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Monday, October 22, 2007

हर रविवार एक फ़िल्म

पहले विविध भारती से हर रविवार दिन में ११ से १२ बजे तक एक घण्टे के लिए एक फ़िल्म प्रसारित होती थी।

प्रसारित होने का मतलब है फ़िल्म की कहानी सुनाई जाती थी। जी नहीं ! कोई कहानी कहता नहीं था बल्कि फ़िल्म का आडियो भाग सुनाया जाता था।

कोई भी फ़िल्म ढाई से तीन घण्टे की होती है जिसे एक घण्टे में समेटना कठिन काम है। लेकिन इतनी कुशलता से संपादन किया जाता था कि लगता ही नहीं था कि फ़िल्म का कोई भाग छूट गया है।

कभी-कभी कुछ सीनस को आपस में जोड़ने से भी कहानी के क्रम में कुछ कठिनाई होती तो उदघोषक एकाध वाक्य कह कर कहानी का क्रम बनाए रखते। गीत भी अपनी जगह पर बजते। यह बात और है कि गीतों का केवल मुखड़ा बजता।

कहानी की समाप्ति पर फ़िल्म से जुड़े सभी के नाम बताए जाते। फ़िल्मों का चयन भी बहुत बढिया होता था जिसमें बूंद जो बन गई मोती जैसी सार्थक फ़िल्मों को चुना जाता तो दो चोर जैसी लोकप्रिय फ़िल्में भी शामिल होती।

हमारे एक मित्र है जिनकी आरंभिक शिक्षा गांव में हुई और उच्च शिक्षा के लिए वो शहर आए। वे बताते है कि उनके गांव में तीन-चार घरों में ही रेडियो था। हर रविवार को ११ बजे उन घरों के बाहर दरवाज़े पर चारपाई पर रेडियो रख दिये जाते और आवाज़ बढा कर फुल वाल्यूम पर रेडियो बजाया जाता। सारा गांव एक घण्टे तक तीन-चार समूहों में बंट कर फ़िल्म की कहानी सुनता।

अस्सी के दशक से हैद्राबाद में बारी-बारी से एक रविवार हिन्दी फ़िल्म और एक रविवार को क्षेत्रीय केन्द्र से तेलुगु फ़िल्म की कहानी सुनाई जाने लगी। फिर लगातार हर रविवार तेलुगु फ़िल्म ही बजने लगी जिससे विविध भारती के हिन्दी फ़िल्मों का क्रम टूट गया।

इस कार्यक्रम का शीर्षक चित्रपट या चित्रशाला था। ठीक से याद नहीं आ रहा।

वैसे चित्रशाला शीर्षक से पांच मिनट का एक कार्यक्रम रोज़ भूले-बिसरे गीत से पहले प्रसारित होता था जिसमें लघु वार्ता या काव्य पाठ सुनाया जाता था। कुछ समय से ये कार्यक्रम भी यहां हैद्राबाद में सुनाई नहीं दे रहा।

यह चित्रशाला कार्यक्रम भी फ़िल्म की कहानी सुनना बंद करने के बहुत समय बाद से यहां हैद्राबाद में सुनाई देने लगा। इसीसे ध्यान हीं नहीं आ रहा कि फ़िल्म की कहानी के कार्यक्रम का शीर्षक चित्रशाला था या चित्रपट या कुछ और।

13 comments:

Dr. Ajit Kumar said...

शायद आप बहुत पहले की बात कर रही हैं. किंतु , आपको मालूम हो कि अभी कुछ दिन पहले तक विविध भारती पर ही पिटारा कार्यक्रम के अंतर्गत "बाइस्कोप की बातें" में लोकेंद्र शर्मा जी भी एक फ़िल्म की पूरी कहानी उसके dialogs के साथ-साथ परदे के पीछे की कहानी भी बड़ी कुशलता से हमलोगों के सामने प्रस्तुत करते थे. शायद ये कार्यक्रम आपके ध्यान में नहीं रहा.

सुभाष कान्डपाल said...

पहले तो मैं विविध भारती का एक बहुत अच्छा श्रोता था लेकिन अब तो बहुत ही कम समय मिलता है रेडियो सुनने के लिए और बहुत दिन्नो से विविध भारती को सुनने का मौका भी नही मिला

विविध भरती मे छाया गीत जो रात के लगभग १० बजे के आस पास आता था मैं इस कार्यक्रम का बहुत ही ज्यादा फेन था. छाया गीत से पहले या कहें की जो ८:३० या ८:४५ पर जो कार्यक्रम आता था, नाम तो याद नही आ रहा है, वो भी मुझे काफी अच्छा लगता था.

annapurna said...

डा अजीत कुमार जी पिटारा में शुक्रवार को प्रसारित होने वाली बाइस्कोप की बातें मैं भी सुनती थी लेकिन ये अलग तरह का कार्यक्रम था जिसमें किसी फ़िल्म के निर्माण से संबंधित बातें होती थी यानि पर्दे के पीछे की बातें और साथ ही कुछ संवाद भी सुनाए जाते थे।

मैं यहां चिट्ठे पर जिस कार्यक्रम की बाते कर रही हूं उसमें फ़िल्म का आडियो भाग सुनाया जाता था। जिस तरह टेलिविज़न पर आप फ़िल्म देखते है उसी तरह यहां फ़िल्म सुनते थे।

सुभाष जी चिट्ठे पर आने का धन्यवाद

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

आदारणिय श्रीमती अन्नपूर्णाजी,

आपने जिस कार्यक्रमका जिक्र किया, उस कार्यक्रमका नाम ’चित्रध्वनि’ था, जो हर महिने के पहले और तीसरे रविवार ही आता था और दूसरे और चौथे रविवार शायद रत्नाकर नामसे लम्बे नाटको वाला कार्यक्रम था । महिने के पाँचवे रविवार्को इन्द्रधनुष नामसे कार्यक्रम होता था और शायद इसका स्वरूप अभी सुबह ९.१५ पर होता है ऐसा नहीं था, पर कुछ ही सालो पहेले दोपहर तीन बजे से साढे तीन बजे तक आता था, उसीसे करीब ८०% मिलता जूलता था । चित्रशाला कार्यक्रम की वार्ताओं को तीन से साढे तीन बजे वाले इन्द्रधनूष कार्यक्रममें शामिल किया जाता था । हाँ, नाम चित्रशाला नहीं बोला जाता था । पर एक बात आप ऐसे कोई भी विषेश प्रकारके कार्यक्रमके बारेंमें ध्यान पर लेगी तो अपने मनमें सोचा होगा की जब ऐसे कार्यक्रममें जल्दी जल्दी पुन: प्रस्तूती की नौबते बढ़्ने लगती है, तब वह बंद होनेकी पूर्व तैयारी रूप ही रहेगी । जब केन्द्रीय विविध भारती सेवा सुबह १०.१५ से शुरू होनी बंध हो कर १२.३० पर शुरू होने लगी थी तब हर स्थानिय विविध भारती केन्द्रोंसे अपनी क्षेत्रीय भाषाकी फिल्मों के चित्रध्वनि शुरू हुए थे । मेरा १३ अक्तूबर, २००७ का स्व. श्री किशोरदा वाला पोस्ट पढा और सुना या नही । हमारे सुरतमें स्थनिय विविध भारती केन्द्र अगस्त, २००२से ही आरंभ हुआ और इसके लिये १९९८से मैं हमारे सांसद श्री काशीरम रांणाजी के पिछे लगा रहा था । इसके पहेले जैसा रिसेप्सन मिलता शोर्ट वेव के दो में से एक या स्थानिय मुम्बई मिडियम वेव पर और कभी कभी अच्छा मौसम होता तो वि. प्र. सेवा अहमदाबादसे ऐसे अलग अलग जगहसे सुनना पडता था । अगर किसी रूपसे पसंद नहीं भी आया हो तो मेरी गलती पर मेरा ध्यान आकर्षित करें ।
पियुष महेता ।

annapurna said...

पीयूष जी धन्यवाद नाम बताने का।
सत्तर के दशक में हर रविवार हिन्दी फ़िल्म ही होती थी। बाद में केवल दो रविवार को होने लगी।

अन्नपूर्णा

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

श्री सुभाषजी को विदीत हो की आप रात्री ८.३०से ८.४५ पर आने वाले कार्यक्रमकी बात कर रहे है, उसका नाम रागरंग था, जो आजके राग-अनुराग कार्यक्रम जैसा था । पर उसमें एक ही राग पर आधारित गाने प्रस्तूत किये जाते थे । उस कार्यक्रम के समाप्त होने पर उसी कार्यक्रमसे जूड कर एक आधी फ़िल्मी धून भी बजती थी, जिसके एक अन्तरे के बाद धून्की फ़िल्म, साझ और वादक कलाकारके नाम बताये जाते थे । फिर ८.४५ पर लघू-तरंग पर राष्ट्रीय समाचार और मध्यम तरंग के स्थनिय वि. प्र. केन्द्रों से या तो प्रायोजित कार्यक्रम या चित्रपट संगीत स्थानिय रूपसे आते थे ।
पियुष महेता ।

सुभाष कान्डपाल said...

धन्याबाद पीयूष जी इस जानकारी के लिए लेकिन शायद मुझे ठीक से याद नही आ रहा है, मैं उस कार्यक्रम की बात कर रहा हू जिसमे रात के समय पर एक लघु कथा सुनाई जाती थी, लगभग १०-१५ मिनट की होती थी वो, उस कार्यक्रम का क्या नाम है , क्या आप बता सकते है

Udan Tashtari said...

बहुत पुरानी बात याद दिला दी. कितना ही पीछे डूबते चले गये यह पढ़ते हुए. आभार.

इरफ़ान said...

मित्रो,

आपकी सूचना के लिये बता दूं कि FM Gold(जो कि दिल्ली और आसपास 106.4 MegaHz पर सुनाई देता है और पूरे देश में शॉर्ट वेव 31 मीटर पर) पर संडे और सैटरडे को दोपहर 3-5 आपको फिल्म की कहानी सुनाने का कार्यक्रम है रेडियो रील यह अब तक के सभी कार्यक्रमों में एक अनूठी हैसियत रखता है. कहानी 4.05 बजे से 5 बजे तक सुनाई जाती है और साउंडट्रैक का दिलचस्प इस्तेमाल किया जाता है.परसों मैं इसमें महल(1949)की कहानी सुना रहा था. थोडा समय मिला तो मैं इसे इसी ब्लॉग पर आपको सुनवाऊंगा.

इरफ़ान said...

और हां, इसे आप DTH पर भी सुन सकते हैं.

annapurna said...

सुभाष जी आप शायद जिस लघुकथा की बात कर रहे है उस कार्यक्रम का नाम मिलन यामिनी था जिसमे एक लघु कथा में बीच-बीच में संबंधित तीन फ़िल्मी गीत बजाए जाते थे।

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

अन्नपूर्णाजी और सुभाषजी,

मिलन यामिनी जैसा कार्यक्रम मूझे (किसीकी भी याददास्त १००% नहीं हो सकती इस लिये शायद मूझसे यह बात छूट रही होगी ) याद नहीं आ रहा है, पर एक समय कुछ ऐसा याद आ रहा है, जब रात्री १०.२० पर शुभ रात्री नामका रातों के नझारोंके बयानात करने वाले गानोंकी उद्दघोषककी शायराना या साहितिक टिपणीके साथ प्रस्तूती वाला शायद १० मिनीटका कार्यक्रम आता था ।

annapurna said...

मिलन यामिनि कार्यक्रम रात में 8:30 से 9:15 के बीच कभी 15 मिनट के लिए सप्ताह में एक बार आता था।

इसमें एक कहानी प्रस्तुत की जाती थी जिसमें पुरूष और नारी पात्र संवाद बोलते थे। कहानी से जुड़े तीन फ़िल्मी गीत उचित जगह पर बजाए जाते थे।

अधिकतर कुसुम अंसल की कहानियां प्रसारित होती थी।

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