सबसे नए तीन पन्ने :

Monday, September 17, 2007

ओवल का टेस्ट मैच,सुशील दोशी और और वो रोमांचक आँखों देखा हाल..

जिंदगी में बहुत सारे लमहे ऐसे होते हैं जो आप वर्षों सहेज कर रखना चाहते हैं। उन लमहों का रोमांच दिल में झुरझुरी सी पैदा कर देता है। आज जिस वाक़ये को आपके सामने रख रहा हूँ वो संबंधित है क्रिकेट से जुड़ी उस हस्ती से, जिसके रेडियो पर बोलने के कौशल ने, उस छोटे वच्चे के मन में, खेल के प्रति ना केवल उसके अनुराग में वृद्धि कि बल्कि उन क्षणों को हमेशा-हमेशा के लिए उसके हृदय में रचा बसा दिया । जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ प्रसिद्ध क्रिकेट कमेन्टेटर सुशील दोशी की जिन्होंने ने बाल जीवन में अपनी जीवंत कमेंट्री से मुझे इस हद तक प्रभावित किया कि बचपन में जब भी मुझसे पूछा जाता कि बेटा, तुम बड़े हो कर क्या बनोगे तो मैं तत्काल उत्तर देता कि मुझे क्रिकेट कमेन्टेटर ही बनना है।

बात आज से करीब २८ वर्ष पूर्व १९७९ की है। सितंबर का महिना चल रहा था। भारत और इंग्लैंड के बीच टेस्ट श्रृंखला का आखिरी टेस्ट ओवल में खेला जा रहा था। मुझे रेडियो पर टेस्ट मैच के आँखों देखा हाल सुनने का चस्का लग चुका था। यूँ तो जब भी टेस्ट मैच भारत में हुआ करते थे, रेडियो की कमेंट्री रविवार को ही ठीक तरह से सुनने को मिल पाती थी। पर जब-जब टेस्ट मैच इंग्लैंड में होते, हमारी तो चाँदी ही हो जाती। साढ़े पाँच घंटे के समय अंतराल की वज़ह से होमवर्क बना चुकने के बाद, भोजन के बाद के खेल का हाल हम मज़े से सुन सकते थे। ऊपर से शाम के वक़्त आंखों देखा हाल सुनने का रोमांच ही अलग होता था। और फिर चार सितंबर की वो शाम तो कुछ ऍसा लेकर आई थी, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

टेस्ट मैच में भारत की स्थिति को पाँचवे दिन की सुबह चिंताजनक ही आंका जा सकता था। इंग्लैंड ने मैच के चौथे दिन आठ विकेट पर ३३४ रन पर पारी घोषित कर भारत के सामने जीत के लिए ४३८ रन का विशालकाय स्कोर रखा था। यूँ तो चौथे दिन की समाप्ति तक गावसकर और चेतन चौहान की सलामी जोड़ी ७६ रन की साझेदारी कर डटी हुई थी पर बाकी की भारतीय टीम पूरे दिन भर में बाथम और विलिस सरीखे गेंदबाजों को झेल पाएगी इसमें सबको संदेह था। पर हमें क्या पता था कि 'स' नाम से शुरु होने वाले दो शख्स, मैदान के अंदर और बाहर से मैच की एक अलग ही स्क्रिप्ट लिखने पर तुले हुए हैं।

सुशील दोशी की आवाज़ कमाल की थी। आँखों देखा हाल वो कुछ यूं सुनाते थे जैसे सारा कुछ आप के सामने घटित हो रहा हो। यही नहीं भारत का विकेट गिरने से हुई मायूसी, या फिर चौका पड़ने से उनकी उत्तेजना को सुनने वाले के दिलो दिमाग तक पहुँचाने की उनकी कला अद्भुत थी। अंतरजाल पर तो मुझे उनकी रेडियो कमेंट्री की कोई रिकार्डिंग तो नहीं मिली। पर मुझे जितना कुछ याद है, उसके हिसाब से उनका अंदाजे बयाँ कुछ कुछ यूँ हुआ करता था।
sushil2.mp3

"....बॉथम पैवेलियन एंड से गेंदबाजी का जिम्मा सँभालेगे । सामना करेंगे गावसकर। फील्डिंग की जमावट.. तीन स्लिप्स, एक गली, कवर, मेड ओफ ओफ साइड में और वाइडिश मेड आन, मिड विकेट और फारवर्ड शार्ट लेग आन साइड में।

बॉथम ने दौड़ना शुरु किया...अंपायर को पार किया दायें हाथ से ओवर दि विकेट ये गेंद आफ स्टम्प के थोड़ी सी बाहर। गेंद के साथ छेड़खानी करने का प्रयास किया गावसकर ने....। भाग्यशाली रहे कि गेंद ने उनके बल्ले का बाहिरी किनारा नहीं लिया अन्यथा परिणाम गंभीर हो सकता था।तारीफ करनी होगी बॉथम की कि जिन्होंने गेंद की लंबाई और दिशा पर अच्छा नियंत्रण रखा है और काफी परेशानी में डाल रखा हे भारतीय बल्लेबाजों को।

अगली गेंद गुड लेन्थ, आफ मिडिल स्टंप पर ,बायाँ पैर बाहर निकाला गावसकर ने , गेंद के ठीक पीछे आकर सम्मानजनक तरीके से वापस पुश कर दिया गेंदबाज की ओर, बाँथम ने फोलोथ्रू में गेंद उठाई और चल पड़े हैं अपने बालिंग रन अप पर।

पहली स्लिप पे गॉवर, दुसरी पर बॉयकॉट तीसरी पर बुचर, गली पर गूच और इसी बीच बॉथम की अगली गेंद आफ स्टम्प के बाहर, थोड़ी सी शॉट। स्कवायर कट कर दिया है गावसकर ने गली के पास से। गेंद के बीच भाग रहे हैं गूच..पहला रन भागकर पूरा किया गावसकर ने, दूसरे के लिए मुडे बैट्समैन..और गूच नहीं रोक पाए हैं गेंद को. गेंद सीमारेखा से बाहर ..चार रन......"


चौके वाली कमेंट्री में दोशी की बोलने की रफ़्तार वाक्य के साथ साथ बढ़ती चली जाती थी। और मज़े की बात कि उस शाम को गावस्कर ने अपनी २२१ रनों की यादगारी पारी में २१ चौके लगाए। गावसकर की उस जबरदस्त पारी की कुछ झलकें आप यहाँ देख सकते हैं।


जब अस्सी रन बनाकर चेतन चौहान आउट हुए तो भारत का स्कोर था २१३ रन। गावसकर का साथ देने आए वेंगसरकर और इस जोड़ी ने स्कोर ३६६ तक पहुँचा दिया। यानि जीतने के लिए ७२ रन और हाथ में आठ विकेट। पर थोड़े थोड़े रनों के अंतर पर विकेट गिरते रहे और हम सबके दिल का तनाव बढ़ता गया और उस वक़्त सुशील दोशी ने कहा..

"...इस मैच का रोमांच कुछ इस तरह बढ़ गया है कि अब ये मैच दिल के मरीजों के लिए रह नहीं गया है। दिल की बीमारियों से त्रस्त व्यक्तियों के डॉक्टर उनको ये सलाह दे रहे होंगे कि इस मैच का आँखों देखा हाल ना सुनें, क्यूंकि ये रोमांच जान लेवा साबित हो सकता है।...."

दोशी की ये पंक्तियाँ बिलकुल सटीक थीं क्यूँकि गुंडप्पा विश्वनाथ के रूप में ४१० रन पर पाँचवां विकेट खोने के बाद ही १५ रन के अंतराल में तीन विकेट और खोकर भारत जीत से हार की कगार पर पहुँच गया था। अंत में भरत रेड्डी और करसन घावरी के क्रीज पर रहते हुए ही शायद खराब रोशनी की वज़ह एक ओवर पहले से दोनों कप्तानों की सहमति से मैच ड्रा के रूप में समाप्त हो गया।

रेडियो कमेंट्री का एक और नायाब अनुभव 'राथमन्स कप' का रहा है जब मैंने रेडियो पाकिस्तान ट्यून कर के भारत की पाकिस्तान पर जीत का हाल मोहल्ले के सारे लड़कों को सुनाया था। और फिर कौन भूल सकता है जसदेव सिंह की जादुई आवाज़ में की गई मास्को ओलंपिक में हॉकी के फाइनल में भारत और स्पेन के बीच के मुकाबले की कमेंट्री, जिसका नतीज़ा भारत के पक्ष में रहा था।

जब से टीवी चैनल ने मैच लाइव दिखाने शुरु किए रेडियो कमेन्ट्री का वो महत्त्व नहीं रहा। पर सुशील दोशी और जसदेव सिंह जैसे दिग्गजों की बदौलत अस्सी के दशक में शायद ही शहर का कोई कोना होता हो जहाँ क्रिकेट और हॉकी के मैच के समय ट्रांजिस्टर ना दिखाई पड़ता हो। वो एक अलग युग था, जिसका आनंद हमारी पीढ़ी के लोगों ने उठाया है।

आज मैं अपनी इस पोस्ट के माध्यम से रेडियो कमेंट्री की इन महान विभूतियों के प्रति आभार प्रकट करना चाहता हूँ जिनकी वज़ह से खेल के मैदान से इतनी दूरी पर रहने के बावज़ूद हम इन रोमांचक क्षणों के सहभागी बन सके।
मेरे द्वारा रचित
प्रविष्टियाँ पढ़ें

18 comments:

Udan Tashtari said...

अरे, कितनी पुरानी यादों में ले गये. आप कहीं तो थमो भाई. अब रेडियो नाम पर भी. आप तो सर्व व्यापी होते जा रहे हैं. खैर, हमें तो अच्छा ही है कि जहाँ जायें आपको पढ़ें.

ऐसे ही रोचकता के साथ लिखते रहें, शुभकामनाऐं.

Sagar Chand Nahar said...

बहुत बढ़िया
रेडियो पर क्रिकेट कमेन्ट्री सुनने का वो जमाना मुझे भी याद है।
क्या मजा आता था, कमेन्टेटर की बोलने की गति रनों के साथ चढ़्ती जाती थी।

जोगलिखी संजय पटेल की said...

मनीषभाई...रेडियो के स्वर्णिम दौर में सुशील दोशी एक धूमकेतू की तरह उभरे थे. हिन्दी कमेंट्री के वे पहले सितारा कमेंट्रेटर कहे जाएंगे. उन्होने अपनी कमेंट्री में कई नये मुहावरे गढ़े.आवाज़ की सफ़ाई और उच्चारणों की शुध्दता पर सुशील भाई ने बहुत मेहनत की . वे ऐसे समय पर परिदृष्य पर आए थे जब अंग्रेज़ी कमेंट्री पूरे शबाब पर थी. बाँबी तलयारखान, विजय मर्चेंट,सुरेश सरैया,आशीष राँय,अनंत सीतलवाड़ जैसे अंग्रेज़ी धाकड़ कमेंट्रेटर्स के बीच सुशील दोशी हिन्दी सुननेवालों के लिये अपनापन लेकर आए. लोग माने या ना माने ...हिन्दी कमेंट्री को पहचान देने में सुशील दोशी का नाम कभी बिसराया नहीं जा सकेगा. यथा नाम तथा गुण वाले सुशीलभाई मेरे भी प्रेरणा-पुंज रहे. मेरे शहर की काँलोनी के एक आयोजन में कार्यक्रम सुत्रधार अनुपस्थित होने पर अनायास वह कार्य मुझे करना पड़ा.आयोजन के मेहमान थे सुशील दोशी. कार्यक्रम समाप्त होने पर मुझ्से बोले इन्दौर में अच्छे कार्यक्रम सूत्रधार की कमी है..इस काम को गंभीरता से लो. बस उनकी प्रेरणा जैसे मुझमें एक अजीब जुनून भर गई. आज माइक्रोफ़ोन पर न जाने कितने कार्यक्रम कर चुका हूँ लेकिन पहली बार सुशील भाई से मिली शाबासी के सामने सारी तारीफ़ें धुंधली मालूम होती है. बिशनसिंह बेदी की नुमाइंदगी में जब पहली बार कपिलदेव पाकिस्तान गए थे तब सुशील दोशी और मुरली मनोहर मंजुल आकाशवाणी से आँखों देखा हाल सुनाने गए थे. पाकिस्तान में ये दो नाम आज भी कई क्रिकेट प्रेमियों की ज़ुबान पर चढे़ जानेमाने नाम हैं. सुशीलभाई की एक और ख़ासियत आपको बता दूँ ..वे सौ से ज़्यादा टेस्ट मैचों में कमेंट्री करने के बाद भी अपने आपको प्रसारण जगत और भाषा का विद्यार्थी मानते हैं.टेस्ट मैच से एक दिवसीय क्रिकेट और अब 20ट्वेंटी के उदभव के बाद जब क्रिकेट गली गली ..गाँव गाँव में लोकप्रिय हो चुका है तब हमें याद रखना चाहिये कि इसके पीछे सुशील दोशी जैसे लोगों की भी अहम भूमिका रही है.ये अलग बात है कि आज रेडियो से कमेंट्री का वह सुनहरा दौर विदा ही हो चुका है. भाषा का विन्यास और उसकी शुध्दता बीते कल की बात हो चुकी है. आपने सुशील दोशी को याद कर रेडियो से जुडी यादों के ज़ख़्मों को हरा कर दिया.

yunus said...

मनीष दिल में बसी पुरानी यादों के तार छेड़ दिये । सुशील दोषी और मुरली मनोहर मंजुल अपने पसंदीदा क्रिकेट कमेन्‍टेट रहे हैं । सुशील जी इंदौर के हैं ।
मिलने का कभी मौका नहीं मिला । यहां मुंबई में सुरेश सरैया जी से अकसर मुलाकातें होती हैं । फोन पर बतियाने का तो मौका मिलता ही रहता है ।
मेरी तमन्‍ना है कि उनका रेडियो पर इंटरव्‍यू करूं । वो तैयार भी हैं । तैयार तो राजसिंह डूंगरपुर भी हैं ।
बस संयोग नहीं बन रहा । हां तो सुशील जी से बातें करने की तमन्‍ना बरक़रार है ।
आपने उनकी बानगी कमाल की पेश की है ।
आपको तो रेडियो में होना चाहिये था ।
आज भी रेडियो की कमेन्‍ट्री हम बहुत मिस करते हैं । आजकल संजय बैनर्जी क्रिकेट की कमेन्‍ट्री करते हैं कभी
कभी । वे जबलपुर के रहने वाले हैं । ये बातें इतनी लंबी हैं कि पूरी पोस्‍ट तैयार हो जाये ।
चलते चलते मुरली मनोहर मंजुल की कमेंन्‍ट्री का एक वाक्‍य पढि़ये । और ये रवि रत्‍नायके की बॉल । ओह
स्‍टंप से इतनी दूर है जितना जयपुर से कोलंबो ।

Sanjeet Tripathi said...

बहुत बढ़िया!!

Manish said...

समीर जी , सागर भाई और संजीत आप सब का शुक्रिया इस पोस्ट को पसंद करने का।

Manish said...

संजय भाई आपने सुशील दोशी के बारे में अपने संस्मरण यहाँ बाँट कर इस पोस्ट का मूल्य बढ़ा दिया. बहुत अच्छा लगा आपके अनुभवों को पढ़ कर।

यूनुस भाई मुरली मनोहर मंजुल और संजय बनर्जी को सुना हैं मैंने। मंजुल और स्कंद गुप्त का भी अपना अलग अंदाज़ था। पर सुशील इन सबमें अलहदा थे. सुशील जी से साक्षात्कार लें तो जरूर बताएँ।

mamta said...

सुशील दोषी तो जैसे बॉल के साथ भागते थे वो भला कोई कैसे भूल सकता है। पर आपने भी पूरी तरह से वही याद ताजा कर दी। क्या कमेंट्री की सॉरी लिखी है पढते हुए लग रहा था वापिस ओवल के ग्राउंड मे पहुंच गए है।

Manish said...

ममता जी ये तो सुशील जी के अंदाज का प्रभाव ही है जो इतनी बातें याद रह गई हैं। वो सर्वश्रेष्ठ थे जहाँ तक क्रिकेट कमेंट्री का ताल्लुक है।

Dimple said...

Baap re aapko kitni puraani baatein yaad hain..:)..per mujhe bhi yad hai radio pe commentry sunna karte the aur har ek cheez ka andaza hio jata tha ..jaise ki hum sach mei field mei bethke dekh rahe ho

Naresh said...
This comment has been removed by the author.
Naresh said...

Sri Sunil Gavaskar aur tatkalin shatabdi ke do "S" ke saath mila Shri Sushil Doshi ka ek "S" aur ho gaye "S" ki hat trick. Main nahi samjhta ki jab Shi Sushil Doshi ji ka jikra hota he to unke shabdo aur vakyon se cricket ka koi bhi tark adhura rahta ho. jaise khel ke maidan me ek achhe khiladi ka mahatvapurn yogdan hota he thik vaise he maidan ke bahar Doshi ji ka mahatvapurn yogdaan hai.Main aaj jab kabhi unse phone pe baat karta hun to unki commentry ke behad romanchit karne vale palo ki yaad dilate he aur main gad gad ho jata hu aur hamesha unse phone par phir vahi owal ki commentry ke vakyansh ka jikra kar baithta hun.

Yug yugantar ke is maha nayak cricket commentator ko pranam

Naresh

A Jain said...

Sorry, do not know how to type in Hindi but still want to post my comments.
Not sure why but I searched for Sushil Doshi today and found this posting. I was also fond of Sushil Doshi's Hindi commentary. Also liked MMM but he was distant second. I lived in Indore for some time and I know he was a hero of Indore around that time. It was a coincidence that,in early 90s when TV started getting popular and he also started commentary on TV, we shared a taxi when going to Bhopal. He and I both had to go to Bhopal and came at the same time at the stand. I recognized him right away.

I had memories of many cricket matches and the ones in which he was the commentator. I know, he was not very much interested in talking to me but I didn't want to loose that chance to so I talked about so many things and asked lot questions regarding his experiences. I always cherish over 4 hours of discussions with the Cricket celebrity who I used to love as much as I used to love Gavaskar in those days.

Hemantkumar Naik said...

Purani yade taja ho gai.ek or bat bhi yad ai.k.ghavri jab bowling karte unke har 1 step ginkar mano doshiji match ka hubhu varnan karte the.sushil doshika jawab nahi.

Hemantkumar Naik said...
This comment has been removed by the author.
Kk Saxena said...

susheel doshiji ka her shabd itna chuninda hai ki aap bhool kar bhee nahi bhool sakte wo bolte kya hain bas cricket ka uppanayas likh dete hain unke iss dailouge ko kaun bhool sakta hai ki YEH MATCH KISI JASOOSI UPPANYAS KE DILCHASP CLIMAX SE KAM NAHIN AANKA JA SAKTA.

Anand Bhisey said...

Great post. Brought back memories. Some of Sushil Doshi's phrases have found their way into popular lexicon and are often used as idioms. For example, "bhagyashali rahe ki gend ne unke balle ka bahri kinara nahi liya" (meaning someone narrowly escaped) and "off stump se kaafi zyaadaa baahar ..." (meaning way off the mark) and, of course, "stroke ke liye jagah banayi aur drive kiya" ... (meaning giving somebody a piece of the mind and then rubbing it in) !!

SHAMBHU NATH JHA said...

आप ने पुरानी यादें ताजा कर दी।मुझे भी याद है उस मैच कीcommentary.।सुशील दोषी की आवाज आपकी आंखों के सामने मैच का नजारा प्रस्तुत करते थे।दोषी और मुरलीमनोहर मंजुल दोनों ही हिंदी कमेंटरी के हसताक्षर रहे हैं।इनहें आदर सहित याद कर रहा हूं।

Post a Comment

आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

अपनी राय दें