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Monday, November 5, 2007

भूले बिसरे गीत माला के सुनहरे मोती

भूले-बिसरे गीत मेरा हमेशा से ही पसन्दीदा कार्यक्रम रहा है। पहले यह कार्यक्रम केवल २० मिनट का होता था और सवेरे ८:१० से ८:३० बजे तक प्रसारित होता था। बाद में इसे आधे घण्टे का किया गया और प्रसारण समय हुआ सवेरे सात से साढे सात। फिर इसमें अंतिम गीत अनिवार्य रूप से के एल सहगल का सुनवाया जाने लगा।

यह कार्यक्रम मोतियों की माला की तरह लगता है। एक-एक गीत बेशकीमती मोती की तरह है।

जिस तरह माला पूरी तैयार होने के बाद उसकी शोभा को कई-कई गुना बढाने के लिए उसमें पदक (लाकेट) लगाया जाता है उसी तरह अंत में बजने वाला के एल सहगल का गीत है।

अब स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर इस माला में रोज़ सुनहरे मोती पिरोए जा रहे है। एक विशेष गीत रोज़ पूरे विवरण के साथ सुनवाया जाता है।

इसी श्रृंखला में केसरी (कृष्ण चन्द्र) डे के भजन सुने। भरत व्यास का फ़िल्म नवरंग के लिए गाया गीत पिछले सप्ताह सुना -

धन्धे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोड़ो

यह गीत पहले भी कभी-कभार सुना था जिसमें कवि के भावो की जगह गेहूं-चावल के भावो का महत्व है और इस तरह कवियों को दुनियादारी सिखाई गई है। लेकिन यह बात पता नहीं थी कि भरत व्यास द्वारा हिन्दी फ़िल्मों के लिए गाया गया यह अकेला गीत है।

ऐसी ही जानकारी आज भी मिली कि पंडित जसराज द्वारा गाया गया भी हिन्दी फ़िल्मों में एक ही गीत है। फ़िल्म का नाम है लड़की सहयाद्रि की और गीत है -

वन्दना करों, अर्चना करों

अभी पता नहीं विविध भारती के खज़ाने में ऐसे कितने कीमती मोती है जो हम श्रोताओं को देखने को मिलेगें।

इसीलिए तो भई हम वाकई विविध भारती की वन्दना करते है, अर्चना करते है।

6 comments:

Manish said...

आफिस की आपाधापी में ये कार्यक्रम अब सुन नहीं पाता। शुक्रिया आज के इसके स्वरूप से परिचय कराने का।

Dr. Ajit Kumar said...

हमेशा तो नहीं पर कभी-कभी तो भूले बिसरे दीत सुन ही लेता हूँ. कई गीत तो मन की गहराइयों में उतर जाते हैं. सहगल साहब के गीत के लिए जो उपमा आपने चुनी है वो बिल्कुल सटीक है.
प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.

इरफ़ान said...

केसी डे को आप केसरी कह रही हैं, क्या राज़ है बताएं. भरत व्यास का गया? क्या आप लिखा कहना चहती हैं? भूले बिसरे गीत सुनने के लिये आप इन दिनों एफ़एम गोल्ड पर मेरा प्रोग्राम "दिल ने फिर याद किया" भी सुन सकती हैं.एक विनम्र प्रयास है अपनी धरोहर को संजोने का.पसंद आयेगा.

yunus said...

अन्‍नपूर्णा जी श्रोता होने से उदघोषक होने तक के सफर में मुझे हमेशा भूले बिसरे गीत से प्‍यार रहा है । मेरे छायागीत का सिलसिला गुजरे जमाने के अनमोल मोतियों वाला, भूले बिसरे के दौरान ही आया था । बहरहाल आज भी इस कार्यक्रम में
ताज़गी है दम है । इरफान भाई भरत व्‍यास ने कई गीत गाये हैं । कविराजा उनमें से एक है । जल्‍दी ही इसे रेडियोवाणी पर सुनवाया जायेगा । भूपिंदर वाले हैंगओवर से गुज़रने के बाद ।

PIYUSH MEHTA-SURAT said...

श्री अन्नपूर्णाजी,

भूले बिसरे गीत एक जमानेमें मधूवन और उसके पहेले सुबह १०.१५ पर रसवंती के नाम से हुआ करते थे वह याद है ? और सचमें भूले बिसरे गीतों की प्रस्तूती तो करीब २ साल से ही शुरू हुई है , तब तक तो पूराने सही पर जाने पहचाने हमेशा जवाँ गीत ही बजते थे ।

इरफानजी अब याद आया की डी. टी. एच. पर आपको एफ. एम. गोल्ड पर सुना है । एक बात सही है की एफ. एम. गोल्ड और रेईनबो की कार्यक्रम प्रस्तूती निजी एफ.एम. चेनलोसे बहोत ही बढी़या होती है , पर फिर भी वह पाँच मेट्रो शहरो के श्रोताओं को नज़रमें रख़ कर ही होती हे । जब की विविध भारती सारे देश के श्रोताओं को ध्यानमें रख़ती है । महाराष्ट्रके कई स्थानिय एफ. एम. केन्दोंको विविध भारती से अलग कर एफ. एम. गोल्ड से जूडा गया था तब उसका सामुहीक कडा विरोध हुआ और वे फिर विविध भारती से जूडे गये ।
पियुष महेता ।

annapurna said...

मनीष जी, अजीत कुमार जी चिट्ठे पर आने के लिए धन्यवाद।

इरफ़ान जी ग़लती की ओर ध्यान दिलाने का शुक्रिया मैनें केसी डे लिखने में ग़लती की। यहां हैद्राबाद में एफ एम गोल्ड सुन नहीं पाते फिर भी मै कोशिश करती रहती हूं कि क्या पता किसी दिन सुनने को मिल जाए।

भरत व्यास की गायकी का राज़ तो यूनुस जी ने बता दिया।

पीयूष जी रसवन्ती और मधुबन कार्यक्रम की जानकारी मुझे नहीं है। जहां तक मुझे याद आ रहा है सवेरे 10:15 से पहले शायद कुछ धुनें बजा करती थी फिर 10:55 तक शायद मंजूषा कार्यक्रम आता था जिसमें शायद ग़ैर फ़िल्मी गीत होते थे। यह अच्छी तरह से याद है कि 11:00 से 12:30 तक डेढ घण्टे के लिए मन चाहे गीत बजते थे।

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