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Friday, February 22, 2008

साफ़ आवाज़ की महंगी तकनीक

अभी-अभी पीयूष जी का चिट्ठा पढा कि वो मुंबई जा रहे है और अमीन सयानी साहब से भी मिलेंगे। तो मैनें भी सोचा कि क्यों न आज सिलोन पर ही कुछ लिखा जाए।

पिछले दिनों मैनें एक चिट्ठा लिखा था सिलोन की खरखराहट के बारे में जिसको लेकर पीयूष जी ने सिलोन के फोन-इन-कार्यक्रम में बात की और इस बारे में विस्तार से लिखा।

पीयूष जी का मानना है कि डी आर एम तकनीक से सिलोन की खरखराहट दूर हो जाएगी और प्रसारण साफ़ आएगा। जब इस बारे में सिलोन की उदघोषिका पद्मिनी परेरा जी से बात हुई तो पद्मिनी जी ने बताया कि जब विज्ञापनों से एक पैसे की भी आमदनी नहीं है तब इतनी महंगी तकनीक कैसे ख़रीदी जा सकती है ?

मैं समझ नहीं पा रही हूं कि यह तकनीक ऐसी कितनी महंगी है कि ख़रीदी ही नहीं जा सक रही। क्या इसका ख़र्च करोड़ों में है ?

क्या विज्ञापन देने वाली कोई भी कंपनी रेडियो सिलोन को यह तकनीक नहीं दे सकती ?

आज टेलीविजन के ढेर सारे चैनलों पर ढेर सारे विज्ञापन आते है। कहीं-कहीं तो एक ही विज्ञापन एक से अधिक चैनलों पर देखाई देता है। क्या ऐसे ही विज्ञापनों का आडियो भाग सिलोन के लिए नहीं भेजा जा सकता ?

पद्मिनी जी ने एक और मुद्दा उठाया, रिज़र्व बैंक के कड़े नियमों का। इन नियमों से पैसा सरकार को मिलता है। वैसे भी कंपनिया आयकर देती ही है। मुझे नहीं लगता कि सिलोन को विज्ञापन देने से कंपनियों को बहुत भारी ख़र्च हो सकता है।

दूसरा मुद्दा उठा विविध भारती से प्रतिस्पर्धा का। प्रतिस्पर्धा तो साठ और सत्तर के दशक में थी लेकिन आज तो सवाल ही नहीं उठता क्योंकि इतने टेलीविजन चैनल और निजि एफ़एम चैनलों कि होते हुए भी विविध भारती लोकप्रिय है।

विविध भारती के अपने श्रोता है जो विविध भारती के कार्यक्रमों के साथ-साथ अन्य चैनलों के कार्यक्रम भी देखते-सुनते है।

मुझे लगता है कि कंपनियां सिलोन को भूल सी गई है। अगर सिलोन द्वारा ही कंपनियों से विज्ञापन मांगे जाए तो शायद कंपनियां मना नहीं करेगी। मुझे नहीं लगता कि यह इतना ख़र्चीला है कि कंपनिया मना ही कर दें।

कम से कम तकनीक तो उपलब्ध करा ही सकती है जिससे प्रसारण साफ़ सुनाई दें। जब सिलोन साफ़ सुन सकेंगे तभी धीरे-धीरे विज्ञापन भी यहां बढने लगेंगे और सिलोन की स्थिति पहले जैसी हो जाएगी।

5 comments:

mamta said...

जहाँ तक हमे याद है रेडियो सिलोन सुनने मे हमेशा ही परेशानी होती थी।
पर आज के समय मे जैसा की आपने कहा है विज्ञापन से शायद इस समस्या से छुटकारा मिल जाए।

जोगलिखी संजय पटेल की said...

मै विगत पच्चीस बरसों से एडवरटाइज़िंग कारोबार से जुड़ा हुआ हूँ. रेडियो सिलोन की आर्थिक मजबूरी के बारे में थोड़ा कुछ बता सकता हूँ. अस्सी के दशक के बाद एडवरटाइज़िंग बजटिंग में बड़ी जगह टीवी ने घेर ली . यही वजह है कि विविध भारती का प्राइम टाइम भी आज मुश्किल में है. नये एफ़एम स्टेशन इस मामले में ज़रा सतर्क और चतुर खिलाड़ी निकले हैं. आप यक़ीन करें या न करे लेकिन ये सचाई है कि तारे ज़मीं पर या जोधा अकबर का संगीत बाक़ायदा एफ़ एम स्टेशन को बिका है. श्रोता इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि फ़लाँ स्टेशन पर साँवरिया का गीत दिन में बीस बार बज रहा है यानी वह बेहद सुरीला है ...जी नहीं निर्माता ने कुछ चंद लाख रूपये उस स्टेशन को चुकाए होते है सो उतनी बार बजना काँट्रेक्ट की अहम शर्त है. सिलोन रेडियो की ताक़त थी पुराना संगीत और बिनाका गीतमाला जैसे दीगर कई स्पाँसर्ड प्रोग्राम्स जिन्हें टीवी लील गया...सिलोन रेडियो के प्रबंधकों ने भी रेडियो मिर्ची या बिग एफ़ जिसे संस्थानों से मार्केटिंग के गुर नहीं सीखे सो बुरे दौर से गुज़रना ही था. भगवान से प्रार्थना कीजिये ये हाल विविध भारती का न हो और कोई मुकेश अंबानी उसे ख़रीद कर रेडियो मिर्ची जैसा न बना दे.
अगर ये हुआ तो चौंकियेगा मत क्योंकि यही परिस्थितियों का तक़ाज़ा है.

annapurna said...

संजय जी बहुत सटीक बात आपने कही है।

जहां तक फ़िल्मी गानों की लोकप्रियता की बात है, यह कुछ अलग तरीक़े से सिलोन पर भी हुआ करता था।

फ़िल्मों की रिलीज़ के पहले ही सिलोन से रेडियो प्रोग्राम द्वारा फ़िल्म का प्रचार किया जाता था जिसका फायदा भी हुआ फ़िल्मों को और उससे सिलोन को भी आय हुई।

सिर्फ़ फ़िल्में ही नहीं कई उत्पाद भी सिलोन के विज्ञापनों की वजह से ही घर-घर में जगह बना पाए और सिलोन को भी इससे आमदनी हुई।

मैं तो सिर्फ़ इतना चाहती हूं कि इसी तरह विज्ञापनों द्वारा कुछ मदद देकर सिलोन को ठीक किया जा सकता है।

हम ये कभी नहीं चाहेंगें कि रेडियो स्टेशन उद्योगपति ख़्ररीद लें। चैनलों के प्रबन्धकों को चाहिए कि कुछ सीमा तक ही मदद लें जिससे स्टेशन मर्यादा में चल सकें।

मुझे लगता है ऐसा हो सकता है। आप जैसे श्रोता जो विज्ञापनों की दुनिया से जुड़े है इस तरह की शुरूवात कर सकते है। कुछ विज्ञापनों द्वारा सिलोन को सहायता देने की ही तो बात है। लाखों का व्यापार कर स्टेशन को खरीदना नहीं है।

राजेंद्र said...

रेडियो सीलोन की बात चली है तो पुराने श्रोताओं को याद होगा कि कैसे लोकप्रिय हिस्दुस्तानी फिल्मों के संगीत के प्रसारण का इस रेडियो स्टेशन का एकाधिकार रहता था और उसी को तोड़ने के लिए विविध भारती का जन्म हुआ. सन् १९६५ के अंत कि बात होगी जब रेडियो सीलोन ने भारतीय देश भक्ति के गाने बजाने बंद कर दिए. जिन गानों पर ऐसा बैन लगा उनमें तत्कालीन "जौहर महमूद इन गोवा", "तू ही मेरी जिंदगी" और "शहीद" फिल्मों के गाने शामिल थे. क्यों कि रेडियो सीलोन का सारा कारोबार भारतीय फिल्मों के विज्ञापन और और दूसरे फिल्मी गानों पर आधारित प्रायोजित कार्यक्रमों पर ही निर्भर था ऐसे में फ़िल्म इंडस्ट्री कि तीखी प्रतिक्रिया हुई. तब जी पी सिप्पी इम्पा के अध्यक्ष होते थे. उन्होंने रेडियो सीलोन के बहिष्कार कि घोषणा कर दी. महीनों यह झंझट चलता रहा फिर समझौता हुआ. इम्पा के मेम्बरों का यह भी आरोप था कि रेडियो सीलोन गानों को बजाने का पूरा पैसा निर्माताओं को नही देता.

annapurna said...

राजेन्द्र जी सिलोन पूरी तरह से व्यावसायिक ही रहा है। इसीलिए इस तरह की बातें हुई। मगर इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि फ़िल्मों, फ़िल्मी गानों और कई उत्पादों को घर-घर पहुँचाया सिलोन ने ही।

जो सिलोन ने किया वह विविध भारती कभी नहीं कर सकती क्योंकि आकाशवाणी की व्यवस्था ही ऐसी है कि यहां हर प्रसारण की एक मर्यादा है जिसके रहते विविध भारती शुद्ध व्यावसायिक कभी नहीं हो सकती। इसीलिए सिलोन की कमी खलती है।

अगर आज टेलीविजन नहीं होता तो सिलोन की ये स्थिति कभी न होती।

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