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Monday, June 2, 2008

बंद कमरे में गवाही

इस बार स्वर्ण जयन्ती के मासिक विशेष कार्यक्रम का आकर्षण है सिनेयात्रा की गवाही देती विविध भारती। यह सच है फ़िल्में विशेषकर फ़िल्मी गीतों का यह सबसे लोकप्रिय चैनल है।

सवेरे से रात तक विभिन्न कार्यक्रमों में पुरानी से नई फ़िल्मों के गाने सुनकर गीत-संगीत के विकास को सहज ही समझा जा सकता है। कुछ समय पहले तक यह बात पूरी तरह सच थी पर अब नहीं लगती।

दिन-ब-दिन गानों की संख्या तो बढती जा रही है पर समय अधिक से अधिक चौबीस घण्टे ही हो सकता है। इसकी गवाही अब धीरे-धीरे मिल रही है।

आजकल रोज़ गाने सुनकर लगता है कि हिन्दी फ़िल्मों में शुरूवाती दौर से ही लता, रफ़ी, आशा, किशोर गा रहे है। कभी-कभार दूसरे गायक भी गा लेते थे और सबसे बड़ी बात कि गानों की शुरूवात पचास के दशक से हुई और पचास के दशक के पहले केवल कुन्दन लाल (के एल) सहगल ही गायक थे। यह बात कहने में बहुत ग़लत है पर खेद है कि आजकल विविध भारती से यही प्रमाणित हो रहा है।

जब से भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम एक घण्टे का हुआ है। तभी से यही स्थिति है। हैदराबाद में अब भी हम पहले की ही तरह सात बजे से ही केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है। शायद और भी ऐसे केन्द्र है जो सात बजे से ही जुड़ते है ऐसे में भूले-बिसरे गीत का पहला भाग केवल सीमित क्षेत्र के लोग ही सुन पाते है।

इस कार्यक्रम की चर्चा करते हुए पिछले सप्ताह पत्रावली में बताया गया कि पंकज मलिक के जन्मदिवस पर पहले आधे घण्टे के कार्यक्रम में सभी गाने उन्हीं के सुनवाए गए। भई हम तो कहेंगें जंगल में मोर नाचा किसने देखा।

जबकि नई पीढी के उत्पादों क्लोज़ अप टूथ पेस्ट और चाँकलेट के विज्ञापनों में पंकज मलिक की शैली में गाना बजता है -

क्या आप क्लोज़ अप करते है

इसी तरह चाँकलेट के विज्ञापन में पुराना गीत -

छुप-छुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है बजता है। मुद्दा ये कि जब बेझिझक विज्ञापन कंपनियाँ इन गीतों को बजाती है तो विविध भारती क्यों इनसे दूर भागती है।

अगर ऐसा ही रहा तो कुछ समय बात नई पीढी समझेगी कि विज्ञापन में बजने वाले गीत की आवाज़ ही मौलिक है और पंकज मलिक, सुधा मल्होत्रा, उमा देवी, सुरैया, श्याम आदि से नई पीढी परिचित ही नहीं होगी।

1 comment:

Anonymous said...

मैनें एक अनियमित शृंखला विविध भारती की लोकप्रियतामें रूकावटे चलाई है । उसमें लिखा ही है, कि स्थानिय विग्य़ापन प्रसारण सेवा के केन्द्रों को आकाशवाणी द्वारा दी गयी लोकल वेरिएसन पोलिसी अन्तर्गत दी गयी विविध भारती के कोई भी चाहे कार्यक्रम कितना ही लोक प्रिय क्यों न हो, को सम्पूर्ण या आंशिक काट कर स्थानिक कार्यक्रम चाहे वो प्रायोजित हि या न भी हो, को प्रसारित करने की स्वतंत्रता विविध भारती के चाहको के लिये एक खलनायिका बन बैठी है । और स्थानिय कार्यक्रममें या उनके प्रसारण समयमें जरूरी परिवर्तन वे करते ही नहीं, जिससे विविध भारती प्रसारणमें कई विसंगतीयाँ स्थानिय केन्दों से सुनने वाले सतर्क श्रोताओं को महसुस होती है ।
हमारे सुरतमें विविध भारती प्रसारण १० के बजाय ९.१५ पर ही रोक लिया जाता है और स्थानिय दैनिक फोन-इन कार्यक्रम ९.१५ से १० और १०.०५ से ११ बजे तक प्रसारित किया जाता है । जब मूज़ जैसे श्रोता लिख़ते है तो दफ़तर जाने वाले श्रोता जाने से पहेले इसी स्थानिय वि. प्रसारण श्रोता रहते है, उनके मन में आप की तरह एक प्रकारकी चीढ़ अवश्य पैदा होगी ।
पियुष महेता
सुरत-३९५००१

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