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Wednesday, January 30, 2008

प्रोग्राम बढ़िया तो था......लेकिन पता नहीं क्यों......

दो-तीन दिन से यही सोच रहा था कि इस तरह की टिप्पणी दूं कि नहीं, कभी दिमाग कहता था...छोड़ो, ऐसा लिखना ठीक न लगेगा, लेकिन अपना मन भी है न कि जब तक खुल कर सब कुछ ब्यां नहीं कर लेता उसे भी चैन कहां पड़ती है। सब से पहले तो युसूफ भाई का शुक्रिया की तीन चार दिन पहले सुबह ही उन की एक पोस्ट से यह पता लग गया कि आज शाम को विविध भारती के पिटारे में आईआईटी के छात्रों से बातचीत पर आधारित कार्यक्रम पेश किया जायेगा। लेकिन फिर भी पता नहीं ठीक वक्त पर कैसे मन से निकल गया...और इस का ध्यान प्रोग्राम के बीस-पच्चीस मिनट बीत जाने पर ही आया , वो भी तब जब बेटे ने इस तरफ मेरा ध्यान दिलाया। उस समय वह सवाल आईआईटिएन से पूछा जा रहा था, कि जब हम गांव शब्द कहते हैं तो उन के मन में कौन सी तस्वीर उभऱती है। संयोग की बात देखिए कि अगले दिन सुबह जब इसी प्रोग्राम को सुनना चाहा तो भी बीस-पच्चीस मिनट का कार्यक्रम बीत चुका था।

हां, हां, प्रोग्राम बढ़िया है, इस में कोई शक नहीं है, ....बात यह भी है न इस प्रोग्राम के माध्यम से हमें आज के समाज की क्रीम कही जाने वाले इन आईआईटिएऩ्स के मन में झांकने का मौका मिला। यह एक बहुत ही मुबारक पहल की है...ताकि दूर-दराज़ के गांव में बैठा ग्रामीण भी तो यह सुने कि उस जैसे करोड़ों लोगों से इक्ट्ठे किए गये टैक्स की बदौलत चल रहे इन आईआईटी संस्थानों में पढ़ रहे बिद्यार्थियों के मन में आखिर क्या चल रहा हैं....उन के हालात सुधारने की क्या रूपरेखा ये बना रहे हैं। निःसंदेह बहुत बहुत ही प्रशंसनीय पहल।

एक सुझाव तो यह है कि इस तरह के प्रोग्राम मैडीकल कालेजों, आईआईएम्स, लॉ-विश्वविद्यालयों इत्यादि के छात्रों को भी लेकर आगे मिलने चाहिए। हमें ऐसे प्रोग्रामों की बहुत बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी।

हां, यह प्रोग्राम भी बढ़िया था...लेकिन फिर भी मुझे मज़ा नहीं आया। अपने आप से पूछ रहा हूं कि कहीं इस का कारण यह तो नहीं था कि बरामदे में लेटा हुया जब मैं यह सुन रहा था तो बेहद ज्यादा ठंडी की वजह से ठिठुर भी तो रहा था। लेकिन फिर असली कारण जो मुझे लगा उस का ध्यान आ ही जाता है कि .....प्रोग्राम की फार्मैट मज़ेदार नहीं था....टोटल दस सवाल....एक सवाल के बाद सभी छात्रों के बोलने की बारी......और हर बार छात्र का जवाब सुनाने से पहले ......श्री प्रवीण चोपडा.,,यमुनानगर हरियाणा से, आईआईटी रूड़की.....और साथ में हर बार --बार बार बजती वह सुरीले से गीत की ट्यून ...तेरी आँखें भूल भूलैंया....लेकिन बार बार यह सब कुछ सुनना परेशानी का बायस ही सिद्ध हो रहा था। अभी मैं यह सोच ही रहा था कि मेरे बेटे ने भी यह कमैंट मार ही दिया की पापा, यह आईआईआई वगैरह कुछ ज्यादा ही नहीं बोल रहे।

मैं भी उस की बात से पूरी तरह सहमत था ....इस प्रोग्राम के फार्मैट में यही गड़बड़ी लगी...और ऊपर से उस बढि़या से गाने की ट्यून की भी कुछ इतनी ज्यादा ओवरडोज़ हो गयी कि हर बार ऐसा लगने लग गया कि जैसे सिर पर हथौड़ा सा ही मारा जा रहा था।

वैसे इस बार बार नाम बताए जाने की बात प्रोग्राम पेश करने वालों को भी कुछ अजीब सी लग रही होगी। तभी तो रेडिया जाकी ने जाते जाते कह भी दिया...अब इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले छात्रों के नाम श्रोताओं को क्या बताएं....वो तो उन्हें वैसे ही याद हो गये होंगे।

बिलकुल सही , युसूफ भाई , सभी नाम लगभग याद ही हो गये थे। आशा है कि आप इस प्रोग्राम के प्रोड्यूसर तक यह बात पहुंचाने का कष्ट करेंगे। हो सके तो ....आगे से कुछ इस तरह का हो कि सब छात्रों को एक ही जगह इक्ट्ठा कर के ऐसे प्रोग्राम की रिकार्डिंग की जाये.....ताकि उस में इन छात्रों की स्पोनटेयटिटि की सही तसवीर उभरे....और इस तरह के प्रोग्राम का इतना तरतीब से पेश किया जाना भी थोडा़ रास नहीं आया। अब एक प्रश्न किया है और अगर प्रोग्राम में भाग लेने वाले छात्र एक ही जगह पर एकत्रित हैं , तो जिस का मन करे पहले बोले.....जब तक दूसरा कुछ सोच ले। बस , यही बात रेडियोनामा तक पहुंचा कर मन हल्का सा हो गया है।

2 comments:

Dr. Ajit Kumar said...

प्रवीण सर,
नमस्कार!
सबसे पहले तो मैं आपको सही कर दूँ कि इस कार्यक्रम की जानकारी आपको यूनुस भाई ने दी, न कि उनके छोटे भाई युसूफ जी ने. आप पहले भी उनके नाम में confused थे.
प्रोग्राम फॉर्मेट की जहाँ तक बात है तो अपनी अपनी राय हो सकती है, पर बीच के गाने तो बिल्कुल प्रश्नों के साथ सटीक जम रहे थे. आई आई टी के ये सारे छात्र एक ही जगह जमा थे इंटर कॉलेज फेस्ट के लिए ये तो हमें प्रोग्राम के पहले ही बता दिया गया था.
मुझे तो कार्यक्रम बहुत पसंद आया और पसंद आई उन भावी technocrats की बेबाक राय.
पोस्ट के लिए धन्यवाद.

yunus said...

डॉ चोपड़ा शुक्रिया आपकी राय के लिए । पढ़कर अच्‍छा लगा । दरअसल ऑडियो मीडियम की अपनी सीमाएं हैं । हमारे सामने संकट ये था कि दस अलग अलग आवाजें आई आई टी के प्रतिभागियों की थीं । और हम दो संचालक । बारह आवाज़ों के बीच कैसे आप प्रतिभागियों की आवाज़ें पहचानेंगे हर बार । इस पर काफी विमर्श हुआ । और फिर इस तरह के फ्लैग लगाने का डिसीज़न हुआ । ये सच है कि तेज़ बीट ने सुनने वालों को थोड़ा सा परेशान किया होगा । पर हमारा सोचना ये था कि इन बीट्स से नाम प्रभावी तरीके से याद रहेंगे । आपकी प्रतिक्रिया से ये तो लगता है, नाम वाक़ई याद रह गये । बहरहाल आगे ख्‍याल रखा जाएगा । आपकी प्रतिक्रिया पहुंचा दी गयी है ।

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