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Tuesday, July 29, 2008

यादों का थमता सिलसिला और नई शुरूवात का ऐलान

पिछले वर्ष सितम्बर में मैनें रेडियोनामा पर पहला चिट्ठा लिखा जिसमें विविध भारती से रोज़ प्रसारित होने वाले देशभक्ति गीतों से जुड़ी मेरी बचपन की यादें थी। फिर चल पड़ा सिलसिला यादों का जिसमें विविध भारती के अलावा रेडियो सिलोन, बीबीसी की हिन्दी सेवा, आँल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस के साथ आकाशवाणी हैदराबाद के कई कार्यक्रमों की यादों को संजोया गया।

यादों के अलावा कई कार्यक्रम ऐसे भी रहे जिन्हें सुनने के बाद मैं अपने आपको रोक नहीं पाई और उस कार्यक्रम के बारे में लिख दिया जिसे आप कार्यक्रमों का विवेचन कहे या विश्लेषण। इसमें संगीत सरिता जैसे नियमित कार्यक्रम भी शामिल रहे और जुबली झंकार जैसे कार्यक्रमों की भी चर्चा हुई।

यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा लेकिन एक-एक कार्यक्रम के बारे में अलग-अलग चिट्ठे नहीं क्योंकि होता यह है कि जब हम एक कार्यक्रम के बारे में लिखते है तब उसी दिन या आस-पास होने वाले कुछ कार्यक्रमों के बारे में नहीं लिख पाते। अगर कुछ समय बाद चिट्ठा लिखा जाए तो वो मज़ा नहीं रह जाता क्योंकि कार्यक्रम होने के बाद कुछ लिखना साँप जाने के बाद लकीर पीटने जैसा लगता है। इसीलिए मैनें सोचा कि क्यों न सभी कार्यक्रमों को मिलाकर लिखा जाए ?

वैसे भी यादों का सिलसिला अब थमने को है। लगभग साल भर हो रहा है यादों को बाँटते पर अब भी कुछ चिट्ठे यादों के झरोखे से निकलेंगे और कुछ कार्यक्रम ऐसे भी है जिनके बारे में अलग से लिखना ही मुझे अच्छा लगेगा। तो आगे क्यों न इस रवानगी को एक नया मोड़ दिया जाए ?

एक ऐसा मोड़ जिसमें सभी कार्यक्रमों की बात हो जाए। यही सोच कर मैनें एक ऐसा सिलसिला शुरू करने की सोची है जिसमें सप्ताह भर प्रसारित कार्यक्रमों की चर्चा एक ही चिट्ठे में हो जाए। जी हाँ - साप्ताहिकी शीर्षक से इसकी शुरूवात करना सोच रही हूँ और वो भी शुक्रवार को…

4 comments:

यूनुस said...

स्‍वागत है ।

डॉ. अजीत कुमार said...

आप के हरेक लेखन का हमें इंतज़ार रहेगा अन्नपूर्णा जी.

Anonymous said...

एक बात इससे यह होगी की आपको ज़ो कहना है वह आप सात या अभी उससे भी ज्यादा लेख़ की बजाय एक ही लेख़में लिख सकेंगी, चाहे वह लम्बा क्यों न हो । एक बात यह भी होती है, कि कोई पाठक कोई बार कुछ: दिनों यह ब्लोग पढ़ नहीं पाता है तो इस ब्लोग पर अपने रस ऋची के लेख़ों के लिये पूरानी पोस्ट चूक जाता है यानि की समय अभाव के कारण उस पर ज़ाता नहीं है, तो जब किसी की ऋची के बारेमें पता होता है तब इस परिस्थीतीमें अगर उनका सम्पर्क सुत्र पता होता है तो उनको उन पोस्ट की लिंक भेजनी पड़ती है और उसके बाद बड़ी प्रोत्साहक प्रतिक्रिया प्राप्त होती है । तो अनुभव से यह लगता है कि किसी भी पोस्ट को कम से कम दो दिन तक मूख़्य पन्ने पर रहने देना चाहिए अगर कोई नयी पोस्ट को पाठको तक जल्द पहोंचाना बहोत अरूरी न हो और एक या दो दिन के बाद प्रकाशन होने पर कोई आपत्ती नहीं हो तो ।

Udan Tashtari said...

विचार अच्छा है. शुरुवात किजिये-स्वागत है.

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आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

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