There was an error in this gadget

Saturday, September 29, 2007

जाने कहॉ गए वो रात दिन

चार साल का था जब दिल्ली आया, माँ के साथ, पिताजी दिल्ली posted थे और अब उन्हें सरकारी मकान भी मिल गया था। पहली चीज़ जो पिताजी ने मुझे तोहफे के रुप में दिया वो था एक जर्मन मेड रेडियो, जो बना मेरे जीवन का पहला पहला दोस्त, मैं बात कर रहा हूँ १९७८ की, अगले लगभग ८ सालों तक उसी रेडियो के आस पास घूमती थी मेरी दुनिया।
सुबह सात बजे से १० बजे तक , सभी कार्यक्रम जो विविद भारती से उन दिनों प्रसारित होते थे बिना नागा सुनता था। " संगीत सरिता " से सुबह की शुरवात होती थी, संगीत के विषय पर इतना ज्ञानवर्धक कार्यक्रम मैंने आज तक दूसरा नही सुना, चित्रगीत पर नयी फिल्मों के गाने आते थे, जो सुबह ८.३० से १० बजे तक प्रसारित होता था, करीब सवा नौ बजे मैं स्कूल के लिए निकल जाता था अपने रेडियो से विदा कह कर और उसे बहुत संभाल कर अपनी छोटी सी अलमारी मे छिपा कर। हमारी स्कूल बस होती थी जो करीब १ घंटे में स्कूल पहुंचती थी, रास्ते में हम अन्ताक्षरी खेलते थे और जितने गाने मुझे याद होते थे, शायाद ही किसी को होते थे, कारण मेरा रेडियो ही तो था, स्वाभाविक है कि जिस टीम में मैं होता था वही जीतती थी।
उन दिनों हम जिस घर में रहते थे वहाँ खुला आंगन होता था और गर्मियों के दिनों में शाम होते ही फर्श को पानी से धोकर हम सब बाहर आंगन में सोते थे, सिराने रखे रेडियो पर छायागीत सुनते सुनते अक्सर नींद लग जाती थी और रेडियो खुला रह जाता था.... अभी भी याद आती है पापा की वो ड़ान्टें...

(शेष अगली पोस्ट में )

6 comments:

काकेश् said...

अच्छा है.जारी रहे.

annapurna said...

बहुत अच्छा लगा पढ कर ।

PD said...

दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात-दिन..

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

सर, बहोत मझेदार बाते,
पर एक छोटासा सुधार, चित्रगीत नहीं पर चित्रलोक ।

yunus said...

हमने काकेश जी से लेकर पियूष जी तक सबकी बातें दोहरा दी हैं ।

mamta said...

अच्छा लगा। रेडियो चीज ही ऐसी है।

Post a Comment

आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

अपनी राय दें