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Saturday, August 2, 2008

त्रिवेणी

त्रिवेणी विविध भारती का बहुत पुराना कार्यक्रम नहीं है और न ही नया-नवेला है। छोटे से इस कार्यक्रम की जिस ने भी कल्पना की वो वाकई तारीफ़ के काबिल है।

यथा नाम तथा गुण है इस कार्यक्रम के। शायद पूरे पन्द्रह मिनट का भी नहीं है यह कार्यक्रम पर है गागर में सागर। वैसे भी विविध भारती की सुबह की सभा में विशुद्ध भारतीय संस्कृति झलकती है। वन्देमातरम के बाद मंगल ध्वनि फिर भक्ति गीत जिसके बाद देश भक्ति गीत फिर पुराने गीत जो जिसके बाद शास्त्रीय संगीत और उसके बाद त्रिवेणी।

इसका स्वरूप छाया गीत की तरह होते हुए भी आधारिक रूप से अलग है। यहाँ भी छाया गीत की तरह ही गीतों के साथ उदघोषक भाव-विचार प्रस्तुत करते है पर यहाँ विषय हमेशा ख़ास रहते है। कोई न कोई उपदेश ज़रूर होता है। इस तरह हर दिन मिलती है एक सीख।

विषय ज़रूरी नहीं कि भारी भरकम हो। टेलीफ़ोन भी विषय हो सकता है तो डाक भी। बड़े विषयों की तो बात ही क्या है ज़िन्दगी का हर फ़लहफ़ा समेट लेते है। थोड़े से अर्थ पूर्ण शब्दों में बात कही और तीन गीत सुनवा दिए।

गीत पूरे तो नहीं सुनवाए जाते पर बहुत ही अर्थपूर्ण संकेत धुन शुरू में ज़रूर बजती है जिसे सुन कर ऐसा लगता है जैसे नदी की धाराएँ कलकल कर रही हो और अक्सर इस धुन के बाद ही उदघोषक कह देते है आज त्रिवेणी की धाराएँ मिल रही है … विषय पर।

पहले यह कार्यक्रम दुबारा दोपहर में मन चाहे गीत से पहले भी प्रसारित होता था पर अब दुबारा प्रसारण बन्द कर दिया गया है। अब केवल एक ही बार सवेरे पौने आठ बजे संगीत सरिता के बाद प्रसारित होता है। रोज़ सुनने से कोई एक ख़ास बात जीवन में ज़रूर सीख लेते है। अच्छा लगता है इस शिक्षाप्रद कार्यक्रम को सुनना हालांकि इसमें विषय के अनुसार नए गाने भी शामिल रहते है पर वो भी विषय के अनुसार होने से अच्छे लगते है।

Thursday, July 31, 2008

छाया गीत

छाया गीत - विविध भारती से प्रसारित होने वाला फ़िल्मी गीतों का एक अनूठा कार्यक्रम। वैसे फ़िल्मी गीत तो विविध भारती पर बजते ही रहते है, जिनमें अधिकतर गीत श्रोता अपनी पसन्द से ही सुनते है पर छाया गीत ही एक ऐसा कार्यक्रम है जिसमें उदघोषक अपनी पसन्द के गीत सुनवाते है और इन गीतों को मेरे अलावा शायद और भी बहुत से ऐसे श्रोता होंगे जो अन्य कार्यक्रमों में बजने वाले गीतों से ज्यादा पसन्द करते है।

उदघोषक सिर्फ़ अपने पसन्द के गीत ही नहीं सुनवाते बल्कि अपने मन की बात श्रोताओं तक पहुँचाते है। उनके भाव उनके विचार सुन्दर साहित्यिक शब्दावली में सज कर गीतों के मोतियों के साथ जब श्रोता तक पहुँचते है तब कौन ऐसा श्रोता होगा जो इसे नापसन्द करें।

मैनें पसन्द-नापसन्द का मुद्दा यहाँ इसीलिए उठाया कि आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग है जो अपनी दुनिया में डूबे रहते है और जिनके लिए रेडियो टेलिविजन समाचारों की दुनिया तक ही सीमित है। इस वर्ग में पढे-लिखे लोग है व्यापारी है और भी अन्य वर्ग के लोग है।

मुझे याद आ रहा है जब हम उस्मानिया यूनवर्सिटी में एम ए में हिन्दी साहित्य पढते थे तब साहित्य की चर्चा में कक्षा में कभी-कभार फ़िल्मों की चर्चा भी छिड़ जाती थी आखिर प्रेमचन्द जैसे साहित्यकार का नाम भी तो फ़िल्मों से जुड़ा है न…

एक बार एक प्रोफ़ेसर ने चर्चा के दौरान कहा कि कभी--कभी फ़िल्मी गीतों में भी अच्छा साहित्य होता है जैसे यह गीत - जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा। प्रोफ़ेसर साहब ने कहा कि वो तो फ़िल्मों से रेडियो से दूर ही रहते है पर रात में बच्चे जब छायागीत सुनते है तो वो भी उनके साथ इन गीतों का आनन्द लेते है। आगे उन्होनें कहा कि ईश्वर की इतनी सुन्दर कल्पना साहित्य के अलावा फ़िल्मों में भी हो सकती है इसका पता उन्हें इस गीत से ही चला या कहे कि छाया गीत से ही चला।

छाया गीत का स्वरूप है ही इतना आकर्षक कि सभी वर्ग के श्रोताओं को लुभाता है, तभी तो यह कार्यक्रम सुनना अच्छा लगता है नहीं तो यह गीत किसी भी कार्यक्रम में सुना जा सकता है पर प्रोफ़ेसर साहब मन चाहे गीत सुनना तो पसन्द नहीं करेंगे ना…

ऐसी ही चर्चा एक बार हमारी मैडम यानि महिला प्रोफ़ेसर ने भी की थी। उन्होनें कहा था दिन भर अपने काम से थक कर जब रात में दस बजे आराम करने लगते है तब यह गीत बहुत सुकून देते है। उन्होनें तो छाया गीत के पूरे कार्यक्रम को साहित्यिक कह दिया था। न केवल इसमें सुनवाए जाने वाले गीत बल्कि गीतों की प्रस्तुति के भाव और भाषा सभी स्तरीय होता है। मुद्दा यह कि रेडियो टेलीविजन से दूरी बनाए रखने वाले भी छायागीत से जुड़ने में संकोच नहीं करते।

बरसों से सुन रहे है छाया गीत रात में दस से साढे दस बजे तक विविध भारती से। मैनें तो बचपन से सुना। कई नाम गूँजने लगते है - बृजभूषण साहनी, राम सिंह पवार, विजय चौधरी, एम एल गौड़, चन्द्र भारद्वाज, कान्ता गुप्ता, अनुराधा शर्मा, मोना ठाकुर और भी नाम है। एक नाम ऐसा भी है जिनके कार्यक्रम तो बहुत कम हुए पर बहुत ही स्तरीय हुए - डा अचला नागर। कभी-कभार अन्य केन्द्रों के उदघोषकों के भी छायागीत सुनवाए जाते। इसी क्रम में हैदराबाद से अशफ़ां जबीं के कार्यक्रम भी सुने।

उदघोषकों के नाम तो बदलते गए पर कार्यक्रम की प्रस्तुति का स्वरूप नहीं बदला। कभी यादों का सिलसिला तो कभी मौसम का लुत्फ़ तो कभी ज़िन्दगी के अलग-अलग रंग।

पिछली बार रेणु (बंसल) जी ने कम चर्चित कलाकारों पर फ़िल्माए गए गीत सुनवाए जैसे हमराही - कलाकार जमुना, प्रोफ़ेसर - कल्पना पर इस श्रृंखला में मीनाकुमारी का नाम खटकने लगा। ख़ैर… जब हम प्रोफ़ेसर का गीत सुन रहे थे तो हमें याद आए बहुत पहले सुने हुए छाया गीत जिसमें एक बार ऐसे युगल गीत सुनवाए गए थे जिनमें युगल स्वर गायिकाओं के थे और शुरूवात प्रोफ़ेसर के इस गीत से हुई थी - हमरे गाँव कोई आएगा। इसी तरह एक बार केवल ग़ज़लें सुनवाई गई और एक बार शास्त्रीय संगीत का पुट लिए गीत।

बहरहाल किसी विषय पर उदघोषक की भावनाएँ हो या फ़िल्मी गीतों की कोई श्रेणी हो, गीत और प्रस्तुति में अच्छा ही होता है छाया गीत।

Tuesday, July 29, 2008

यादों का थमता सिलसिला और नई शुरूवात का ऐलान

पिछले वर्ष सितम्बर में मैनें रेडियोनामा पर पहला चिट्ठा लिखा जिसमें विविध भारती से रोज़ प्रसारित होने वाले देशभक्ति गीतों से जुड़ी मेरी बचपन की यादें थी। फिर चल पड़ा सिलसिला यादों का जिसमें विविध भारती के अलावा रेडियो सिलोन, बीबीसी की हिन्दी सेवा, आँल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस के साथ आकाशवाणी हैदराबाद के कई कार्यक्रमों की यादों को संजोया गया।

यादों के अलावा कई कार्यक्रम ऐसे भी रहे जिन्हें सुनने के बाद मैं अपने आपको रोक नहीं पाई और उस कार्यक्रम के बारे में लिख दिया जिसे आप कार्यक्रमों का विवेचन कहे या विश्लेषण। इसमें संगीत सरिता जैसे नियमित कार्यक्रम भी शामिल रहे और जुबली झंकार जैसे कार्यक्रमों की भी चर्चा हुई।

यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा लेकिन एक-एक कार्यक्रम के बारे में अलग-अलग चिट्ठे नहीं क्योंकि होता यह है कि जब हम एक कार्यक्रम के बारे में लिखते है तब उसी दिन या आस-पास होने वाले कुछ कार्यक्रमों के बारे में नहीं लिख पाते। अगर कुछ समय बाद चिट्ठा लिखा जाए तो वो मज़ा नहीं रह जाता क्योंकि कार्यक्रम होने के बाद कुछ लिखना साँप जाने के बाद लकीर पीटने जैसा लगता है। इसीलिए मैनें सोचा कि क्यों न सभी कार्यक्रमों को मिलाकर लिखा जाए ?

वैसे भी यादों का सिलसिला अब थमने को है। लगभग साल भर हो रहा है यादों को बाँटते पर अब भी कुछ चिट्ठे यादों के झरोखे से निकलेंगे और कुछ कार्यक्रम ऐसे भी है जिनके बारे में अलग से लिखना ही मुझे अच्छा लगेगा। तो आगे क्यों न इस रवानगी को एक नया मोड़ दिया जाए ?

एक ऐसा मोड़ जिसमें सभी कार्यक्रमों की बात हो जाए। यही सोच कर मैनें एक ऐसा सिलसिला शुरू करने की सोची है जिसमें सप्ताह भर प्रसारित कार्यक्रमों की चर्चा एक ही चिट्ठे में हो जाए। जी हाँ - साप्ताहिकी शीर्षक से इसकी शुरूवात करना सोच रही हूँ और वो भी शुक्रवार को…

Thursday, July 24, 2008

आराधना के रूप

रेडियोनामा पर आराधना का मतलब है भक्ति गीत।

आमतौर पर भक्ति गीतों के प्रसारण का समय सुबह ही होता है पर विविध भारती पर पहले शाम के समय सांध्य गीत कार्यक्रम में पन्द्रह मिनट के लिए फ़िल्मों से लिए गए भक्ति गीत प्रसारित होते थे। बहुत साल हुआ यह कार्यक्रम बन्द हो गया और जिसके बाद से ही हैदराबाद में ऐसा कार्यक्रम सुनने को नहीं मिला। हाँ… कभी-कभार इधर-उधर कुछ कार्यक्रमों में फ़िल्मी भक्ति गीत सुनवाए जाते है। लेकिन नियमित शाम में भक्ति गीत सुनना और फ़िल्मी भक्ति गीत सुनना दोनों ही हैदराबाद में बरसों से बन्द है।

तो यह था आराधना का एक रूप जहाँ फ़िल्मों से लिए गए भक्ति गीत प्रसारित होते थे। दूसरे रूप में वो भक्ति गीत आते है जिन्हें किसी कवि ने रचा है। यह कवि कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, रसख़ान, रहीम भी है और कुछ ऐसे कवि भी जो भक्त कवियों के रूप में लोकप्रिय तो नहीं पर इनकी रचनाएँ अच्छी होती है। यही भक्ति गीत हम नियमित सवेरे छह से साढे छह बजे तक सुनते है। कार्यक्रम है - वन्दनवार।

वन्दनवार के बाद हैदराबाद में क्षेत्रीय कार्यक्रम में साढे छह बजे से सात बजे तक अर्चना कार्यक्रम में ऐसे ही तेलुगु भक्ति गीत सुनने को मिलते है जिनमें भक्त कवि अन्नमाचार्य की रचनाएँ बहुत लोकप्रिय है विशेषकर गायिका शोभा राजु की आवाज़ में जिसमें शास्त्रीय पुट है जैसे -

ब्रह्मम ओकटे
भला तनदनाना भला तनदनाना

यहाँ ओकटे का अर्थ है एक। ब्रह्मम यानि ईश्वर। ईश्वर एक है और भला तनदनाना रिदम है। और एक गीत है -

इदिगो अल्लदिगो श्री हरिदासमु

अर्थ है देखो वो देखो श्री हरिदास और आगे ईश्वर का बख़ान है। यह भक्त कवि हरिदास की रचना है।

अर्चना कार्यक्रम में इस तरह के भक्ति गीतों के अलावा आराधना का एक और रूप या तीसरा रूप सुनने को मिलता है। जैसे आज सुबह सुना श्री साईं चरित जिसमें साईं बाबा की महिमा गाई गई इसी तरह हनुमान चालिसा दुर्गा स्तुति आदि सुनवाए जाते है। अनुराधा पौड़वाल की तेलुगु में गाई शिव स्तुति भी सुनवाई जाती है। इसके अलावा बाईबिल के गीत भी प्रसारित होते है। कहने का मतलब ये कि किसी कवि द्वारा लिखित भक्ति रचनाओं के बजाए सीधे धार्मिक ग्रन्थों से ली गई भक्ति रचनाएँ भी सुनवाई जाती है।

यह तो बात हुई विविध भारती की अब एक नज़र आकाशवाणी हैदराबाद के क्षेत्रीय कार्यक्रम पर। हैदराबाद बी चैनल पर सुबह साढे छह बजे से आधे घण्टे के लिए कार्यक्रम होता है - ईश्वर अल्ला तेरो नाम जिसमें एक भजन, एक नाद या सूफ़ी क़व्वाली, एक शबद और बाइबिल के गीत शामिल होते है। एस तरह यह भक्ति संगीत का कार्यक्रम विविधता लिए होता है।

Tuesday, July 22, 2008

नाट्य तरंग

नाट्य तरंग - जैसा मधुर नाम वैसा ही कार्यक्रम।

रेडियो के जिन कार्यक्रमों को तैयार करने में बहुत ज्यादा मेहनत लगती है वे है - रूपक और नाटक। विविध भारती पर पहले रूपक विशेष रूप से विशेष अवसरों पर बहुत प्रसारित होते थे। आकाशवाणी का तो रूपकों और नाटकों का राष्ट्रीय प्रसारण होता रहा। अब तो रूपक यहाँ तक की स्थानीय केन्द्रों से भी कम ही हो गए है पर नाटकों का प्रसारण अब भी है।

रूपक से अधिक दिलचस्पी आम आदमी की नाटकों में होती है शायद इसीलिए नाटकों का चलन कम नहीं हो पाता है। स्थानीय केन्द्रों से स्थानीय लेखकों के नाटकों का प्रसारण होता है तो वहीं विविध भारती पर ख्याती प्राप्त लेखकों के नाटक सुनने को मिलते है।

विविध भारती पर नाटक तो बहुत समय से प्रसारित हो रहे है पर जहाँ तक मेरी जानकारी है यह नाटक प्रहसनों और झलकियों के रूप में हवामहल, अपना घर जैसे कार्यक्रमों तक ही सीमित रहे और नाटक के रूप में तथा कहानियों के नाट्य रूपान्तर के रूप में भी हवामहल में प्रसारित होते रहे। इस तरह नाट्य तरंग कार्यक्रम हवामहल, जयमाला, संगीत सरिता की तरह पुराना कार्यक्रम शायद नहीं है।

नाट्य तरंग शनिवार और रविवार को दोपहर साढे तीन बजे से चार बजे तक प्रसारित होता है। इसमें हिन्दी के नाटकों के साथ-साथ हिन्दी के उपन्यासों का भी नाट्य रूपान्तर किया जाता है साथ ही नए पुराने सभी लेखकों को शामिल किया जाता है जैसे शिवानी के उपन्यास कृष्णकलि का रेडियो नाट्य रूपान्तर बहुत अच्छा रहा।

हिन्दी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के नाटकों के हिन्दी अनुवाद और कहानियों उपन्यासों के हिन्दी रेडियो नाट्य रूपान्तर भी प्रसारित होते है। बंगला भाषा से विषेषकर रविन्द्रनाथ टैगोर और शरतचन्द्र तो पहले से ही शामिल रहे। बाद में उड़िया, मराठी, असामी जैसी भाषाओं का साहित्य भी शामिल हुआ अब तो दक्षिण भारतीय भाषाओं का साहित्य भी निरन्तर शामिल हो रहा है। पिछले दिनों मूल तमिल नाटक का हिन्दी अनुवाद आपकी बेटी शीर्षक से प्रसारित किया गया जिसके निर्देशक थे चिरंजीत।

यह एक अच्छा कार्यक्रम है जिसके द्वारा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का भी हमें आनन्द मिलता है। कुछ साल पहले यह कार्यक्रम हैदराबाद में सुनने को नहीं मिल रहा था शायद इसका प्रसारण सीमित क्षेत्र तक ही था। आशा है आगे भी यह कार्यक्रम जारी रहेगा और देश के अधिकांश भागों में सुनने को मिलेगा।

Saturday, July 19, 2008

पिटारे में खिचड़ी

सबसे पहले मैं अपने सभी ब्लोगर मित्रों को बधाई देना चाहती हूँ कि सबने मिलकर रेडियोनामा पर तीन शतक पूरे कर तीन सौ चिट्ठों में रेडियो के अलग-अलग रंग प्रस्तुत किए।

आज के चिट्ठे में हम चर्चा करेगें कार्यक्रम पिटारा की। शुक्रवार का पिटारा जिसका शीर्षक है पिटारे में पिटारा पर हम तो कहेगें पिटारे में खिचड़ी। विविध भारती का यह कार्यक्रम वैसे शीर्षक की तरह भानुमति का पिटारा ही है पर शुक्रवार को दूसरी कहावत भी पूरी हो जाती है - कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा।

समझ में नहीं आता कि भानुमति को इस तरह का कुनबा जोड़ने की ज़रूरत ही क्या है ? शुक्रवार का पिटारा वाकई समझ से परे है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इसमें प्रसारित होने वाले कार्यक्रम बेतुके है। हमारा कहने का मतलब है इन अच्छे कार्यक्रमों की इस तरह से खिचड़ी प्रस्तुति क्यों की जाती है ?

अब कल ही का कार्यक्रम ले लीजिए, संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद के वाजिद से ममता (सिंह) जी की बातचीत। बहुत ही सरस रही बातचीत साथ ही गानों में भी मज़ा आया चाहे वो पार्टनर के गाने हो या सोनी के नख़रे पर यह कार्यक्रम शुक्रवार को पिटारे में पिटारा में क्यों ? क्या वाजिद साहब बुधवार को आज के मेहमान बन कर नहीं आ सकते ? मुझे नहीं लगता कि वाजिद साहब को कोई एतेराज़ होगा।

इसी तरह से ममता जी ने पहले गीतकार प्रशान्त जी से भी बातचीत की थी और चर्चा हुई थी चमेली और जब वी मेट फ़िल्मों के गानों की भी। अगर नई फ़िल्मों की वजह से ही यह कार्यक्रम शुक्रवार को प्रसारित हुए तब भी बड़ी अजीब बात लगती है कि नए कलाकार आज के मेहमान क्यों नहीं हो सकते ?

बात सिर्फ़ यहीं तक नहीं है यानि सिर्फ़ इसी तरह के कार्यक्रम ही इसमें नहीं होते बल्कि दूसरी तरह के कार्यक्रम भी इसमें होते है जैसे पिछले शुक्रवार को कार्यक्रम था - चूल्हा-चौका। लगभग दस-ग्यारह साल पहले पिटारा कार्यक्रम में कुछ अलग विषय के कार्यक्रम भी थे जिनमें से एक था सोलह सिंगार जो शायद रेणु (बंसल) जी प्रस्तुत करती थी और एक कार्यक्रम था चूल्हा-चौका। नामों से समझा जा सकता है कि किस तरह के कार्यक्रम थे।

शायद इसी पुराने कार्यक्रम की रिकार्डिंग पिछले सप्ताह प्रसारित हुई जिसे प्रस्तुत कर रही थी आशा साहनी और अतिथि थे शान्ता नन्दा, आरती जी जो गायिका है जिनका पूरा नाम और एक और अतिथि का नाम मैं भूल रही हूँ। इसमें विभिन्न प्रकार के नाश्ते बनाना बताया गया इस कार्यक्रम का भाग सोमवार की सखि-सहेली में भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

ऐसा भी नहीं है कि हर शुक्रवार अच्छा नहीं लगता। अच्छा लगा जब कांचन (प्रकाश संगीत) जी की संगीत नाटिका - दुल्हिन की शादी में दूल्हा बाराती सुनने को मिला। बाइस्कोप की बातें इस दिन हमेशा से ही अच्छी लगी। इन अच्छे कार्यक्रमों के साथ अगर फ़िल्मों गीतों की अलग-अलग तरह से प्रस्तुति की जाएगी तो ज्यादा अच्छा लगेगा जिसमें कुछ पुरानी प्रस्तुतियाँ है जो अब बन्द हो गई है जैसे एक ही कलाकार, एक और अनेक, साज़ और आवाज़ और भी कई तरह की प्रस्तुतियाँ हो सकती है।

तो बस आवश्यकता है शुक्रवार के पिटारा को दुबारा व्यवस्थित करने की फिर पिटारा हर रोज़ अच्छा लगेगा।

Thursday, July 17, 2008

भेंट वार्ता

आकाशवाणी के कार्यक्रमों का चिरपरिचित नाम है भेंटवार्ता। अगर मैं ये कहूँ तो ग़लत नहीं होगा भेंटवार्ता शब्द आकाशवाणी और दूरदर्शन की ही देन है। कितना सही शब्द है भेंट वार्ता - जब आप किसी से भेंट करते है या मिलते है तो बातचीत करते है या वार्तालाप करते है तो यही तो हुई भेंटवार्ता।

स्थानीय दोनों केन्द्र आकाशवाणी और दूरदर्शन से अब भी ऐसे कार्यक्रमों को अधिकतर भेंटवार्ता ही कहा जाता है पर कहीं-कहीं कुछ अलग नाम भी है जैसे एक मुलाक़ात, इनसे मिलिए, हमारे मेहमान, आज के मेहमान, कुछ पल … के साथ आदि।

विविध भारती पर ऐसे दो कार्यक्रम प्रसारित होते है। एक कार्यक्रम छोटा सा है, पन्द्रह मिनट का - इनसे मिलिए जिसे मैं बहुत सालों से सुनती आ रही हूँ और दूसरा ऐसा ही कार्यक्रम है जो एक घण्टे का है - आज के मेहमान जो कुछ ही सालों से शुरू हुआ है।

इनसे मिलिए शीर्षक बहुत सालों से चलन में है इसीलिए अच्छा ही लगता है वैसे ध्यान दें तो शीर्षक अटपटा सा लगता है ऐसे जैसे कह रहे हो ये जो बैठे है इनसे मिलिए या इनसे मिल ही लीजिए बैठे है जो यहाँ ख़ैर… आज के मेहमान शीर्षक से लगता है रोज़ कुछ न कुछ कार्यक्रम किया जाना है आज के कार्यक्रम में मेहमान को बुला लेना है लो बस आ गए मेहमान, आज यह है कल कोई और मेहमान होगा, बस… मेहमान के लिए प्यार, दुलार, स्नेह कुछ नहीं बस ड्यूटी ही ड्यूटी है ख़ैर…

वैसे कार्यक्रम दोनों अच्छे है। बहुत ही रोचक और विविधता लिए है। जिस भी क्षेत्र का व्यक्ति हो उस क्षेत्र के बारे में उनके काम के बारे में उनके जीवन के बारे में अधिकांश जानकारी मिल जाती है। इनसे मिलिए पन्द्रह मिनट का होता है पर समय की कमी नहीं खलती क्योंकि पूरी बातचीत पन्द्रह मिनट में सिमट जाती है। आज के मेहमान कार्यक्रम पिटारा के अंतर्गत होने से एक घण्टे का होता है जिससे बातचीत में थोड़ा विस्तार आ जाता है और बीच-बीच में मेहमान की पसन्द के गाने भी बजते है।

एक बात ज़रूर खलती है दोनों कार्यक्रम बुधवार को ही प्रसारित होते है। तीन से चार आज के मेहमान में एक व्यक्ति से मिलने के साढे तीन घण्टे के बाद ही जयमाला के बाद प्रसारित होता है इनसे मिलिए कार्यक्रम जिससे कार्यक्रमों की विविधता कहें या मूड कहे बदलता नहीं है। इनसे मिलिए तो बरसो से बुधवार को ही सुनते है आज के मेहमान रोज़ प्रसारित होने वाले पिटारा में किसी और दिन कर दीजिए, सिर्फ़ कार्यक्रमों की अदला-बदली ही तो करनी है।

इनसे मिलिए में फ़ौजियों से लेकर लेखक, कलाकार लगभग सभी क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्तियों से मुलाक़ात हो जाती है उसी तरह आज के मेहमान में भी विभिन्न क्षेत्रों से मेहमान आते है जैसे गीतकार और संवाद लेखक अशोक मिश्रा से निम्मी मिश्रा की बातचीत। धारावाहिकों के शुरूवाती दौर के संवाद लेखक जब केवल देश में दूरदर्शन ही था और वो भी श्याम बेनेगल जैसे निर्देशक का धारावाहिक - भारत एक खोज के संवाद लेखक से मिलना अच्छा लगा जो अब भी कलात्मक फ़िल्मों से जुड़े है जैसे फ़िल्म नसीम जिसमें कैफ़ी आज़मी ने भी अभिनय किया था। बड़ी ही अच्छी थी फ़िल्म भी, धारावाहिक भी और अच्छी रही बातचीत इस लेखक से जो गीतकार भी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एनएसडी की यादों को बाँटना सुखद रहा।

एक अलग ही क्षेत्र लेकर आए कमल (शर्मा) जी महिला कबड्डी खिलाड़ी भारती उज्जवल के साथ और बातचीत में समेट लिया सभी पहलुओं को जिसमें स्कूल के दिनों से लेकर राष्ट्रीय पहचान हासिल करने तक सब कुछ था।

एक अलग ही पहलु को छुआ युनूस जी ने भारतीय तकनीकि संस्थान प्रमुख से बातचीत में जिसमें देश-विदेश के तकनीकी पहलु अपनी उपलब्धियों और ख़ामियों के साथ सिमट आए। आईआईटी के पुराने चित्र भी प्रस्तुत हुए और साफ़ हुआ नए पुराने का अंतर और विकास यात्रा, यही तो फ़ायदा होता है एक ऐसे प्रमुख से बात करने का जो अपने विद्यार्थी काल की भी बात करता है।

कल की कमल (शर्मा) जी की बातचीत बहुत ही रोचक थी। राजस्थानी संस्कृति की बहुत सी बातें जानी जैसे तब तक बेटा कुँवर जी ही रहेगा जब तक परिवार में पिताजी विराजमान हो। महारानी के पैर का क़िस्सा तो बहुत ही रोचक रहा। अख़बार में महारानी की फ़ोटो छपी जिसमें महारानी के पैर दिखने लगे फिर क्या था सारे के सारे अख़बार विमान से निकलवा कर खरीद लिए गए। यह गरिमा रही महिलाओं की और आज पैर तो छोड़िए बहुत कुछ दिखता और दिखाया जाता है।

कुछ मायनो में यह बातचीत मेरे लिए बहुत ही विशेष रही। धन्यवाद कमल जी का कि उन्होनें बातचीत को इस मोड़ तक समेटा कि उसमें यह गीत शामिल हो गया -

जिया हो जिया हो जिया कुछ बोल दो
अरे ओ दिल का परदा खोल दो
जब प्यार किसी से होता है

इस गीत से जुड़ी बातचीत मेरे लिए बहुत ख़ास रही।

Tuesday, July 15, 2008

सेहतनामा

बचपन से आकाशवाणी हैदराबाद केन्द्र से एक कार्यक्रम सुनते आए है - डाक्टर से मुलाक़ात। यह कार्यक्रम उर्दू मैगज़ीन प्रोग्राम नयरंग में प्रसारित किया जाता है। नयरंग रोज़ रात में साढे नौ बजे प्रसारित होता है। पहले आधा घण्टा फिर एक घण्टे का कर दिया गया इस कार्यक्रम को। हमेशा से ही महीने में एक या दो बार प्रसारित होता रहा सेहतनामा प्रोग्राम में डाक्टर से मुलाक़ात कार्यक्रम।

डाक्टर से मुलाक़ात के अलावा सेहतनामा में और कोई कार्यक्रम नहीं सुना गया। डाक्टर से मुलाक़ात कार्यक्रम दस से पन्द्रह मिनट का है जिसमें एलोपेथी, आयुर्वेदिक, यूनानी सभी विधाओं के डाक्टरों को बुलाया जाता है।

इस कार्यक्रम का एक ढाँचा है। मौसम के अनुसार विषय चुने जाते है। इस समय विषय रहेगा बरसात के मौसम में होने वाली आम बीमारियाँ या बच्चों की आम बीमारियाँ इस मौसम में या मलेरिया, वायरल बुख़ार आदि के बारे में। बातचीत का भी ढाँचा होता है जैसे बीमारी के लक्षण, इलाज जिसमें दवाई और घरेलू इलाज दोनों पर बात की जाती है फिर परहेज़ यानि क्या खाए और क्या न खाए फिर ख़ास बात यह कि यह बीमारी ही न हो इससे बचने के उपाय।

इस तरह हर छोटी-बड़ी बीमारी के बारे में जानकारी मिल जाती और बीमारी से बचने के उपाय और परहेज़ तथा घरेलू उपायों से हर बार डाक्टर के पास दौड़े बिना हम ख़ुद ही सेहत का ध्यान रख सकते है। जब मौसम की बीमारियों के बारे में बातचीत न हो तब अन्य बीमारियों के बारे में भी बातचीत की जाती इस तरह बहुत सी जानकारी इस छोटे पर नियमित प्रसारित कार्यक्रम में मिल जाती।

इसके बाद हमने दूसरा कार्यक्रम सुना विविध भारती पर प्रसारित होने वाला सेहतनामा जो एक घण्टे का कार्यक्रम है और हर सोमवार को तीन से चार बजे तक प्रसारित होता है। यह भी डाक्टर से मुलाक़ात कार्यक्रम है। इसमें किसी डाक्टर से बातचीत की जाती है। चूँकि कार्यक्रम एक घण्टे का है इसीलिए डाक्टर साहब की पसन्द के फ़िल्मी गीत भी बजते है। यह शायद विविध भारती का सेहत संबंधी पहला कार्यक्रम है। अगर इससे पहले भी कोई कार्यक्रम था तो इसकी जानकारी शायद पीयूष जी दे सके।

इस कार्यक्रम में कभी भी किसी भी रोग को लेकर बातचीत की जाती है जैसे कल रेणु (बंसल) जी ने बातचीत की डा जयंत आप्टे से जो मनोचिकित्सक है। इसका एक पहलू तो समझ में आया कि यह समय है युवा वर्ग के परीक्षा परिणामों और आगे की पढाई के लिए कोर्स चुनने का जिसमें हताशा निराशा स्वाभाविक है। पर कल एक बात पर मैनें ध्यान दिया कि मनोरोगों के बारे में एक ही बात बार-बार दोहराई जा रही थी कि फ़ोबिया हवाई यात्रा से होता है, लिफ़्ट से होता है, बच्चों को स्कूल जाने से होता है आदि लेकिन इसके निदान पर ज्यादा बात नहीं की गई।

कई बातें स्थायी और अस्थायी होती है उस पर भी चर्चा नहीं हुई जैसे बच्चा बचपन में स्कूल नहीं जाना चाहता पर उमर के साथ-साथ यह समस्या समाप्त हो जाती है। कुछ रोग स्थायी होते है जैसे अँधेरे से डरना इसके लिए कुछ घरेलू उपाय भी है जैसे कि हमने अपने जानने वालों में एक को देखा है उन्हें रोशनी में छत पर ले जाया जाता फिर लाइट बन्द कर दी जाती फिर साथ वाले उन्हें बताते कि देखो अभी तो हम यहाँ आए और यहाँ कुछ डरने वाली बात नहीं। ऐसे ही कई उपाय है। एक तनाव से ग्रसित महिला को हमने देखा उसे तनाव से कमज़ोरी भी बहुत हो गई थी। उसे बहुत अच्छा भोजन जिसमें मिठाई भी शामिल हो दिया जाता। नियमित इस भोजन से उसे अच्छी नींद आने लगती जिससे वह तनाव से दूर रहती। क्योंकि हर बार हम डाक्टर के पास तो नहीं दौड़ सकते और अधिक दवाइयाँ भी तो नहीं लेनी चाहिए।

एक कार्यक्रम में रेणु (बंसल) जी ने डा अनिश वी नावरे जी से दंत सुरक्षा पर बात की। एक कार्यक्रम में डा हेमा रानी से बात की गई बच्चों में ह्रदय रोग पर जो जन्मजात नहीं होते। यह बातचीत परिपूर्ण थी। इसमें विषाणु, रूमाटिक फ़ीवर, लक्षण, इलाज जिसमें दवा का नाम, पेनसिलिन के इंजेक्शन और उचित न होने पर दूसरे इंजेक्शन, इलाज का कोर्स सभी शामिल था।

अच्छा लगेगा कि मौसम या समय के अनुसार बातचीत हो और एक ढाँचे में हो।

Friday, July 11, 2008

मनोरंजन के साथ शिक्षा या शिक्षा के साथ मनोरंजन ?

मेरे पिछले चिट्ठे से उठी ग़लतफ़हमी मुझे पीयूष जी की टिप्पणी में नज़र आई इसीलिए मै यह चिट्ठा लिख रही हूँ। अच्छा रहेगा अगर इस विषय पर बहस हो जाए।

पीयूष जी, क्या आप मुझे बता सकेगें कि सेहतनामा, वन्दन्वार और संगीत सरिता जैसे कार्यक्रम किस दृष्टि से मनोरंजक है ? सिर्फ़ इसमें गाने बजते है इसीलिए। मुझे नहीं लगता है कि सिर्फ़ गाने शामिल होने से ही कार्यक्रम मनोरंजन की श्रेणी में आ जाते है।

दूसरी बात मनोरंजन के साथ शिक्षा या शिक्षा के साथ मनोरंजन ? यूथ एक्सप्रेस, सखि-सहेली, आज के मेहमान जैसे कार्यक्रम आप ध्यान से सुनिए इनमें काम की बातें बताई जाती है, जानकारी दी जाती है जिसके साथ मनोरंजन के लिए गीत होते है। सखि-सहेली में तो गानों की फ़रमाइश के साथ पत्र में काम की बातें, सलाह मशवरा भी होता है साथ में बजते है फ़रमाइशी गीत। अगर मनोरंजन मुख्य है तो इन कार्यक्रमों को त्रिवेणी की तरह बनाया जा सकता है। कोई एक विषय ले लीजिए और उस पर अलग-अलग तरह से जानकारी दीजिए और सुनवाइए गीत जबकि यूथ एक्सप्रेस में तो वार्ताएं भी प्रसारित होती है।

अब तो सखि-सहेली में भी साहित्य को गंभीर रूप से शामिल करना शुरू कर दिया है। दो-चार दिन पहले मैनें पहली बार सुना सखि-सहेली में जयशंकर प्रसाद की कहानी पुरस्कार के बारे में कुछ-कुछ बताया गया और शेष सखियों को पत्र लिख कर बताने के लिए कहा गया, तो शुरू हो गई न एक और नई बात इस कार्यक्रम में।

इसी तरह से शुरूवात होती जाती है और कार्यक्रम का स्वरूप बदलता जाता है। यही तो हो रहा है पिछले कई सालों से कई कार्यक्रमों में और साथ-साथ कई नए कार्यक्रम भी शुरू हो रहे और ऐसे ही परिवर्तनों के साथ कार्यक्रम का स्वरूप ऐसा बदलता है कि जिसमें मनोरंजन कम महत्वपूर्ण और दूसरी बातें अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इसीलिए तो मैनें लिखा कि अब विविध भारती पूरी तरह से मनोरंजन सेवा नहीं रही तो अब भी यह क्यों कहा जा रहा है कि विविध भारती संपूर्ण मनोरंजन सेवा है।

शायद मेरा पिछला चिट्ठा ठीक से समझा नहीं गया या हो सकता है कि मेरे लिखने का ढंग ही कुछ ऐसा रहा कि ठीक से समझ में नहीं आया हो। ख़ैर… मुद्दा यह कि कार्यक्रमों का स्वरूप बहुत बदला है और यह बदलाव बहुत अच्छा है फिर अब क्यों इसे केवल मनोरंजन चैनल माना जाए। जब प्रस्तुतकर्ता इतनी मेहनत करते है कि मनोरंजन के अलावा श्रोताओं को बहुत सी जानकारी घर बैठे मिले तो फिर इसे केवल मनोरंजन चैनल क्यों माने ?

स्वर्ण जयन्ती के इस अवसर पर विविध भारती के वर्तमान स्वरूप को देखते हुए इसे सिर्फ़ मनोरंजन की सीमा में नहीं रखा जा सकता। विविध भारती जिस तरह से आगे बढ रही है उस तरह से कोई उचित नाम इस सेवा का होना ही चाहिए, ऐसा मेरा मानना है। अगर अब भी कोई शक हो तो इस पर बहस की जा सकती है…

Thursday, July 10, 2008

फिर भी विविध भारती मनोरंजन सेवा ही है ?

जब विविध भारती की शुरूवात हुई तब यह पंचरंगी कार्यक्रम थी - ये विविध भारती है आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम

जहाँ तक मैनें सुना है पंचरंगी कार्यक्रम के पाँच रंगों में एक रंग शास्त्रीय संगीत का, एक रंग लोक संगीत का, एक रंग फ़िल्मी संगीत का, एक रंग सुगम संगीत का और एक रंग मनोरंजक कार्यक्रम जैसे हवामहल का था। यह जानकारी कहाँ तक सच है मैं नहीं जानती।

इसके बाद यह केन्द्र व्यावसायिक हो गया जिससे विविध भारती हो गई विज्ञापन प्रसारण सेवा और बन गई मनोरंजन सेवा। कार्यक्रमों का समय बढा, स्थानीय केन्द्रों से भी प्रसारण शुरू हुए साथ ही कार्यक्रमों में भी परिवर्तन आए।

कहना न होगा कि कार्यक्रमों के स्वरूप में हमेशा से ही परिवर्तन होते गए और बदलते-बदलते आज विविध भारती का एक नया ही रूप हमारी नज़र में है।

पहले अक्सर समाज में जब कार्यक्रमों की बात चलती थी तब विविध भारती के बारे में कहा जाता था - विविध भारती से तो बस चौबीस घण्टे प्यार मोहब्बत के गाने ही बजते रहते है।

विविध भारती का दूसरा नाम ही मनोरंजन था इसीलिए इसे मनोरंजन सेवा कहने में कोई आपत्ति नहीं थी। पर आज हम कार्यक्रमों पर नज़र डालते है तो मनोरंजन सेवा कहने में हिचकिचाहट होती है। हालांकि पहले भी कुछ कार्यक्रम ऐसे थे जिन्हें मनोरंजन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता था जैसे वन्दनवार - भक्ति संगीत मनोरंजन नहीं है। संगीत सरिता जैसे कार्यक्रम मनोरंजन के लिए नहीं सुने जाते। लेकिन ऐसे कार्यक्रमों की संख्या कम थी और फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रमों की संख्या अधिक थी इसीलिए मनोरंजन सेवा मान लिया गया।

पर आज तो कार्यक्रमों का एक अलग ही दौर है। सुबह से शुरूवात करते है। वन्दनवार मनोरंजन की श्रेणी में नहीं आता है। संगीत सरिता शिक्षाप्रद कार्यक्रम है। सेहतनामा कार्यक्रम से हमें जानकारी मिलती है और हैलो डाक्टर से तो सलाह मिलती है। आज के मेहमान और इनसे मिलिए जैसे कार्यक्रमों से हमें विशिष्ट व्यक्तियों और उनके काम का परिचय मिलता है।

इसी तरह यूथ एक्सप्रेस और सखि-सहेली युवाओं और महिलाओं के लिए सूचना परक कार्यक्रम है। लोक संगीत हमारी संस्कृति है। यह सभी कार्यक्रम मनोरंजन की श्रेणी में नहीं आते।

मनोरंजन के कार्यक्रम है - भूले-बिसरे गीत, त्रिवेणी, सुहाना सफ़र, हैलो फ़रमाइश, जयमाला, हवामहल, एक ही फ़िल्म से, छाया गीत, आपकी फ़रमाइश। क्या इन्हीं मुट्ठी भर कार्यक्रमों से विविध भारती का परिचय है ? नहीं ! नहीं !! नहीं !!!

फिर आज भी विविध भारती सेवा को सिर्फ़ मनोरंजन सेवा ही क्यों कहा जाता है ? क्या फिर से इसे पंचरंगी कार्यक्रम या किसी और नाम से सुशोभित नहीं किया जा सकता।

Tuesday, July 8, 2008

छोरे- छोरियों की छुक- छुक

विविध भारती पर छोरे-छोरियों के लिए एक छुक-छुक चलती है जिसका एक अंग्रेज़ी नाम है - यूथ एक्सप्रेस जिसे चलाते है अपने युनूस भाई। अरे नहीं… वो वाले भाई नहीं, अच्छा ठीक है हम युनूस जी लिखते है।

यह गाड़ी हर रविवार को घण्टे भर के लिए चलाई जाती है, दोपहर बाद तीन से चार बजे तक। एक हमने देखी थी कुछ दिन पहले वो… आज़ादी एक्सप्रेस जो रेल विभाग वाले चलाते है। हर राज्य के मुख्य शहरों के स्टेशनों पर दो-चार दिन खड़ा कर देते है।

यहाँ सिकन्द्राबाद में भी तीन दिन के लिए खड़ी थी सो हमने देख ली। गाड़ी क्या थी… बस एक ऐसी दुनिया थी जहाँ हमने देखा तस्वीरों में स्वाधीनता संग्राम। अब इसी गाड़ी कि प्रेरणा से विविध भारती की छुक-छुक चल रही है… ऐसा कुछ तो हम ठीक से नहीं जानते, पर इतना ज़रूर कहेगें कि दोनों गाड़ियों से हमारा ज्ञान बढता है।

युनूस जी तो मस्त ड्राइवर है। नए-पुराने मस्त गाने गाते हुए गड्डी दौड़ाते है। इसके एक डिब्बे में होती है पेन्ट्री यानि खाने-पीने का ताज़ा सामान जिसमें दुनिया की ताजी-ताजी बातें होती है। यूरो फुटबाल टूर्नामेंट हुआ और इसकी पूरी जानकारी थाली में परोस दी गई।

एक डिब्बा इसमें ऐसा है जिसमें दो लोग बैठ कर गुटर्गु ! धत्त तेरे की… गुफ़्तगु करते है जिनमें से एक गाड़ी वाले होते है और दूसरे सज्जन बाहर से आते है। बाहर से आकर गाड़ी में बैठने वालों में युवाओं के पसन्दीदा युवा गायक कुणाल गांजावाला भी है जिनसे ममता (सिंह) जी ने बातचीत की। मीडिया विश्लेषक विनोद जी भी है जिनसे कमल (शर्मा) जी ने बेबाक बातचीत की। मीडिया में बाज़ारवाद से लेकर युवाओं में साहित्य पढने की आदत तक कई बातें शामिल रही।

कमल (शर्मा) जी एक और बातचीत बहुत ही अच्छी और उपयोगी रही, गिरधारीलाल जी से की गई बातचीत जिसमें उनके द्वारा संग्रह किए गए विभिन्न कलाकारों का पहला गीत सुनवाया गया। लता, रफ़ी, नौशाद, कई नई बातें सामने आई जैसे मुकेश का पहली नज़र फ़िल्म के लिए गाया गीत पहला गीत माना जाता था जिस पर कुन्दनलाल सहगल की गायकी की छाप नज़र आती थी पर यहाँ बताया गया कि मुकेश ने सबसे पहले 1941 में निर्दोश फ़िल्म के लिए गीत गाया था।

इस गाड़ी का एक और डिब्बा बड़ा ही अच्छा है - किताबों की दुनिया जिसमें पिछली बार बच्चन जी की मधुशाला थी। इससे पहले डा अमरकांत दुबे ने डा रामचन्द्र शुक्ल पर अच्छी जानकारी दी और उनके द्वारा किए गए हिन्दी साहित्य के वर्गीकरण को बहुत अच्छी तरह समझाया। एक बार इसमें प्रेमचंद के उपन्यास प्रतिज्ञा के बारे में किसी का भेजा आलेख भी पढ कर सुनाया गया।

इसमें युवाओं के लिए विभिन्न पाठ्यक्रमों के बारे में भी जानकारी दी जाती है जिससे करिअर बनाने में सहायता मिलती है।

कुल मिला कर भई हमें तो यह छुक-छुक भली लगती है।

Saturday, July 5, 2008

सुहाना सफ़र

सुहाना सफ़र - फ़िल्मी संगीत का एक बेहतरीन कार्यक्रम जो विविध भारती से रोज़ दोपहर में बारह से एक बजे तक प्रसारित होता है।

हर दिन एक संगीतकार के गीत सुनवाए जाते है पर हर सोमवार को ऐसे संगीतकारों के गीत सुनवाए जाते है जिनके गीत बहुत कम है। यह कहा जाता है कि यह कम प्रचलित संगीतकारों के गीत है।

हम तो क्वानटिटी में नहीं क्वालिटी में विश्वास रखते है इसीलिए हमें सोमवार का कार्यक्रम कुछ ज्यादा ही अच्छा लगता है। कई ऐसे संगीतकार है जिनका नाम संगीतकार के रूप में कम प्रचलित है पर गीत ज़ोरदार है इसीलिए इस दिन कई अच्छे गीत सुनने को मिलते है जैसे -

चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा (संगीतकार राजकमल)
पंख होते तो उड़ आती रे (संगीतकार रामलाल)

इस तरह इस दिन ख़ास बात यह भी होती है नए पुराने सभी गीत एक ही घण्टे में सुनने को मिलते है जैसे किशोर कुमार का स्वरबद्ध किया फ़िल्म झुमरू का गीत जिसके साथ इक़बाक ख़ुरैशी और हुस्नलाल भगतराम के संगीत से संजोए गीत तो साथ में नए गीत भी। कुछ बहुत लोकप्रिय गीत सुनने को नहीं मिले या बहुत ही कम सुनवाए गए जैसे संगीतकार शारदा का खुद का गाया फ़िल्म सूरज का गीत -

तितली उड़ी उड़ जा चली
फूल ने कहा आजा मेरे पास
तितली कही मैं चली आकाश

आगे तीन दिन माहौल लगभग एक जैसा रहता है क्योंकि इन संगीतकारों के गीत एक निश्चित अवधि की फ़िल्मों में होने से लगभग समान ही है।

मंगलवार को अनु मलिक के नए गाने सुनने को मिलते है। इसके बाद बुधवार को आनन्द मिलिन्द के गाने जो अनु मलिक से थोड़ा पीछे का समय है जिनके पीछे के समय में है नदीम श्रवण जिनके गीत शुक्रवार को बजते है।

बीच में गुरूवार को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जिनके गीत पारसमणि से बाँबी तक है और उसके बाद भी।
ऐसे ही गीत है कल्याण जी आनन्द जी के जो शनिवार को सुनवाए जाते है जिसमें क़ुर्बानी का लैला मैं लैला गीत भी बजता है और दिलीप कुमार-सायरा बानो का गोपी फ़िल्म का गीत भी - जैंटिलमैन जैंटिलमैन जैंटिलमैन फिर रविवार को आर डी बर्मन के गीत जो नए गानों का आधार है।

यह क्रम बहुत अच्छा है और इस क्रम में गाने सुनना अच्छा लगता है। क्रम वैसे शुरू से ही अच्छा रहा। पहले पुराने संगीतकारों के गीत बजते थे जैसे सी रामचन्द्र शुक्रवार को ओ पी नय्यर। कुछ नाम छूट गए है जैसे शंकर जयकिशन जिसे शायद आगे शामिल किया जाए।

एक बात यहाँ भी खटकती है। इस कार्यक्रम के दौरान कहा जाता है कि यह स्वर्ण जयन्ती की सुरीली सौगात है। क्या इसका मतलब यह है कि स्वर्ण जयन्ती की समय सीमा की समाप्ति के बाद यह कार्यक्रम बन्द हो जाएगा ? अगर ऐसा है तो ठीक नहीं है और इसे जारी रखने का अनुरोध है।

Friday, July 4, 2008

शीरी शीरी सुर लहरी

वाह ! यथा नाम तथा गुण - जैसा शीर्षक वैसा ही कार्यक्रम था, बड़ा ही मीठा-मीठा सा।

जी हाँ ! हम बात कर रहे है कल प्रसारित जुबली झंकार कार्यक्रम की। विविध भारती की स्वर्ण जयन्ती का मासिक पर्व। इस बार इस पर्व में लोक संस्कृति झलक रही थी।

रोज़ की तरह कल भी हम तीन बजे से ही केन्द्रीय सेवा से जुड़ पाए क्योंकि ढाई से तीन बजे तक क्षेत्रीय कार्यक्रम का प्रसारण रहा।

कल की महफ़िल आलिम-फ़ाज़िल लोगों की महफ़िल थी जिसमें शरीक थे शास्त्रीय संगीत के महारथी पंडित शिवकुमार शर्मा, राम देशपांडे साथ में थे लोकगायक डा वाणी (क्षमा कीजिए पूरा नाम नहीं लिख पा रही हूँ), विश्वनाथ रत्ता और साथी तथा वादक कलाकार जिनके साथ महफ़िल में शिरकत कर रहे थे आकाशवाणी के कश्मीर केन्द्र निदेशक बशीर आरिफ़ साहब और कमी खल रही थी महेन्द्र मोदी साहब की।

कश्मीरी लोक गीत सुनवाए गए। महफ़िल में पधारे कलाकारों के साथ-साथ अन्य कलाकारों के भी गीत सुनने को मिले जिनमे ख़ास था हब्बा ख़ातून का ज़िक्र। मुझे याद आ रही है संगीत सरिता की वो कड़ियाँ जो हब्बा ख़ातून और बुल्ले शाँ पर तैयार की गई थी। मन कर रहा है एक बार फिर उन कड़ियों को सुनने का अगर विविध भारती की इनायत हो तो…

वैसे कल का जुबली झंकार कार्यक्रम लोक संगीत और संगीत सरिता का मिलाजुला रूप था। लोक गीतों का मज़ा तो हम ले रहे थे पर जैसा कि होता है कि भाव समझना और शब्द समझना भी कठिन होता है इसीलिए कठिनाई से हम नोट कर पाए -

रोरा वल्ला याने दिल बरो… गुलशन बहाए… या करो

पता नहीं इन बोलों में मैनें कितनी ग़लतियाँ की पर गीत के भाव बतलाए गए कि बाग़ों में बहार है सभी तुम्हारी राह देख रहे है…

अच्छा लगा कि हर गीत के भाव बताए गए। बशीर आरिफ़ी साहब ने भी घरों में होने वाले उत्सवों, शादी के गानों के बारे में बताया।

कल बिल्कुल ही पहली बार एक बात बताई गई कि किन्नर जब लोक गीत गाते है तब उनकी लय अलग होती है और मुझे भी कल ही यह बात ध्यान में आई कि शादी-ब्याह के अवसर पर और यहाँ तक कि बच्चे के जन्म पर भी लोक गीत किन्नर गाते है पर न कभी सहित्य में और न ही कभी संगीत के कार्यक्रमों में इसकी चर्चा की गई। कल इनकी तरफ़ इशारा भी कार्यक्रम में नयापन ले आया।

लोक गीत घरेलु समारोहों में समाँ बाँध लेते है जहाँ कई बार बिना साज़ों के गाया जाता है। कल यही बात उठाई निम्मी (मिश्रा) जी के साथ संचालन कर रहे कमल (शर्मा) जी ने। यह बात भी तभी उठी जब मेहमान गायकों की टोली ने बिना साज़ के गीत प्रस्तुत किया। यहीं पंडित शिवकुमार शर्मा जी ने समझाया लोक गीतों की अलग-अलग लय के बारे में जो शास्त्रीय अंदाज़ में अलग है और किन्नरों का अंदाज़ अलग है और ठेठ लोकगायकी में कुछ पश्चिमी अंदाज़ आ मिला है।

इन लोकगीतों का राम देशपांडे जी ने न सिर्फ़ शस्त्रीय विश्लेषण किया बल्कि बंदिशें भी प्रस्तुत की। सुरों की चर्चा हुई और साथ ही साज़ों की भी चर्चा हुई। उत्तर भारतीय और कश्मीरी सारंगी में फ़र्क बताया गया। सारंगी जैसे साज़ रवाब के साथ-साथ इरानी सन्तूर की भी चर्चा हुई।

इस तरह की चर्चा में फ़िल्मी गाने न हो, यह तो हो ही नहीं सकता। शर्मा जी के संगीतबद्ध किए सिलसिला और चांदनी के गीतों की झलक के साथ ज़ंजीर की मन्नाडे की गाई क़व्वाली की झलक भी सुनी -

यारी है इमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी

और चोर मचाए शोर का किशोर कुमार का गीत भी सुना -

घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं

सावन की घटा जैसी कई फ़िल्मों के गीतों की झलकियाँ सुनवाई गई। यहाँ एक कमी मुझे खली कि इस तरह के गीतों के लिए प्रचलित राग पहाड़ी का बहुत ही सुन्दर गीत जिसे फ़िल्म प्रेमपर्वत के लिए जयदेव के संगीत में लता ने गाया -

ये दिल और उनकी निगाहों के साए

नहीं सुनाई दिया। माना तो यह भी जाता है कि इसी गीत से जयदेव ने फ़िल्मी गीतों के श्रोताओं का राग पहाड़ी से परिचय करवाया। या हो सकता है कि तीन बजे से पहले ये और कुछ पुराने गीत जैसे शगुन फ़िल्म से सुनवाए गए जो हम सुन नहीं पाए।

कुल मिलाकर हमें तो भई यह जुबली की बड़ी ही मीठी झंकार लगी।

Saturday, June 28, 2008

हैलो फ़रमाइश !

विविध भारती और फ़रमाइश दोनों का चोली-दामन का साथ है या यूँ कह सकते है कि विविध भारती वाले और फ़रमाइश करने वाले दोनों एक-दूजे के लिए बने है - मेड फ़ार इच अदर

बचपन से सुनती आई हूँ एक गाना सुनवाने के लिए फ़रमाइश करने वालों की सूची। कभी-कभी सूची बड़ी मज़ेदार हुआ करती जैसे एक दो सामान्य नाम लेने के बाद नाम आते पप्पू गुड्डी उनके मम्मी पापा और उनके परिवार के सभी सदस्य… अरे ! कितना बड़ा परिवार है !!

देश के कई शहरों के नाम तो हमें विविध भारती से ही पता चले जैसे भाटापारा, छपड़ा, छिवड़िया, देवरिया और भी ऐसे कई नाम है जिनको सुन कर लगता है क्या शहरों के ऐसे नाम भी है… अरे ऐसा नाम तो शायद ही कभी सुना हो…

मुद्दा ये कि पता नहीं देश के किस कोने से विविध भारती में चिट्ठी आ जाए। अब ये बात काग़ज़ों से निकल कर तार-बेतार पर आ गई है। जिन गानों की फ़रमाइश चिट्ठियों से आती थी अब फ़ोन पर आने लगी है। सीधे बात होती है इसीलिए फ़रमाइश के अलावा और भी दो-चार बातें हो जाती है। वैसे चिट्ठियों का क्रम अब भी जारी है।

इस समय मन चाहे गीत के अलावा सखि-सहेली में फ़रमाइशी गीतों का अनुरोध किया जाता है। सखि-सहेली में केवल महिलाएँ ही अनुरोध करती है। इन चिट्ठियों के अलावा हर शुक्रवार को सखियाँ फोन पर अपनी फ़रमाइश बताती है। फ़ोन पर फ़रमाइश की सुविधा सभी के लिए सप्ताह में तीन बार मंगलवार, गुरूवार और शनिवार को पिटारा के अंतर्गत हैलो फ़रमाइश कार्यक्रम में है। हर कार्यक्रम एक घण्टे का है।

सभी फ़रमाइशी कार्यक्रमों में अधिकतर वही गाने बार-बार सुनने को मिलते है। बचपन में अब्बा (मेरे पूज्य पिताजी) कहा करते थे अरे इतने लोगो ने फ़रमाइश कर दी इस गाने की, ये गाना तो अभी सप्ताह भर पहले ही तो सुना था। क्या इन लोगों ने यह गाना नहीं सुना था या इतना अच्छा है कि बार-बार सुनना चाहते है ! आख़िर कितनी बार ? जबकि कुछ गाने तो ऐसे है जो शायद ही कभी बजते हो।

गानों की फ़रमाइश के अलावा आजकल फ़ोन पर कुछ बातचीत भी होती है। बातों से लगता है कि कुछ पढने-लिखने वाले लड़के-लड़कियाँ है। कुछ पढी-लिखी और कुछ अशिक्षित गृहणियाँ है। कुछ व्यापारी है जैसे दुकान चलाने वाले। कुछ है खेती करने वाले। बहुत कम फ़ोन आते है रिटायर लोगों के।

हमें अक्सर इस बात का आश्चर्य होता है कि जो लोग अभी रिटायर है उनका ज़माना रेडियो का ज़माना था। उन्हें रेडियो की आदत रही होगी और ज़ाहिर है उस समय के गानों के शौकीन रहे होगें तो क्यों नहीं आज फ़ुरसत में अपने इस शौक को वे पूरा करते जबकि ऐसे लोगों के फोन बहुत ही कम आते है।

मैं हर शुक्रवार का हैलो सहेली ! ध्यान से सुनती हूँ और मुझे याद नहीं कि मैनें ऐसी किसी महिला का फोन सुना है जिसने यह कहा हो कि अब मैं नौकरी से रिटायर हुई हूँ और आराम से रेडियो सुनती हूँ। वैसे हमारे देश में महिलाएँ अध्यापन की नौकरी अधिक करती है। मैनें किसी अध्यापिका का फोन भी कभी नहीं सुना।

लगता है कुछ पेशे से जुड़े लोग ही विविध भारती में फ़रमाइश करते है और बाकी सब इन्हीं के फ़रमाइशी गीतों से संतोष कर लेते है।

जहाँ तक बात पिटारा की है हम तो कहेगें तीन दिन हैलो फ़रमाइश बहुत है। किसी एक दिन फ़रमाइश को छोड़ कर किसी और रूप में फ़िल्मी गीत सुनवाए जाए, किसी ऐसे रूप में जिसमें नए-पुराने उन सभी गीतों को समेटा जा सके जिनकी फ़रमाइश तो नहीं की जाती पर जो अच्छे और लोकप्रिय गीत है।

Tuesday, June 24, 2008

पद लहरी बनाम वाक्यांजलि

फ़िल्मी गीत प्रस्तुत करने के बहुत सारे ढंग है। कहीं फ़रमाइश को आधार बना कर तो कहीं फ़िल्में, कलाकार या विषय को आधार बना कर फ़िल्मी गीत सुनवाए जाते है।

आजकल एक कार्यक्रम आकाशवाणी हैदराबाद केन्द्र से प्रसारित हो रहा है। तेलुगु फ़िल्मी गीतों का यह कार्यक्रम बहुत समय से चल रहा है। इसका स्वरूप अच्छा है। इसमें एक पद को लिया जाता है। मैं यहाँ बता दूँ कि तेलुगु में शब्द को पद कहते है।

इस साप्ताहिक कार्यक्रम में हर सप्ताह एक पद या शब्द लिया जाता है और ऐसे फ़िल्मी गीत सुनवाए जाते है जिसके मुखड़े में वह शब्द हो जैसे एक पद लिया गया है अम्माई यानि लड़की। अब उन तेलुगु फ़िल्मी गीतों को आप सुन सकेंगें जिसके मुखड़े में अम्माई शब्द है।

एक इसी तरह का कार्यक्रम रेडियो सिलोन से पहले शायद सवेरे आप ही के गीत कार्यक्रम के बाद प्रसारित होता था जो शायद साप्ताहिक था। इस कार्यक्रम का नाम था - वाक्यांजलि

इसमें एक अच्छा सा वक्य चुना जाता था। यह ध्यान रखा जाता था कि वाक्य उपदेशात्मक हो या बोधगम्य हो या कोई अच्छी सी बात इस वाक्य में कही गई हो। यह वाक्य पाँच-छ्ह शब्दों का होता था क्योंकि आधे घण्टे में पाँच-छह गीत ही सुनवाए जा सकते है।

इस वाक्य के हर शब्द से शुरू होने वाला फ़िल्मी गीत सुनवाया जाता था। शब्दों को क्रम से लिया जाता था जैसे पहले शब्द से शुरू होने वाला गीत कार्यक्रम का पहला गीत होता उसके बाद दूसरे, तीसरे शब्द आदि।

कई बार ऐसा होता कि उस शब्द से शुरू होने वाला गीत नहीं मिलता तब ऐसा गीत चुना जाता जिसमें शब्द गीत के मुखड़े में हो। कभी ऐसा भी होता कि कोई शब्द गीत के मुखड़े में भी नहीं मिलता तब उससे मिलते-जुलते शब्द के गीत को चुना जात जैसे फुलवारी शब्द न मिले तो ऐसा गीत सुनवाया जाता जिसमें फूल शब्द हो।

Thursday, June 19, 2008

और भी राज्य है राजस्थान के अलावा

कल रात जयमाला के बाद इनसे मिलिए कार्यक्रम में बीएसएफ़ के फ़ौजी भाई की पत्नी से ममता (सिंह) जी की बातचीत प्रसारित हुई। ऐसी और भी बातचीत के कार्यक्रम प्रसारित हुए। इनसे मिलिए कार्यक्रम में फ़ौजी अधिकारियों से शायद अशोक सोनावणे जी ने भी बातचीत की।

पिछले रविवार यूथ एक्सप्रेस में मीडिया को लेकर जो बातचीत कमल (शर्मा) जी ने विश्लेषक विनोद जी से की उनके तार भी जैसलमेर से जुड़े थे।

सखि-सहेली में जयपुर आकाशवाणी केन्द्र में तैयार कार्यक्रम दुबारा भी प्रसारित किया गया। दुबारा सुनना भी बहुत अच्छा लगा लेकिन…

अब लग रहा है जैसे विविध भारती को जैसलमेरिया हो गया जैसे मच्छर काटने से मलेरिया होता है वैसे ही विविध भारती की टीम जैसलमेर क्या गई, बस सबको जैसलमेरिया हो गया।

एक कहावत है अंग्रेज़ी में - डू नाँट पे टू मच फ़ाँर ए विज़ल। इस कहावत से संबंधित छोटी सी कहानी है - एक ग़रीब लड़का था। जब वह दूसरे बच्चों को स्टील से बनी सीटी (विज़ल) बजाते देखता तो उसका भी मन करता बजाने को। जैसे-तैसे पैसे जोड़ कर उसने सीटी खरीदी। बहुत ख़ुश हुआ। एक कोने में बैठ कर सीटी बजानी शुरू की। बजाया बहुत बजाया फिर बजाते बजाते थक गया और सोचने लगा अब इसे क्या बजाऊँ ? कब तक बजाऊँ ? इसीलिए कहते है डू नाँ पे टू मच फ़ाँर ए विज़ल

कुछ ऐसी ही स्थिति नज़र आ रही है विविध भारती के कार्यक्रमों में। जहाँ सुनो वहाँ जैसलमेर, चाहे इनसे मिलिए हो या सखि-सहेली या यूथ एक्स्प्रेस वग़ैरह वग़ैरह…

शायर ने क्या ख़ूब कहा - और भी ग़म है ज़माने में मुहब्बत के सिवाय। भई सच में ज़िन्दगी में मुहब्बत ही सब कुछ नहीं है। वैसे ही और भी रज्य है इस देश में राजस्थान के अलावा, एक जैसलमेर ही इकलौता शहर नहीं है।

विविध भारती की टीम का दौरा कोई कुंभ का मेला तो है नहीं जो चौदह साल में एक बार लगे। अरे भई… और राज्यों के भी दौरे कीजिए। हम मानते है कि राजस्थान की रंग-बिरंगी संस्कृति की छटा ही निराली है पर पूर्वोत्तर राज्यों का प्राकृतिक सौन्दर्य कुछ कम नहीं है। वहाँ के लोक संगीत को भी बटोर लाते।

अगर फ़ौजी भाइयों के पास ही जाना है तो असम में भी बहुत से फ़ौजी भाई है। कच्छ की सीमा सुरक्षा के जवानों से भी बात करेगें तो मज़ा आएगा। कच्छ के रेगिस्तान को जानेंगें तो भी मज़ा आएगा।

हमें इतना ज्ञान नहीं है कि जैसलमेर की सीमा अन्य सीमाओं से कितनी विशेष है और इसकी बहुत अधिक जानकारी भी नहीं मिली। पर इतना जानते है अपने देश में निराली विविधता है जो विविध भारती जैसलमेर की तर्ज पर समेट कर अपने श्रोताओं तक पहुँचा दे तो मज़ा आ जाए।

Tuesday, June 17, 2008

युवावाणी

युवावाणी यानि युवाओं की वाणी - जैसी आकाशवाणी वैसी ही युवावाणी, अपने स्तर के श्रोताओं का परिपूर्ण संसार।

जहाँ तक मेरी जानकारी है सत्तर के दशक में आकाशवाणी से युवावाणी कार्यक्रम आरंभ हुए। पहले शायद दिल्ली या मुंबई फिर सत्तर के दशक के मध्य तक देश के अधिकांश आकाशवाणी केन्द्रों से इसकी शुरूवात हो गई।

युवावाणी कार्यक्रम युवाओं के लिए युवाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला कार्यक्रम है। लगभग सभी केन्द्रों के कार्यक्रम का ढांचा एक जैसा है जिसमें शायद कुछ फेर-बदल होता रहता है। प्रसारण का समय सप्ताह में एक बार कम से कम तो अधिक से अधिक रोज़ एक घण्टा है जिसमें से आधा घण्टा सुबह और आधा घण्टा शाम में है। कहीं-कहीं शायद पैंतालीस मिनट तक भी रहा।

युवावाणी अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषा दोनों में रही और एक के बाद एक भाषाओं में लगातार प्रसारण समय रहा। राज्यों की विशेष स्थिति पर दो से अधिक भाषाओं में भी कार्यक्रम रहे जैसे आकाशवाणी हैदराबाद से अंग्रेज़ी, तेलुगु और उर्दू में रोज़ एक घण्टा और हिन्दी में सप्ताह में आधे घण्टे का प्रसारण।

युवावाणी में क्या नहीं है ? सभी तरह के कार्यक्रम है जैसे रूपक (फ़ीचर) होता है जो किसी भी विषय पर होता है, क्विज़ होता है सामान्य जानकारी बढाने के लिए, वार्ताएँ होती है विभिन्न विषयों पर, कैरियर के लिए उपयोगी बातें बताई जाती है, विभिन्न व्यक्तियों से भेंट वार्ताएँ होती है जिसमें कला और साहित्य से लेकर आईएएस जैसी परीक्षाओं में सफल उम्मीदवारों से भी बातचीत की जाती है।

फ़िल्मी गीत और ग़ैर फ़िल्मी गीत होते है जो नए गाने होते है। सप्ताह में या महीने में एक बार एक कार्यक्रम होता है जिसका शीर्षक अधिकांश केन्द्रों में मेरी पसन्द रहा जिसमें प्रस्तुतकर्ता अपनी पसन्द के गीत सुनवाते है और कुछ गीत के बारे में तो कुछ अपने मन की बात बताते है।

ऐसा ही कार्यक्रम अंग्रेज़ी में भी होता है जिसका शीर्षक है माई काइन्ड आँफ़ म्यूज़िक जिसमें अंग्रेज़ी फ़िल्मी और ग़ैर फ़िल्मी गीत सुनने को मिलते है। इस तरह इसी कार्यक्रम से पाश्चात्य संगीत सुनने को मिलता है। कभी-कभी केवल पाश्चात्य धुनें भी सुनवाई जाती है।

आपमें से बहुतों को याद होगी कम सैपटैम्बर की लोकप्रिय धुन जो कई हिन्दी फ़िल्मों और नाटकों में भी बजती रही।

युवावाणी में नाटकों का भी नियमित प्रसारण होता रहा। इतना ही नहीं कहानियाँ और कविताएँ भी प्रसारित होने से नए कवियों, लेखकों और कलाकारों को भी प्रोत्साहन मिला। इसी कार्यक्रम से कई गायक और संगीतकार उभरे।

Wednesday, June 11, 2008

टेलीविजन में रेडियो

पिछले रविवार को दोपहर बाद मैं अपनी पसन्द का कोई कार्यक्रम देखने के लिए टेलीविजन के रिमोट पर ऊँगली चला रही थी। एक के बाद एक चैनल आ रहे थे कि एक चैनल पर वालीबाल का मैच चल रहा था और आवाज़ आ रही थी कमल (शर्मा) जी की।


कमल जी टेलीविजन पर वालीबाल की कमेंट्री देते है… ओह ! नो !! यह तो विविध भारती है। फिर हमने देखा वालीबाल का मैच और सुनी बातें साहित्य की, मीडिया की…


मुद्दा ये कि अब रेडियो सुनने के लिए अलग से रेडियो सेट खरीदने की ज़रूरत नहीं। टेलीविजन के ढेर सारे चैनलों में से आपका स्थानीय केबल आँपरेटर एक ऐसे चैनल को जो वहाँ के लोग कम देखते है, उसको एफ़ एम से जोड़ देगा। नतीजा ये कि टेलीविजन चैनल का वीडियो आप देखिए और आवाज़ सुनिए एफ़ एम विविध भारती की।


हमारे घर में कभी ज़ी स्पोर्टस तो कभी फ़ैशन टीवी पर विविध भारती होता है। अक्सर शनिवार रविवार की रात में दस बजे के बाद जब रूटिन धारावाहिक नहीं होते है तब रिमोट कन्ट्रोल से ही काम लिया जाता है और छाया गीत सुना जाता है।

वैसे ही रात के दस बजे सन्नाटा होता है। ऐसे में कभी-कभी छाया गीत में बड़ी गंभीर बातें बताई जाती है और सुनवाए जाते है बड़े ही शान्त और गंभीर गीत जो सन्नाटे को काटते भले लगते है पर नज़र डालो तो तेज़ दौड़ती हुई गाड़ियाँ। कार रेस चल रही है। तेज़ी से सरपट गाड़ियाँ दौड़ रही है और शान्त गीत बज रहा है जिसका धीमा-धीमा संगीत गंभीर बोलों को समेट रहा है।


हद तो तब हो गई जब एक दिन सुबह-सवेरे टेलीविजन पर हामारी नज़र पड़ गई। कमल जी आध्यात्म की बातें बता रहे थे और रैम्प पर बालाएँ अपने जलवे बिखेर रही थी फिर पार्श्व में गूँज उठा भक्ति गीत।

लगता है इस समस्या का शायद ही कोई समाधान हो। क्या ही अच्छा हो कि टेलीविजन में एक चैनल एफ़ एम का हो जिसके पर्दे पर कुछ फूल, पर्वत मालाएँ, हरी-भरी घाटियाँ नज़र आए और सुनाई दे विविध भारती।

Monday, June 9, 2008

रेडियोनामा पर मेरी सौ वीं पोस्ट

आज रेडियोनामा पर मैं अपना सौं वाँ चिट्ठा लिख रही हूँ। मैनें अपना पहला चिट्ठा पिछले वर्ष 19 सितम्बर को लिखा था। तब से आज तक मैं अपने अनुभव बाँटने की कोशिश कर रही हूँ। दूसरों के अनुभव पढती हूँ।

वास्तव में रेडियोनामा पर लिखना ही एक सुखद अनुभव है। रेडियो बचपन से मेरा साथी है। मैं अपने बचपन से विविध भारती सुन रही हूँ। इतने ढेर सारे अनुभव है कि नहीं लगता है कि सब के सब मैं सभी से बाँट पाऊँगी। फिर भी हमेशा कोशिश करती रहती हूँ। आज कोशिश करूँगी विविध भारती के कार्यक्रम प्रस्तुति के बारे में कुछ लिखने की।

जब मैं बचपन में सुना करती थी तब प्रस्तुति बेहद सादगी से होती थी। सिर्फ़ इतना कहा जाता था -

ये विविध भारती है आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम या मनोरंजन सेवा या विज्ञापन प्रसारण अब प्रस्तुत है … कार्यक्रम

फिर कार्यक्रम शुरू हो जाता। फ़रमाइशी फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम में तो गिने-चुने वाक्य कहे जाते जैसे -

प्रस्तुत है दोगाना या युगलगीत या गीत जिसे आवाज़े दी है लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने गीत के बोल लिखे है राजेन्द्र कृष्ण ने और संगीत दिया है मदन मोहन ने और फ़िल्म का नाम है …

वाक्यों में कुछ ही परिवर्तन होता जैसे -

फ़िल्म का नाम है … या यह गीत … फ़िल्म से लिया है या … फ़िल्म का गीत सुनिए
गीतकार है … या गीत लिखा है … या … का लिखा गीत सुनिए या बोल है … के
संगीतकार है … या … का संगीत या स्वरबद्ध किया गीत सुनिए या सुरों में पिरोया है या सुरों से सजाया है … ने
आवाज़ है … की या आवाज़ दी है … ने या … की आवाज़ों में गीत सुनिए
फ़रमाइश करते है या अनुरोध करते है या प्रस्तुत है गीत आप सबके अनुरोध पर और सूची पढ दी जाती।

अन्य कार्यक्रमों में भी सीमित शब्दों में जानकारी दी जाती।

जब कार्यक्रम का समय आधा हो जाता तब पहले तो सिर्फ़ इतना ही कहा जाता था - ये कार्यक्रम आप विविध भारती से सुन रहे है। इसीलिए पहले उदघोषकों की सिर्फ़ आवाज़ ही सुनी जाती थी क्योंकि भाषा तो जानी-पहचानी ही रहती थी।

पर अब तो प्रस्तुति में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया है। पता ही नहीं चलता कि किस कार्यक्रम में उदघोषक क्या-क्या कहेंगें। दुनिया जहान की बातें मौसम की बातें खेल जगत की बातें।

पहले जो श्रोता थे अब दोस्त हो गए। नमस्कार हैलो हो गया। ब्रेक में बाकायदा एक धुन सुनी जाती है। उदघोषक अपना नाम बताते है। शहर में क्या हो रहा है यह भी बताते है यानि कब क्या बताएगें क्या नहीं बताएगें कुछ पता नहीं सब उनके मूड से वे ही तय करते है।

हम तो कहेंगें कि पचास साल की होते-होते विविध भारती हम सब की पक्की सहेली बन गई है। ऐसी सहेली जो पूरी तरह से परिपक्व हो चुकी है और हम से कुछ भी बड़े अधिकार से कहती है।

और अब परिपक्वता की हद को पार करती (पचास के पार जाती) विविध भारती सठियाने (साठ की होने) जा रही है। देखना ये है कि एक दशक के बाद कैसी लगती है सठियाई (साठ की) विविध भारती…

Friday, June 6, 2008

उजाले उनकी यादों के

उजाले उनकी यादों के - यह कार्यक्रम आजकल हर रविवार को रात में साढे नौ से दस बजे तक प्रसारित होता है जबकि पहले मंगलवार गुरूवार को इसी समय प्रसारित होता था। इस कार्यक्रम में जैसे कि नाम से ही पता चलता है बीते समय की फ़िल्मी हस्तियों से बातचीत की जाती है।

इस कार्यक्रम की परिकल्पना (काँन्सेप्ट) बहुत अच्छा है। आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों में जिनसे बातचीत की जाती है उन्हीं के बारे में जानकारी मिलती है पर यहाँ ऐसा नहीं है। यहाँ उस कलाकार के पूरे कैरियर के दौरान जिन-जिन लोगों के साथ उनका साथ रहा उन सभी के बारे में बात होती है। इतना ही नहीं फ़िल्मी जीवन से हट कर दूसरे क्षेत्र में भी अगर उस कलाकार का योगदान है तो उस पर भी विस्तार से बातचीत होती है।

यह कार्यक्रम शायद कमलेश (पाठक) जी प्रस्तुत करतीं है। इस कार्यक्रम के स्वरूप के लिए विविध भारती को बधाई। मेहमान कलाकार से बातचीत करते है कमल (शर्मा) जी। इस कार्यक्रम की लोकप्रियता में कमल (शर्मा) जी का बहुत बड़ा योगदान है। वह ख़ुद बहुत ही कम बोलते है पर मेहमान से सब कुछ उगलवा लेते है। ऐसी बातें भी जो आमतौर पर लोकप्रिय कलाकार शायद ही कहना पसन्द करें जैसे -

आजकल चल रही श्रृंखला में लोकप्रिय कलाकार शशिकला ने बताया कि जब मदर टेरेसा के आश्रम में कलकत्ता में वो समाज सेवा कर रहीं थी तब उन्हें मदर से मिलने की बहुत इच्छा थी और जब मदर आईं तो कैसे छोटे बच्चों की तरह वो दरवाज़े के बाहर से मदर को देखने लगी थीं।

जब मैनें इस स्तर पर बातचीत सुनी तो मुझे लगा यह तो कमल जी का ही कमाल है और क्या तरीका रहा होगा प्रस्तुतकर्ता (शायद कमलेश पाठक) का और क्या छवि है विविध भारती की कि एक कलाकार अपना दिल खोल कर रख देता है।

सिर्फ़ एक ही श्रृंखला जो अभी पूरी भी नहीं हुई जिसको सुन कर व्ही शान्ताराम के बारे में बहुत जानकारी मिली जिसे शशिकला ने अन्ना साहेब कहा। मुझे याद आ गई फ़िल्म तीन बत्ती चार रास्ता जिसमें छह बहुओं वाले लालाजी की मराठी बहू बनी थी शशिकला।

हृषि दा यानि हृषिकेश मुखर्जी के बारे में भी बातें हुई। बताया गया उनका काम करने का अंदाज़ और मुझे याद आ गई अनुपमा की शोख़ और चंचल पर सकारात्मक भूमिका वाली शशिकला जो अपनी सहेली शर्मिला टैगोर से फोन पर देर तक बात करती है और जवाब नहीं मिलने पर कहती है - ज़रूर सिर हिला रही होगी।

लता मंगेशकर और मीनाकुमारी के बारे में बातें हुई तो मुझे याद आ गई फ़िल्म फूल और पत्थर जिसमें वैम्प बनी शशिकला गाती है -

शीशे से पी या पैमाने से पी
या मेरी आँखों के मयख़ाने से पी

और सबसे ज्यादा याद आ आया वो अंतिम सीन जहाँ वो अपने ख़ास वैम्पनुमा कपड़े पहन कर धर्मेन्द्र से मिलने बस्ती में जाती है और सारी बस्ती उसे देखने जमा हो जाती है।

यह है कमाल इस कार्यक्रम का जो इतना याद दिला देता है एक श्रोता को। आशा है सिलसिला जारी रहेगा…

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