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Friday, September 28, 2007

मेरे महबूब न जा....आधी रात न जा..

मेरे महबूब न जा...आधी रात न जा...होने वाली है सहर...थोड़ी देर और ठहर....आज भी जब इस गीत को सुनता हूं तो बरसों पुरानी यादों में खो जाता हूं। विविध भारती का एक कार्यक्रम बेला के फूल...रात 11 से 11.30 बजे आने वाला यह कार्यक्रम शायद ही कोई दिन था, जब मैं नहीं सुनता था। जिसका अब साथ नहीं है। राजस्‍थान जहां मैं पला और बढ़ा हर मौसम में रात में घर की छत पर रेडियो लेकर जाता और छायागीत एवं बेला के फूल जरुर सुनता। बेला के फूल कार्यक्रम का आखिरी गीत बरसों पहले लगभग यही होता था....मेरे महबूब न जा...आधी रात न जा...। वाकई उस समय मन करता की यह महूबब कहीं ना जाए...इतना बढि़या कार्यक्रम और अब यह तो जाने की बात करने लगे। इस गाने की धुन के साथ ही समझ में आ जाता था कि विविध भारती की आखिर सभा समाप्‍त होने को है और अपने सोने की सभा शुरू होने वाली है।


गाना समाप्‍त और आवाज आती विविध भारती की यह अंतिम सभा अब समाप्‍त होती है। सुबह फिर आप से मुलाकात होगी। स्‍कूल, कॉलेज और यून‍िविर्सिटी के दिनों में बेला के फूल कार्यक्रम के बाद सोने का वक्‍त हो जाता लेकिन अब महानगरों में मची भागमभाग कोई वक्‍त तय नहीं करती। बेला के फूल कार्यक्रम में सुने गए कई गाने आज भी मुझे याद आते हैं। लेकिन मैंने जिक्र केवल एक गाने का किया है यह बताने के लिए कि यह महबूब अब ना जाने कहां चला गया।


रेडियो के बेहद पुराने श्रोता पीयूष मेहता के साथ इंटरनेट पर चैट करते समय मैंने उन्‍हें भी कार्यक्रम के बारे में पूछा तो उन्‍होंने बताया कि बेला के फूल विविध भारती की केंद्रीय सेवा में अब नहीं है , पर यह सिर्फ़ मुंबई, पुणे और नागपुर के स्‍थानीय विज्ञापन सेवा वाले विविध भारती केंद्रों से 11 से 11.30 रात्रि में आ रहा है और ये भी तीनों केंद्र अलग अलग है पर अब सूरत में मुंबई सीबीएस हर समय पकड़ में नहीं आता इसलिए अगर हाल ही में कुछ परिवर्तन उन केंद्रों पर हुआ होगा तो पता नहीं है। लेकिन आज रात इस कार्यक्रम के बारे में रेडियो सुनकर जरुर बताऊंगा। आप भी जोडि़ए जानकारी बेला के फूल कार्यक्रम पर.........।

6 comments:

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

श्री कमल शर्माजी,

शामका ५.३० से शुरूमें ६.३० तक़ और बादमें सुबह ११.०० से १२ बजे तक आनेवाला मधू-मालती और रात्री का बेलाके फूल ये दोनो कार्यक्रम शुरूमें जैसे मैनें आपको चेट पर कहा है सिर्फ़ महाराष्ट्रके तीन शहरों मुम्बई, पूणे और नागपूर सिर्फ तीन केन्द्रों से जारी किये गये थे । और वे सब विज्ञापन प्रसारण सेवा मुम्बई द्वारा पूर्व ध्वनि- मूद्रीत होते थे । जैसे मैने अपने आपके द्वारा जारि किये जये लेखमें लिखा था, कि उस समय विज्ञापन और प्रायोजित कार्यक्रमों की बुकिंग हर राज्यों के राजधानी के विज्ञापन प्रसारण सेवा के केन्द्र पर ही होती थी, और विविध भारती सेवा के राष्ट्रीय पूर्व ध्वनि-मूद्रीत कार्यक्रमों में काट छाट करके उसमें विज्ञापनो को भी हर राज्यों के राजधानी के विज्ञापन प्रसारण सेवा के केन्द्र पर ही शामिल किये जाते थे । तो विज्ञापन की बूकिंग का समय कम पडने के कारण और शुरूमें दूसरे विविध भारती सेवाके कार्यक्रममें से निकाले गये गानों से ये कार्यक्रम बनाये जाते थे । बादमें सही रूपमें स्थानिय विज्ञापन और प्रायोजित कार्यक्रमों की बूकिंग की शुरूआत हुई तब ये कार्यक्रम भी सहीमें स्थानिक बन गये । पर एक दौर बीचमें ऐसा भी था, जो बहोत कम समयावधीका था, जिसमें बेला के फूल कार्यक्रम विविध भारती सेवा द्वारा हर देशके दोनो लघू तरंग सहीत सभी स्थानिय विविध भारती केन्द्रो से रात्री ८.०५ पर ८ बजे के दो मिनटके राष्ट्रीय समाचार बुलेटिन के बाद हर स्थानिय विविध भारती केन्द्रोंसे अलग अलग प्रसारित होने वाले एक धून कार्यक्रम के बाद रात्री ८.३० तक आता था और उसमें फिल्मी हस्तीयाँ भी आमंत्रीत कि जाती थी ।
जब स्व. हेमन्त कुमारजी को बूलाया गया था तब उन्होंने बताया था कि, ’बेला के फूल से मेरा बहोत गहरा रिस्ता है । बेला मेरी पत्नी है और हमारे बच्चे बेला के फूल है ।’ अगर युनूसजी इस पर कुछ और जानकारी देंगे या अगर मैनें कुछ गलत लिखा है तो उसे सुधारेंगे तो खुशी होगी ।

mamta said...

कमल जी आपका अनुभव पढ़ कर अच्छा लगा। । यूनुस भाई को धन्यवाद देना चाहिऐ कि इन्होने ये रेडियोनामा शुरू किया जहाँ हम सब को अपनी इतनी पुरानी बातों को याद करने का मौका मिल रहा है।

आशीष said...

मैंने तो आज तक कभी ध्यान से रेडियो सुना ही नहीं है,.मुझे लग रहा है की मैंने एक बहुत शानदार चीज़ से वंचित रह गया हूँ.

yunus said...

व्‍यस्‍त हूं इसलिए बहुत संक्षिप्‍त में बात कह रहा हूं । समय मिलते ही विस्‍तार से बताऊंगा ।
दरअसल कंसेप्‍ट ये है कि बेला के फूल विविध भारती के विज्ञापन प्रसारण केंद्रों का अपना छायागीत है ।
अब ये विज्ञापन प्रसारण सेवा क्‍या है । वो केंद्र जो केवल विविध भारती मुंबई की केंद्रीय सेवा के कार्यक्रम प्रसारित करते हैं । जैसे बनारस,दिल्‍ली,इंदौर, भोपाल या लखनऊ । इन्‍हें संक्षिप्‍त में हम रेडियो वाले सी बी एस भी कहते हैं । सी बीस एस यानी कमर्शियल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस स्‍टेशन । खैर तो चूंकि बंबई से हम सब छाया गीत करते हैं इसलिए स्‍थानीय सेवाओं को भी मौक़ा दिया जाये ताकि वो एक नाज़ुक से कार्यक्रम के ज़रिए अपनी सभा खत्‍म करें । ये था उद्देश्‍य । और लगभग सारे विज्ञापन प्रसारण केंद्र इस कार्यक्रम को करते हैं । रही इतिहास की बात तो पियूष जी ने काफी कुछ बताया है ।

अजय यादव said...

विविध-भारती के कई कार्यक्रम मुझे बेहद पसंद रहे हैं, जिनमें छायागीत और जयमाला जैसे अनेक नाम शामिल हैं. परंतु यह कार्यक्रम ’बेला के फूल’ कभी नहीं सुन पाया. आपको पढ़ कर लगता है कि इसको न सुन पाना शायद अनजाने ही कुछ खो जाने जैसा रहा.
वैसे जिस गीत का आपने ज़िक्र किया है, उसमें शायद ’आधी रात’ की जगह ’आज की रात’ है.

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

श्री कलमजी,
आज सुबह मैनें विविध भारती की विज्ञापन प्रसारण सेवा का मुम्बई केन्द्र ६.५५ पर मध्यम तरंग २५२.१ मीटर यानि ११.५५ मेगा हट्झ पर जब हर विविध भारती केन्द्र अपने यहाँ से प्रसारित होने वाले स्थानिक और केन्द्रीय विविध भारती सेवा के अपने यहाँ से जो कार्यक्रम सह-प्रसारित करते है उनकी रूप रेखा प्रसारित करते है, उसी समय ट्यून किया । उसमें रात्री ११.०५ पर बेला के फूल का जिक्र था । श्री युनूसजीने जो कहा है कि देशके हर स्थानिक केन्द्रो से इसी नाम का स्थानिक छायागीत जैसा कार्यक्रम है, उसमें में छोटा सा सुधार करना चाहूँगा कि बेला के फूल नामसे तो सिर्फ़ मुम्बई, पूणे और नागपुर पर ही है, जिसमें भी किसी फ़िल्मी हस्ती के जन्मदिन या मृत्यू दिन पर वह विषेष होते है और छाया गीत जैसे इन तीनो केन्द्रों से ’पल पल दिल के पास’ नाम के अपने अलग कार्यक्रम सुबह ११.०० बजे होते है और अन्य राज्यों के विविध भारती केन्द्रों से छाया गीत जैसे स्थानिक कार्यक्रम होते है पर कहीं दैनिक या हमारे सुरतमें तो सिर्फ १५ मिनिट का साप्ताहिक कार्यक्रम ही है । श्री अजयजी, जब बेला के फूल विविघ भारती सेवाका राष्ट्रीय प्रसारण वाला था, वह समय तो शायद आपके जन्म से भी पहेलेका हो सकता है ।

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