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Friday, March 14, 2008

आप अपनी पसंद का ही सुनादें...

आप अपनी पसंद का ही सुनादें...  (आशेन्द्र सिंह)

रेडियो से जुडाव 1994 में आकाशवाणी ग्वालियर से शुरू हुआ।   इस यात्रा ने लगभग 6 साल का पड़ाव आकाशवाणी भोपाल में लिया। मैं मेन चैनल में था इस लिए नई फिल्मों की सी डी हमारी लायब्रेरी में फ़िल्म रिलीज़ होने के बहुत दिनों बाद आतीं थी, लेकिन विविध भारती (सी बी एस ) में जल्दी आ जाती थी।  इधर श्रोताओं के ज़्यादातर फरमाइशी ख़त नई फ़िल्मों के गीतों के लिये आते थे।  कभी - कभी सीबीएस से नई फ़िल्म की सीडी मांगने पर मिल जाती तो उसके गाने बजाते हुए बड़ी ख़ुशी होती।  एक बार फरमाइशी फिल्मी गीतों का साप्ताहिक प्रोग्राम जो कि लाइव फोन- इन था, कर रह था। एक श्रोता ने नई फ़िल्म के एक गाने की फरमाइश कर दी। हमारी लायब्रेरी में उस फ़िल्म की सीडी थी नहीं। मैंने श्रोता से क्षमा मांगते हुए कहा कि इस फ़िल्म की सीडी हमारी लायब्रेरी में नहीं है आप किसी और फ़िल्म का गाना बताइए , श्रोता ने दूसरी फ़िल्म भी नई बता दी। मैंने एक बार फिर क्षमा मांगते हुए कहा कृपया आप अन्य किसी फ़िल्म का गाना बताइए।  इस बार श्रोता बंधु ने 'शोले' फ़िल्म के गाने की फरमाइश की।  दुर्भाग्य से हमारे यहाँ 'शोले' की जो एलपी थी वह टूटी हुई थी। मैंने शायराना अंदाज़ में श्रोता से कहा किसी ऐसे गाने की फरमाइश कीजिए जो आप के साथ- साथ और सुनने वालों के दिल में उतर जाए ।  इस बार श्रोता खीज़ गया और बोला तब आप अपनी पसंद का गाना ही सुना दीजिएगा। श्रोता के तेवर से उसकी खीज़ ज़ाहिर हो रही थी। आख़िर मैंने फ़िल्म 'आशिकी' का  "तू मेरी जिन्दगी है ..." गीत सुनवाया

उसके बाद जब भी लाइव फ़ोन - इन करता तो श्रोताओं से शुरू में ही अनुरोध कर लेता कृपया बहुत नई फिल्मों के गानों की फरमाइश न करें ।

लेखक का परिचय उन्हीं के शब्दों में

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मैं आशेन्द्र सिंह मूलतः एक पत्रकार हूँ. शिक्षा में एम. ए. (हिंदी साहित्य) से करने के बाद पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिग्री ली. आकाशवाणी ग्वालियर से रेडियो से जुडाव हुआ यह यात्रा भोपाल आकाशवाणी तक अनवरत चली. भोपाल में युववाणी में लगभग 6 नए प्रोग्राम शुरू करवाए. इसी दौरान दो साल तक ई टीवी (मध्यप्रदेश) में दो धारावाहिक चलाये. लगभग 7 अख़बारों में कम किया कुछ रेडियो नाटक भी लिखे और कुछ खास संग्रहों में रचनाएँ भी प्रकाशित हुई. इसी बीच ज्ञानवानी में भी कम किया. कुछ फीचर बहुत उल्लेखनीय रहे है. फ़िलहाल दिल्ली के एक मीडिया संस्थान को बतौर संपादक सेवाएं दे रहा हूँ. साथ ही 5 राज्यों में एक विश्व स्तरीय संस्था के सहयोग से बच्चों को रेडियो का तकनीकी व व्यवहारिक प्रशिक्षण दे रहा हूँ. अपनीबात के नाम से एक ब्लोग भी चला रहा हूँ.

1 comment:

yunus said...

आशेंद्र जी आपने छोटे स्‍टेशनों में गानों की कमी की बात कही है कुछ हद तक सही है पर अब शायद हालात काफी सुधर गये हैं । वैसे मैंने कई बार फोन इन कार्यक्रम में कुछ ऐसे श्रोताओं की बातें सुनी हैं जिन्‍हें गाने से ज्‍यादा अपनी आवाज सुनने का शौक होता है इसलिए वो कहते हैं आप गाना तो कोई भी सुनवा दीजिए बस हमारी बातें पूरी सुनवाईयेगा । अच्‍छा है आप रेडियोनामा पर आए । अब आते रहिए ।

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