जी चौधरी मेरे प्रिय संगीतकार और शहनाई नवाज राम लाल जी के भतीजे हैं जानकर एक सुखद आश्चर्य हुआ। रामलाल जी को जवाहरात पहनने का बहुत शौक था इसलिये फिल्म जगत में उन्हें रामलाल हीरापन्ना के नाम से भी जाना जाता था। कार्यक्रम की एंकर कांचन प्रकाश संगीत का संगीत ज्ञान भी इस कार्यक्रम से पता चला, कि कैसे फटाफट वे रागों को पहचान जाती है।
पता नहीं क्यों इस कार्यक्रम को सुनने के बाद लगता है कि अभी इस में बहुत सी कड़ियां और आ सकती थी, अन्तिम दो दिन तो बहुत जल्दी बीत गये। देखते हैं विविध भारती कल कौनसा नया कार्यक्रम लेकर आती है।
:)
Saturday, July 19, 2008
संगीत सरिता पर गूँज रहा है पटियाला घराने का सबरंग
विविध भारती का संगीत सरिता कार्यक्रम शास्त्र से रूबरू होने का
श्रेष्ठ माध्यम है. बरसों से कई शास्त्रीय संगीतप्रेमी सुबह साढ़े सात बजे
अपने रेडियो सैट से सट जाते हैं.इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी ताक़त
यह है कि कभी भी यह किसी तरह मोनोटनी नहीं परोसता.कभी
ख़याल गायकी के रंग हैं तो कभी ठुमरी के.कभी मौसमी रागों की
बात है तो कभी किसी वाद्य के बारे में विस्तार से जानकारी.साथ ही फ़िल्म
संगीत में यदि प्रस्तुत किये गये राग पर आधारित कोई गीत उपलब्ध
है उसे कार्यक्रम के अंत में लगभग सभी प्रस्तुतियों में सुनाया जाता है.
इससे वे श्रोता भी संगीत सरिता और शास्त्रीय संगीत की ओर आकृष्ट
होते हैं जो पूरी तरह् से भारतीय संगीत के शास्त्र से वाकिफ़ नहीं.
आइये अब इस पोस्ट के मकसद की ओर......
आज से दो तीन दिन पूर्व पटियाला घराने के मूर्धन्य गायक उस्ताद बड़े
ग़ुलाम अली खाँ साहब की गायकी पर एकाग्र कार्यक्रम गायकी में सबरंग
का प्रसारण प्रारंभ हुआ है. इसकी प्रस्तोता हैं सुश्री छाया गांगुली.1995 में
पहली बार प्रसारित हुए इस कार्यक्रम में ख़ाँ साहब की गायकी पर प्रकाश
डाला है उस्ताद जी की गायकी के अग्रणी प्रस्तोता पं.अजय चक्रवर्ती ने.
अजयजी से बातचीत की है वरिष्ठ प्रसारणकर्ता मरहूम क़ब्बन मिर्ज़ा साहब ने.
शुरूआत में ख़याल गायकी के बारे में बताया गया और राग भूपाली में
निबध्द रचनाएँ सुनाईं गईं जो ख़ाँ साहब ने किसी प्रायवेट महफ़िल में
गाईं थीं.अभी बहुत सी कड़िया प्रसारित होना शेष हैं ज़रूर सुनें गायकी में सबरंग.
ये भी बता दें कि सबरंग उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब का तख़ल्लुस यानी
उपनाम था और सबरंग नाम से ही उस्ताद जी ने कई सुमधुर बंदिशे रचीं.
श्रेष्ठ माध्यम है. बरसों से कई शास्त्रीय संगीतप्रेमी सुबह साढ़े सात बजे
अपने रेडियो सैट से सट जाते हैं.इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी ताक़त
यह है कि कभी भी यह किसी तरह मोनोटनी नहीं परोसता.कभी
ख़याल गायकी के रंग हैं तो कभी ठुमरी के.कभी मौसमी रागों की
बात है तो कभी किसी वाद्य के बारे में विस्तार से जानकारी.साथ ही फ़िल्म
संगीत में यदि प्रस्तुत किये गये राग पर आधारित कोई गीत उपलब्ध
है उसे कार्यक्रम के अंत में लगभग सभी प्रस्तुतियों में सुनाया जाता है.
इससे वे श्रोता भी संगीत सरिता और शास्त्रीय संगीत की ओर आकृष्ट
होते हैं जो पूरी तरह् से भारतीय संगीत के शास्त्र से वाकिफ़ नहीं.
आइये अब इस पोस्ट के मकसद की ओर......
आज से दो तीन दिन पूर्व पटियाला घराने के मूर्धन्य गायक उस्ताद बड़े
ग़ुलाम अली खाँ साहब की गायकी पर एकाग्र कार्यक्रम गायकी में सबरंग
का प्रसारण प्रारंभ हुआ है. इसकी प्रस्तोता हैं सुश्री छाया गांगुली.1995 में
पहली बार प्रसारित हुए इस कार्यक्रम में ख़ाँ साहब की गायकी पर प्रकाश
डाला है उस्ताद जी की गायकी के अग्रणी प्रस्तोता पं.अजय चक्रवर्ती ने.
अजयजी से बातचीत की है वरिष्ठ प्रसारणकर्ता मरहूम क़ब्बन मिर्ज़ा साहब ने.
शुरूआत में ख़याल गायकी के बारे में बताया गया और राग भूपाली में
निबध्द रचनाएँ सुनाईं गईं जो ख़ाँ साहब ने किसी प्रायवेट महफ़िल में
गाईं थीं.अभी बहुत सी कड़िया प्रसारित होना शेष हैं ज़रूर सुनें गायकी में सबरंग.
ये भी बता दें कि सबरंग उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब का तख़ल्लुस यानी
उपनाम था और सबरंग नाम से ही उस्ताद जी ने कई सुमधुर बंदिशे रचीं.
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sanjay patel
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उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ,
गायकी में सबरंग,
विविध भारती,
संगीत सरिता,
सबरंग
Tuesday, July 1, 2008
संकेत धुनों का संगीत विश्लेषण
विविध भारती के संगीत के प्रतिष्ठित कार्यक्रम संगीत सरिता में हमने समय-समय पर कई श्रृंखलाएं सुनी। आज मैं अनुरोध करना चाहती हूँ एक ऐसी श्रृंखला की प्रस्तुति के लिए जिसमें विविध भारती की विभिन्न संकेत धुनों का संगीत विश्लेषण हो।
इस श्रृंखला में सभी धुनों को शामिल किया जाए जिसमें सबसे पुरानी आकाशवाणी की सिगनेचर ट्यून भी हो जो शुरू से आज तक लगातार बज रही है। इसके अलावा विविध भारती की सबसे पुरानी धुन भी हो जो हवामहल कार्यक्रम की है और वो तमाम संकेत धुनें हो जो नए पुराने लगभग सभी कार्यक्रमों के लिए बजती है जैसे -
वन्दनवार, संगीत सरिता, त्रिवेणी, सखि-सहेली, हैलो सहेली, पिटारा और पिटारा के अंतर्गत प्रसारित होने वाले कार्यक्रम, जयमाला, सलाम इंडिया, लोक संगीत
इन हर एक संकेत धुन में बजने वाले वाद्यों को बताइए और हो सके तो इनके राग भी बताइए। मुद्दा ये कि इन धुनों के संगीत का विश्लेषण कर हम श्रोताओं को समझाइए। मेरी समझ में विविध भारती की तरफ़ से श्रोताओं को स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर दिया जाने वाला यह नायाब तोहफ़ा होगा।
तो भई हम तो प्रतीक्षा कर रहे है कि विविध भारती की ओर से कब मिलेगा हमें तोहफ़ा… तोहफ़ा… तोहफ़ा… तोहफ़ा…
इस श्रृंखला में सभी धुनों को शामिल किया जाए जिसमें सबसे पुरानी आकाशवाणी की सिगनेचर ट्यून भी हो जो शुरू से आज तक लगातार बज रही है। इसके अलावा विविध भारती की सबसे पुरानी धुन भी हो जो हवामहल कार्यक्रम की है और वो तमाम संकेत धुनें हो जो नए पुराने लगभग सभी कार्यक्रमों के लिए बजती है जैसे -
वन्दनवार, संगीत सरिता, त्रिवेणी, सखि-सहेली, हैलो सहेली, पिटारा और पिटारा के अंतर्गत प्रसारित होने वाले कार्यक्रम, जयमाला, सलाम इंडिया, लोक संगीत
इन हर एक संकेत धुन में बजने वाले वाद्यों को बताइए और हो सके तो इनके राग भी बताइए। मुद्दा ये कि इन धुनों के संगीत का विश्लेषण कर हम श्रोताओं को समझाइए। मेरी समझ में विविध भारती की तरफ़ से श्रोताओं को स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर दिया जाने वाला यह नायाब तोहफ़ा होगा।
तो भई हम तो प्रतीक्षा कर रहे है कि विविध भारती की ओर से कब मिलेगा हमें तोहफ़ा… तोहफ़ा… तोहफ़ा… तोहफ़ा…
Saturday, June 21, 2008
राष्ट्रीय गीत और गान के राग
बरसों से संगीत सरिता, स्वर सुधा, राग-अनुराग जैसे कार्यक्रम हम सुनते आए है। हमें यह पता चल गया है कि ये ढेर सारे फ़िल्मी गीत कौन-कौन से राग पर आधारित है। पर खेद है कि अब तक यह जानकारी नहीं मिली कि राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम और राष्ट्रीय गान जन गन मन किन रागों पर आधारित है।
यह दोनों ही रचनाएँ बंगला भाषा के कवियों से निकली है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान रची गई इन रचनाओं को ये कवि स्वयं जन सभाओं में गाया करते थे जिससे लगता है कि यह रचनाएँ रविन्द्र संगीत में निबद्ध है। राष्ट्रीय गान के तो रचनाकार ही रविन्द्रनाथ टैगोर है।
बंकिम चन्द्र द्वारा रचित वन्देमातरम तो बहुत लम्बी रचना है जिसमें माँ दुर्गा की शक्ति का भी बख़ान है पर पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है और इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा देकर इसकी न केवल धुन बल्कि गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है जो बावन सेकेण्ड है।
इस तरह लगता है कि राष्ट्रीय गान और गीत के न सिर्फ़ राग बल्कि इसमें बजने वाले साज़ भी लगभग तय है। हम विविध भारती से अनुरोध करते है कि अपने प्रतिष्ठित कार्यक्रम संगीत सरिता में राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत का संगीत विश्लेषण प्रस्तुत करें।
साथ ही लोकप्रिय क़ौमी तराना - सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा, का भी संगीत विश्लेषण प्रस्तुत करें। मोहम्मद इक़बाल की यह रचना लगता है हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ही रची गई है जो लगभग एक ही धुन में लोकप्रिय है। मेरी जानकारी में यह तराना किसी और धुन में नहीं है।
यह दोनों ही रचनाएँ बंगला भाषा के कवियों से निकली है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान रची गई इन रचनाओं को ये कवि स्वयं जन सभाओं में गाया करते थे जिससे लगता है कि यह रचनाएँ रविन्द्र संगीत में निबद्ध है। राष्ट्रीय गान के तो रचनाकार ही रविन्द्रनाथ टैगोर है।
बंकिम चन्द्र द्वारा रचित वन्देमातरम तो बहुत लम्बी रचना है जिसमें माँ दुर्गा की शक्ति का भी बख़ान है पर पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है और इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा देकर इसकी न केवल धुन बल्कि गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है जो बावन सेकेण्ड है।
इस तरह लगता है कि राष्ट्रीय गान और गीत के न सिर्फ़ राग बल्कि इसमें बजने वाले साज़ भी लगभग तय है। हम विविध भारती से अनुरोध करते है कि अपने प्रतिष्ठित कार्यक्रम संगीत सरिता में राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत का संगीत विश्लेषण प्रस्तुत करें।
साथ ही लोकप्रिय क़ौमी तराना - सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा, का भी संगीत विश्लेषण प्रस्तुत करें। मोहम्मद इक़बाल की यह रचना लगता है हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ही रची गई है जो लगभग एक ही धुन में लोकप्रिय है। मेरी जानकारी में यह तराना किसी और धुन में नहीं है।
Tuesday, May 27, 2008
एक सुर बेसुरा सा…
संगीत सरिता में विभिन्न रागों की बारीकियाँ बताई जाती है। वाद्यों के बारे में समझाया जाता है। यह सब सुन कर शास्त्रीय संगीत का अच्छा ज्ञान होने लगता है।
इसके साथ-साथ मेरी संगीत यात्रा श्रृंखला में संगीतज्ञों की पूरी यात्रा उन्हीं की ज़ुबानी सुनाई जाती है जिससे उनकी शिक्षा, उनके कार्यक्रम, पुरस्कार सम्मान आदि के बारे में अच्छी जानकारी मिलती है।
पर कभी किसी कार्यक्रम में यह नहीं सुना कि आज अमुक कलाकार का जन्मदिन है, पुण्यतिथि है, उन्हें अमुक सम्मान मिला है। यहाँ तक कि हर साल गणतंत्र दिवस पर विभिन्न क्षेत्रों में योगदान के लिए सरकार पद्म पुरस्कार प्रदान करती है। इस सिलसिले में शास्त्रीय संगीत के कई कलाकार सम्मानित हुए। इतना ही नहीं विदेशों में भी भारतीय कलाकार सम्मानित होते है पर कभी विविध भारती ने इसकी चर्चा नहीं की।
कई बार विभिन्न कार्यक्रमों में सुनने को मिलता है कि आज अमुक गायक कलाकार या संगीतकार या गीतकार या निर्माता-निर्देशक का जन्मदिन या पुण्य तिथि है या उन्हें अमुक सम्मान मिला है और शुरू हो जाता है उनके गीतों का सिलसिला।
यह सिलसिला भूले-बिसरे गीतों से शुरू होता है। सुहाना सफ़र में, मन चाहे गीत में गीत बजते है। यहाँ तक कि अक्सर एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम भी समर्पित हो जाता है।
फ़िल्मी दुनिया के अलावा कुछ और हस्तियों को भी याद किया जाता है जैसे सखि-सहेली में कल्पना चावला, सुनिता विलियम्स। और तो और जब भारत की क्रिकेट टीम कहीं मैच जीतती है तब मन चाहे गीत में भी उन्हें बधाई दे दी जाती है। पर खेद है कि संगीत सरिता में ऐसा कभी कुछ नहीं होता।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कई कलाकार हमारे साथ है जो अब भी शास्त्रीय संगीत की परम्परा बनाए रखे है। कुछ हमसे बिछुड़ गए। आख़िर यह हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है इतनी महत्वपूर्ण फ़िल्में तो नहीं।
मानते है कि विविध भारती के कार्यक्रम फ़िल्मों से ही अधिक जुड़े है पर संगीत सरिता जैसे कार्यक्रमों का अपना महत्व है जिनका अपनी संस्कृति को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान है। रोज़ संगीत सरिता सुनने पर भी पता ही नहीं चलता कि किस महान संगीतज्ञ का जन्मदिन, पुण्यतिथि कब है। किसे, कब, क्या सम्मान मिला है।
आशा है इस कार्यक्रम में कलाकारों के योगदान को भी उचित समय पर उचित रूप में याद कर इस कार्यक्रम को कलाकारों के लिए समर्पित किया जाएगा। किसी महान संगीतज्ञ के जन्मदिन या पुण्यतिथि या उन्हें सम्मान मिलने पर संगीत सरिता में उनका गायन वादन प्रस्तुत कर उनकी शैली की चर्चा की जएगी।
इसके साथ-साथ मेरी संगीत यात्रा श्रृंखला में संगीतज्ञों की पूरी यात्रा उन्हीं की ज़ुबानी सुनाई जाती है जिससे उनकी शिक्षा, उनके कार्यक्रम, पुरस्कार सम्मान आदि के बारे में अच्छी जानकारी मिलती है।
पर कभी किसी कार्यक्रम में यह नहीं सुना कि आज अमुक कलाकार का जन्मदिन है, पुण्यतिथि है, उन्हें अमुक सम्मान मिला है। यहाँ तक कि हर साल गणतंत्र दिवस पर विभिन्न क्षेत्रों में योगदान के लिए सरकार पद्म पुरस्कार प्रदान करती है। इस सिलसिले में शास्त्रीय संगीत के कई कलाकार सम्मानित हुए। इतना ही नहीं विदेशों में भी भारतीय कलाकार सम्मानित होते है पर कभी विविध भारती ने इसकी चर्चा नहीं की।
कई बार विभिन्न कार्यक्रमों में सुनने को मिलता है कि आज अमुक गायक कलाकार या संगीतकार या गीतकार या निर्माता-निर्देशक का जन्मदिन या पुण्य तिथि है या उन्हें अमुक सम्मान मिला है और शुरू हो जाता है उनके गीतों का सिलसिला।
यह सिलसिला भूले-बिसरे गीतों से शुरू होता है। सुहाना सफ़र में, मन चाहे गीत में गीत बजते है। यहाँ तक कि अक्सर एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम भी समर्पित हो जाता है।
फ़िल्मी दुनिया के अलावा कुछ और हस्तियों को भी याद किया जाता है जैसे सखि-सहेली में कल्पना चावला, सुनिता विलियम्स। और तो और जब भारत की क्रिकेट टीम कहीं मैच जीतती है तब मन चाहे गीत में भी उन्हें बधाई दे दी जाती है। पर खेद है कि संगीत सरिता में ऐसा कभी कुछ नहीं होता।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कई कलाकार हमारे साथ है जो अब भी शास्त्रीय संगीत की परम्परा बनाए रखे है। कुछ हमसे बिछुड़ गए। आख़िर यह हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है इतनी महत्वपूर्ण फ़िल्में तो नहीं।
मानते है कि विविध भारती के कार्यक्रम फ़िल्मों से ही अधिक जुड़े है पर संगीत सरिता जैसे कार्यक्रमों का अपना महत्व है जिनका अपनी संस्कृति को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान है। रोज़ संगीत सरिता सुनने पर भी पता ही नहीं चलता कि किस महान संगीतज्ञ का जन्मदिन, पुण्यतिथि कब है। किसे, कब, क्या सम्मान मिला है।
आशा है इस कार्यक्रम में कलाकारों के योगदान को भी उचित समय पर उचित रूप में याद कर इस कार्यक्रम को कलाकारों के लिए समर्पित किया जाएगा। किसी महान संगीतज्ञ के जन्मदिन या पुण्यतिथि या उन्हें सम्मान मिलने पर संगीत सरिता में उनका गायन वादन प्रस्तुत कर उनकी शैली की चर्चा की जएगी।
Wednesday, May 21, 2008
'संगीत सरिता' की अमूल्य कड़ी
विविध भारती पर शास्त्रीय संगीत से परिचय कराने वाला सुन्दर कार्यक्रम आता है , सुबह ७.३० बजे से ७.४५ बजे तक - संगीत सरिता । आज इस कार्यक्रम की एक अत्यन्त सुन्दर कड़ी पूरी हुई । सरोद के उद्गम और विकास , उससे जुड़े घराने , उससे जुड़ीं बन्दिशें आदि पर विशद चर्चा हुई दो उस्तादों के द्वारा । सरोद वादक बुद्धदेव दासगुप्त से प्रख्यात सितारवादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र खाँ ने इस कार्यक्रम के लिए बातचीत की थी । संगीत के दो धुरन्धरों की आपसी बातचीत में सहजता ,सरलता थी और प्रश्नों को ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा था ताकि आम श्रोता का ज्ञान वर्धन हो। यह कार्यक्रम विविध भारती के लिए १९९५ में छाया गांगुलीजी ने तैय्यार किया था ।
विविध भारती और इस कार्यक्रम से जुड़े जो भी लोग जीवित हैं उन्हें युनुस ख़ान के जरिए मेरी पत्नी डॉ. स्वाति का 'आभार ' पहुँचे । स्वाति का जन्मस्थान ग्वालियर है इसलिए उन्हें लाजमीतौर पर शास्त्रीय संगीत में रुचि है ।
विविध भारती और इस कार्यक्रम से जुड़े जो भी लोग जीवित हैं उन्हें युनुस ख़ान के जरिए मेरी पत्नी डॉ. स्वाति का 'आभार ' पहुँचे । स्वाति का जन्मस्थान ग्वालियर है इसलिए उन्हें लाजमीतौर पर शास्त्रीय संगीत में रुचि है ।
Monday, May 12, 2008
रवीन्द्र संगीत
8 मई कविवर गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्मदिन है। देश भर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। आकाशवाणी हैदराबाद से मैनें भी एक वार्ता दी - गीतांजलि का संदेश।
समाचार पत्रों में विभिन्न जगह आयोजित कार्यक्रमों के समाचार मिले जिनमें से आकर्षक कार्यक्रम था गुरूदेव की भूमि कलकत्ता के विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम जो साहित्य, कला और संगीत से सरोबार रहा।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के साहित्य का अनुवाद तो सभी भाषाओं में हुआ। हिन्दी अनुवाद को विविध भारती के हवामहल के अलावा नाटकों में भी सुना और कई-कई बार सुना। बहुत ही सुन्दर नाट्य रूपान्तर और प्रस्तुति। पर खेद है कि कभी भी रवीन्द्र संगीत की चर्चा नहीं हुई।
संगीत सरिता कार्यक्रम रोज़ प्रसारित होता है। वर्षों से प्रसारित हो रहा है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, वाद्य, फ़िल्मी संगीत की जानकारी दी जाती है। कर्नाटक संगीत की भी चर्चा होती है। बहुत ही बारिकी से यह भी बताया जाता है कि शास्त्रीय संगीत के इन दोनों रूपों हिन्दुस्तानी और कर्नाटक की परम्परा क्या है, इनमें समानता और फ़र्क क्या है और फ़िल्मों में इसका प्रयोग कैसा रहा।
यहां तक कि दोनों तरह के संगीत में प्रयुक्त होने वाले वाद्यों की चर्चा भी विस्तार से की जाती है जिसमें जाने-माने संगीतज्ञ भी भाग लेते है। पर शास्त्रीय संगीत के तीसरे रूप रवीन्द्र संगीत की कभी चर्चा नहीं हुई।
मुझे लगता है कि सचिन देव (एस डी) बर्मन और अनिल विश्वास के संगीत पर कुछ तो छाप रवीन्द्र संगीत की होगी। हो सकता है कि मन्ना डे और पंकज मलिक की गायकी पर भी इसका प्रभाव रहा हो। इन सभी कलाकारों पर संगीत सरिता में चर्चा तो की गई पर रवीन्द्र संगीत का कभी नामो-निशान नहीं रहा।
यह आकाशवाणी संस्कृति के बाहर की बात तो नहीं है। कलकत्ता के केन्द्रों से ज़रूर रवीन्द्र संगीत के कार्यक्रम होते होंगें ऐसा मेरा अनुमान है। क्या संगीत सरिता में एक श्रृंखला ऐसी नहीं हो सकती जिससे रवीन्द्र संगीत के बारे में कम से कम आरंभिक जानाकारी मिल जाए ?
समाचार पत्रों में विभिन्न जगह आयोजित कार्यक्रमों के समाचार मिले जिनमें से आकर्षक कार्यक्रम था गुरूदेव की भूमि कलकत्ता के विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम जो साहित्य, कला और संगीत से सरोबार रहा।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के साहित्य का अनुवाद तो सभी भाषाओं में हुआ। हिन्दी अनुवाद को विविध भारती के हवामहल के अलावा नाटकों में भी सुना और कई-कई बार सुना। बहुत ही सुन्दर नाट्य रूपान्तर और प्रस्तुति। पर खेद है कि कभी भी रवीन्द्र संगीत की चर्चा नहीं हुई।
संगीत सरिता कार्यक्रम रोज़ प्रसारित होता है। वर्षों से प्रसारित हो रहा है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, वाद्य, फ़िल्मी संगीत की जानकारी दी जाती है। कर्नाटक संगीत की भी चर्चा होती है। बहुत ही बारिकी से यह भी बताया जाता है कि शास्त्रीय संगीत के इन दोनों रूपों हिन्दुस्तानी और कर्नाटक की परम्परा क्या है, इनमें समानता और फ़र्क क्या है और फ़िल्मों में इसका प्रयोग कैसा रहा।
यहां तक कि दोनों तरह के संगीत में प्रयुक्त होने वाले वाद्यों की चर्चा भी विस्तार से की जाती है जिसमें जाने-माने संगीतज्ञ भी भाग लेते है। पर शास्त्रीय संगीत के तीसरे रूप रवीन्द्र संगीत की कभी चर्चा नहीं हुई।
मुझे लगता है कि सचिन देव (एस डी) बर्मन और अनिल विश्वास के संगीत पर कुछ तो छाप रवीन्द्र संगीत की होगी। हो सकता है कि मन्ना डे और पंकज मलिक की गायकी पर भी इसका प्रभाव रहा हो। इन सभी कलाकारों पर संगीत सरिता में चर्चा तो की गई पर रवीन्द्र संगीत का कभी नामो-निशान नहीं रहा।
यह आकाशवाणी संस्कृति के बाहर की बात तो नहीं है। कलकत्ता के केन्द्रों से ज़रूर रवीन्द्र संगीत के कार्यक्रम होते होंगें ऐसा मेरा अनुमान है। क्या संगीत सरिता में एक श्रृंखला ऐसी नहीं हो सकती जिससे रवीन्द्र संगीत के बारे में कम से कम आरंभिक जानाकारी मिल जाए ?
Monday, May 5, 2008
शास्त्रीय संगीत का पहला पाठ
दो दिन पहले संगीत सरिता में बत्तीस कड़ियों की श्रृंखला समाप्त हुई - थाट और उसके प्रकार। रूपाली (रूपक) जी की अन्य श्रृंखलाओं की तरह यह श्रृंखला भी ज्ञानवर्धक रही जिसे वीणा (राय सिंघानी) जी और विनीता (ढोलकिया) जी की सहायता से तैयार किया गया।
इस श्रृंखला को तीन संगीतज्ञों ने प्रस्तुत किया - पद्मा तलवलकर, पंडित विद्याधर व्यास और प्रभाकर कालेकर
शुरूवात की पद्मा तलवलकर जी ने और बताया कि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में कुल दस थाट है। फिर शुरू हुआ सिलसिला एक के बाद एक सभी थाटों की जानकारी देने का। एक-एक थाट में आने वाले रागों की चर्चा की गई। इन रागों का आरोह-अवरोह चलन बताया गया फिर इन रागों में बंदिशें भी सुनवाई गई।
हर एक थाट के प्रचलित और कम प्रचलित दोनों ही तरह के रागों की चर्चा की गई। शुरूवाती कड़ियों में पद्मा तलवलकर जी ने मालवा थाट के राग मालवा, पूरिया की जानकारी दी। इसके बाद पंडित विद्याधर व्यास ने जिन थाटों की जानकारी दी उनमें है कल्याण थाट का राग कल्याण।
बाद की कड़ियों में प्रभाकर कालेकर जी ने खमाज थाट के राग कलावती की जानकारी दी और इसकी बंदिश में तीन ताल को भी समझाया। बिलावल थाट का राग शंकरा, कठिन राग विहाग और मधुर राग हंसध्वनि की चर्चा की।
अंतिम कड़ियों में आसावरी थाट का राग देसी और कम प्रचलित राग देश गन्धर्व की चर्चा की गई। अंत में प्रस्तुत किया गया थाट भैरवी जैसा कि शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में कार्यक्रम का समापन राग भैरवी से होता है। पहले ऐसे कार्यक्रम रात-रात भर चला करते थे और जब रात की सामप्ति होने लगती तो कलाकार भैरवी के सुर छेड़ देते और श्रोता समझ जाते कि यह अंतिम प्रस्तुति है।
भैरवी थाट में भोपाल तोड़ी और बिलासख़ानी तोड़ी की चर्चा की गई। श्रृंखला में रागों की जानकारी के साथ-साथ सामान्य जानकारी भी दी गई जैसे बिलासख़ानी तोड़ी के लिए बताया गया कि यह तानसेन के पुत्र ने तैयार किया और उन्हीं के नाम से इसे जारी किया गया।
अंतिम प्रस्तुति थी राग भैरवी। इस तरह शास्त्रीय संगीत की आरंभिक जानकारी श्रोताओं को मिल गई।
इस श्रृंखला को तीन संगीतज्ञों ने प्रस्तुत किया - पद्मा तलवलकर, पंडित विद्याधर व्यास और प्रभाकर कालेकर
शुरूवात की पद्मा तलवलकर जी ने और बताया कि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में कुल दस थाट है। फिर शुरू हुआ सिलसिला एक के बाद एक सभी थाटों की जानकारी देने का। एक-एक थाट में आने वाले रागों की चर्चा की गई। इन रागों का आरोह-अवरोह चलन बताया गया फिर इन रागों में बंदिशें भी सुनवाई गई।
हर एक थाट के प्रचलित और कम प्रचलित दोनों ही तरह के रागों की चर्चा की गई। शुरूवाती कड़ियों में पद्मा तलवलकर जी ने मालवा थाट के राग मालवा, पूरिया की जानकारी दी। इसके बाद पंडित विद्याधर व्यास ने जिन थाटों की जानकारी दी उनमें है कल्याण थाट का राग कल्याण।
बाद की कड़ियों में प्रभाकर कालेकर जी ने खमाज थाट के राग कलावती की जानकारी दी और इसकी बंदिश में तीन ताल को भी समझाया। बिलावल थाट का राग शंकरा, कठिन राग विहाग और मधुर राग हंसध्वनि की चर्चा की।
अंतिम कड़ियों में आसावरी थाट का राग देसी और कम प्रचलित राग देश गन्धर्व की चर्चा की गई। अंत में प्रस्तुत किया गया थाट भैरवी जैसा कि शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में कार्यक्रम का समापन राग भैरवी से होता है। पहले ऐसे कार्यक्रम रात-रात भर चला करते थे और जब रात की सामप्ति होने लगती तो कलाकार भैरवी के सुर छेड़ देते और श्रोता समझ जाते कि यह अंतिम प्रस्तुति है।
भैरवी थाट में भोपाल तोड़ी और बिलासख़ानी तोड़ी की चर्चा की गई। श्रृंखला में रागों की जानकारी के साथ-साथ सामान्य जानकारी भी दी गई जैसे बिलासख़ानी तोड़ी के लिए बताया गया कि यह तानसेन के पुत्र ने तैयार किया और उन्हीं के नाम से इसे जारी किया गया।
अंतिम प्रस्तुति थी राग भैरवी। इस तरह शास्त्रीय संगीत की आरंभिक जानकारी श्रोताओं को मिल गई।
Friday, April 4, 2008
राग में ढलती अनुभूतियां
अनुभूतियां जब शब्दों में ढलती है तो कविता बनती है, यह बात तो सभी जानते है लेकिन यह बात शायद सभी नहीं जानते कि अनुभूतियां राग में भी ढलती है।
जब सामाजिक परिवेश से भावनाएं बदली तब कविता भी छंद और लय की सीमाएं तोड़ कर बाहर निकली। इसी तरह कभी-कभी अनुभूतियां भी पारम्परिक रागों में नहीं ढल पाती और फूट पड़ते है नए राग।
इस सप्ताह के आरंभ में संगीत-सरिता में एक बहुत ही अच्छी श्रृंखला समाप्त हुई - राग रसीले रंग निराले जिसे तैयार किया छाया (गांगुली) जी ने और प्रस्तुत किया प्रसिद्ध बांसुरी वादक और संगीतकार डाँ विजय राघव राव जी ने।
कुछ नया सुनने मिला जैसे राग शिव कौंस पाश्चात्य वाद्यों पर और भारतीय परम्परा में झप ताल पर। उन्होनें खुद की रचना भी प्रस्तुत की राग मधु कौंस में।
मूल जानकारी तो ये थी कि परम्परागत राग कुछ है जैसे यमन, तोड़ी इन रागों में कुछ बदलाव कर या इनका समन्वय कर नए राग बनाए जाते है जैसे शुद्ध नट और हंस ध्वनि के समन्वय से बना राग नट हंस जिसे प्रस्तुत भी किया गया।
एक बहुत ही भावुक प्रस्तुति भी रही राग विजय रंजिनी जो राग पीलू और कल्याण का मिश्रण है। इसके बारे में उन्होनें बताया कि आन्ध्र प्रदेश में विजयवाड़ा में मंदिर में हुई भावानात्मक अनुभूति जब राग में ढलने लगी तो वह परम्परागत सीमाएं तोड़ कर बाहर आई और तैयार हुआ यह मिश्रित राग।
यहाँ एक बात मेरे मन में आ रही है कि जैसे विज्ञान में विशेषकर पौधों में विभिन्न किस्मों की विशेषताओं को लेकर एक नया पौधा तैयार किया जाता है जिसे संकर या हाइब्रिड कहते है उसी तरह से ये मिश्रित राग भी क्या संकर या हाइब्रिड कहे जा सकते है ?
मुझे याद आ रहा है बहुत पहले शायद इसी कार्यक्रम में बताया गया था कि परम्परागत राग तोड़ी में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ तानसेन ने कुछ परिवर्तन किए और इस तरह बना नया राग मियां की तोड़ी कहलाया।
यहाँ मैं एक अनुरोध करना चाहती हूँ कि इस तरह संगीतज्ञों द्वारा बनाए गए राग और मिश्रित रागों पर एक श्रृंखला प्रस्तुत कीजिए जिसमें यह बताइए कि किन मूल रागों कि कौन-कौन सी विशेषताओं को लेकर मिश्रित राग तैयार किए गए और किसने इन रागों को तैयार किया।
जब सामाजिक परिवेश से भावनाएं बदली तब कविता भी छंद और लय की सीमाएं तोड़ कर बाहर निकली। इसी तरह कभी-कभी अनुभूतियां भी पारम्परिक रागों में नहीं ढल पाती और फूट पड़ते है नए राग।
इस सप्ताह के आरंभ में संगीत-सरिता में एक बहुत ही अच्छी श्रृंखला समाप्त हुई - राग रसीले रंग निराले जिसे तैयार किया छाया (गांगुली) जी ने और प्रस्तुत किया प्रसिद्ध बांसुरी वादक और संगीतकार डाँ विजय राघव राव जी ने।
कुछ नया सुनने मिला जैसे राग शिव कौंस पाश्चात्य वाद्यों पर और भारतीय परम्परा में झप ताल पर। उन्होनें खुद की रचना भी प्रस्तुत की राग मधु कौंस में।
मूल जानकारी तो ये थी कि परम्परागत राग कुछ है जैसे यमन, तोड़ी इन रागों में कुछ बदलाव कर या इनका समन्वय कर नए राग बनाए जाते है जैसे शुद्ध नट और हंस ध्वनि के समन्वय से बना राग नट हंस जिसे प्रस्तुत भी किया गया।
एक बहुत ही भावुक प्रस्तुति भी रही राग विजय रंजिनी जो राग पीलू और कल्याण का मिश्रण है। इसके बारे में उन्होनें बताया कि आन्ध्र प्रदेश में विजयवाड़ा में मंदिर में हुई भावानात्मक अनुभूति जब राग में ढलने लगी तो वह परम्परागत सीमाएं तोड़ कर बाहर आई और तैयार हुआ यह मिश्रित राग।
यहाँ एक बात मेरे मन में आ रही है कि जैसे विज्ञान में विशेषकर पौधों में विभिन्न किस्मों की विशेषताओं को लेकर एक नया पौधा तैयार किया जाता है जिसे संकर या हाइब्रिड कहते है उसी तरह से ये मिश्रित राग भी क्या संकर या हाइब्रिड कहे जा सकते है ?
मुझे याद आ रहा है बहुत पहले शायद इसी कार्यक्रम में बताया गया था कि परम्परागत राग तोड़ी में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ तानसेन ने कुछ परिवर्तन किए और इस तरह बना नया राग मियां की तोड़ी कहलाया।
यहाँ मैं एक अनुरोध करना चाहती हूँ कि इस तरह संगीतज्ञों द्वारा बनाए गए राग और मिश्रित रागों पर एक श्रृंखला प्रस्तुत कीजिए जिसमें यह बताइए कि किन मूल रागों कि कौन-कौन सी विशेषताओं को लेकर मिश्रित राग तैयार किए गए और किसने इन रागों को तैयार किया।
Monday, February 25, 2008
श्रोताओं से सीधे जुड़ती संगीत सरीता
फ़्यूज़न म्यूज़िक और भारतीय शास्त्रीय संगीत के मेल की जानकारी देती श्रृंखला सुर मंथन सुनी जिसे संगीत सरिता के लिए रूपाली रूपक ने वीणा राय सिंघानी के सहयोग से प्रस्तुत किया।
इस श्रृंखला में सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया ने विभिन्न रागों जैसे चारूकेशी आदि के लिए आरोह अवरोह के साथ दोनों तरह के संगीत की जानकारी दी। यह राग आधुनिक वाद्य यंत्रों पर फ़्यूज़न म्यूज़िक में भी सुनवाए गए।
जब बारी आई इन रागों पर फ़िल्मी गीत सुनवाने की तब उन्होंने कहा कि यह गीत सुनिए और इसका विवरण चिट्ठी लिख कर भेजिए या फोन पर बताइए। इस विवरण में श्रोताओं को बताना है कि गीत किसने गाया है और संगीतकार कौन है। गीत भी ऐसे लोकप्रिय सुनवाए गए जैसे -
देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए
दूर तक निगाह में है गुल खिले हुए
मैं सोच रही थी कि श्रृंखला के अंत में श्रोताओं की चिट्ठियां पढी जाएगी और उनके फोन काल सुनवाए जाएगें या कम से कम उनके नाम बताए जाएगें। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कल इसकी आठवीं और अंतिम कड़ी प्रसारित हुई। इस कड़ी में भी गीत सुनवाया गया और श्रोताओं से विवरण बताने को कहा गया।
यहां तक कि न फोन नम्बर बताया गया न पता बताया गया। इस बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई। वैसे संगीत सरिता में यह अच्छी शुरूवात है।
इस श्रृंखला में सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया ने विभिन्न रागों जैसे चारूकेशी आदि के लिए आरोह अवरोह के साथ दोनों तरह के संगीत की जानकारी दी। यह राग आधुनिक वाद्य यंत्रों पर फ़्यूज़न म्यूज़िक में भी सुनवाए गए।
जब बारी आई इन रागों पर फ़िल्मी गीत सुनवाने की तब उन्होंने कहा कि यह गीत सुनिए और इसका विवरण चिट्ठी लिख कर भेजिए या फोन पर बताइए। इस विवरण में श्रोताओं को बताना है कि गीत किसने गाया है और संगीतकार कौन है। गीत भी ऐसे लोकप्रिय सुनवाए गए जैसे -
देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए
दूर तक निगाह में है गुल खिले हुए
मैं सोच रही थी कि श्रृंखला के अंत में श्रोताओं की चिट्ठियां पढी जाएगी और उनके फोन काल सुनवाए जाएगें या कम से कम उनके नाम बताए जाएगें। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कल इसकी आठवीं और अंतिम कड़ी प्रसारित हुई। इस कड़ी में भी गीत सुनवाया गया और श्रोताओं से विवरण बताने को कहा गया।
यहां तक कि न फोन नम्बर बताया गया न पता बताया गया। इस बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई। वैसे संगीत सरिता में यह अच्छी शुरूवात है।
Friday, February 8, 2008
भारतीय ताल वाद्य और फिल्म संगीत
संगीत सरिता कार्यक्रम में इन दिनों एक बहुत अच्छी श्रंखला चल रही है - भारतीय ताल वाद्य और फिल्म संगीत जिसे प्रस्तुत कर रहे है कांचन (प्रकाश संगीत ) जी और उनके सहयोगी दिलीप ( कुलकर्णी ) जी और वीना ( राय सिंघानिया ) जी।
प्रसिद्ध तबला वादक श्री बाल कृष्ण अय्यर जी से निम्मी ( मिश्रा ) जी की बातचीत पर आधारित इस कार्यक्रम में ताल वाद्यों की जानकारी दी जा रही है।
शुरूवात में पखावाज की जानकारी दी गई जिसके बाद मृदंगम की। कई नई बातें सामने आई जैसे कि संस्कृत शब्द मृदा यानी मिट्टी से बने इस वाद्य का नाम इसीलिए मृदंगम है। वाद्यों की पूरी जानकारी के साथ-साथ जब वादक पार्थ सारथी जी और शेखर जी बजा कर सुनाते है तो सारी बातें बहुत अच्छी तरह से समझ में आ जाती है।
पिछली कडियों में तबले की जानकारी दी गई जिसमें कई बातें ऎसी थी जो शास्त्रीय सन्गीत की जानकारी नहीं पर रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी रही जैसे तबले को कैसे बांधा जाता है और आटा लगाया जाता है।
इसी तरह उप ताल वाद्यों - खंजीरा और मोर सिंग (शायद लिखने में गलती हो ) के बारे में भी बताया गया कि इनका प्रयोग कर्णाटक संगीत में अधिक होता है। यहाँ यह नहीं बताया गया कि हिन्दुस्तानी भक्ति संगीत में जैसे मीरा और कबीर के भजनों में जिस मंजीरा का प्रयोग किया जाता है क्या यह और खंजीरा अलग है। मीरा के तो एक हाथ में तम्बूरा होता है और एक हाथ में मंजीरा.
इसी तरह सूफी फकीर भी चिमटा बजाते है। क्या यह भी ताल वाद्य है ?
आज तेरहवीं कडी में ढोल की बात हुई। महाराष्ट्र , गुजरात और पंजाब के ढोल और लोक संगीत की बात चली। पंजाब के गले में लटकाने वाले जिस छोटे ढोल की बात चली यही ढोल दखिनी लोक संगीत में भी है। हैदराबादी उर्दू यानी दखिनी जबान में लोक गीतों को तो ढोलक के गीत ही कहते है। इनमें से एक गीत फिल्म बाजार में पैमिला चोपडा और साथियो की आवाजों में है -
चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारी रे
आशा है आगे की कडियों में इस पर भी चर्चा होगी।
प्रसिद्ध तबला वादक श्री बाल कृष्ण अय्यर जी से निम्मी ( मिश्रा ) जी की बातचीत पर आधारित इस कार्यक्रम में ताल वाद्यों की जानकारी दी जा रही है।
शुरूवात में पखावाज की जानकारी दी गई जिसके बाद मृदंगम की। कई नई बातें सामने आई जैसे कि संस्कृत शब्द मृदा यानी मिट्टी से बने इस वाद्य का नाम इसीलिए मृदंगम है। वाद्यों की पूरी जानकारी के साथ-साथ जब वादक पार्थ सारथी जी और शेखर जी बजा कर सुनाते है तो सारी बातें बहुत अच्छी तरह से समझ में आ जाती है।
पिछली कडियों में तबले की जानकारी दी गई जिसमें कई बातें ऎसी थी जो शास्त्रीय सन्गीत की जानकारी नहीं पर रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी रही जैसे तबले को कैसे बांधा जाता है और आटा लगाया जाता है।
इसी तरह उप ताल वाद्यों - खंजीरा और मोर सिंग (शायद लिखने में गलती हो ) के बारे में भी बताया गया कि इनका प्रयोग कर्णाटक संगीत में अधिक होता है। यहाँ यह नहीं बताया गया कि हिन्दुस्तानी भक्ति संगीत में जैसे मीरा और कबीर के भजनों में जिस मंजीरा का प्रयोग किया जाता है क्या यह और खंजीरा अलग है। मीरा के तो एक हाथ में तम्बूरा होता है और एक हाथ में मंजीरा.
इसी तरह सूफी फकीर भी चिमटा बजाते है। क्या यह भी ताल वाद्य है ?
आज तेरहवीं कडी में ढोल की बात हुई। महाराष्ट्र , गुजरात और पंजाब के ढोल और लोक संगीत की बात चली। पंजाब के गले में लटकाने वाले जिस छोटे ढोल की बात चली यही ढोल दखिनी लोक संगीत में भी है। हैदराबादी उर्दू यानी दखिनी जबान में लोक गीतों को तो ढोलक के गीत ही कहते है। इनमें से एक गीत फिल्म बाजार में पैमिला चोपडा और साथियो की आवाजों में है -
चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारी रे
आशा है आगे की कडियों में इस पर भी चर्चा होगी।
Friday, January 18, 2008
कोयलिया बोले अमवा की डाल पर
आज सुबह संगीत सरिता में श्रृंखला कार्यक्रम ध्रुपद धमाल का सुरीला संसार की अंतिम कड़ी प्रसारित हुई। आठ कड़ियों की इस श्रृंखला में ध्रुपद गायकी से परिचित करवाया उदय भवालकर जी ने।
संगीत के क्षेत्र में शास्त्रीय संगीत वैसे ही एक कठिन विधा है इस पर ध्रुपद गायकी तो और भी कठिन है लेकिन इसे समझने में इस श्रृंखला से बहुत सहायता मिली।
बहुत ही सरल शैली में सहजता से इसकी बारीकियों को बताया गया। साथ ही विभिन्न रागों में इसके सुर-ताल की बंदिशे भी प्रस्तुत की गई। मुझे सबसे अच्छी लगी राग सोनी पर आधारित प्रस्तुति।
आज अंतिम कड़ी में राग मालकौंस प्रस्तुत हुआ। जब मैनें इसकी बंदिश सुनी तो मुझे याद आ गई बचपन की संगीत कक्षा जहां हमारी शिक्षिका श्रीमती कमला पोद्दार ने हमें इस राग में एक बंदिश सिखाई थी जिसके बोल थे -
कोयलिया बोले अमवा की डाल पर
ॠतु बसन्त की देत सन्देशवा
विविध भारती के इस कार्यक्रम से तो रसिक श्रोताओं को आनन्द आता ही है और मेरे जैसे श्रोता भी इसकी हर कड़ी से अपने आपको कुछ अधिक जानकर महसूस करने लगते है। विशेषकर रूपाली (रूपक - कुलकर्णी) जी की हर प्रस्तुति पारम्परिक संगीत के ज्ञान को बढाती ही रही।
संगीत के क्षेत्र में शास्त्रीय संगीत वैसे ही एक कठिन विधा है इस पर ध्रुपद गायकी तो और भी कठिन है लेकिन इसे समझने में इस श्रृंखला से बहुत सहायता मिली।
बहुत ही सरल शैली में सहजता से इसकी बारीकियों को बताया गया। साथ ही विभिन्न रागों में इसके सुर-ताल की बंदिशे भी प्रस्तुत की गई। मुझे सबसे अच्छी लगी राग सोनी पर आधारित प्रस्तुति।
आज अंतिम कड़ी में राग मालकौंस प्रस्तुत हुआ। जब मैनें इसकी बंदिश सुनी तो मुझे याद आ गई बचपन की संगीत कक्षा जहां हमारी शिक्षिका श्रीमती कमला पोद्दार ने हमें इस राग में एक बंदिश सिखाई थी जिसके बोल थे -
कोयलिया बोले अमवा की डाल पर
ॠतु बसन्त की देत सन्देशवा
विविध भारती के इस कार्यक्रम से तो रसिक श्रोताओं को आनन्द आता ही है और मेरे जैसे श्रोता भी इसकी हर कड़ी से अपने आपको कुछ अधिक जानकर महसूस करने लगते है। विशेषकर रूपाली (रूपक - कुलकर्णी) जी की हर प्रस्तुति पारम्परिक संगीत के ज्ञान को बढाती ही रही।
Friday, September 28, 2007
संगीत सरिता में बचपन से किया सद्यः स्नान
हम जिस स्कूल में पढते थे वहां संगीत अनिवार्य विषय था। सप्ताह में एक दिन संगीत की कक्षा लगती थी। यह कक्षा संगीत कक्ष में ही लगती थी।
संगीत कक्ष एक बड़ा सा कमरा था जिसमें दरी बिछी होती थी। हम सब छात्र दरी पर बैठते, सामने कुर्सी पर हमारी अध्यापिका श्रीमती कमला पोद्दार बैठती और साथ लगी मेज़ पर होता हारमोनियम। दीवार से लगी शीशे की अलमारियों में सजे होते तबला, ढोलक, घुंघरू, सितार, वीणा। लेकिन हमारे पाठ्यक्रम में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में केवल गायन शामिल था वादन नहीं इसलिए इन साज़ों का प्रयोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया जाता था।
हमारी अध्यापिका श्रीमती कमला पोद्दार बहुत अच्छी कलाकार थी। आकाशवाणी के हैदराबाद केन्द्र से उनके कार्यक्रम नियमित प्रसारित होते थे। कक्षा में हमें विभिन्न राग सिखाए जाते। उनका सिखाने का तरीका भी बहुत अच्छा था।
पहले वो राग का नाम बतातीं, फिर बतातीं कि यह राग किस थाट से उत्पन्न हुआ है। उसके बाद बताया जाता आरोह - अवरोह, वादी - संवादी, शुद्ध स्वर, धईवत स्वर और गायन का समय। फिर इन्ही बातों को वो दुबारा बतातीं और हम अपनी कापियों में नोट करते जो ज़रूरी था क्योंकि संगीत की तिमाही, छमाही और वार्षिक परीक्षा भी होती थी।
राग के बारे में लिखने के बाद हारमोनियम पर आरोह अवरोह अध्यापिका गा कर सुनातीं। फिर राग पर आधारित हमें एक गीत सिखाया जाता। इस तरह स्कूली जीवन में विभिन्न रागों पर गीत , भजन सीखें। लेकिन आज अफ़सोस है एक बात का कि हमने उन कापियों को संभाल कर नहीं रखा।
उन्हीं दिनों परिचय हुआ संगीत सरिता कार्यक्रम से। रेडियो तो बचपन से ही रोज़ ही घर में बजते देखा। लेकिन जब स्कूल में संगीत सीखते थे तब यह कार्यक्रम अधिक अच्छा लगता था।
उन दिनों इस कार्यक्रम में भी प्रतिदिन एक राग के बारे में वही सब बताया जाता । फिर उस राग पर आधारित एक फ़िल्मी गीत बजता और फिर साज़ पर यही राग बजाया जाता। हम सभी ये कार्यक्रम रोज़ सुबह साढे सात बजे सुनते।
कभी - कभी जो राग रेडियो में सुनते वही स्कूल में सिखाया जाता तब हम सब गीत सीखते समय उस फ़िल्मी गीत की बात कहने लगते तब अध्यापिका कहती - नहीं, तुम्हारे वो फ़िल्मी गाने बिल्कुल नहीं। स्कूल तो छूटा पर सुबह साढे सात बजे संगीत सरिता सुनने का क्रम आज तक नहीं टूटा।
इस कार्यक्रम में कई परिवर्तन हुए। पहले रोज़ केवल रागों के बारे में बताया जाता था। फिर हर रविवार को विशेष कार्यक्रम होने लगा जिसमें संगीत के क्षेत्र के किसी महान व्यक्ति से बातचीत की जाती। फिर आया श्रंखलाओं का दौर।
जब मैनें श्रंखला सुनी पार्शव गायन के रंगीन ताने बाने तो मुझे याद आया - नहीं, तुम्हारे वो फ़िल्मी गाने बिल्कुल नहीं।
सभी श्रंखलाएं अच्छी लगी - रसि केशु, तबला और उसका बाज़, मेरी संगीत यात्रा, सरोद का सुर संसार । बेगम अख़तर पर कार्यक्रम, परवीन सुलताना, सूफ़ी गायक बुल्ले शाह, एक और गायिका जिसका नाम मैं भूल रही हूं जिसका प्रसारण 96 या 97 के आस पास हुआ था, इन सब से बहुत कुछ जाना। अच्छा लगा गुलज़ार, आर डी और आशा को एक साथ सुनना।
अब भी अच्छा चल रहा है। ज़रीन शर्मा की श्रंखला समाप्त हुई और अब चल रही है मदन मोहन की।
वाकई बधाई के पात्र है - रूपाली रूपक (कुलकर्णी) , छाया गांगुली, कांचन प्रकाश संगीत, कमला कुंदर, अशोक सोनावरे।
संगीत कक्ष एक बड़ा सा कमरा था जिसमें दरी बिछी होती थी। हम सब छात्र दरी पर बैठते, सामने कुर्सी पर हमारी अध्यापिका श्रीमती कमला पोद्दार बैठती और साथ लगी मेज़ पर होता हारमोनियम। दीवार से लगी शीशे की अलमारियों में सजे होते तबला, ढोलक, घुंघरू, सितार, वीणा। लेकिन हमारे पाठ्यक्रम में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में केवल गायन शामिल था वादन नहीं इसलिए इन साज़ों का प्रयोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया जाता था।
हमारी अध्यापिका श्रीमती कमला पोद्दार बहुत अच्छी कलाकार थी। आकाशवाणी के हैदराबाद केन्द्र से उनके कार्यक्रम नियमित प्रसारित होते थे। कक्षा में हमें विभिन्न राग सिखाए जाते। उनका सिखाने का तरीका भी बहुत अच्छा था।
पहले वो राग का नाम बतातीं, फिर बतातीं कि यह राग किस थाट से उत्पन्न हुआ है। उसके बाद बताया जाता आरोह - अवरोह, वादी - संवादी, शुद्ध स्वर, धईवत स्वर और गायन का समय। फिर इन्ही बातों को वो दुबारा बतातीं और हम अपनी कापियों में नोट करते जो ज़रूरी था क्योंकि संगीत की तिमाही, छमाही और वार्षिक परीक्षा भी होती थी।
राग के बारे में लिखने के बाद हारमोनियम पर आरोह अवरोह अध्यापिका गा कर सुनातीं। फिर राग पर आधारित हमें एक गीत सिखाया जाता। इस तरह स्कूली जीवन में विभिन्न रागों पर गीत , भजन सीखें। लेकिन आज अफ़सोस है एक बात का कि हमने उन कापियों को संभाल कर नहीं रखा।
उन्हीं दिनों परिचय हुआ संगीत सरिता कार्यक्रम से। रेडियो तो बचपन से ही रोज़ ही घर में बजते देखा। लेकिन जब स्कूल में संगीत सीखते थे तब यह कार्यक्रम अधिक अच्छा लगता था।
उन दिनों इस कार्यक्रम में भी प्रतिदिन एक राग के बारे में वही सब बताया जाता । फिर उस राग पर आधारित एक फ़िल्मी गीत बजता और फिर साज़ पर यही राग बजाया जाता। हम सभी ये कार्यक्रम रोज़ सुबह साढे सात बजे सुनते।
कभी - कभी जो राग रेडियो में सुनते वही स्कूल में सिखाया जाता तब हम सब गीत सीखते समय उस फ़िल्मी गीत की बात कहने लगते तब अध्यापिका कहती - नहीं, तुम्हारे वो फ़िल्मी गाने बिल्कुल नहीं। स्कूल तो छूटा पर सुबह साढे सात बजे संगीत सरिता सुनने का क्रम आज तक नहीं टूटा।
इस कार्यक्रम में कई परिवर्तन हुए। पहले रोज़ केवल रागों के बारे में बताया जाता था। फिर हर रविवार को विशेष कार्यक्रम होने लगा जिसमें संगीत के क्षेत्र के किसी महान व्यक्ति से बातचीत की जाती। फिर आया श्रंखलाओं का दौर।
जब मैनें श्रंखला सुनी पार्शव गायन के रंगीन ताने बाने तो मुझे याद आया - नहीं, तुम्हारे वो फ़िल्मी गाने बिल्कुल नहीं।
सभी श्रंखलाएं अच्छी लगी - रसि केशु, तबला और उसका बाज़, मेरी संगीत यात्रा, सरोद का सुर संसार । बेगम अख़तर पर कार्यक्रम, परवीन सुलताना, सूफ़ी गायक बुल्ले शाह, एक और गायिका जिसका नाम मैं भूल रही हूं जिसका प्रसारण 96 या 97 के आस पास हुआ था, इन सब से बहुत कुछ जाना। अच्छा लगा गुलज़ार, आर डी और आशा को एक साथ सुनना।
अब भी अच्छा चल रहा है। ज़रीन शर्मा की श्रंखला समाप्त हुई और अब चल रही है मदन मोहन की।
वाकई बधाई के पात्र है - रूपाली रूपक (कुलकर्णी) , छाया गांगुली, कांचन प्रकाश संगीत, कमला कुंदर, अशोक सोनावरे।
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