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Saturday, November 3, 2007

विविध भारती की लोकप्रियता के सामने रूकवटें-१

पाठक गणको किये गये वादे के मुताबिक मैं इस विषय पर अपने विचार के कुछ अंश को ले कर हाजि़र हूँ ।

सबसे पहेले तो सरकारके माहिती प्रसारण मंत्रालयके (मंत्रीयों के अंगत सचिवों सहित) अधिकारीयों तथा आकाशवाणी के महानिदशालय के उच्च अधिकारीयों की 'यस मिनिस्टर’ यानि ’जी मंत्रीजी’ वाली मानसिकता इसके लिये शुरू से यानि आजादी काल से ही सबसे बडी़ जिम्मेदार है,जो किन प्रजा के किस प्रश्न को आगे करना और किस प्रश्न को पीछे करना वह अपनी पसंद के मुताबिक तय करते है । और उसी के मुताबिक सरकारमें दरखास्तें प्रस्तुत की जाती है । यह बात हमारे सुरत शहरमें आकाशवाणी की स्थानिय खंड समयावधी वाले एफ.एम.केन्द्र (जो १९९३में एक खानेकी पूरी थाली के जरूरतमंद को आधी रोटी का एक टुकडा फेंक कर बच्चों की तरह पटाया जाय या २२ साल के इन्सान को खिलौनेवाली ट्रायसिकल दी जाय इस तरह) दिया गया था, और इस बात को मैनें दिल्ही से सुरत में आये सहायक महानिदेशक (ई.सन२००१ में) श्री श्याम कुमार शर्माजी को भी बोला थी कि बड़े अफ़सरान अपनी कचहरीयों में बैठ कर ही निर्णय लेते है, कि कौनसी जगह किस प्रकार के केन्द्र देने है।
विविध भारती चेनलके रूपमें दूसरा चेनल देने के लियेमैं १९९७ से लिख रहा था और करीब एक साल बाद अपने संसदीय प्रतिनिधी उस समयके कपडा मंत्री द्वारा लिखना शुरू किया तो उसको अलग चेनल की बजाय ०२-०८-२००२ के दिन विविध भारतीके रूप में परिवर्तेत कर दिया गया,जो उसके बाद भी करीब २००५ तक स्टिरीयो नहीं हुआ था।
शायद यह बातें इन्दौर, हैद्राबाद, अहमदाबाद के श्रोताओं और पाठकोको ज्यादा महत्व की न लगे फि़र भी जरूरी मानता हूँ । क्यों कि,२००२ तक हमने विविध भारती के कार्यक्रमों को अलग अलग दूर दूर के केन्द्रों से सुननेकी जो परेशानियाँ सही है वह हम सुरत वाले ही समझ सकते है। उदाहरण के तौर पर जब लघु- तरंग पर विविध भारती पंचरंगी कार्यक्रम के नाम से दो अलग अलग कंप संख्या पर आती थी तब भी मुम्बई से कार्यक्रम सुबह ९.३० की जगह ८.३० पर ही समाप्त होते थ । दोपहर १२.३० की जगह २.०० बजे शुरू होते थे और रात्री भी १०.३० की जगह ८.१५ पर बंध होते थे। मद्रास (चेन्नाई)से प्रसारण जारी रहता था। पर दोनो केन्द्र सभा की शुरूआत और समाप्ती में अपनी पहचान सिर्फ़ ’ये विविध भारती है आकाशवाणी का पंचरंगी प्रोग्राम’ इन शब्दों मे देते थे पर कम्प संख्या सिर्फ़ अपनी अपनी ही बताते थे।
दो पहर का मन चाहे गीत मुम्बईसे शोर्ट वेव पर १.३० की जगह दो बजे शुरू होते हुए आधा घंटा देरी से और सिर्फ़ आधा ही आता था । इस तरह एक ही पहचान वाले दो केन्द्रों के बीच कोई संकलन या एकवाक्यता नहीं थी । और विविध भारती के पत्रवाली कार्यक्रममें स्थानिय केन्द्रों के श्रोताओं को ध्यानमें रख कर ही पत्रों को शामिल किया जाता था ।

आज एफ. एम. स्टिरीयो डिजीटल प्रसारण तकनीक आम बात हुई है पर इस जमानेमें भी मुम्बई, दिल्ही, कोलकटा, और चेन्नाई के स्थानिय विविध भारती केन्द्रोंको जैसे अन्य शहरोंके स्थानिय विविध भारती मध्यम तरंग केन्द्रोंको एफ. एम. स्टिरीयोमें परिवर्तीत किया गया है, नहीं किया गया, जब कि, इन शहरों में पहेले मेट्रो और आज एफ. एम. गोल्ड और एफ. एम. रेइन्बो चेनल्स चल रहे है । और अन्य निजी़ रेडियो चेनल्स से पूरा एफ. एम, बेन्ड भरा हुआ है, इन दो ए.आई. आर. एफ. एम. चेनल्स को एक संयूक्त चेनल में परिवर्तित करके एक बचने वाली एफ. एम. कम्पसंख्या पर स्थानिय विविध भारतीकी विज्ञापन प्रसारण सेवा को तबदिल करना जरूरी है, यह मैं मेरे एक निजी़ सुरतमें पले बढे पर ३६ सालो से मुम्बई में बस रहे पर हाल ही में १८ सालों के अन्तराल के बाद कुछ ही दिनों सुरत रह कर गये मित्र के उदाहरण से कहता हूँ, जो इन एफ. एम. चेनल्स की भरमारसे विविध भारती को करीब करीब भूल चूका था पर सुरतमें एफ. एम. पर सुन कर विविध भारती का दीवाना बन कर गया और वहाँ विविध भारती के प्रसारणसे असंतुष्ट रहने लगा है ।

समय समय पर और बातें छेडूंगा । पर एक साथ बहूत लिखूंगा तो युनूसजी सहित सब समयाभाव के कारण मानसिक रूपसे पढ़्ते पढ़्ते थक जायेंगे । इस लिये हाल इतना ही ।
पियुष महेता ।

3 comments:

Manish said...

पीयूष भाई शुक्रिया इस जानकारी के लिए। राँची में भी विविध भारती का प्रसारण तो होता है पर स्टीरियो की सुविधा नहीं है। इस बार स्वर्ण जयंती पर मैं मोबाइल पर विविध भारती सुनने कार्यालय ले गया था औरों को भी बताया तो वो भी रेडिओ ले कर आए पर। पर दिन में तीन बजे के बाद हर पाँच मिनट में प्रसारण ठप्प हो जाता था। नतीजन अच्छा कार्यक्रम आने के बाद भी तंग आ कर हमें रेडिओ आफ कर दिया।

सागर चन्द नाहर said...

पीयूष भाई
उन दिनों मैं भी सुरत में था जब यह स्टेशन शुरु हुआ था। तब रेडियो पर तो रेडियो के कार्य्क्रम सही सुनए नहीं जाते थे पर मजे कि बात यह थी कि टीवी में रेडियो के कार्य्क्रम व्यवधान करते थे, यानि रेडियो के कार्यक्रम टी वी पर सुनाई देते थे।

आज की पोस्ट में कुछ सुधार किये हैं। आप को पता चल गया होगा! :)

annapurna said...

अच्छी जानकारी दी आपने।

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