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Thursday, November 1, 2007

फुलझड़ियां

दीपावली को सप्ताह भर रह गया है। महिलाओं की दिवाली तो अभी से शुरू हो जाती है। सारी तैयारियां जो करनी होती है। मैनें भी सोचा इस अवसर पर अपनी सखी-सहेलियों को कुछ तोहफ़ा दूं।

क्या कहा सखी-सहेलियां कौन ? अरे भई वहीं जो विविध भारती पर रोज़ दोपहर तीन बजे आती है और चार बजे तक मलाई-बर्फ़ की तरह जमी रहती है।

मैं चर्चा कर रहीं हूं विविध भारती के कार्यक्रम सखी-सहेली की जिसकी परिभाषा मेरे लिए कुछ यूं है -

एक डाल पर चहचहाती बहुत सारी चिड़याएं यानि सखी-सहेली !

मैं यह कार्यक्रम पहले ही दिन से सुन रही हूं जब सप्ताह में एक दिन बुधवार को प्रसारित होता था। फिर चार दिन होने लगा और शुक्रवार को फोन-इन-कार्यक्रम जिसमें कोई एक सखी देश भर की सहेलियों से फोन पर बतियाती है।

लगातार एक साल तक कार्यक्रम सुनने के बाद मेरे मन में कुछ चित्र उभरने लगे। मैनें हर सखी-सहेली की एक तस्वीर बनाई और आज मैं इन्हीं तस्वीरों को शब्द चित्रों की तरह यहां प्रस्तुत कर रहीं हूं। यहीं शब्द-चित्रों का तोहफ़ा मैं देना चाहती हूं।
मैं कैसे प्रस्तुत करूं ये चित्र ? चलिए कल्पना करते है कि सामने एक गलियारा है जिसमे से होकर सखी-सहेलियां स्टुडियो मे जाती है इस कार्यक्रम की प्रस्तुति के लिए।

सबसे पहले चली आ रही है कमलेश (पाठक) जी जिन्हें टीम लीडर कहें या कप्तान। तेज़-तेज़ क़दमों से चलती हुई चली आ रही है एक हाथ में सखियों की चिट्ठियां और उनकी पसन्द के गानों की सीडी को ऐसे संभाले हुए जैसे किसी नन्हें-मुन्ने को मां गोद में संभालती है। चली जा रही है, चली जा रही है, चली जा रही है तेज़ तेज़ बालों को पीछे कस कर बांधे हुए। दुपट्टे को सटर पटर गले में डाले जो किसी भी दिशा में लहराने लगता है। बस चली जा रही है आखिर समय पर कार्यक्रम जो प्रस्तुत करना है, तीन बज रहे है और देश भर की सखियां प्रतीक्षा कर रही होगी (क्योंकि देश भर में महिलाओं को और कोई काम तो है नहीं)

इनके पीछे आ रही है निम्मी (मिश्रा) जी, मस्त बिंदास गजगामिनी, हौले हौले क़दम रखती हुई स्टुडियो पहुंची, कंधे पर दुपट्टा लटकाए, नाक पर चश्मा ठीक किया। बस चार ख़त पढ देंगें चार गीत सुना देंगें बस और क्या ?

अगले दिन कांचन (प्रकाश संगीत) जी चली आ रही है गानो के सीडी उठाए। इनका बस चले तो सारा कार्यक्रम गा कर प्रस्तुत करें। चाहे चिट्ठियां पढनी हो या कोई सलाह देनी हो। अगर किसी दुखियारी सखी की दर्द भरी चिट्ठी हो तो भी गा कर ही पढेंगें किसी उदास राग में गा देगें और क्या ?

अब चली आ रही है रेणु (बंसल) जी, दरअसल ये कार्यक्रम नहीं एक ज़िम्मेदारी है, एक-एक चिट्ठी के एक-एक अक्षर को ध्यान से पढना चाहिए, सखियों की पसन्द के गीत बजाने से पहले चार बार देख लेना चाहिए कि कहीं कोई ग़लत गीत तो नहीं बज रहा। लो चार बज गए और ड्यूटी ख़त्म हुई। बात दरअसल ये है कि… (बस रेणु जी अब अगले कार्यक्रम में मिलेगें)
अगले कार्यक्रम के लिए चली आ रही है अपनी शहनाज़ (अख़्तरी) आपा, गले में आंचल डाले, हाथ में सीडी और चिट्ठियां उठाए जैसे साठ के दशक की हिरोइनें एक दो किताब कापी उठाए कालेज जाती थी न बिल्कुल उसी तरह। पूरे विश्वास के साथ स्टुडियो मे जा रही है। पूरा भरोसा है कि जिस सहेली की चिट्ठी पढूंगी वो खुश जिसकी नहीं पढूंगी वो भी खुश। जो गीत मैं सुनवाऊंगी वो सबको पसन्द आएगें, जो मैं कहूंगी वो सबको अच्छा लगेगा और जो मैं नहीं कहूंगी उस बारे में कोई सोचेगा भी नहीं।

अब बारी है ममता (सिंह) जी की, यहां थोड़ी सी गड़बड़ है। हुआ यूं कि यूनुस जी ने रेडियोवाणी में ममता जी का चित्र दिखा दिया। अब लिखने को कुछ रहा नहीं सिर्फ़ इतना बता दूं असली चित्र मेरे मन के चित्र से एकदम उल्टा निकला।

आजकल इस डाल पर कुछ नए पंछी भी आ रहे है यानि इस कार्यक्रम में नई सखियां आ रही है जिनके चित्र अभी बने नहीं है।

चित्र कितने सही है और कितने ग़लत ये तो सखियां खुद ही बता सकती है। अगर बताना चाहे तो, मेरी राय में बता देना चाहिए हम श्रोताओं को भी तो जानने का अधिकार है। हम श्रोता क्या सिर्फ़ सुनने के लिए ही है।

2 comments:

yunus said...

लगता है मुझे ही सारी सखियों सहेलियों की तस्‍वीरें आपके सामने पेश करनी होंगी । पर कभी कभी लगता है कि आपकी कल्‍पनाओं को झटका क्‍यों दूं । ममता जी की तस्‍वीर ने आपको किस तरह का झटका दिया है बताईये । वो पूछ रही हैं ।

annapurna said...

सबसे पहली बात तो ये ग़लत है कि ममता जी मेरी सहेली होते हुए सीधे मुझसे नहीं पूछ रही, यही मुझे लगने वाला पहला झटका है।

मैनें तो सीधे-सीधे लिख दिया था कि असली तस्वीर एकदम उल्टी है। बस सही तस्वीर को उल्टा कर दीजिए यही मेरी तस्वीर है। लगता है नहीं कर पा रही या मुझसे लिखवाना ही चाहती है यह दूसरा झटका है।

यूनुस जी कल्पनाओं के पंख कोमल होते है जितना ऊपर उड़ेंगें उतनी तेज़ी से नीचे आ गिरेगें इसीलिए आपने मेरी कल्पना को झटका नहीं देना सोचा यह मेरे लिए तीसरा झटका है।

चौथा और अंतिम झटका ये है कि किसी सखी की कोई टिप्पणी नहीं आई और सखा को आगे कर दिया, ये तो अच्छी बात नही है। अरे भई कार्यक्रम में सब की सब सखियां सबको साहसी बनने की शिक्षा देती है यहां कम से कम सब मिल कर मेरा ही एक सच्चा या बौड़म सा शब्द चित्र खींच देती, खैर…

चलिए यूनुस जी मैने मान लिया है सखियां रेडियो पर कोरी बातें करती है, साहस वाहस कुछ नहीं है, और क्या, बस आप इन सबका एक ग्रुप फोटो हमें दिखा दीजिए। उम्मीद है आपमें इतना साहस ज़रूर होगा कि सारी सखियों को एक जगह बैठा कर उनकी तस्वीर खींच सकें…

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