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Friday, June 6, 2008

उजाले उनकी यादों के

उजाले उनकी यादों के - यह कार्यक्रम आजकल हर रविवार को रात में साढे नौ से दस बजे तक प्रसारित होता है जबकि पहले मंगलवार गुरूवार को इसी समय प्रसारित होता था। इस कार्यक्रम में जैसे कि नाम से ही पता चलता है बीते समय की फ़िल्मी हस्तियों से बातचीत की जाती है।

इस कार्यक्रम की परिकल्पना (काँन्सेप्ट) बहुत अच्छा है। आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों में जिनसे बातचीत की जाती है उन्हीं के बारे में जानकारी मिलती है पर यहाँ ऐसा नहीं है। यहाँ उस कलाकार के पूरे कैरियर के दौरान जिन-जिन लोगों के साथ उनका साथ रहा उन सभी के बारे में बात होती है। इतना ही नहीं फ़िल्मी जीवन से हट कर दूसरे क्षेत्र में भी अगर उस कलाकार का योगदान है तो उस पर भी विस्तार से बातचीत होती है।

यह कार्यक्रम शायद कमलेश (पाठक) जी प्रस्तुत करतीं है। इस कार्यक्रम के स्वरूप के लिए विविध भारती को बधाई। मेहमान कलाकार से बातचीत करते है कमल (शर्मा) जी। इस कार्यक्रम की लोकप्रियता में कमल (शर्मा) जी का बहुत बड़ा योगदान है। वह ख़ुद बहुत ही कम बोलते है पर मेहमान से सब कुछ उगलवा लेते है। ऐसी बातें भी जो आमतौर पर लोकप्रिय कलाकार शायद ही कहना पसन्द करें जैसे -

आजकल चल रही श्रृंखला में लोकप्रिय कलाकार शशिकला ने बताया कि जब मदर टेरेसा के आश्रम में कलकत्ता में वो समाज सेवा कर रहीं थी तब उन्हें मदर से मिलने की बहुत इच्छा थी और जब मदर आईं तो कैसे छोटे बच्चों की तरह वो दरवाज़े के बाहर से मदर को देखने लगी थीं।

जब मैनें इस स्तर पर बातचीत सुनी तो मुझे लगा यह तो कमल जी का ही कमाल है और क्या तरीका रहा होगा प्रस्तुतकर्ता (शायद कमलेश पाठक) का और क्या छवि है विविध भारती की कि एक कलाकार अपना दिल खोल कर रख देता है।

सिर्फ़ एक ही श्रृंखला जो अभी पूरी भी नहीं हुई जिसको सुन कर व्ही शान्ताराम के बारे में बहुत जानकारी मिली जिसे शशिकला ने अन्ना साहेब कहा। मुझे याद आ गई फ़िल्म तीन बत्ती चार रास्ता जिसमें छह बहुओं वाले लालाजी की मराठी बहू बनी थी शशिकला।

हृषि दा यानि हृषिकेश मुखर्जी के बारे में भी बातें हुई। बताया गया उनका काम करने का अंदाज़ और मुझे याद आ गई अनुपमा की शोख़ और चंचल पर सकारात्मक भूमिका वाली शशिकला जो अपनी सहेली शर्मिला टैगोर से फोन पर देर तक बात करती है और जवाब नहीं मिलने पर कहती है - ज़रूर सिर हिला रही होगी।

लता मंगेशकर और मीनाकुमारी के बारे में बातें हुई तो मुझे याद आ गई फ़िल्म फूल और पत्थर जिसमें वैम्प बनी शशिकला गाती है -

शीशे से पी या पैमाने से पी
या मेरी आँखों के मयख़ाने से पी

और सबसे ज्यादा याद आ आया वो अंतिम सीन जहाँ वो अपने ख़ास वैम्पनुमा कपड़े पहन कर धर्मेन्द्र से मिलने बस्ती में जाती है और सारी बस्ती उसे देखने जमा हो जाती है।

यह है कमाल इस कार्यक्रम का जो इतना याद दिला देता है एक श्रोता को। आशा है सिलसिला जारी रहेगा…

4 comments:

Manish said...
This comment has been removed by the author.
Manish said...

बीच बीच में इसे सुना है। निसंदेह बेहतरीन कार्यक्रम है। शुक्रिया इस कार्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए...

mamta said...

पर हमने तो ये कार्यक्रम दिन मे सुना है जिसमे नंदा से बात चीत और रमेश और सीमा देव से बात चीत सुनी थी । ये कार्यक्रम हमे काफ़ी पसंद आया । और शायद ये ६ कडियों मे होता है। और इस पर हमने एक पोस्ट भी लिखी थी।

mamta said...

शायद repeat होता होगा।

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