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Saturday, February 16, 2008

कभी कभी विविध भारती पर बहुत गु़स्सा आता है !

वाक़ई...सच लिख रहा हूँ.
आज यानी १६ फ़रवरी की बात है. भूले-बिसरे गीत सुन रहा था. कोई नये उदघोषक थे. साहब न कार्यक्रम के मूड को समझते थे न विविध भारती की उजली विरासत को. ऐसे नाटकीय अंदाज़ में बोल रहे थे जैसे किसी आर्केस्ट्रा कार्यक्रम का संचालन कर रहे हों ( वह भी बहुत अलग होता है) गुले बकावली फ़िल्म से एक गीत रफ़ी साहब द्वारा गाया जाना था...उदघोषकजी ने संगीतकार का नाम कहा हँसराज हँस. जी हँसराज हँस , पंजाबी लोक-गीत गाय. होना चाहिये था..हँसराज बहल ! बोल चुकने के बाद क्षमा करिये हँसराज...और बस चुप्पी. अब मेरे जैसे पुराने फ़िल्म संगीत के छोटे-मोटे दर्दी के लिये तो ये कुफ़्र ही समझिये. ये नये अनाउंसर्स समझते ही नहीं कि विविध भारती सिर्फ़ एक रेडियो स्टेशन नहीं एक जीता-जागता दस्तावेज़ है. इन उदघोषकजी की मेहरबानी के साथ शहद जैसे मीठे गानों के बीच कौवे की कौं कौं के जैसे बजते स्कूल चलें हम के इश्तेहार भी कान के स्वाद को बेमज़ा करते हैं. माना विविध भारती की अपनी वित्त्तीय मजबूरियाँ हैं लेकिन कम से कम सुबह ६ बजे से ८ बजे तक का सुरीला ट्रांसमिशन तो बख्श दीजिये हुज़ूर ! और हाँ याद आया...सुबह अर्पण कार्यक्रम समाप्त होते ही स्थानीय केन्द्र का उदघोषक दिन भर के विविध भारती आकर्षणों की जानकारी देता है. लेकिन क्या इसे जानकारी इसे कहेंगे.... सरगम से सितारे......बजे....हवा महल......बजे...अरे भाई आज इन कार्यक्रमों में क्या होने वाला है ये भी तो बताइये...कौन है सरगम के सितारे कार्यक्रम का मेहमान...यदि वह स्वानंद किरकिरे है तो इस इन्दौरी बाशिंदे को कई इन्दौरी श्रोता सुनना चाहेंगे...हवा महल में यदि म्युज़िक मास्टर भोलाशंकर आ रहे हैं तो गणपतलाल डांगी जी के कई क़द्रदान जयपुर में हैं....मुंशी इतवारीलाल आ रहे हैं तो लख़नऊ में विनोद रस्तोगी के चाहने वाले आज भी कम नहीं हुए....यह स्थानीयता ही तो रेडियो की ताक़त है जनाब....अल्लाह के लिये उसे ख़त्म न कीजिये ....वरना विविध भारती अपना वजूद ही खो बैठेगी.

उच्चारण के मामले में भी इन दिनों विविध भारती में बेफ़िक्री है. अभी पिछले दिनो नग़मा-निगार(यानी गीतकार) को एक अनाउंसर नग़मा-निसार कह रहे थे. अब बताइये जिस विविध भारती को सुन सुन कर हज़ारों लोग बोलना सीखते हैं उन्हे इन अनाउंसमेंटस से क्या मिलेगा.
एफ़.एम स्टेशनों की बाढ़ ने जिस तरह का कानफ़ोडू संगीत परोसा है लगता विविध भारती के हुक़्मरान उससे बेख़बर हैं.जनाब हमें शहद चाहिये......मधुमख्खियों की भन भन नहीं...तरस खाइये हम पर...हम विविध भारती के श्रोता मात्र नहीं उसकी संगीत यात्रा के शेयर होल्डर्स हैं.

10 comments:

सागर नाहर said...

सर सचमुच बड़ा गुस्सा आता है.. अब इस लेख की अगली कड़ी मैं लिखूंगा, कि क्यों मुझे विविध भारती पर गुस्सा आता है।

डॉ. अजीत कुमार said...

संजय जी,
आपने बिल्कुल नस पकडी है. नए अनाउन्सर कभी कभी कार्यक्रम बेमजा कर देते है. पर नए होने के कारण क्षम्य भी हैं.
सभी तो एक बारगी ही विविध भारती की शान नहीं बन सकते ना.
वैसे, विज्ञापनों के मामले में स्थानीय केन्द्र तो हद ही पार कर देते हैं.
धन्यवाद.

Lavanyam - Antarman said...

कहाँ थे आप इत्ते दिनों से ?

आप की पोस्ट देखकर खुशी हुई -
आशा है, इसका असर भी होगा

जोगलिखी संजय पटेल की said...

आदरणीय आप सभी.
सहमत स्वर के लिये शुक्रिया.लावण्या बेन कभी कभी उचट सी हो जाती है न जीवन में ...बस समझिये उसी का शिकार हूँ मैं.लगता है सबकुछ दोहरा ही तो रहे हैं हम. हमारा कारनामा वैसा तो नहीं न जैसा आपके पापाजी का रहा.उन्होने नई ज़मीन से परवाज़ ली थी न..कितना संघर्ष रहा हो. हम तो बस कहीं सुना...कहीं पढ़ा...मौलिक क्या है हमारे पास ? ये तो आज विविध भारती प्रकरण ने दिल दुखा दिया सो लिख गया जैसे तैसे.अब सोचता हूँ क्या होना जाना है इस शिकायत से भी.

Harshad Jangla said...

Sanjaybhai
Your "Akrosh" is well written.They should hire the annoncers after testing their accents, pronounciation etc. Hope your voice reaches them.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

आदरणिय श्री संजयजी,
विविध भारती पर करीब सभी अद्दघोषको की परम्परा रही है, कि अगर गाने से पहेले गलत उद्दघोषणा हो गयी तो गाने के बाद सही उद्दघोषणा कर देनी पर इस तरह जैसे गाने के पहेले कोई उद्दघोषणा हुई ही नहीं हो, सच्ची या गलत ।
शुक्रवार के दिन ही एक नयी (शायद) अस्थायी उद्दघोशिकाने शाम ७०५ पर और फिर रात्री ८-३० पर व्यापारी अन्तराल में वायोलीन पर श्री अनिल मोहिले की बजाई धी ट्रेन फिल्म की धून गुलाबी आँखे बजाई पर यह ४५ आर पी एम एल पी होते हुए उन्होंने अन्य रुटिन एल पी की तरह ३३ आर पी एम पर बजाई, पर बजने पर सुन कर भी उनको खयाल नहीं आता है कि गलती सुधारे ।
पियुष महेता

annapurna said...

संजय जी आपका चिट्ठा पढ कर मुझे भी कुछ-कुछ गुस्सा आ रहा है।

जहां तक भूले-बिसरे गीत में हंस राज बहल की बात है, उसके बारे में आप को बता दूं कि शायद उदघोषक की ग़लती के बाद गुस्से में भिनभिनाते ही रह गए, नहीं तो आपको पता होता कि गीत के तुरन्त बाद उदघोषक से सबसे पहले सही नाम बताया था।

इसे कहते है लाइव प्रसारण में ज़बान का फिसलना जो क्षम्य है।

इस तरह की ग़लती हो सकती है। आप ही का उदाहरण ले लीजिए, चिट्ठा लिखते समय आपने लिखा - … विविध भारती आकर्षणों की जानकारी देता है। लेकिन क्या इसे जानकारी इसे कहेंगें…

हां एक और बात - सरगम के सितारे या सरगम से सितारे

आप तो लिखने के बाद पढ कर पोस्ट कर सकते है तो ये हाल है फिर…

जिस भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम की आप चर्चा कर रहे है उसकी असली नब्ज़ तो आपने पकड़ी ही नहीं। मैं एक-दो सप्ताह देखकर फिर पकड़ने वाली हूं।

प्रतीक्षा कीजिए मेरे चिट्ठे की फिर पता चलेगा कि गुस्सा करने के लिए किस बारीक नज़र की ज़रूरत है।

जोगलिखी संजय पटेल की said...

परम आदरणीय अनुराधाजी
आपकी बारीक़ नज़र को अग्रिम सलाम ! उस अनाउंसर की तो छोडि़ये ; आपने मेरे लिखने में जो ग़लतियाँ बताईं उसके लिये उपकृत हूँ.मेरा लिखना भी लाइव होता है (हिन्दी में उसे स्फ़ूर्त कहूँ तो ज़्यादा बेहतर होगा)सो उसे भी कृपया क्षम्य ही मानिये.मनुष्य है ग़लतियों का पुलिंदा . मेरा मक़सद किसी को शर्मसार करना नहीं था ...ये महसूस करवाना था कि विविध भारती जैसी महान संस्था में किसी ज़माने में इन सब बातो को ख़ासी तवज्जो दी जाती सी थी जो अब गुम सी हो चली है. हाँ कुछ लोग हैं जो अब भी मेहनत करते हैं और विविध भारती के सुनहरे दौर को ज़िन्दा कर देते हैं.मुझ जैसे अत्यंत साधारण से प्रसारणकर्ता ने विविध भारती और आकाशवाणी सुनकर ही बोलना सीखा है सो मुझे भिनभिनाने का हक़ बनता है..

जोगलिखी संजय पटेल की said...

इस बार तो अक्षम्य ग़लती कर ही गया अन्नपूर्णाजी.(अनुराधाजी नहीं...)

annapurna said...

संजय जी, मुझे अच्छा लगा कि आपने हर बात खुले दिल से स्वीकार की।

आपका पूरा हक़ है आप इसे बनाए रखिए।

हम तो यही चाहते है कि इन छोटी-मोटी बातों को नज़र अन्दाज़ करते हुए अपनी पैनी नज़र कार्यक्रम की बारिकियों पर डालिए हो सकता है कि भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में आजकल जो चल रहा है जिस पर मै दो सप्ताह तक देखने के बाद लिखना चाहती हूं उस पर आप पहले ही लिख दें।

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