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Wednesday, April 2, 2008

जब विविध भारती ने हमें अप्रैल फ़ूल बनाया

अरे नहीं ! हम सखि-सहेली की बात नहीं कर रहे। हमें तो अप्रैल फ़ूल बनाया गया मन चाहे गीत कार्यक्रम से।

बात पुरानी है। शायद चार-पाँच साल हो गए। उस पहली अप्रैल को मन चाहे गीत शायद रेणु (बंसल) जी प्रस्तुत कर रहीं थीं।

हुआ यूं कि डेढ बजे जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ रेणु जी ने कहना शुरू किया कि आज पहली अप्रैल है। आज के दिन एक-दूसरे को मूर्ख बना कर मज़ाक किया जाता है। वैसे तो ये पाश्चात्य संस्कृति है पर हमारे देश में भी इस अवसर पर बड़े-बड़े आयोजन होते रहे है, वग़ैरह वग़ैरह…

फिर आगे कहा कि अगर आपके जीवन में भी कोई ऐसा मज़ेदार अनुभव है तो हमें बताइए। फोन लाइन खुली है और नंबर है … आप सबके अनुभवों की रिकार्डिंग हम कल प्रस्तुत करेंगे।

जाने क्या जादू था इन बातों में कि हमने गंभीरता से लिया और लगे नंबर डायल करने लगे।

हर दो-तीन गानों के बाद नंबर बताया जाता और कहा जाता कि अभी रिकार्डिंग चल रही और आप भी फोन कर अपने अनुभव बताइए। हम फोन करते गए पर फोन था कि लग ही नहीं रहा था। इसी तरह एक घण्टा बीत गया।

यक़ीन मानिए इस एक घण्टे के दौरान हमें थोड़ा सा भी शक नहीं हुआ क्योंकि इस सूचना के साथ कार्यक्रम बहुत ही सामान्य चल रहा था। कार्यक्रम की समाप्ति पर कहा गया कि आपका फोन तो लगा ही नहीं होगा और यह सुनने पर ही हमें समझ में आया कि हम तो … बन गए।

कल तीन बजे इन लोगों ने भी कोशिश की। सखि-सहेली कार्यक्रम जैसे ही शुरू हुआ, शुरू हो गया इन लोगों का नाटक। दोनों एक दूसरे को कांचन जी और कमलेश जी कह कर संबोधित कर रहे थे। कहने लगे धूप में से आकर ठंडा पानी पी लिया और गला ख़राब हो गया। भौंडी सी आवाज़ निकालने की कोशिश किए जा रहे थे।

अब कौन समझाए इन लोगों को… अरे भई ! तीन साल से सुनते आ रहे है चीं चीं। अब तो एक चीं दूसरी चीं से अलग साफ़ पहचानी जाती है। एक मिनट में वो पकड़ी गई जिसे कांचन जी कहा जा रहा था और पहला गाना शुरू होते-होते पूरी पोल-पट्टी खुल गई।

शहनाज़ (अख़तरी) जी आप तो कभी ऐसी कोशिश (हिमाक़त) कीजिए ही मत। आप कुछ भी खा पी लें, रहेगी तो शहनाज़ की शहनाज़ ही।

रही बात कांचन (प्रकाश संगीत) जी और कमलेश (पाठक) जी की तो, वो दोनों तो ऐसे ग़ायब है जैसे -- के सिर से -- (हमें उम्मीद है आप सब मुहावरा जानते है)

और इन दोनों के लिए हम एक मशहूर शायर की ये एक पंक्ति ही कहेंगे -

साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

शायर का नाम युनूस जी बता देंगे और अब हम समाप्त कर रहे है अपना पचहत्तरवाँ चिट्ठा।

4 comments:

yunus said...

भई अन्‍नपूर्णा जी अप्रैल फूल बनाने का ये खेल रचा था रेडियोसखी ममता सिंह ने । जिसे अगले ही दिन एक बड़ी खबर के रूप में नई दुनिया इंदौर ने प्रकाशित किया था । भाई संजय पटेल इसकी तस्‍दीक करेंगे । बाकी बातों पर हम टिप्‍पणी नहीं करेंगे । :D

annapurna said...

क्या आप नई दुनिया की ख़बर को यहाँ चिपका सकते है।

डॉ. अजीत कुमार said...

अन्नपूर्णा जी,
रेडियोनामा की ये महफ़िल आप लोगों से ही गुलज़ार है. इतनी पुरानी बात आपने हमारे सामने रखी इसके हम शुक्रगुज़ार हैं. मलाल है कि मैं ये कार्यक्रम नहीं सुन पाया था.

yunus said...

खोजकर चिपकाता हूं । कहीं दबी पड़ी होगी ।
थोड़ा सा इंतज़ार

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